Radhika Krishna Rukmini. Darshan. Patrika.13.V2.S:7.
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कृण्वन्तो विश्वमार्यम.
In association with.
A & M Media.
Pratham Media.
Times Media.
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Radhika Krishna Rukmini.
Darshan.Patrika.
Number.13.Volume : 2. Series : 7.
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प्यार.व्यवहार.संस्कार.
राधिका कृष्ण रुक्मिणी दर्शन : १३.
पत्रिका आवरण पृष्ठ.
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* राधिका कृष्ण रुक्मिणी दर्शन : १३ :पत्रिका आवरण पृष्ठ : शक्ति.डॉ.अनु मंजिता अनुभूति. |
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जो तुम छोड़ो पिया मैं नाही तोडू रे.राधिका कृष्ण रुक्मिणी दर्शन : त्रिशक्ति प्रस्तुति.
दैनिक : में जाने व पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक को दवाएं.
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राधिका कृष्ण रुक्मिणी.
प्यार.व्यवहार.संस्कार.
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त्रिशक्ति विचार धारा
महाशक्ति मीडिया प्रस्तुति.
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राधिकाकृष्ण: प्रेम प्रकृति दर्शन : नैनीताल डेस्क : पृष्ठ : ० / १.
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राधिका डेस्क.
राधाकृष्ण मंदिर.मुक्तेश्वर.नैनीताल.
संपादन
शक्ति.डॉ.अनु मधुप रितु.
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शक्ति. राधिकाकृष्ण दृश्यम : विशेष : विचार.
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देख मुझे सब है पता
सुनता है तू मन की सदा
*
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स्वयं के जीवन में चमत्कार क्या अर्थ...है ..प्रिये !,
स्वयं के जीवन में चमत्कार क्या अर्थ...है ..प्रिये !,
आप मौन रह कर, खुले मन से विनीत होते हुए,
स्वयं को साबित करने के बजाय , सिद्ध लक्ष्य के लिए सम्यक कर्म करते रहते है
और आपके मन की कामना पूर्ण हो जाती है ...क्योंकि ईश्वर भी आपके साथ होते हैं
*
शोध विचार @ शक्ति. डॉ.अनु सुनीता रंजीता
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स्वयं को साबित करने के बजाय , सिद्ध लक्ष्य के लिए सम्यक कर्म करते रहते है
और आपके मन की कामना पूर्ण हो जाती है ...क्योंकि ईश्वर भी आपके साथ होते हैं
*
शोध विचार @ शक्ति. डॉ.अनु सुनीता रंजीता
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साभार इस्कॉन मंदिर : पाटलिपुत्र : दृश्यम.
*
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गायन : बस तुम्ही ही बसे हो मेरे मन में
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शब्द विचार
तोरा ' मन ' दर्पण कहलाए :
*
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विचार सन्दर्भ माया.
कृति शक्ति : डॉ. अनु : छाया.
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जब व्यक्ति स्वयं के गुण दोष को स्वीकार करने और सम्यक
जनों के लिए सम्मान करना शुरू कर देता है,
तो परिवर्तित जीवन में आनंद ही आनंद उत्पन्न होता है.
*
लोग क्या कहेंगे ?
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फ़र्क इसमें नहीं है कि लोग क्या कहेंगे
फ़िक्र तो इस बात की है आप क्या कहेंगे ?
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©️®️M.S.Media.Water Colour.26.
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विचार सन्दर्भ माया
कृति : शक्ति : छाया.
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जीवन क्या है ?
अपने स्वयं समस्त शब्दों और कर्मों का हिसाब ही ...तो
जिसमें हर्ष - विषाद, सफलता - विफलता , सम्मान - अपमान के
प्रतिफ़ल प्राप्त होते हैं , इसी जनम में....
*शोध विचार @ शक्ति. डॉ.अनु सुनीता रंजीता
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तोरा मन दर्पण कहलाए.
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तेरी मेरी कहानी है
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©️®️M.S.Media.WC.Madhup.1996
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विचार सन्दर्भ माया
कृति : मधुप : छाया.
लघुता से प्रभुता
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जब पत्थर तोड़ कर भगवान बन सकते हैं
तो अपने अहंकार खत्म कर हम इंसान क्यों नहीं हो सकते
ज़रा सोचिए
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लघुता क्षणिक आवेश, अनावश्यक क्रोध ,तत्क्षण निकले
अमर्यादित, अपरीक्षित सत्य रहित शब्दों का स्वयं के मानवीय आचरण
में संवहन करना
प्रभुता समय ,सत्य ,शब्द की विशालता, निजता और सहनशीलता, का सम्मान है प्रिय
*
जो व्यक्ति अपने मन के साथ साथ दूसरे वैष्णव जन के मन को समझ लेता है
उस अंतर्यामी को दुनिया समझने की
कोई आवश्यकता नहीं रह जाती...
*
शोध विचार @ शक्ति.प्रिया मधुप अनुभूति.
*
टाइम्स मीडिया प्रस्तुति --------- रुक्मिणीकृष्ण : प्रकृति प्रेम : दृश्यम : आज : पृष्ठ : ० / १. ---------- राधाकृष्ण मंदिर.मुक्तेश्वर. नैनीताल डेस्क संपादन शक्ति.रेनू मधुप मीना . |
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शक्ति. रूक्मिणीकृष्ण दृश्यम : विशेष : विचार.
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प्यार : व्यवहार : संस्कार.
*
*
रुक्मिणी कृष्णे हृदयम, शांतिः भवेत.
*
गोविन्द बोलो हरि गोपाल बोलो.
*
स्वयं शक्ति मीना सिंह अभिनीत
भजन सुनने व देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक को दवाएं.
*
बड़े बड़ाई न करे बड़े न बोले बोल
*
बड़े बड़ाई न करे बड़े न बोले बोल
जो जितने बड़े उसमें उतनी ही विनयशीलता
जो जितने छोटे उसमें उतनी ही हठधर्मिता
विचार करें आप किस श्रेणी में हैं
*
राम : रावण और अंतर्मन
*
पहले रावण बाहर था आज का रावण
स्वयं के भीतर और आस पास भी है इसलिए धर्म युद्ध
अब धनुष का नहीं स्वयं के विवेक का है
इसलिए सत्कर्म करें ,सजग रहें और सकारात्मक भी रहें
*
जहाँ जाइएगा हमें पाइएगा.
लगाव में खोने के डर से हम किसी को पकड़ कर रखते हैं
जबकि प्रेम में यह विश्वास है कि उन्हें लौट कर हमारे पास ही आना है
*
प्रकृति : फूल और कांटें
©️®️M.S.Media.Madhup.
Painting Water Colour. 80 / 26.
*
विचार सन्दर्भ माया
कृति मधुप : छाया.
*लेकिन इसकी खुशबू जो फ़िजा में सदियों तलक लोगों की रूहों में
रच बस जाती है ...एक प्रकृति की सुन्दर प्रेम कहानी ही है
*
शोध विचार @ शक्ति.रेनू मधुप मीना.
*
*
विचार सन्दर्भ माया
शक्ति. रितु सिंह : कृति छाया
*
मौन हूँ, निःशब्द हूँ मगर निस्सार नहीं, अर्थ पूर्ण हूँ
भले बुरे की परख़ मुझे, जागृत हूँ, त्रिकाल दर्शी हूँ हो साथ माधव तो सार्थक हूँ सम्पूर्ण हूँ
*
दृष्टि के समक्ष तो हृदय में वर्तमान
वास्तविक प्रेम का परीक्षण,साथ तो अनुपस्थित, दूरी और निःशब्दता के साथ में है
शोध विचार @ शक्ति.प्रिया मधुप रितु .
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कोई तो है.
*
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सन्दर्भ : विचार : माया.
शक्ति : अनु : छाया.
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कितना मुश्किल है दिल को समझाना कि कोई था, अब नहीं है
सच्चाई मन से पूछिए कोई था,कब नहीं है,अब भी है,और रहेगा भी
*
मेरी बात के माने दो
यदि जीवंतता है, व्यक्ति की स्वतंत्रता मान्य है तो भिन्नता के साथ असंगतता होगी ही
तब जीवन में भिन्नता, स्वतंत्रता के साथ सामंजस्य स्थापित करने का नाम ही
जीवन है
*
शब्द सम्हारे बोलिए.
शब्द सम्हारे बोलिए, शब्द के हाथ न पाँव
एक शब्द औषधि करे, एक शब्द करे घाव.
*
*
विचार सन्दर्भ माया
शक्ति. रितु सिंह : छाया.
*
जीवन का वास्तविक मूल्य संग्रह में नहीं
बल्कि उस विग्रह में है जो सुकर्म से अर्जित किए गए विरासत में आप
अपने बाद बहुजन के हृदय में स्मृति वश छोड़ जाते हैं
*
देखा है जिंदगी को कुछ इतना क़रीब से
अपनी जिंदगी में ' समय ',' शब्द ' और ' शख्स '
को पढ़ने, ' जानने ' और समझने की ' सलाहियत ' जरूर रखिए
क़ामयाबी आपके क़दम चूमेगी
*
विचार @ शक्ति.डॉ.राखी मधुप अनु .
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राधिकाकृष्ण : जीवन दर्शन : दृश्यम : शब्द चित्र : पृष्ठ : १ / १.
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वृन्दावन.डेस्क.
संपादन
शक्ति. गुल मधुप शबनम
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दर्शन ड्योढ़ी : राधिकाकृष्ण.
*
मैनें तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने
*
जागो उठ कर देखो
जीवन जोत उजागर है
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©️®️M.S.Media. Water Colour .25 / 26
*
सन्दर्भ : विचार : माया.
शक्ति.रितु कृति : मधुप : छाया.
*
आसक्ति यदि सकारात्मक, रचनात्मक व सर्वहित में है तो श्रेष्यकर
अनासक्ति स्वार्थी, एकाकी सर्व हित से परे है तो इसका क्या औचित्य
*
जब जब तू मेरे सामने आए
*
विनम्रता मानव का सबसे अहम गुण है जो संयम से
जनित है जिससे मानव का क़द और क़िरदार
ऊँचा होता है
*
शोध विचार शक्ति रेनू मधुप रितु .
*
तुम्हें दूसरे से मधुर सुनना प्रिय है , तो उसे क्यों नहीं ?
तुम्हें दूसरे की कटुता नहीं भाती है ,तो दूसरे को तुम्हारे कड़वे बोल कैसे भले लगेंगे ?
अपने दिल से जानिए पराए दिल का हाल
*
शोध विचार शक्ति सीमा सुनीता रंजीता.
*
सही जिज्ञासा यह नहीं है कि मृत्यु के बाद जीवन का अस्तित्व है या नहीं, मूल प्रश्न तो हमारे समक्ष यह है कि हम मृत्यु से पहले कितना, कब ,कहाँ ,कैसे
और किसके लिए सम्यक जीवन जीते हैं ?
*
शोध विचार शक्ति सीमा सुनीता रंजीता
*
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विचार सन्दर्भ माया
मधुप शक्ति. अनु : छाया.
*
अपने लिए, सब के लिए तो जी कर देख लिया, माधव
अब सम्यक मन सम्यक जन के लिए जीना चाहता है
*
प्यार, व्यवहार और संस्कार के साथ
ख़ुशीपूर्वक जीने के लिए क्या लगता नहीं कि मेरे अपने सपने देखना जरुरी है ?
तनिक विचार कीजिये
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विचार @ शक्ति.प्रिया.मधुप अनु
-------रुक्मिणीकृष्ण : जीवनदर्शन : दृश्यम : शब्द चित्र : पृष्ठ : १ / २.
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विदर्भ डेस्क : महाराष्ट्र
संपादन
शक्ति.शालिनी डॉ सुनीता मधुप.
शक्ति.शालिनी डॉ सुनीता मधुप.
*

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विचार सन्दर्भ माया
शक्ति.डॉ.सुनीता मधुप : छाया.
*
जागो मोहन प्यारे
*
क्या स्वयं का जीवन संघर्ष महाभारत नहीं ?
क्या अपने आस पास धृतराष्ट्र ,शकुनि, दुःशासन और दुर्योधन नहीं ?
क्या अपने भीतर छल प्रपंच, ईर्ष्या द्वेष ,लोभ कामना नहीं ?
यदि है तो ,आज के परिपेक्ष्य में प्रासंगिकता किस की है , विचार कीजिए
सतयुग सत्य हरिश्चंद्र की , मर्यादा पुरुषोत्तम राम की
या व्यवहारिक, योगीराज, कर्मयोगी श्री कृष्ण की ?
*
उत्तिष्ठत जाग्रत
स्वप्न से शीघ्र जाग जाना ही श्रेष्यकर है..प्रिय
फिर चाहे वह ' नींद ' से हो, ' वहम ' से हो,या ' अहम ' से
*
त्रेता युग : द्वापर युग : कल युग
*
विचार सन्दर्भ माया
शक्ति.रितु सिंह : छाया.
त्रेता युग : द्वापर युग : कल युग.
मन रे इस ' कलयुग ' छल प्रपंच, स्वार्थ ,धोखा युक्त मायावी संसार में
तू ' सतयुग ' के हरिश्चन्द्र , ' त्रेता युग ' के राम को काहे को ढूंढें ?
द्वापर युग के श्रीकृष्ण, मनमोहन है ना, तेरे पास
*
नीयत नीति और नियति
मनुष्य के स्वयं नियति का रास्ता उसकी स्वयं की नीति और
उसकी नीयत से ही जुड़ा है कि वो सफ़लता या विफलता किस पड़ाव पर
पर पहुंचेगा
*
तुम्हारे लिए
शोध विचार शक्ति @ शालिनी डॉ.सुनीता मधुप.
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मीराकृष्ण : जीवन दर्शन : शब्द चित्र : दृश्यम : मेवाड़ : डेस्क : पृष्ठ : १ / ३.
----------
*
मीरा डेस्क.
मेवाड़ डेस्क.जयपुर.
प्रादुर्भाव वर्ष : १९८२.
संस्थापना वर्ष : १९८९. महीना : सितम्बर.दिवस : ९.
*
मेवाड़ डेस्क.जयपुर.
संपादन.
शक्ति.जया अनीता गरिमा
*
साची कहूं तुमसे.
*
जिंदगी का सफ़र ये है कैसा सफ़र.
*
![]() |
विचार : सन्दर्भ माया. छोटू कृष्णा : छाया. |
*
कहीं आप वो तो नहीं
*
द्वेष, क्रोध, लोभ, काम और अहंकार मानव जीवन के वर्तमान पांच अवगुण है
जो मानव के सही गलत निर्णय लेने के विवेक को हर लेते है
अपने अंतर्मन में ढूंढ लीजिए
*
चैन से जीने के लिए सभी बैचेन है.माधव !
सिर्फ़ अपने लिए
*
*
है कौन ये दुनियाँ में
न पाप किया जिसने
*
कुछ दूसरों की कमियों को भी सहना सीख लीजिए
मत भूलें कि हममें भी कई खामियाँ हैं जिन्हें दूसरे सहन करते हैं
*
तुलसीदास.
धीरज, धरम, मित्र अरु नारी।
आपद काल परिखिअहिं चारी॥
*
उसने मेरी हर ' हँसी ' की क़ीमत वसूल ली
जबकि ' गुमान ' यह था कि हर क्षण अपनी जिंदगी में ' शक्ति ' हॅंस कर ही मिलेगी
*
सौ बार जनम लेंगे सौ बार फ़ना होंगे
मन चाहत में ही भटकता रहा यूँ ही इधर उधर
जिंदगी ढ़लती रही सरे शाम उम्र की दहलीज पर.
*
शोध विचार @ शक्ति.डॉ.रजनी मधुप गरिमा.
*
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सम्पादकीय शक्ति पृष्ठ : २.
---------
*
त्रिशक्ति
कार्यकारी सम्पादिका.
*

*
मुक्तेश्वर.नैनीताल डेस्क.
शक्ति.डॉ.सुनीता रंजिता मीना.
*
त्रिशक्ति छाया.
लघु फ़िल्म सम्पादिका.
*
*
त्रिशक्ति
सम्पादकीय शोध विचार धारा : पृष्ठ : २.
@ शक्ति शालिनी मधुप रेनू.
*
लघु कथा : डॉ.मधुप
*
मन का संयम टूटा जाए : २ / १
*
राधिका : माधव ! मेरी यह वर्तमान अभिलाषा है .....इसे पूर्ण कर दें...
माधव : जैसी आपकी इच्छा....
( थोड़े ही दिनों में राधिका के मन की आरोपित इच्छा ही मन का बंधन बन गयी. घुटन होने लगी )
राधिका : नहीं माधव ! जैसे पूर्ववत था वही रहने दें......
माधव : जैसा आप चाहे......
( पुनः राधिका के मन में कहीं न कही फांस रह ही गयी...कुछेक दिनों बाद )
राधिका : स्वयं में ही प्रश्न किया ......अब मैं नाचूं बहुत गोपाल ?
चित को अभी भी शांति नहीं मिली प्रभु , विकार मेरे मन में ही है ...चाहती हूँ अवगुण मेरे चित ना धरो
माधव : यथार्थ राधिके ! सम्यक साथ, सोच,शब्द और सत्कर्म ही मानव की अंतिम चिर अभिलाषा होनी चाहिए
अब मैं नाचूं बहुत गोपाल
*
अनु : प्रेम किसके जैसा होना चाहिए शिव पार्वती की भाँति या कृष्ण ,राधा रुक्मिणी जैसा ?
मन : शिव शक्ति के लिए एकनिष्ठ थे, अधिकार पूर्ण,असहज हुए बाद में प्रलयंकारी भी
दूसरी तरफ माधव राधा रुक्मिणी के लिए स्वाभाविक, सहज और व्यवहारिक थे
इसलिए प्रेम अमर हो गया....अब आप अपने मन से सुनिश्चित करें
आप किस पक्ष में हैं ?
*
अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो वा.
*
*
हमें कड़वे सच से बेहतर हमें धर्मराज युधिष्ठर का वो कल्याणकारी अर्ध्यसत्य
की आवश्यकता है जिससे जीवन संघर्ष महाभारत में अधर्म पर धर्म विजय मिले
*
शोध विचार @ शक्ति शालिनी मधुप रेनू.
©️®️M.S.Media.WC.26
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सम्पादकीय : त्रिशक्ति : गोरी साँवरे सलोनी : गद्य संग्रह : आलेख : पृष्ठ : २ / २.
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अ 'भय हो : अति सूक्ष्म लघु कथा.
शक्ति. डॉ.सुनीता मधुप अनुभूति.
©️®️M.S.Media.
बरसों बीत गए । बात पुरानी है। एक कहानी है। बचपन की कहानी तेरी मेरी। हमारे पार्श्व में लगभग ढाई साल का एक बच्चा रहता था। बहुत ही प्यारा दुलारा। सीधा साधा आज्ञाकारी। भोले भाव मिले रघुराई। मैं बड़े प्यार से उन्हें छोटू कृष्णा कहता। हमारी उनकी खूब बातें होती थी। कुछ वो जाने कुछ न हम जाने। माँ ने उन्हें कुछ कुछ बोलना सिखाया ।
जैसे ....क्रो, काऊ, ...आदि। एक दिन उन्होंने बिल्ली देखी। ...मां ने कहा,.... कैट ....म्याऊ ...।
एक दिन इसी तरह उन्होंने कहा : पई !
मैं समझ नहीं पाया। माँ से जानना चाहा,तब उसकी माँ ने कहा वह कह रहे है, ... .पढ़ रहे है।
अवस्था पांच साल की हुई। अब स्कूल में दाखिले की बारी आयी। पूरी तैयारी के साथ उन्हें मना फुसला कर पाठशाला ले जाया गया।
लेकिन त्रासदी देखिए परिसर में प्रवेश करते ही उन्होंने गुरु जी को ख़जूर की छड़ी से एक बच्चे को मारते हुए देख लिया। साथ ही साथ गुरु जी चिल्ला भी रहे थे।
पार्श्व में ही कुछ शरारती बच्चें दंडस्वरूप मुर्गा भी बने हुए थे। वो काफी सहम गए। माँ के पीछे जा छिपे।
आगे इस भयपूर्ण वातावरण : चीखने ,चिल्लाने की घटना ने उनके मनोमस्तिष्क पर इतना दुष्प्रभाव डाला कि कई दिनों तक़ वह विद्यालय ही नहीं गए। कदाचित औपचारिक शिक्षा से दूरी ही बना ली।
दशक बीत गए। अनायास ही एक दिन उनकी माँ से मुलाक़ात हो गयी।
पूछा, कहाँ है छोटू कृष्णा ? ...क्या कर रहें है ?
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| शक्ति. काजल |
उनके बारे में सुनना बहुत ही अच्छा लगा।
उनकी माँ कह रही थी, ....बमुश्किल स्कूल गए। अधिकतर शिक्षा अनौपचारिक ही पूरी की। ..अभी मनोविज्ञान के शोधार्थी है। प्रकृति से उन्हें शुरू से ही लगाव था .. इसलिए मन ....प्रकृति ...मस्तिष्क....व्यवहार....वाणी ...भय ...और वातावरण पर शोध कर रहे है।
याद आ गया बच्चे ही बड़े ( विकसित ) के पिता होते हैं। बचपन की आदतें ही बड़ेपन में घर कर लेती हैं ना ।
सीख : अपने आम जीवन के बदलते घटना क्रम में कभी न कभी में भय का मन में पैदा होना तो लाज़िमी ही है। लेकिन अ'भय हो इसका सम्यक प्रयास पीड़ित और दोषी दोनों की तरफ़ से होना चाहिए। सच ही रविंद्र ने कहा है व्हेर द माइंड इज विदाउट फियर।
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आधी सच्ची आधी झूठी। यह अर्थपूर्ण लघु कथा जीवन की कई सत्य घटनाओं से प्रेरित है।
*
विशेष संपादन : शक्ति.काजल अंजू डॉ. मनीष.नई दिल्ली.
सज्जा : शक्ति. रंजिता सीमा अनुभूति .
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शक्ति आलेख. : संस्मरण :धर्म : अध्यात्म और जीवन.
तोरा मन दर्पण कहलाए : जीवन दर्शन
शक्ति.मातृ की कलम से.
*
शक्ति.निर्मला सिन्हा.
प्रधान आचार्या.
*
परिवर्तन ही जीवन का शाश्वत नियम है : ईश्वर ने इस परिवर्तन शील ब्रह्माण्ड में अनेकों प्रकार के जीवजन्तु पेड़ पौधे पैदा किए हैं । सभी जन्म लेते हैं। परिर्वतनशील जीवन में आगे बढ़ते हैं। और परिवर्तित होते जाते हैं। अस्थायीत्व सभी में हैं। स्थायित्व तो कहीं भी नहीं है सिर्फ इसका सृष्टिकर्ता ही स्थायी हो सकता है।
बीज से पेड़, पेड़ से फल और पुनः फल से बीज और पेड़ की उत्पति होती है। जीव जंतुओं में भी अपनी हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चौरासी लाख योनियों की संख्या बतलाई गई है। और प्रत्येक एक जीव में एक अंनत सता का निवास है जो कथित आत्मा है। वह कभी क्षीण नहीं होती।
जीवन चलने का नाम : रूप परिवर्तन भले ही हो जाए, शरीर नष्ट हो जाए लेकिन उस अजर अमर आत्मा का विनाश कभी नहीं होता है । जब व्यक्ति जन्म लेता है,मरता भी है। प्रथमतः वह अपनी मातृ शक्ति तदुपरांत अपने परिवार से बंध जाता है। उसका अपना इच्छित समूह व समाज होता है , जिसमें वह अपना समय व्यतीत करता है । मानव जीवन जीवन मृत्यु चक्र व परिवर्तन के साथ निरंतर गतिशील है।
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पुनः नए जीवन की शुरुआत होती है। शेष रहती है तो केवल स्मृतियां। समय के साथ -साथ स्मृतियां भी धुँधली पड़ने लगती है। क्योंकि अवस्था और कारण वश मन भूलने लगता है।
जीवन के कठोर यथार्थ, समस्त कटु मीठे तीखे अनुभवों के मध्य विस्मृतियों का पर्दा व्यक्ति को अंततः सहज व सामान्य बना ही देता है।
स्मृतियाँ जहाँ जीवन को संजोती हैं, वहीं कठोर यथार्थ का सामना होने पर भूलने की विवशता मनुष्य का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच बन जाती है। इस विषय को अपने जीवन में अनुभव से अर्जित निम्नलिखित तीन मुख्य बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है।
मानसिक संतुलन : पुरानी कड़वी यादों को न भूल पाने से व्यक्ति वर्तमान को खुलकर नहीं जी पाता है , इसलिए आगे बढ़ने के लिए विस्मृति आवश्यक है। हमें भरसक प्रयत्न करना ही चाहिए।
परिवर्तन की स्वीकार्यता : भी अनिवार्य है। समय निरंतर बदलता है और पुराने घावों को पीछे छोड़ना ही प्रकृति का नियम है। जिसने बदलाव को नहीं माना दिक्कतें हुई।
भावनात्मक मुक्ति : कुछ घटनाओं को भूलना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि मानसिक शांति और नई शुरुआत के लिए उठाया गया एक व्यावहारिक कदम है। इसे अपनाना ही होगा सम्यक परिवर्तनों के साथ।
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मेरे : गीत : समर्थित : तोरा मन दर्पण कहलाय
जग से चाहे : भाग ले कोई मन से भाग न पाय
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साभार : फ़िल्म काजल : मीना कुमारी
प्रस्तुति : शक्ति : डॉ.सुनीता मधुप सीमा.
*ईश्वर की ख़ोज : मन में या मंदिरों में : मैंने खूब यात्रायें की। अयोध्या देखी, द्वारिका देखी। मथुरा, वृन्दावन गोकुल भी देखी । बंगलोर, मैसूर ,रामेश्वरम, मदुरई , तिरुपति, मीनाक्षी मंदिर, द्वारिका, पुरी के साथ साथ अन्य धार्मिक स्थलों की भी यात्राएं की ।
मंदिरों की भव्यता वास्तुकला ने सिद्ध कर दिया है कि भारत कलाकारों और महान निर्माण कर्ताओं का देश है। भावनाएं मिली, भक्ति भाव भी जागे। मूर्तियों में दर्शन भी हुए ..... लेकिन ईश्वर मिले....? मिलते कहाँ ? वो तो मृग की कस्तूरी की तरह अन्तः मन में ही छिपे थे।
मानती हूँ मन चंगा तो कठौती में गंगा। मन पवित्र है तो मन ही देवता है। जग से भाग लीजिए मन से कैसे भागेंगे ? सच में आपके मन में ही आपके किये गए समस्त अच्छे बुरे सभी कर्मों का लेखा जोखा है। आप स्वयं भी जानते है। अपने मन से निर्दोष बनिए जग को दिखलाने के लिए नहीं। अपनी गलतियों के लिए भी स्वयं में लज्जित हो ,सुधार के लिए प्रयास रत भी रहें । प्रशंसा दूसरों से होने दें स्वयं से नहीं।
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| श्री हरि : बद्री विशाल के दर्शन : निर्मला सिन्हा : फोटो : प्रत्येश |
कर्मों का लेखा-जोखा स्वयं के भीतर ही : आप दुनिया की नज़रों से अपने गलत कर्म या विचार छुपा सकते हैं, लेकिन अपने स्वयं के मन से कुछ भी नहीं छुपा सकते. आपका मन आपके हर भले-बुरे कर्म को देखता भी है और आपको उसका अहसास भी कराता है।
मन की पवित्रता : इस भजन में आगे सीख दी गई है कि इंसान को इस ' मन रूपी दर्पण ' पर कभी भी झूठ, ईर्ष्या या लालच की धूल नहीं जमने देनी चाहिए, ताकि उसकी अंतरात्मा हमेशा शुद्ध और सत्य का मार्ग दिखाती रहे। संक्षेप में, यह पंक्ति इंसान को आत्म-मंथनऔर ईमानदारी से जीने की प्रेरणा देती है।
*
©️®️M.S.Media.Madhup
Painting Water Colour 03/ 26.
*
संपादन सज्जा
शक्ति.डॉ.सुनीता मधुप सीमा
*
क्रमशः जारी
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शक्ति आलेख. २ / २ / १
सीकर : राजस्थान के खाटूश्यामजी
भीम के पुत्र घटोत्कच के पुत्र महान धनुर्धर बर्बरीक
*
शक्ति.सीमा डॉ.आर के मधुप.
शांति के प्रयास व्यर्थ हुए। कुरु वंश में पांडवों और कौरवों के मध्य महाभारत निश्चित था। समस्त आर्यावर्त के राजा अपने पक्ष को मर्यादित कर रहें थे कि उन्हें किसे साथ देना है ? इनमें से महावली भीम के पौत्र महान धनुर्धर बर्बरीक भी थे जिनके अजीब गरीब प्रण ने श्रीकृष्ण को दुविधा में डाल रखा था। उन्होंने सुनिश्चित किया था कि वो हारे का सहारा बनेंगे। कृष्ण को इस वचनबद्धता का परिणाम भी ज्ञात था। वह कदाचित चिंतित भी थे।
अब प्रश्न उठता है कि ये बर्बरीक थे कौन और कहां से किस दृष्टि से पुरा युद्ध देख रहे थे कि उन्होंने युद्ध का तात्विक हक़ीक़त देख पाये।
बर्बरीक एक महान धनुर्धर परिचय : भीम के पुत्र घटोत्कच के पुत्र थे बर्बरीक। उनकी माता: नागकन्या मोरवी या अहिलवती थी। उनके पितामह पांडव पुत्र भीम थे। बर्बरीक की अद्भुत शक्तियाँ और तीन बाणबर्बरीक को शिव जी और नवदुर्गा की तपस्या से तीन ऐसे बाण प्राप्त थे, जिससे वे पूरी दुनिया को कुछ ही मिनटों में जीत सकते थे।
पहला बाण : उन सभी शत्रुओं को चिह्नित करता था जिन्हें नष्ट करना हो। दूसरा बाण : उन लोगों को चिह्नित करता था जिन्हें बचाना हो। तीसरा बाण : चिह्नित किए गए सभी शत्रुओं का खात्मा कर वापस लौट आता था।
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बर्बरीक श्रीकृष्ण को शीश दान करते हुए |
बर्बरीक का पांडवों के हित में शीश दान करना : बर्बरीक की क्षमता देखकर श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण वेश में उनसे दान में उस का शीश ही मांग लिया। तब भगवान श्रीकृष्ण ब्राह्मण का भेष बनाकर सुबह बर्बरीक के शिविर के द्वार पर पहुंच गए और दान मांगने लगे।
बर्बरीक ने कहा, ' मांगो ब्राह्मण ! क्या चाहिए ..?
ब्राह्मणरूपी कृष्ण ने कहा, कि तुम दे न सकोगे।
लेकिन बर्बरीक कृष्ण के जाल में फंस गए और कृष्ण ने उससे उसका शीश मांग लिया। बर्बरीक द्वारा अपने पितामह पांडवों की विजय हेतु स्वेच्छा के साथ शीशदान कर दिया गया।
बर्बरीक ने खुशी-खुशी अपना शीश दान कर दिया, लेकिन महाभारत युद्ध देखने की इच्छा प्रकट की। श्रीकृष्ण ने उनके कटे सिर को एक ऊंचे स्थान पर रख दिया, जहाँ से उन्होंने पुरा युद्ध देखा। संजय के अतिरिक्त अन्य बर्बरीक व हुनमान जो अर्जुन की रथ की पताका पर विद्यमान रहें ही थे जिन्होंने महाभारत का सम्पूर्ण युद्ध देखा था।
श्रीकृष्ण द्वारा खाटू श्याम बनने का वरदान : युद्ध की समाप्ति के बाद श्रीकृष्ण ने बर्बरीक के महान बलिदान से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया कि कलयुग में उन्हें श्रीकृष्ण के नाम ' श्याम ' से पूजा जाएगा। आज उन्हें राजस्थान के सीकर जिले में स्थित प्रसिद्ध खाटू श्याम मंदिर में बाबा खाटू श्याम के रूप में पूजा जाता है।
महाभारत के युद्ध समाप्ति के बाद जब पाण्डवों में विजयश्री के श्रेय के लिए होड़ लगी थी तब श्री कृष्ण ने कहा कि इसका निर्णय तो बर्बरीक का शीश ही बेहतर कर सकता हैं। बर्बरीक ने तब बताया कि युद्ध में दोनों ओर श्री कृष्ण का ही सुदर्शन चल रहा था और द्रौपदी महाकाली बन रक्तपान कर रही थी।
हारने वाले का साथ : बर्बरीक दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे। बर्बरीक के लिए तीन बाण ही काफी थे जिसके बल पर वे कौरवों और पांडवों की पूरी सेना को समाप्त कर सकते थे। युद्ध के मैदान में भीम पौत्र बर्बरीक दोनों खेमों के मध्य बिन्दु एक पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हो गए और यह घोषणा कर डाली कि मैं उस पक्ष की तरफ से लडूंगा जो हार रहा होगा। बर्बरीक की इस घोषणा से कृष्ण चिंतित हो गए।
बर्बरीक का अतुलनीय पराक्रम : भीम के पौत्र बर्बरीक के समक्ष जब अर्जुन तथा भगवान श्रीकृष्ण उसकी वीरता का चमत्कार देखने के लिए उपस्थित हुए तब बर्बरीक ने अपनी वीरता का छोटा-सा नमूना मात्र ही दिखाया। कृष्ण ने कहा कि यह जो वृक्ष है इसके सारे पत्तों को एक ही तीर से छेद दो तो मैं मान जाऊंगा।
बर्बरीक ने आज्ञा लेकर तीर को वृक्ष की ओर छोड़ दिया।
जब तीर एक-एक कर सारे पत्तों को छेदता जा रहा था उसी दौरान एक पत्ता टूटकर नीचे गिर पड़ा। कृष्ण ने उस पत्ते पर यह सोचकर पैर रखकर उसे छुपा लिया की यह छेद होने से बच जाएगा, लेकिन सभी पत्तों को छेदता हुआ वह तीर कृष्ण के पैरों के पास आकर रुक गया।
तब बर्बरीक ने कहा कि प्रभु आपके पैर के नीचे एक पत्ता दबा है कृपया पैर हटा लीजिए, क्योंकि मैंने तीर को सिर्फ पत्तों को छेदने की आज्ञा दे रखी है आपके पैर को छेदने की नहीं।
उसके इस चमत्कार को देखकर कृष्ण चिंतित हो गए। भगवान श्रीकृष्ण यह बात जानते थे कि बर्बरीक प्रतिज्ञावश हारने वाले का साथ देगा। यदि कौरव हारते हुए नजर आए तो फिर पांडवों के लिए संकट खड़ा हो जाएगा और यदि जब पांडव बर्बरीक के सामने हारते नजर आए तो फिर वह पांडवों का साथ देगा। इस तरह वह दोनों ओर की सेना को एक ही तीर से खत्म कर देगा।
बर्बरीक के इस बलिदान को देखकर दान के पश्चात श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को कलियुग में स्वयं के नाम से पूजित होने का वर दिया। आज बर्बरीक को खाटू श्याम के नाम से पूजा जाता है। जहां कृष्ण ने उसका शीश रखा था उस स्थान का नाम खाटू है।
*
संपादन : शक्ति शालिनी रंजिता रेनू
संपादन : शक्ति शालिनी रंजिता रेनू
सज्जा शक्ति. कंचन मंजिता स्वाति.
*
*
*
------------
सम्पादकीय :त्रिशक्ति : गोरी साँवरे सलोनी : पद्य संग्रह : आलेख : पृष्ठ : २ / ३.
---------------
संपादन
शक्ति. डॉ.रजनी मानसी रेनू
*
*
शक्ति. अनुभाग
*
*
शक्ति. रेनू शब्दमुखर.
लेखिका कवयित्री सम्पादिका.
जयपुर.
*
सीपिकाएँ.
तू लाली है सबेरे वाली
*
तू लाली है सबेरे वाली
*
©️®️M.S.Media.
Shakti.Soni. Indraprasth.Water Colour Painting.16 / 26.
*
शक्ति. सोनी : इंद्रप्रस्थ : छाया. भाविका : संदर्भित : माया.
*
मेरे हिस्से की धूप ( रोशनी )
Shakti.Soni. Indraprasth.Water Colour Painting.16 / 26.
*
शक्ति. सोनी : इंद्रप्रस्थ : छाया. भाविका : संदर्भित : माया.
*
मेरे हिस्से की धूप ( रोशनी )
मेरी ड्योढ़ी से
किसी ने चुरा भी ली
तो क्या हुआ ?
मैने फिर से,
अपने मन के आँगन में,
एक पूरा सूरज उगा कर
सुराखों से छीजती रोशनी से
किसी ने चुरा भी ली
तो क्या हुआ ?
मैने फिर से,
अपने मन के आँगन में,
एक पूरा सूरज उगा कर
सुराखों से छीजती रोशनी से
घर मन संसार रोशन कर
एक नया
सबेरा बसा लिया
*
शक्ति. रेनू मधुप सोनी
*
सीपिकाएँ
नदी और नारी
*
*
मैं कोई आईना नहीं थी
जो हर चेहरा लौटा देती.
मैं तो वो नदी थी
*
जिसने पत्थर को
भी बहना सीखा दिया.
*
संपादन सज्जा
शक्ति.शालिनी मधुप अनुभूति .
शक्ति.शालिनी मधुप अनुभूति .
*
मैं ठीक हूँ.


वह रोई नहीं
मैंने आज देखा
मैंने आज देखा
क्लासरूम में
रोज की तरह चकर-चकर
करने वाली
वह बहुत शांत थी
लग रहा था जैसे मेरे पूछते ही रो देगी
पर वह रोई नहीं.
बस खिड़की से बाहर देखती रही.
मैं समझ गयी
कुछ टूट गया है भीतर.
पूरी क्लास में
वह सबसे शांत थी.
और मैं जानती हूँ,
सबसे ज़्यादा शोर
*शक्ति. अनुभाग
*
डॉ.रजनी परमार *
कवयित्री.लेखिका.एंकर पटना दूरदर्शन.
सम्पादिका एम. एस. मीडिया.
*
भाविकाएँ
सज कनुप्रिया के जूड़े
*
प्रेम में देना मुझे
कनेर के फूल प्रिय !
सज कनुप्रिया के जूड़े
ज्यों इतराऊँ
पीत पट श्याम सा
हर धूप,धूल,बारिश
*
*
और झेलते हुए उपेक्षा दंश को
जब भी बंशी की टेर सुनूं
कर श्रृंगार कनेल के फूलों से
दौड़ पड़ूं सब छोड़ छाड़
हिय लगने को तेरे प्रिय !
*
संपादन सज्जा
शक्ति. डॉ.सुनीता रंजिता सीमा.
संपादन सज्जा
शक्ति. डॉ.सुनीता रंजिता सीमा.
*
शक्ति. अनुभाग
*
*
*
शक्ति. शालिनी
लेखिका. कवयित्री. प्रधान सम्पादिका.
एम. एस. मीडिया.
*
गज़ल
*
दर्द के सारे सफ़्हे मेरी आशनाई हो गए.
*

*
गज़ल सन्दर्भ : माया
कृति : कलर पेंटिंग ९२ : मधुप : छाया.
*
जो अश्क़ आँख से उतरे, रोशनाई हो गए,
दर्द के सारे सफ़्हे मेरी आशनाई हो गए.
मैंने जो कुछ भी जिया था,वही अल्फ़ाज़ बना,
उम्र के बिखरे हुए लम्हें मेरी गहराई हो गए.
माँ की दुआ, बाप की सीख,घर की वो मिट्टी की महक,
मेरे काग़ज़ पर उतरकर मेरी रहनुमाई हो गए.
कुछ शिकायत थी ज़माने से,कुछ ख़ुद से गुफ़्तगू,
दिल में दफ़्न सारे क़िस्से लब की गोयाई हो गए.
*
शब्दार्थ
रोशनाई : स्याही, सफ़्हे-पन्ना/पृष्ठ,
आशनाई : परिचय/लगाव/मोहब्बत,
गोयाई: बोलने की क्षमता,
*
*
दर्द के सारे सफ़्हे मेरी आशनाई हो गए.
*

*
गज़ल सन्दर्भ : माया
कृति : कलर पेंटिंग ९२ : मधुप : छाया.
*
जो अश्क़ आँख से उतरे, रोशनाई हो गए,
दर्द के सारे सफ़्हे मेरी आशनाई हो गए.
मैंने जो कुछ भी जिया था,वही अल्फ़ाज़ बना,
उम्र के बिखरे हुए लम्हें मेरी गहराई हो गए.
माँ की दुआ, बाप की सीख,घर की वो मिट्टी की महक,
मेरे काग़ज़ पर उतरकर मेरी रहनुमाई हो गए.
कुछ शिकायत थी ज़माने से,कुछ ख़ुद से गुफ़्तगू,
दिल में दफ़्न सारे क़िस्से लब की गोयाई हो गए.
*
शब्दार्थ
रोशनाई : स्याही, सफ़्हे-पन्ना/पृष्ठ,
आशनाई : परिचय/लगाव/मोहब्बत,
गोयाई: बोलने की क्षमता,
*
गज़ल.
जो अश्क़ आँख से उतरे, रोशनाई हो गए,

*
गज़ल सन्दर्भ : माया.
कृति : कलर पेंटिंग ९२ : मधुप : छाया.
*
मैंने तन्हाई के मौसम में, जिन्हें सींचा था,
वो सभी ख़्वाब एक दिन मेरी शनासाई हो गए।
कितनी रातों की थकन,कितने सुकूतों का सफ़र,
मेरे अशआर में ढलकर दर्द की गवाही हो गए।
जो किसी से कह न पाई,जो किसी ने सुन न पाए,
रूह के पोशीदा राज़ मेरी बीनाई हो गए।
वक़्त ने जो ज़ख़्म दिए,मैंने सजाए शेर में,
दर्द के सब रंग आख़िर मेरी दानाई हो गए।
अब किताबों में जो पढ़ते हैं मेरे एहसास को,
जानते क्या हैं कि कितने दिन मेरी तन्हाई हो गए।
जो अश्क़ आँख से उतरे, रोशनाई हो गए,
दर्द के सारे सफ़्हे मेरी आशनाई हो गए.
*
शब्दार्थ
शनासाई - पहचान, सुकूत - मौन,
पोशीदा -छिपा हुआ : रहस्यमयपूर्ण ,
बीनाई - दृष्टि, दानाई -बुद्धि.
*
जो अश्क़ आँख से उतरे, रोशनाई हो गए,

*
गज़ल सन्दर्भ : माया.
कृति : कलर पेंटिंग ९२ : मधुप : छाया.
*
मैंने तन्हाई के मौसम में, जिन्हें सींचा था,
वो सभी ख़्वाब एक दिन मेरी शनासाई हो गए।
कितनी रातों की थकन,कितने सुकूतों का सफ़र,
मेरे अशआर में ढलकर दर्द की गवाही हो गए।
जो किसी से कह न पाई,जो किसी ने सुन न पाए,
रूह के पोशीदा राज़ मेरी बीनाई हो गए।
वक़्त ने जो ज़ख़्म दिए,मैंने सजाए शेर में,
दर्द के सब रंग आख़िर मेरी दानाई हो गए।
अब किताबों में जो पढ़ते हैं मेरे एहसास को,
जानते क्या हैं कि कितने दिन मेरी तन्हाई हो गए।
जो अश्क़ आँख से उतरे, रोशनाई हो गए,
दर्द के सारे सफ़्हे मेरी आशनाई हो गए.
*
शब्दार्थ
शनासाई - पहचान, सुकूत - मौन,
पोशीदा -छिपा हुआ : रहस्यमयपूर्ण ,
बीनाई - दृष्टि, दानाई -बुद्धि.
*
सूक्ष्मिकाएँ.
ख़्वाब. भाविका सन्दर्भ : माया.
कृति : मधुप : छाया
*
दिन में देखा, वह ख़्वाब था.
रात्रि में आया, वह ख़्वाब था।
संघर्षों में रहा, वह ख़्वाब था.
पूरा भी हुआ, वह ख़्वाब था।
कृति : मधुप : छाया
*
दिन में देखा, वह ख़्वाब था.
रात्रि में आया, वह ख़्वाब था।
संघर्षों में रहा, वह ख़्वाब था.
पूरा भी हुआ, वह ख़्वाब था।
*
संपादन सज्जा
शक्ति.कंचन मंजिता स्वाति.
संपादन सज्जा
शक्ति.कंचन मंजिता स्वाति.
*
------------
राधिकाकृष्णरुक्मिणी : आज का गीत : जीवन संगीत : भजन : पृष्ठ : ३.
-------------
शक्ति.श्रद्धा मीना गुल
मुंबई डेस्क
*
*
धुन : दृश्यम. प्रकृति : प्रेम : पर्वत : पुनर्जन्म
*
ढ़ाई अक्षर प्रेम का : शक्ति प्रिया अनुभूति
*
तराने : दृश्यम : लोकेशंस : नेपाल
कुछ कहो तो कहा नहीं जाता
दर्दे दिल का सहा नहीं जाता.
*
बीती बातों का कुछ ख़्याल करो
कुछ तो बोलो कुछ हमसे बात करो
*
फिल्म : पगला कही का : आशा. शमी कपूर.
*
अपना भी हाल तेरे जैसा है
क्या करें हम भी मौसम ऐसा है
फिल्म : अभिनेत्री : हेमा.शशि कपूर.
*
दार्जलिंग : टॉय ट्रेन : फिल्म : आराधना
*
सुनाई देती है जिसकी धड़कन तुम्हारा दिल या हमारा दिल है
*
गायन : अभिनय : शक्ति. गुल सक्सेना. मुंबई
*
अँखियों को रहने दो अँखियों के आस पास.
कहीं दीप जले कही दिल ज़रा देख ले आके परवाने
तेरी कौन सी है मंजिल
बाग में जा खड़ी की खड़ी रह गयी
*
पन्ना की तमन्ना है कि हीरा मुझे मिल जाए
अपनी जगह से कैसे पर्वत हिल जाए.
*
-------
राधिकाकृष्णरुक्मिणी : शक्ति : प्रेम प्रकृति : कला दीर्घा : पृष्ठ : ५ .
--------
शिमला डेस्क.
संपादन
शक्ति.स्वाति मधुप अनुभूति.
*
---------
राधिकाकृष्णरुक्मिणी : प्रेम प्रकृति शक्ति : फोटो दीर्घा : पृष्ठ :७.
-----------
संपादन
शक्ति. मंजू संजू लक्षिका जोशी.
शिमला डेस्क.
*
![]() |
| चंद्रताल :मनाली :हिमाचल की एक झलक : कोलाज :शक्ति. मंजू श्रीराम संजू .किन्नौर. |
MS Media Powered
English Section
*
*
Contents.
*
English Editorial Section : Cover Contents Page 1
Shakti Editorial. English Page : 2
Shakti Editorial. Prose : English Page : 3
Shakti Editorial. Poem : English Page : 4
Shakti Vibes : .Page : 5
Radhika : Krishna : Rukmini : Photo Gallery.Page : 6
Visuals News : News : Editorial Page : 7
Shakti Art Gallery : Radhika : Krishna : Rukmini : English : Page 8.
Gratitude : Day Special : You Said it : Page : 9.
Shakti Editorial. English Page : 2
Shakti Editorial. Prose : English Page : 3
Shakti Editorial. Poem : English Page : 4
Shakti Vibes : .Page : 5
Radhika : Krishna : Rukmini : Photo Gallery.Page : 6
Visuals News : News : Editorial Page : 7
Shakti Art Gallery : Radhika : Krishna : Rukmini : English : Page 8.
Gratitude : Day Special : You Said it : Page : 9.
*
Times Media Advertising Shakti Powered.
Contents.
*
Times Media Powered
*
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Shakti. Editorial. English Page : 2
-------------
Chief Editor.
Chandigarh Desk.
*
Shakti. Dr. Anuradha. Chandigarh.
Arya.Er. Manish. IITian. USA.
Shakti. Nikita. Australia.
*
Executive Editor.
Darjeeling Desk.
*
Shakti. Seema PriyaVani
*
Photo Reel Editor
Jaipur Desk.
*
Shakti.Naina. Shabnam. Anubhuti.
---------
Shakti Editorial Poem : 4.
----------
Editor.
Shakti Priya.Seema Kajal
Darjeeling.Desk.
*
My dreams Sparkling beams.
Poem.
Shakti. Priya.Darjeeling.
*
The golden rays of morning kissed my face,
While I still rested in my peaceful place.
I wandered through my dreams with quiet delight,
Their gentle glow still shining warm and bright.
*
That lovely dream refused to fade away,
For in its arms I longed a while to stay.
But sparkling beams awakened me at last,
Though I wished those precious moments wouldn't pass.
*
The rising sun crept softly to my bed,
Its golden warmth around my blanket spread.
A ringing bell declared the break of day,
Reminding me there was no time to stay.
*
Yet still I dream,
and hope continues high.
poem.
*
Priya : Darjeeling : Monastery :
Photo Water Colour Painting
*
Oh, what a life—so busy like a bee,
From office work to home, no time feels free.
Each day repeats beneath the endless sky,
Yet still I dream, and hope continues high.
*
Editing : Decorative
Shakti. Naina Madhavee.Manjita Anubhuti.
*
----------
Shakti Vibes : English : Page : 5.
------------
Editor.
Darjeeling Desk.
Shakti.Priya Seema Vani.
*
Something humbly you accept as true, good and the best for all
what you believe is the right belief.
*
@ Shakti. Dr.Sunita Ranjita Seema.
*
Either Silence or Better Seaking
*
![]() |
| ©️®️M.S.Media. Water Colour Painting. Madhup / 89 / 26. * Speak only when you feel that your words are better than your silence. * Shakti. Shalini Priya Seema. |
------------
Shakti Art Gallery : Radhika : Krishna : Rukmini : English : Page 8.
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Editor.
Shakti. Manjita Seema.Anubhuti.
![]() |
| Rimjhim Gire Sawan. Mumbai Marine Drive : Photo Painting : Shakti Vidisha Madhup Ritu |
----------
Gratitude : Day Special : You Said it : Page : 9.
-----------
Shakti.Naina Priya.Seema Anubhuti.
*
Day Special. Guru Purnima
Ashadha Shukla Paksh Poornima
*

*
Ashram : Sandipani Muni : Balaram Krishna Sudama.*
Guru Purnima is celebrated in the Hindu month of Ashadha Poornima. this year on Wednesday, July 29, 2026, marking the full moon Purnima.
The sacred full moon tithi began at 6:18 PM on Tuesday, July 28, and ends at 8:05 PM on July 29. This festival honors spiritual and academic teachers, as well as sage Veda Vyasa
*
Shakti. Priya Ranjita Seema.
*
*
Day Special.
National Doctors' Day
July 1.
former West Bengal Chief Minister.
*
National Doctors' Day in India is observed on July 1 to honor the birth and death anniversary of the legendary physician and former West Bengal Chief Minister, Dr. Bidhan Chandra Roy. The day recognizes the tireless dedication, compassion, and critical lifesaver role of medical professionals in our society.
National Doctors' Day in India is observed on July 1 to honor the birth and death anniversary of the legendary physician and former West Bengal Chief Minister, Dr. Bidhan Chandra Roy. The day recognizes the tireless dedication, compassion, and critical lifesaver role of medical professionals in our society.
*
Dr.Anupama.Dr.Archana.Dr.Rakhi.
Shakti. Editors. Mahashakti Media.
*
---------
You Said it : Wishes : Page : 9.
--------
Editor.
Shakti.Kajal.Seema.R.K.
Indraprasth Desk.
9th of July.
Our heartiest wishes on
*
Happy Marriage Anniversary
to You Both.
Editor.
Shakti.Manju Shreeram
Kinnaur. Himachal.
*
*
and for your United Lovable Life Journey
Hum Dev Shakti Family.
*------------
Courtesy : Page : 9 / 2
-----------
Editor.
Shakti. Dr.Sunita Ranjita Seema.
*
to
*
Shakti.Vidisha.Advocate.Legal Advisor. Shakti.Seema Kumari.Advocate.
Shakti.Jasika Singh.Advocate.
*for providing us Nyayik Sanrakshan.
*
*
----------
You Said It. Page 9/3
----------
*
Editor.
Shakti.Kajal.Seema.R.K.
*
About Art Gallery .
A very nice and unforgettable memory for us.Really it's a very fabulous water color painting.
N.K. Singh.Varanasi.
N.K. Singh.Varanasi.
*
about Short Story
अ 'भय हो : अति सूक्ष्म लघु कथा.
The short story seems to be the real story of my kids joining first time the school....even I went into my childhood while I used to witness such an event...
Dr.Manish New Delhi.
*
about Short Story.
अ 'भय हो : अति सूक्ष्म लघु कथा.
Kahani padhne se apne bachon ke bachpan ki yaad aa gayi 😀
Anju.New Delhi.
*
Such a heartwarming story !
Absolutely adorable !
It perfectly captures the innocence of a toddler.
This brought a huge smile to my face.😊
Shakti Editor. Kajal.New Delhi.
*





























































































Such a heartwarming story !
ReplyDeleteAbsolutely adorable !
It perfectly captures the innocence of a toddler. This brought a huge smile to my face.😊
Shakti Kajal
Kahani padhne se apne bachon ka bachpana ki yaad aagyi 😀
ReplyDeleteThe short story seems to be the real story of my kids joining first time the school....even I went into my childhood while I used to witness such an event...
ReplyDeleteDr. Manish
A very nice and unforgettable memory for us.Really it's a very fabulous water color painting.
ReplyDeleteNK SINGH,VARANASI