सम्पादकीय : आलेख

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सम्पादकीय : आलेख 



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अक्टूबर  : सम्पादकीय : आलेख 
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अरुण कुमार 

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अगस्त  मास 
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Poem २७। ०८ २५ 
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All r in quest of love

All r in quest of love
everyone is asking love
everyone is preaching the message of
love
but the love
it's theme and
essence is 
beyond the 
narration and
description in
the words
it is a deep feeling of innocent heart and soul 
always fresh like blooming flowers and
flowing rivers
smiling face of children 
innocent eyes of
mothers
loving affections of father
and blowing airs
a very subtle feeling of pure
heart and 
conscience
indiscriminating
the barriers of 
caste creed and
religion
free from all the
evils of life
and that is why
it is the embodiment of
the purity and 
righteousness
of thy merciful Lord
who is in itself 
Love and Passion.
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प्रेम भक्ति और ज्ञान २८ ०८ २५ 
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जब  ज्ञानयोग,भक्तियोग, कर्मयोग,सहज योग,क्रियायोग,विह़गंमयोग,भावातीत ज्ञानयोग आदि की बातें होती हैं तो इससे सम्बन्धित अनेक मत मतान्तर दिखाई देते हैं और सबके अपने अपने आधार और व्याख्याएं भी होती हैं और जो व्यक्ति जिसे अपनी समझ और ज्ञान से अपनाते हैं, उन्हें वही सुगम और श्रेष्ठ लगता है,कहा भी गया है जाके जे भाय वही सोहाय और यह ठीक वैसे ही है जैसे भोजन और खाने वाले का सम्बन्ध होता है। संसार के समस्त मत पंथ विश्वास विचार आदि घुमा फिराकर एक ही बिंदु पर सहमत नजर आते हैं जिसे एकेश्वरवाद कहा जाता है और हजारों साल पहले हमारे यहां इसकी घोषणा कर दी गयी थी कि,
ब्रह्मं एक: द्वितीयो नास्ति 
सद्ं एक विप्रा बहुधा वदन्ति 
भगवान श्री कृष्ण ने भी अपनी इसी विराटता को कुरुक्षेत्र में पार्थ के समक्ष स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि,
हे पार्थ,समस्त संसार में जितने भी मार्ग हैं सब मेरी ओर ही आते हैं,अब यहां उनके कहने की अलग-अलग व्याख्यान दिए जा सकते हैं पर यथार्थ तो यही है कि परमात्मा को जानने और पाने के मार्ग भले ही अलग-अलग हों पर परम सत्य और चेतना तो एक ही है जिसकी अनुभूति सहजता से होती है। सब मार्ग एक ही सत्ता के हैं और जिसे जो रुचे पचे स्वीकार करे और सबसे सहजता से प्रेम करे जिसे कश्मीर शैव मत में* स्वप्रतिविम्बवाद कहा गया है जो सबको समन्वयवादी और समरसी होने की प्रेरणा देता है, सबको शिवमय होने की मार्ग बताता है पर भेद तो रहेंगे कि मानव प्रकृति और प्रवृत्ति ही विभेदकारी है लेकिन तो यथार्थवादी और सत्यपरक हैं उनके लिए वह सत्ता तो जल मिट्टी सादृश्य है, मिट्टी को जो रूप दे दो और जल को जिस पात्र में डालो,उसका आकार धारण कर लेता है। ऐसी ही प्रकृति ज्ञान प्रेम और भक्ति की है कि ईश्वर को जिस रूप में भजो, जहां भजो,जिस भाषा में भजो सब भाषाएं उसकी है।
पर कभी कभी इन मार्गों में भी विवाद और तर्क होते हैं पर वे आधारहीन और कुतर्क ही होते हैं। वैश्विक स्तर पर जितने श्रेष्ठ साहित्य रचे गए हैं, उनमें समन्वयवादी और समरसी स्वभाव ही देखे गए हैं। आजकल हमारे यहां ज्ञान और भक्ति की श्रेष्ठता को लेकर अनावश्यक विवाद होते देखे जा रहे हैं जहां श्रेष्ठ होने की होड़ मची हुयी है जो अज्ञानता और अंधकार का ही परिचायक है। जो ज्ञानी होंगे, निरहंकारी
और समन्वयवादी होंगे,समरसी होंगे और वही सच्चे भक्त भी होंगे। ईश्वरीय सत्ता को जानने समझने के जितने मार्ग बताए गए हैं, निस्संदेह उनमें भक्ति मार्ग सबसे सरल और सुगम माना गया है परन्तु ज्ञान और कर्म की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती है। ईश्वरीय सत्ता को जानने वाले या तो ज्ञानी होते हैं या भक्त होते हैं या साधक या शोधक होते हैं,आर्त् या याचक को उस श्रेणी में नहीं रखा जाता है।
कामना या इच्छा रखने वाले तो याचक होते हैं,उनको ईश्वर को जानने की कोई इच्छा नहीं होती है,जैसे क्षुधा पीड़ित को भोजन से मतलब होता है, स्रोतों से नहीं वैसा ही सम्बन्ध उनके बीच होता है। इसलिए न तो ज्ञान श्रेष्ठ मार्ग है न भक्ति पर अपने कर्म और कर्तव्यों का पालन करना जरूर श्रेष्ठ है और निस्संदेह जो ज्ञानी होगा वह कर्मयोग और भक्तियोग को सहजता से समझ लेगा। इसलिए ज्ञान को समरसी और समन्वयवादी होना ही श्रेष्ठ है।

गोस्वामी जी समन्वयवादी और क्रान्तिदर्शी संत कवि थे। संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान होते हुए भी उन्होंने तत्कालीन लोक भाषा अवधी और ब्रजभाषा में अपने साहित्य रचे कि आमजन तक सहजता से पहुंचा जा सके। यही मार्ग तथागत सिद्धार्थ ने भी अपनाया था कि उस समय भी संस्कृत दो स्वरूपों में यथा, देवभाषा और लोकभाषा के रूप में मौजूद थी परन्तु उन्होंने अपनी धर्म देशना पाली भाषा में दी जो आमजन की भाषा थी। ऐसे ही समन्वयवादी विचारक और क्रांतिकारी संत कवि कबीरदास जी भी थे और उन्हीं के परम्परा में संत शिरोमणि रैदास,रहीम, रसखान, मनसुखदास
आदि भी थे जिनके काव्य में एक साथ ज्ञान,प्रेम,और सहज भक्ति की अविरल प्रवाहमान गंगा दिखाई देती है और करिश्मा ये है कि समकालीन होते हुए भी इन्होंने कभी एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप नहीं लगाए कि उस समय तक प्रेम, भक्ति और ज्ञान बाजारवाद और उपभोक्तावाद का शिकार नहीं हुआ था।
उस कालखंड में उपजे समस्त मतों और पंथों ( शैव, शाक्त, वैष्णव और गाणपत्य) के विवाद का एक ही जवाब था,
जात पांत पुछे नहीं कोए
हरि को भजै सो हरि को होए और यही यथार्थ भी है।

आज भी सन्दर्भ ऐसे ही हैं कि भारत की बहुत बड़ी हिन्दी आबादी संस्कृत नहीं जानती है और न समझ सकती है, एक तरह से यह आज भी अभिजन वर्ग की भाषा है, इसलिए या तो क्षेत्रीय भाषा या हिन्दी ही सर्वत्र ग्राह्य हो सकती है। संस्कृत भारत की पहचान है, कोई दो राय नहीं परन्तु यह लोकभाषा नहीं बन सकती है।
संस्कृत का विद्वान होना और सहज विद्वान होना दोनों अपनी अपनी जगह श्रेष्ठ हैं।
रह गयी बात प्रेम और ज्ञान की तो तो जो सच्चे ज्ञानी होंगे वे सहज ही प्रेमी और भक्त हो जाएंगे कि ज्ञान मार्ग ही प्रेम मार्ग को प्रशस्त करता है।
ज्ञान हमें चैतन्य करता है और ज्ञान ही हमें प्रज्ञान का बोध कराता है और दोनों की अंतिम परिणति 
प्रेम और मुक्ति में होती है।
प्रेमयुक्त भक्ति और ज्ञान युक्त भक्ति दोनों श्रेष्ठ हैं। 
भगवान कृष्ण ने इसीलिए 
ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग,प्रेमयोग के मार्ग को बताया है और जिसे जो स्वीकार्य हो, स्वीकार कर लें।
श्री शिव राम कृष्णाय नमः।
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हम और कर्मकाण्ड  दिवस २९  ०८ २५.
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कोई कितना भी जप-तप, पूजा पाठ, तीर्थ यात्रा,दान पूण्य कर्मकाण्ड आदि कर ले परन्तु जिनके भाव विचार,वाणी, कर्म, व्यवहार और आचरण 
सही नहीं हैं, व्यवहारिक और लोकोन्मुखी नहीं हैं तो सब व्यर्थ है।
मन, मस्तिष्क का चैतन्य चेतना है जो हर पल क्षण जागृत‌ है, क्रियाशील है, यहां तक कि हमारे सुषुप्तावस्था में भी यह काम करता रहता है और चैतन्य अवस्था की बातों पर प्रतिक्रिया करता रहता है कि सब स्मृतियों के रूप में चित्त में संग्रहित रहते हैं।
हम हर पल क्षण कुछ न कुछ या तो सोंचते रहते हैं या कुछ न कुछ करते रहते हैं और उनकी प्रतिक्रिया हमारे भीतर होती रहती है।
आधुनिक मनोविज्ञान और मनोविश्लेषण कहता है कि चित्त की एकाग्रता के अभाव के कारण हम करते रहते हैं कुछ और दिमाग में चलता रहता है कुछ और ये सब हमारी स्मृतियों में संग्रहित होता रहता है जिससे हमारी आदतों का सृजन होता है,जो हमारा स्वभाव और कालान्तर में चरित्र और प्रवृत्ति में रूपांतरित हो जाता है और इसलिए विचार और कर्म दोनों में तालमेल बड़ा कठिन काम होता है। हम किसी कर्मकाण्ड यथा,पूजा, प्रार्थना, यज्ञादि में संलग्न हों पर ध्यान विचलित हो, एकाग्रता न हो तो वह औपचारिक क्रिया मात्र रह जाती है, यहां भाव विचार और कर्म में समन्वय नहीं हुआ तो प्रयोजन व्यर्थ हो गया।
फरेब,छल छद्म,ठगी, हकमारी आदि उपायों से कोई धनोपार्जन करके अन्नदान, वस्त्र दान, धर्मशाला निर्माण या अन्य पूण्यसूचक काम कर रहा हो तो उसे वाहवाही और लोकप्रियता तो मिल सकती है परन्तु उन कर्मों के फल से मुक्ति
नहीं मिल सकती है कि किसी भी अच्छे प्रयोजन में लगे हुए धन में यदि पापवृत्ति
संलग्न हो तो उसके प्रतिफल कदापि अच्छे नहीं हो सकते हैं।
कर्मकाण्ड जीवन का एक पक्ष है जिसे हर मत पंथ विश्वास और विचार के लोग करते हैं जिससे मानसिक शांति मिलती है परन्तु आत्मिक या आध्यात्मिक शांति के लिए वैचारिक और क्रियात्मक शुद्धि का होना जरूरी है। जैसे विचार हमारे कर्मों से जुड़े हुए हैं वैसे ही कर्मकाण्ड धीरे धीरे हमें आध्यात्मिक दिशा की ओर उन्मुख करते हैं कि आखिर हम ये सब करते क्यों हैं और जब इस पर विचार करते हैं तो जैसे वेद उपनिषदों की ओर मुड़ गये,हम भी यह सोचना शुरू कर देते हैं कि ईश्वर‌ क्या सिर्फ लौकिक सुखों की प्राप्ति के लिए हैं, क्या सारे कर्मकाण्ड सांसारिक सुख के लिए हैं और उसी क्षण हमारे भीतर चेतना का रूपांतरण होना शुरू हो जाता है।
रूपांतरण की यह प्रक्रिया किसी में त्वरित,किसी में तीव्र,किसी में मंद और किसी में गौण भी होती है। जिसमें जैसी प्रतिक्रिया होती हैं वैसा ही उसके भीतर रूपांतरण भी होता है और इस रूपांतरण के सैकड़ों उदाहरण भरे पड़े हैं।
सिद्धार्थ का बुद्ध होना, वर्द्धमान का महावीर होना, रत्नाकर का वाल्मीकि होना, अंगुली माल का संन्यासी होना,राम का मर्यादा पुरुषोत्तम होना, कृष्ण का योगेश्वर कृष्ण और कर्मयोगी होना, नरेंद्र दत्त का विवेकानन्द होना, अरविन्द घोष का स्वामी अरविन्द होना, रामबोला का तुलसीदास होना आदि रूपांतरण के अनुपम उदाहरण है।
हम ये नहीं कहते हैं कि जप-तप, पूजा पाठ आदि अनुचित कार्य हैं,ये बिल्कुल सही हैं जो हमें इस सांसारिकता में कुछ पल तो अपने इष्ट के लिए निकालने के लिए प्रेरित करते हैं और उन्हीं क्षणों में सिर्फ ये सोचना है कि इन सबका अंतिम लक्ष्य क्या होना चाहिए बस इसी सोच की परिणति हमारे रुपान्तरण का कारण बन जाती है।
परमात्मा सबको अपने अपने तरीके से रचा बनाया है,कुछ गुण और हुनर दिए हैं जो विशिष्ट हैं और उनका उचित व्यवहार और प्रयोग ही अच्छा और सच्चा कर्म है, कर्तव्य है।
धन है तो धन दो, वस्त्र है तो वस्त्र दो,अन्न है तो अन्न दो,बल है तो असहाय निर्बल की मदद कर दो, ज्ञान है तो ज्ञान बांटों अर्थात् जो कुछ देने बांटने लायक हो, निस्संकोच
और उदार हृदय से दो,बांटों कि ये सब के सब संचय और संग्रहित होने पर संकट के कारण बन सकते हैं,
सद्गुरु कबीर साहब कहते हैं,
जो जल बाढ़े नाव में 
घर में बाढ़े दाम 
दोउ हाथ उलिचिए
यही सयानों काम
अर्थात् नदि में जब नाव हो और नाव में पानी भरने लगे तो दोनों हाथों से उसे उलीचकर खाली करते रहिए नहीं तो नाव डूब जाएगी और वैसे ही घर में यदि धन धान्य भरपूर हो जाए तो उसे बांटिए नहीं तो लूट जाएगा या नष्ट हो जाएगा।
इसका सीधा सा अभिप्राय है कि जो अतिशय हो जाए उसका विवरण और विभाजन होते रहना चाहिए,यही श्रेष्ठ कर्म है,यही श्रेष्ठ कर्मकाण्ड भी है।
माया मुई न मन मुआ 
मरी मरी गया सरीर 
आसा तृष्णा ना मुई 
यूं कह गया कबीर 
जो नाशवान है और जो शाश्वत है, दोनों के फर्क को समझते हुए जीवन मार्ग को प्रशस्त करना और उसका अनुगमन करना ही जीवन की सार्थकता और सिद्धि है और यही सच्चा और अच्छा कर्मकाण्ड भी है।
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एक आंख या एक हाथ या एक पैर ३० ०८ २५.
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एक आंख या एक हाथ या एक पैर से हम जीवित रह सकते हैं पर जो एक ही है उसके बगैर जीवित रहना संभव नहीं रह जाता है जैसे हृदय और लीवर,इसी तरह कोई एक व्यक्ति समाज के लिए बहुत जरूरी हो जाता है पर यह वैकल्पिक है कि व्यक्ति स्थानापन्न अस्तित्व है, कोई न कोई उस रिक्ति को भरने आ ही जाता है।
इसलिए हमें सारी विभिन्नताओं को समझते हुए एक मार्ग अपनाना होगा और झाड़ू के सिद्धान्त को अपनाना होगा कि बंधे हुए हैं तो उपयोगी हैं और खूलकर बिखर गए तो स्वयं कूड़ा बन गये। इसी मर्म को समझना जीवन की सार्थकता है कि अनेकता में, विविधता में, भिन्नता में एकत्व का बोध करना है। यह सहज बोध भी है और आध्यात्मिक दर्शन भी है जहां तमाम भिन्नता में हमें एक मनुष्य और एक परमात्मा की खोज में सदैव रहना है और अनुभूति भी करनी है।
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मृत्यु,रोग और दुर्घटना दिवस : ३१ ०८ २५.
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मानव जीवन में ये तीन ऐसी बड़ी त्रासदियां हैं जो कभी भी, कहीं भी,किसी भी समय बगैर किसी फर्क के किसी के पास आ सकती हैं और उसे टाला भी नहीं जा सकता है।
यहां विज्ञान और अध्यात्म, दोनों मौन हो जाते हैं कि किसी का वश इन पर नहीं चलता है।
इनकी कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है और ना कोई सूचना उपग्रह है जो इनकी सूचना दे सके। सबकुछ अचानक से हो जाता है और हम मूक और मौन तमाशबीनों की तरह सबकुछ गुजरते हुए देखते रहते हैं और कुछ न कर पाने की गहन पीड़ाओं को झेलते रहते हैं।
इन तीनों का किसी व्यक्ति के मौजूदा हालात और मजबूरियों से कोई लेना-देना भी नहीं होता है कि ये तीनों इस मायने में समदर्शी हैं कि अमीर गरीब और लाचारों में कोई फर्क नहीं कर पाती हैं। मृत्यु तो एक हादसा है जो हमें किंकर्तव्यविमूढ़ सा कर देती है। एक निमिष में मानों सबकुछ बदलकर रख देती है। हंसता खेलता परिवार उजड़ जाता है, एक मां की कोख सूनी हो जाती है,एक स्त्री का श्रृंगार उजड़ जाता है,एक पिता का सहारा छीन जाता है,एक पल में कितने रिश्ते खत्म हो जाते हैं फिर भी हम बेफिक्र जीवन के इस यथार्थ को नहीं समझ पाते हैं।
अभी-अभी दो दिन पूर्व चार घरों के चिराग बूझ गए। हम सब अपने अपने तरीके से इसकी अनुभूति और व्याख्या कर रहे हैं पर गमगीन तो सब हैं। मानवीय संवेदनाओं का असर तो सब पर पड़ता है पर यहां दो पक्ष‌ उभर कर हमारे सामने आते हैं कि नियती या प्रारब्ध को यही मंजूर था,यही ईश्वरीय इच्छा थी पर सच होते हुए भी हमारा मन,हृदय और मस्तिष्क इसे स्वीकार नहीं कर पाता है कि यह न्याय है और यह औचित्यपूर्ण है। किसी नजरिए से कोई इसे स्वीकार नहीं कर सकता है कि जो हुआ सो ठीक हुआ है कि लोग कहा करते हैं कि ईश्वर जो करता है ठीक करता है,पर इसे कोई स्वीकार नहीं कर सकता है कि ऐसा होना किसी नजरिए से ठीक या सही कहा जाए। पर इस पर विचार करके, सावधान रहके और सचेष्ट रहके ऐसी हृदयविदारक दुर्घटनाओं को रोका तो जरूर जा सकता है,ऐसे मृत्यु के बारे में कहा गया है कि इसका स्थान,काल और हेतु सुनिश्चित है।
मृत्यु एक अद्भुत घटना है जो किसी को अचानक कहीं भी ग्रस
सकती है।
कल शुक्रवार को एक ऐसी घटना घटी है जो किसी को हतप्रभ कर सकती है।
चेन्नई के विख्यात अस्पताल सविता मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के विख्यात कार्डियोलॉजिस्ट डॉ ग्राडलिन राॅय जिनकी उम्र मात्र 39 वर्ष थी, अचानक गिरे और तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें नहीं बचाया जा सका। उन्हें 
सी पी आर के साथ साथ हृदय रक्षक सारे उपाय किए गए परन्तु एक हृदय शल्य चिकित्सक हृदयाघात से मर गया और कोई कुछ न कर सका। उनका बायां आर्टरी ब्लौक था।
अब समस्या पर गौर किया जाए तो कुछ बातें निकल कर सामने आती हैं। एक हृदयरोग विशेषज्ञ को समझ नहीं आता है कि उसका बायां आर्टरी बिल्कुल ब्लौक हो रहा है और एक दिन अचानक हृदयाघात होता है और समस्त सुविधाओं के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सकता है।
हमें स्वीकार करना पड़ता है कि हम तमाम वैज्ञानिक उपलब्धियों के बावजूद मृत्यु को नहीं टाल सकते हैं परन्तु उसे सावधानी और सुरक्षा मानकों का पालन कर असामयिक होने से बचने की कोशिश कर सकते हैं कि महत्तम कोशिशों के बावजूद ही नियती या प्रारब्ध को स्वीकार करना पश्चाताप का कारण नहीं बनता है। सद्गुरु कबीर साहब के दो पद यहां कितना सार्थक नजर आ रहे हैं,एक नजर इनपर भी डालने का कष्ट करें,
कबीरा गरब न कीजिए 
काल गहे कर केस
न जाने कित मारिहें
क्या घर क्या परदेस।
झूठे सुख को सुख कहै
मानत है मन मोद
खलक चबेना काल का
कुछ मुख में कुछ गोद।
बीमारी, दुर्घटना और मृत्यु पर ये मेरे निज के विचार हैं। 

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सितम्बर मास 
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भयाक्रांत होने दिवस : ०१ ०९ २५ 
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चूहे बिल्ली से, बिल्ली कुत्ते से, कुत्ते बन्दर से,बन्दर चीता या तेन्दूए से,तेन्दूए शेर से डरते हैं, भयाक्रांत होने की यह लम्बी श्रृंखला है। इसमें अंतिम जीव शेर नहीं आदमी है कि आदमी इन सबसे डरता है।
लेकिन हकीकत कुछ और है कि हम सब एक दूसरे से डरते हैं।
सबको अपने अपने प्राणों का भय होता है। सबको अपनी अपनी जिंदगी प्यारी होती है।
परन्तु जब आत्माभिमान,मान सम्मान और प्रतिष्ठा के एकदम से जाने की बात हो जाए तो जान
प्राथमिक नहीं रह‌ जाती है और लोग जान की बाजी भी लगा देते हैं। जान जाए तो जाए पर मान सम्मान स्वाभिमान और प्रतिष्ठा न जाने पाए कि इनके अस्तित्वहीन हो जाने पर जीवन मोल और मूल्य दोनों खो देता है और ऐसा जीवन निरर्थक और मूल्यहीन हो जाता है।
आदमी सबकुछ खोकर फिर से सबकुछ प्राप्त कर सकता है परन्तु खोयी या नष्ट हो चुकी प्रतिष्ठा फिर से प्राप्त नहीं कर सकता है। इसलिए गुप्त जी ने सही ही कहा है
सब जाए अभी पर मान रहे
मरने पर गूंजित गान रहे
मृत्यु,तय है कि एक न एक दिन आनी ही आनी है,जिस विधि और जिस जगह पर आनी है,आ ही जाएगी, फिर कदम दर कदम टूटकर,झूककर और समझौता करके जीने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। जीवन की स्वयं अपनी मान और मर्यादा है और जो मर्यादा च्युत हो जाता है,वह अस्तित्व में रहते हुए भी अस्तित्वहीन हो जाता है।
निजी जीवन से लेकर पारिवारिक जीवन और पारिवारिक जीवन से लेकर सामाजिक जीवन और सामाजिक जीवन से लेकर राष्ट्रीय जीवन और राष्ट्रीय जीवन से लेकर वैश्विक स्तर के जीवन व्यवस्था की अपनी सीमाएं और मर्यादाएं हैं जिसकी रक्षा करना सबका महत्वपूर्ण कर्म और कर्तव्य है।
हम किसी भी तरह के शंका,संशय,भय या खौफ आदि से तभी मुक्त रह सकते हैं जब 
हम किसी अस्वीकार्य के साथ स्वीकार्यता लेकर नहीं जी रहे हों नहीं चल रहे हों।
कानून या नीति या विधान हमें इसलिए नहीं पालन करना चाहिए कि इससे हम सुरक्षित रहेंगे बल्कि इसलिए पालन करना चाहिए कि स्वयं सुरक्षित रहते हुए भविष्यगामी पीढ़ियों को भी सुरक्षित रख सकें और इसी की चिन्ता या चिन्तन हम सब में से अधिकांश नहीं करते हैं जिसकी परिणति अनेक नाकारात्मक रुपों में हमारे सामने आती रहती हैं।
इन्हीं तथ्यों का अवलोकन करते हुए श्री कृष्ण ने महाभारत युद्ध के शुरू होने के ठीक पहले अर्जुन को चेतावनी देते हुए समझाया था कि,
हे पार्थ! यह महज युद्ध नहीं एक धर्म युद्ध है जो सत्य, न्याय और औचित्यपूर्ण अधिकारी के लिए लड़ा जाने वाला है,या तो मान, सम्मान, न्याय और औचित्यपूर्ण अधिकार 
के लिए युद्ध करो या पलायन करो या समर्पण करो,पर ध्यान रहे तुम केवल कुरुक्षेत्र ही नहीं हारोगे बल्कि अपना समस्त अर्जित यश और पराक्रम भी हारोगे और यही नहीं आने वाली पीढ़ियां तुम्हें कायर और नपुंसक कहकर धिक्कारेगी और तुम पर थुकेगी, निर्णय अब तुम्हारे हाथ है। यह अधर्म, अन्याय और असत्य के विरुद्ध शंखनाद है,उठो पार्थ, गांडीव उठाओ।
यह युद्ध सिर्फ द्वापर युग में ही नहीं हुआ था बल्कि हर युग और हर कालखंड में होता रहा और होता रहेगा।
भय का स्वरूप चाहे जो हो, जहां भी हो और जिससे भी हो, हमारे सामने अनेक विकल्प खुले रहते हैं और जो विवेक स्वीकार करे उसे अपनाना चाहिए पर अतीत को कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए।
इतिहास गवाह है जिसने भी जब कभी जहां भी युद्ध से मुंह मोड़ा है, कलंकित हुआ है कि श्री कृष्ण भी इसीलिए* रणछोड़ कहे गए हैं।
हां,एक बात उल्लेखनीय है कि बदलते परिवेश और बदलते युगधर्म में रणनीतियों का बदलना भी जीत के लिए जरूरी हो गया है। युद्ध जीतने के लिए ही लड़े जाते हैं,यह सदैव ध्यान में रखना चाहिए।
श्री कृष्ण ने कहा भी था,यदि साध्य‌ या लक्ष्य न्याय, धर्म और सत्य की स्थापना हो तो साधन की परवाह नहीं की जाती है।
इसलिए भयाक्रांत करने वाले कारक और कारण के मध्य ही वीरता और शौर्य का प्रदर्शन होता है।
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मृण्मय से चिण्मय की यात्रा। दिवस ०२ ०९ २५ 
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जीवन स्वयं में एक ऐसी यात्रा है जो इस
लौकिक जीवन के अंत होने तक चलती रहती है और भारतीय आध्यात्मिक जीवन दर्शन और चिन्तन में यह तबतक चलती रहती है जबतक मनुष्य आवागमन या पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त नहीं हो जाता है।
इसे जैन मत में कैवल्य, बौद्ध मत में निर्वाण कहा गया है और अपने अपने सिद्धांतों के अनुरूप इसकी व्याख्या भी की गयी है जिन सबका सार एक ही है। यह अवधारणा सिर्फ हिन्दू,जैन, बौद्ध और सिखों में है।
अब शीर्षक के उपर विचार करने की जरूरत है जिसे जानना इसलिए जरूरी है कि बगैर अर्थ को जाने शब्दार्थ नहीं जाने जा सकते हैं।
मृण्मय शब्द का अर्थ मिट्टी से बना होता अर्थात् जो भी नाशवान है, शाश्वत नहीं है, मृण्मय है और जो परम सुख या आनन्दमय है,जो मृण्मय नहीं है, चिन्मय है और चिन्मय क्या है जिस अवस्था को पाने के प्राप्त करने के बाद कुछ शेष नहीं रह जाता है, चिन्मयानंद को प्राप्त करने की यात्रा,जो सुख नष्ट न होने वाला हो की यात्रा है जिसकी यात्रा एक शोध है,खोज है,परमानुभूति है।
यात्राएं तो हम जीवन भर करते ही रहते हैं जिसका लक्ष्य कोई एक नहीं होता है,हम कभी सौन्दर्य और स्थल पर्यटन के लिए यात्रा करते हैं तो कभी मानसिक शांति या किसी इच्छित कामना की पूर्ति के लिए तीर्थ या धाम की यात्रा करते हैं और ये यात्राएं सबके जीवन काल के समाप्त होने तक चलती ही रहती है पर यह कोई नहीं कह सकता कि हम अपनी यात्राओं से संतुष्ट हो गए हैं और किसी यात्रा की इच्छा या कामना नहीं रह गयी है कि ये सारी यात्राएं 
क्षणिकाओं की सुख देती है, यात्रा समाप्त और सुखानुभूति खत्म 
और यही यात्रा मृण्मय है, स्मृतियों में, चित्त में संग्रहित हैं जिनकी अनुभूतियां स्मृतियों में सुख देती है और यही सुख हमें फिर से पाने को बेचैन किए रहता है और उन सुखों को बार बार भोगने की कामना तबतक बनी रहती है जबतक हम अपनी दैहिक चेतना में जीवित रहते हैं और दैहिक चेतना जैसे जैसे क्षीण होने लगती है,उनकी निरर्थकता और निस्सारता का बोध होने लगता है। हम बढ़िया भोजन, बढ़िया वस्त्र, बढ़िया रहने सहन, बढ़िया आवास और वाहन आदि की कामना इसी सुहानुभूति के लिए करते रहते हैं और इसका कोई अंत ही नहीं होता है और यही मृण्मय यात्रा का सच है।
मृण्मय से चिण्मय की यात्रा मन से उपर जाकर, चित्त से उपर जाकर,सभी स्मृतियों से उपर जाकर एक ऐसी यात्रा है जिसके लिए अन्तस्थ बोध और अस्तित्व को जानने की यात्रा करनी पड़ती है जिसकी खोज करते करते जब यह अनुभूति होने लगे कि अब जो मिल रहा है,वह क्षणिकाएं नहीं 
चिन्मयानंद है,ऐसा सुख जिसे कोई छीन नहीं सकता,जिसे काल मिटा नहीं सकता है जो चिरन्तन है, शाश्वत है, अपरिवर्तनीय है और इसके लिए वन गमन या संन्यास लेने की कोई जरूरत नहीं है बल्कि आत्मचिंतन और आत्मयात्रा की जरूरत है।
हमें ही दृश्य, हमें ही दृष्टि और हमें ही द्रष्टा बनना है। हमें हमारी समस्त क्रियाशीलताओं का अवलोकनकर्ता बनना है और ज्यों ज्यों हमारी यह दृष्टि गहरी होती चली जाएगी, दृश्य और परिदृश्य बदलते चले जाएंगे,हमारा दृष्टिकोण बदलते चला जाएगा। हम हमारे भीतर एक छनना पत्र अर्थात् एक फिल्टर पेपर को विकसित होते देख सकेंगे और इस फिल्टरिंग से होते हुए अब जो हमारी यात्रा होगी वह मृण्मय से चिण्मय की यात्रा होगी और जब इस मृण्मय यात्रा की समाप्ति इस दृष्टि के साथ होगी तो हमारी यात्रा चिन्मय की प्राप्ति की होगी।
प्रभु सबका कल्याण करें,सबको सद्बुद्धि दें।
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संश्यात्मा विनश्यति : विश्लेषण और सच : दिवस ४ ९ २५ 
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मूलतः यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 4 के 40 से उद्धृत है जिसका मूल भाव यह है कि अज्ञानी, मूढ़, अविश्वासी और संशय में रहने वाला व्यक्ति नष्ट हो जाता है। पर ध्यान रहे कि यह मूलतः भक्ति भाव के विश्वास,आस्था और श्रद्धा से जुड़ी हुयी भावना है जिसकी व्याख्या अनेक रुपों में आज की जा रही है जो प्रासंगिक और सन्दर्भित है।
यह सत्य है हम जो कुछ भी करें पुरी आस्था, विश्वास और श्रद्धा के साथ करें वहां शक की कोई गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए पर जीवन विषमताओं और विडम्बनाओं से भरा हुआ है जहां सत्यान्वेषण और शोध की जरूरत होती है। एक मरीज की चिकित्सा जब शुरू की जाती है तो इस विश्वास के साथ कि मरीज ठीक हो जाएगा परन्तु वांछित सुधार न होने पर चिकित्सक और औषधियां दोनों बदलने की जरूरत आन पड़ती है कि वह विश्वास उस मरीज की जान ले लेती इसलिए हर कालखंड में तथ्य एवं कथ्य की पुनरीक्षण की जरूरत होती है और इसका अर्थ यह भी नहीं कि यह श्लोक जो कह रहा है,गलत है।
यह मनुष्यों की सहज वृत्ति और प्रवृत्ति है कि हम नामचीन लोगों को ही सुनना, पढ़ना और देखना चाहते हैं पर भूल जाते हैं कि उनकी शुरुआत भी एक आदमी की तरह से ही हुई थी और आम आदमी को सुनना र समझना इसलिए भी जरूरी होता है कि सम्प्रति वह जो कुछ कह बोल या लिख रहा होता है, वर्तमान को लिख बोल रहा है और जो बड़े बोल रहे हैं,लिख रहे हैं,अतीत बोल रहे हैं,अतीत भी देखिए, सुनिए और समझिए पर जो एक दम से सम्मुख है,उसकी उपेक्षा मत कीजिए।
यह भी सत्य है कि हम हमारी ज्ञानेन्द्रियों
और अतिन्द्रियों से जो कुछ अनुभव प्राप्त कर रहे हैं,सब सापेक्ष‌ हैं,वह किसी एक का अनुभूत ज्ञान है और कोई भी ज्ञान चाहे वह जिस भी विषय से सम्बन्धित क्यों न हो, सदैव अपूर्ण ही होता है कि आज न कल उसकी जो मौलिकता है,उसको छोड़कर सब बदल जाता है या बदल दिया जाता है।
परन्तु भौतिक विज्ञान के नियम और अभौतिक अर्थात् सूक्ष्म या आध्यात्मिक विज्ञान के नियम में बड़े फर्क होते हैं। भौतिक विज्ञान के स्वयं सिद्ध नियमों को छोड़कर शेष नियम बदलते रहते हैं जैसे क्वांटम भौतिकी ने विज्ञान के अनेक नियमों में बदलाव ला दिया है। खगोल भौतिकी के नियमों में लागातार बदलाव देखे जा रहे हैं परन्तु जो प्रकृति का सत्य है जिसे *ऋत् या शाश्वत सनातन नियम भी कहते हैं,वह जो प्रकृति में कल था,आज भी वही है।
कारण और कार्य या घटना तथा अस्तित्व के सिद्धान्त में वही मोल और मूल्य है,वही मौलिकता है।
जिस बीज के जो गुणधर्म और गुणवत्ता होते हैं,वह हो सकता है, स्थान काल के प्रभाव से थोड़ा प्रभावित हो पर आम की गुठली से आम का ही पौधा निकलेगा,यह स्थापित सत्य है,यह प्रकृति का परम सत्य है,इसे संशय या अनिश्चितता की अवस्था में नहीं देखा जा सकता है।
संश्यवादी दार्शनिकों में देकार्त्त इसी चिन्तन पर कहता है कि संशय करो कि संशय‌ से ही किसी विषय या वस्तु या व्यक्ति के यथार्थ का बोध होता है, यहां तक कि वह स्वयं पर भी संशय करने की बात करता है। वह कहता है कि किसी के कहने पर नहीं बल्कि मैं स्वयं सोंचता हूॅं इसलिए मेरा अस्तित्व है, मैं हूॅं।
यह जो स्वयं को बताने वाली चेतना है वह मन है,जिसकी पुष्टि बुद्धि और विवेक करती है। इसी मन से समस्त अस्तित्वों लौकिक या अलौकिक आदि का बोध होता है और फिर यही बोध किसी की पुष्टि करता है।
दर्शन और चिन्तन का यह क्षेत्र हमारी उस गुण का प्रमाण है जिसे rationality and reasoning कहते हैं। यह सिद्धांत इतना स्पष्ट और साफ है कि इसे भौतिक विज्ञान का अंग भी माना जाता है।
स्थूल और सूक्ष्म के मध्य में जो चेतना है वहीं से खोज शुरू होती है, जहां खोज होगी वहां शंका होगी, जहां शंका होगी वहां तर्क और बौद्धिकता होगी,सीधे स्वीकार्यता नहीं होगी। संभावनाएं होगी, कल्पनाएं और अनुमान होंगे और जब ये सब एक जगह इकट्ठा होंगे तो द्वन्द होगा और यही द्वन्द्वात्मक अवस्था हमें अन्तिम सत्य तक ले जाएगी।
इसी द्वन्द्वात्मक आधार पर एक प्राचीन दर्शन और चिन्तन का विकास हुआ जिसे वेदांत या औपनिषदिक दर्शन में 
* नेती नेती और जैन दर्शन में* सप्तभंगी या नय का सिद्धान्त कहा गया है जिसने कालान्तर में** द्वैत, अद्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि आस्तिक दर्शनों को जन्म दिया।
यह दर्शन हमारे व्यवहारिक जीवन में भी इतना उपयोगी और प्रासंगिक है कि इसे गंभीरता से अवलोकन करने की जरूरत है।
हमें जब किसी विषय, वस्तु या व्यक्ति के बारे में कुछ बताया जाता है तो यह हमें विश्लेषण और मूल्यांकन का ठोस आधार प्रदान करता है। इसी आधार पर देखी,सुनी, पढ़ी और समझी बातों का  विश्लेषण और मूल्यांकन करते हैं।
यहीं पर हमें हमारी 
Rationality and reasoning की जरूरत होती है और इनका प्रयोग करके हम अपने अनुभवों के आधार पर और अनुभवजनित स्मृतियों के आधार पर 
सच को जानने में सफल हो सकते हैं कि आंखों देखा, कानों सुना और पढ़ा हुआ भी ग़लत हो सकता है परन्तु rationality and reasoning से फिल्टर होकर निकला हुआ गलत नहीं हो सकता है।
इसलिए आज पारिवारिक जीवन से लेकर सामाजिक और वैश्विक स्तर पर इसके आधार पर आकलन करने की जरूरत है।
हम आदतन घटना और परिणामों पर अनर्गल बहस करते हैं जबकि जरूरत बौद्धिक तर्कपूर्ण कारण समूहों की खोज करने की है। अतीत के अनुभवजनित परिणामों और वर्तमान के प्रसंगों और सन्दर्भों के आलोक में देखने और समझने की जरूरत है और इस चेतना का हमारे मूल्क में सख्त अभाव है।
समाधान चाहे जिस भी समस्या का ढुंढना हो तो उस समस्या के अन्तर्निहीत कारणों की खोज करनी होगी,अतीत में जो गलतियां हुयी हैं,उनकी पुनरावृत्ति से बचते हुए ही समाधान खोजा जा सकता है ।
हां,कुछ समस्याएं अपवाद भी हो सकती हैं तो उसके लिए बेहतर विकल्प को समाधान बनाते हुए एक मार्ग विकसित किया जा सकता है।
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ज्ञान और प्रेम : कृष्ण : दिवस : ०५ ०९ २५ 
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ज्ञान और प्रेम दोनों की प्रकृति और प्रवृत्ति समान होती है, दोनों ही हमें बांधते नहीं, मुक्त करते हैं।
प्रेम का स्वरूप इतना विराट है कि इसमें वे सारे भाव एक साथ समाए रहते हैं,मोह,माया,ममता, आकर्षण, वात्सल्य,
स्नेह,लगाव,चाहत आदि सभी मानवीय भावनाओं का जो सार है,जो निचोड़ है,जो नवनीत है,जो समेकित समुच्चय है,प्रेम है परन्तु प्रेम जबतक इन रुपों में रहता है, मनुष्य को बांधता है, दिग्भ्रमित करता है,मन को चंचल और विचलित करता है और यही कारण है कि कृष्ण जैसे योगेश्वर पुरुष कह उठते हैं,
उधो,
मोहे ब्रज बिसरत नाहीं 
गोपियां बोल उठती हैं,
उधो,
मन माने की बात 
दाख छुहारा छाड़ी
अमृत फल 
विष कीरा विष खात 
उधो,
मन माने की बात।
प्रेम जैसा कि संसार के समस्त युगपुरुषों ने कहा है कि ईश्वरीय सत्ता की अनुभूति वही हृदय कर सकता है जिसके हृदय में प्रेम का वास हो अर्थात प्रेम जैसे हृदय का, आत्मा का विषय है वैसे ही ईश्वर हृदय और आत्मा का विषय है, चेतना है। बड़ी गहराई में जाने की जरूरत होती है जब हम प्रेम को समझने और जानने की कोशिश करते हैं। यह अनन्त व्योम सा विराट और असीम है।
यही प्रेम जब * मोह, ममता,माया, स्नेह, आकर्षण,चाहत, वासना आदि की सीमाओं से मुक्त हो जाता है, बंधनों से मुक्त हो जाता है तब अपने वास्तविक रुप में आ जाता है। जबतक वह कन्हैया है, गोपाल है, यशोदानंदन है, तब तक वह मोह लगाव और चाहत है, राधा और गोपियों का चहेता है पर कन्हैया जैसे ही कृष्ण में रुपान्तरित होते हैं सारे भाव तिरोहित हो जाते हैं। रास लीला का रुपान्तरण महारास में हो जाता है। एक कृष्ण की माया और छाया सौर रश्मियों की तरह विराट हो जाती है,एक ब्रह्म की चेतना समस्त जीवों में समाहित हो जाती है।
परम चेतना का महा मिलन जीवात्मा से हो जाता है। सबका अस्तित्व एकाकार हो जाता है,
The single entity of the whole is reflected in a single embodiment of the existence of the Beingness.
वह जो प्राणतत्व है एकाकार हो जाता है।
एक प्राण से सभी प्राणवान हो जाते हैं और समस्त विभिन्नताएं सिमट कर एक हो जाती हैं। सारे विम्ब एक दूसरे के प्रतिबिम्ब बन जाते हैं,सारे भेद अभेद के भाव मिट जाते हैं और इसी की वृहद् व्याख्या कश्मीर शैव मत में 
स्वात्म प्रतिविम्बवाद में की गयी है जिसकी प्रेरणा शायद यही महारास की चेतना है।
यह विराट दर्शन और चिन्तन सिर्फ भारत की भूमि से ही फूटकर 
निकलती है और विश्वव्यापी हो जाती है। जब एक हृदय प्रेममय हो जाता है तो उसकी दृष्टि बस उसकी ही तलाश करती है और उसी का प्रतिबिम्ब सबमें दिखाई पड़ता है जैसे ठाकुर रामकृष्ण जी को मंदिर, मस्जिद,गिरजा और प्रतिमा में काली माता ही दिखाई पड़ती थीं,मीरा को सर्वत्र कृष्ण ही दिखाई पड़ते थे,तुलसी को कृष्ण में राम ही दिखाई पड़ते थे,सती पार्वती को हर
मूरत में शिव ही नजर आते थे,सूर को बाल कृष्ण ही नजर आते थे, अद्भुत और अनिर्वचनीय है प्रेम की सत्ता और उसकी अनुभूति और तभी तो
सद्गुरु कबीर साहब बोल उठते हैं 
गूंगे की रे सर्करा 
खाए और मुस्काए
और सांसारिक प्रेम में डूबे मजनूं को लैला ही लैला दिखाई पड़ती थी। जब हृदय और आत्मा प्रेम रस में डूब जाते हैं तो तो वह बांधकर रखने वाली चेतना के भाव तिरोहित हो जाते हैं,यही स्व का बोध,
पर का बोध,द्वैत का बोध वैसे ही मिट जाता है जैसे अरुणोदय के होते ही गहन तम का साम्राज्य 
नष्ट हो जाता है,
प्रेम गली अति सांकरी 
जामें दोउ ना समाय 
जब मैं था तब हरि नहीं 
जब हरि है मैं नाय
पुनः इसकी गहराईयों में जाते हुए कबीर बोल उठते हैं,
लाली मेरे लाल की जित देखौं तित लाल
लाली देखन मैं गयी 
मैं भी हो गयी लाल 
उसके प्रेम,उसकी विराटता की खोज करते करते स्वयं विराट हो जाना ही तो वह प्रेम है और यही प्रेम बांधता नहीं मुक्त कर देता है,स्व के बोध को पर में मिला देता है।
ऐसे ही ज्ञान है जो जबतक सतही होता है, सीमा में बंधा रहता है और जैसे ही परिपक्वता की ओर उन्मुख होने लगता है, मुक्त करने लगता है।
हमारे औपनिषदिक दर्शन में कहा भी गया है, सा विद्या या विमुक्तये, अर्थात् वह विद्या ही अर्थात् ज्ञान ही है जो हमें मुक्त करता है। ज्ञान जो विद्या है,वह डिग्री नहीं,उपाधि नहीं, कोई विशेषण नहीं बल्कि आत्मचेतना है, औचित्य और अनौचित्य के फर्क को समझने की कला है जिसका सम्बन्ध सिर्फ शास्त्रों से नहीं बल्कि आत्मबोध से होता है।
शास्त्रों के ज्ञान उधार के ज्ञान होते हैं,जो सापेक्ष और व्यक्तिवादी होते हैं जिनमें किसी व्यक्ति विशेष की अनुभूत चेतना का वर्णन होता है परन्तु वह स्वबोध नहीं होता है। गौतम सिद्धार्थ ने तीन गुरुओं यथा,आलार कलाम,
विश्वामित्र और उद्दत रामपुत से तत्कालीन सारे ज्ञान अर्जन किए लेकिन उन्हें आत्मज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई, आत्मचेतना नहीं जागी,प्रज्ञावान नहीं हुए परन्तु जब वे इनकी गहराईयों में गए तो इन्हें प्रज्ञा का बोध हुआ,वे आत्मचैतन्य होकर सिद्धार्थ से तथागत सिद्धार्थ हो गये और मुक्त हो गये, बुद्ध हो गये और उन्होंने ने अपने अंतिम धम्मदेसना में कहा,
अत्त सरणा अनय सरणा 
धम्म सरणा विहरथ 
अप्प दीपो भव
आत्मज्ञान,आत्मबोध,
आत्मचेतना ही प्रज्ञा जागरण to be enlightenment one का मूलाधार है
और ऐसा हमारे औपनिषदिक दर्शन और षट्दर्शन में भी कहा गया है।
इस तरह प्रेम के मर्म और ज्ञान के यथार्थ को समझना ही प्रेम और ज्ञान को जानना है।
हमारे दर्शन और चिन्तन को विराटाक्ष 
देते हुए कहा भी गया है कि,
किं ब्रह्म 
प्रज्ञान ब्रह्म।
ज्ञान जब उस अवस्था में पहुंचता है जहां लघु और विराट का बोध होने लगे, आत्मतत्व का बोध होने लगे,वही 
ब्रह्म को जानने की अवस्था है और ध्यान रहे कि ब्रह्म किसी मत,पंथ, विचार आदि से बंधी चेतना नहीं है बल्कि जो असीम, अनन्त, अगोचर, अनिर्वचनीय और विस्तृत होती हुई सत्ता है, ब्रह्म है जो भिन्न भिन्न रुपों में व्यक्त होते हुए भी एक ही है,
The ultimate truth is one but defined and expressed in different ways by the wise people.
एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति और इस यथार्थ को समझना ही 
परम ज्ञान और प्रज्ञान है। स्मरण रहे कि ज्ञान कभी भी विभेदकारी नहीं हो सकता है वैसे ही जैसे प्रेम जो एक कर देता है।
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भागम भाग करते रहते हैं कि शान्ति या सुकून : दिवस ०५ ०९ २५ 
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हम भागम भाग करते रहते हैं कि शान्ति या सुकून कहां मिले और कैसे मिले कि सबकुछ मिल जाने के बाद भी मन चित्त यदि शान्त नहीं हो और अशान्ति बनी रहे तो सब सुख अर्थहीन और व्यर्थ लगता है, शान्ति के पीछे भागने से शान्ति नहीं मिलती कि शान्ति तो स्थिर रहती है, शान्ति का सीधा सादा अर्थ ही शान्त रहना,जो शान्त है,बस वहीं पर शान्ति है,उसकी अनुभूति कीजिए।
शान्ति या सुकून के पीछे भागा नहीं जाता,मन चित्त को स्थिर रखकर उसकी अनुभूति की जाती है कि वह किस रुप में हमारे सामने है और उसे कैसे देखना और समझना है। इस देखने और समझने के मध्य शान्ति है,जो विराम है वहीं शान्ति है।
सभी बड़े छोटे, साधनहीन, सम्पन्न, समृद्ध,विपन्न,निर्बल
सबल सबकी कुछ न कुछ अपनी अपनी समस्याएं होती हैं और सबकी समस्याएं लगभग उनके सामर्थ्य और क्षमताओं के समानुपाती होते हैं, हां, इसमें कुछ अपवाद भी होते हैं या हो सकते हैं और सबका समाधान मन चित्त की शान्त अवस्था है।
विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी आप स्वयं उसके समाधान हैं बस मन चित्त को स्थिर करने और रखने की जरूरत होती है और यही हम नहीं कर पाते हैं,जैसे गतिशील पानी में हम अपना चेहरा नहीं देख पाते हैं वैसे ही मन चित्त की चंचलता है।
स्थिर पानी में हम अपने आप को देख पाने में सक्षम होते हैं वैसे ही मन चित्त की एकाग्रता में ही हम अपनी समस्याओं का हल ढूंढ़ने में सफल हो सकते हैं।
आपदाएं आती हैं,उनका आना भी एक सहज और प्राकृतिक प्रक्रिया है,इसे भी समझने की जरूरत है कि उन्हीं आपदाओं में हमारे समाधान भी छुपे होते हैं।
थक हार कर बैठना नहीं है, बैठकर गंभीरता से चिंतन करना है कि चिंता हमारे मस्तिष्क को निष्क्रिय कर देती है और चिन्तन उसे प्रखर और क्रियाशील करके हमें ऊर्जावान बना देती है। मुश्किलें और समस्याएं हमारे भीतर की क्षमताओं और संभावनाओं को 
खोजकर निकालने का काम करती हैं, हमें पुनर्जीवित करती हैं और हमारी जिजीविषा को मजबूत करती है।
इसलिए भागना नहीं है,स्थिर मन चित्त से हल ढूंढ़ना है कि पलायन अन्य समस्याओं को जन्म दे सकता है और स्थिरता
हल खोजकर निकाल सकता है।
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स्वयं के साथ सोना और स्वयं के साथ जागना दिवस ०८ ०९ २५ 
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सोना और जागना तो मनुष्य की सहज वृत्ति है जिसके लिए किसी को गंभीरता से चिन्तन करने की जरूरत नहीं पड़ती है,जैसे सुबह उठकर हम अपनी अपनी दिनचर्या में लग जाते हैं जिसके लिए किसी विशेष प्रयोजन की जरूरत नहीं होती है, ठीक वैसे ही सामान्य दृष्टिकोण में हमारा सोना और जागना भी होता है। यह जीवों की सहज क्रियाशीलता है की लोग सोते और जागते हैं। परन्तु जब इसे एक विशेष क्रियाशीलता के रुप में अवलोकन किया जाता है तब इसके आयाम बदल जाते हैं और हमारी ये सहज वृत्ति एक विशेष वृत्ति में रुपान्तरित हो जाती है और हमारे सोने जागने के अर्थ बदल जाते हैं।
सोना एक सहज क्रियाशीलता इसलिए है कि दिन भर की समस्त क्रियाशीलताओं के बाद शरीर के समस्त अंगों को विश्राम की जरूरत होती है और यह विश्राम अगले दिन के लिए हमें ऊर्जावान बनाए रखता है और फिर अगले दिन हम अपने अपने काम धंधे में लग जाते हैं और लगभग पुरी जिन्दगी सोने जागने में ही समाप्त हो जाती है जिसका कोई हिसाब किताब हम नहीं रखते हैं पर यह बड़े लेखा संधारण की तरह ही महत्वपूर्ण है।
हम यदि सोने और जागने के समय अपनी चेतना के साथ जुड़े रहें तो अद्भुत अनुभव होते रहते हैं कि सोने और जागने के समय चेतना दो रुपों में हमारे साथ उपलब्ध रहती है एक चेतन मन और मस्तिष्क और एक अवचेतन या अर्द्धचेतन मनो मस्तिष्क ( Conscious and Sub Conscious State of mind with Brain) जब हम शयनावस्था में होते हैं तो हमारा चेतन मन या जागृत चेतना स्थूल शरीर के साथ विश्रामावस्था में चली जाती है और उसके साथ ही स्वत: स्फूर्त अवचेतन या अर्द्धचेतन मन सक्रिय हो जाता है।यह अवचेतन मन एक साथ अनेक क्रियाशीलताओं का संपादन करने लगता है।यह बाह्य उत्तेजनाओं के साथ प्रतिक्रिया करने के साथ साथ अतीत की स्मृतियों का समेकन भी करने लगता है जिसकी प्रतिक्रिया स्वप्नों के रूप में होती हैं। कभी कभी हम हमारी अतृप्त इच्छाओं और कामनाओं की पूर्ति होते हुए भी देखते हैं और वैसी जगहों या लोगों से भी भेंट होते देखते हैं जिन्हें हम न कभी देखे या सुने या पढ़े भी होते हैं और ये सब हमारी चित्तवृत्ति का जागरण है, स्मृतियों का पुनर्जागरण है जो अवचेतन मन अपनी क्रियाशीलता में दिखाता है। परामनोविज्ञान इसे transformation of emotions and feelings in sleeping or Sub Conscious State कहता है जो अद्भुत और अकल्पनीय होता है। कभी कभी हमारा अवचेतन मन * ब्रह्माण्डीय ऊर्जा और शक्तियों से भी जुड़ जाता है जिससे असंभव और असाध्य समस्याओं और आधियों व्याधियों का निदान निकल आता है और हम उनसे मुक्ति पा लेते हैं। स्वप्नावस्था में ही हम अपनी मुश्किल से मुश्किल समस्याओं का निदान पा लेते हैं जिसपर विज्ञान मौन है। नेपोलियन को एक सैन्य अभियान में सुबह में हमला करना था परन्तु उसी रात उसे स्वप्न में ऐसा बोध हुआ कि हमला रात में करना सही होगा और 
उसने सेना की तैयारी बदल दी और अभियान रात में शुरू हुआ और वो जीत गया। सुबह में उसकी शत्रु सेना सजग और तैयार थी और अभियान समय में परिवर्तन ने उसे विजयी बना दिया।
इसीलिए हमने कहा कि हमें स्वयं के साथ सोना चाहिए कि सोने समय यह आकलन करें कि दिन भर में हमने क्या क्या किया और क्या लम्बित रह गया और समस्याएं क्या शेष रह गयी,यही चैतन्य मन जब सोने समय अवचेतन अवस्था में चला जाता है तो वह चेतना की समेकित स्मृतियों पर काम करने लगता है और योजनाएं बनाने लगता है और हमें हमारी समस्याओं और परेशानियों का हल ढूंढ़ने लगता है। ठीक यही प्रक्रिया सुबह जागने के समय होती है, अवचेतन मन निष्क्रिय हो जाता है और चेतन मन उसी की प्रेरणा पर काम करने लगता है। इसलिए सोते समय भी हमें स्वयं के साथ सोना चाहिए कि चेतना की सारी संचित स्मृतियों का समेकन रात में हो जाए और हमारे चौबीस घंटों का मूल्यांकन हो जाए कि हमने क्या खोया और क्या पाया।
मनुष्य की मानसिक शक्तियों में अपार ऊर्जा है जिसका सीधा सम्बन्ध काॅस्मस एनर्जी से होता है चूंकि हमारे यहां कहा गया है,
यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे 
यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे
अर्थात् उस असीम विराट अगोचर और अनिर्वचनीय ब्रह्माण्डीय संरचनाओं में जो कुछ है वह हमारे भीतर है और हमारी समस्त क्रियाशीलताओं का असर उस पर और उसमें होने वाली  समस्त क्रियाशीलताओं का असर हम पर पड़ता रहता है,ऐसा भौतिक और आध्यात्मिक विज्ञान दोनों का मानना है।
हमारे जागने का अभिप्राय स्वयं की चेतना के साथ जागना और सोने का अभिप्राय स्वयं की चेतना के साथ सोना है जो सहज होते हुए भी एक साधना है,एक शोध है,एक समझ है जो हमें सम्पूर्ण रूप में 
सचेत और सजग बनाने का काम करती है। इसलिए स्वयं के साथ सोइए और स्वयं के साथ जागिए,ताकि शयन और जागरण में कोई पश्चाताप न हो।
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जीवन के औचित्य और अनौचित्य का निर्णय ०९ ०९ २५ 
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जन्म के बाद और मृत्यु के पूर्व का जो समय है,शायद हम उसे ही जीवन कहते हैं पर यही सच नहीं है।
यह भौतिक और स्थूल जीवन है जो सबको दिखाई देता है और इसी आधार पर हम सबके जीवन के बारे में कुछ बोलते सुनते और लिखते हैं और इसी में हमारा जीवन भी सम्मिलित है।
जन्म के साथ जैसा जैव रसायन विज्ञान और आध्यात्मिक विज्ञान भी कहता है कि हर मनुष्य का स्वतंत्र मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार,विवेक और प्रारब्ध होता है, इनमें भौतिक विज्ञान प्रारब्ध से सहमत नहीं होता है। वैसे मन, बुद्धि,विवेक और अहंकार के अस्तित्व भी स्थूल और दृश्यमान नहीं होते परन्तु हमारी क्रियाशीलताओं के आधार पर मनोविज्ञान और भौतिक विज्ञान इनकी सत्ता को स्वीकार करता है। वैसे ही हमारे प्राण और आत्मा की सत्ता है जो स्थूल तो नहीं परन्तु सूक्ष्म रूप में मौजूद है और हमारी बाह्य और आन्तरिक चेतना का मूलाधार है।
प्राण असल में वायु या सांस ही तो है पर भौतिक जीवन का मूलाधार है और आत्मा की नाभिकीय ऊर्जा है और दोनों को अलग-अलग समझना थोड़ा कठिन है पर आध्यात्मिक दर्शन और विज्ञान में सहज है। दोनों एक दूसरे से अविच्छिन्न रूप में संयुक्त हैं पर आत्मा श्रेष्ठ है। प्राण भौतिक जीवन और जगत का आधार है कि इसके बगैर किसी जीवधारी का अस्तित्व अपने में बना नहीं रह सकता है पर आत्मसत्ता तो सृजन लय और प्रलय का आधार है। प्राण के रहते हुए हम जीवित तो रह सकते हैं परन्तु आत्महीन होकर हम जीवित होते हुए भी मृतवत हो जाते हैं, कोई चेतना, कोई संवेदना नहीं रह जाती है और तब हम किसी के बारे में यह कहते हैं कि उसकी आत्मा मर गयी है और जिसकी आत्मा मर गयी हो अर्थात् जो सत्य असत्य के औचित्य पर सोच विचार नहीं कर सकता हो,उसके जीवन का कोई औचित्य भी नहीं रह जाता है, इसलिए जन्म के बाद और मृत्यु के पूर्व भी आदमी जीवित रहते हुए मर जाता है। फिर हम जीवन को कैसे व्याख्यापित करते हैं तो यह सवाल बड़ा पेचिदा है कि इसकी परिभाषाएं निरपेक्ष नहीं होती बल्कि सापेक्ष होती है और सापेक्ष का जो समेकित रुप है अर्थात् सारी परिभाषाओं का जो सार है,वही निरपेक्ष भाव हो सकता है जिसमें एक पक्ष बड़ा प्रबल है कि 
जीवित वही है जिसे आत्मचैतन्य बोध प्राप्त है,जिसके हृदय में संवेदना,सहज करुणा और प्रेम है,जो अपने उपलब्ध संसाधनों से लोगों के लिए सहयोग करने को तत्पर रहता है,जो 
मानवीय मोल और मूल्यों का सम्मान करता है, अब हमें यह देखना और तय करना है कि इन गुणों या विशिष्टताओं में से हम कितनों का निर्वहन करते हैं और उनकी मात्रा और अन्तर्निहीत भाव ही उनके जीवित रहने के औचित्य और अनौचित्य का निर्णय करेगा और यह निर्णय 
पर निर्णय नहीं आत्मनिर्णय होना चाहिए कि लोगों के निर्णय भी अपनी समझ और हमारी उपयोगिता और उपादेयता के आधार पर होती है, सापेक्ष होती है, इसलिए आत्मनिर्णय और आत्मसाक्षी से श्रेष्ठ निर्णय कुछ नहीं होता है कि हम सबसे झूठ सच कह बोल सकते हैं परन्तु जब हम खुद से सवाल करते हैं तो झूठ नहीं बोल सकते हैं कि हमारा reasonable reasoning wit and conscience 
इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा। यदि हम अपने तर्क से किसी कृत्य के औचित्य को सही भी करना चाहेंगे तो हमारा reasonable reasoning wit and conscience (विवेक सम्मत बुद्धि और अन्त:करण) उसका खंडन कर देगा।
अब सारा निर्णय स्वयं हमारे हाथों में हैं कि हम स्वयं के साथ और अन्य लोगों के साथ कैसे न्याय करते हैं।
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उम्र के उस पार। १० ०९ २५ 
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उम्र के किस पड़ाव पर खड़े हो,
चुप क्यों हो,
कुछ गा कर देखो,
कुछ गुनगुना कर देखो,
जहाँ छोड़ कर आए हो खुद को
वहीं फिर खड़े हो सकते हो
बस नजर घुमाकर देखो।।
             एक छोटी-सी अभिव्यक्ति के साथ एक अमरिकी लेखक महाशय फ्रैंक मैक्फोर्ट ( पुलित्जर पुरस्कार विजेता) ने अपने उम्र के लगभग सातवें दशक में लिखते है कि" हर काम को करने की एक उम्र होती है " एक ऐसा झूठ है जिसे हम ताउम्र एक हकीकत के रूप मे जीते रहते है, इसे झूठलाते हुए फिर लिखते है कि, ' मेरी उम्र के आखिरी दिनों मे भी जो सूरज उगेगा, वह मुझसे उतनी ही उम्मीद रक्खेगा जैसे उसने मेरी जिन्दगी के पहले दिन
रक्खा था, फिर मैं उसकी उम्मीद क्यों तोड़ दूँ।'
इसी क्रम में विश्वविख्यात अंग्रेजी साहित्य जगत के दीप्तिमान नक्षत्र जी बी शाॅ लिखते हैं  कि " हम इसलिए खेलना नहीं छोड़ देते हैं कि हम बुढ़े हो जाते हैं बल्कि हम इसलिए बुढ़े हो जाते हैं कि हम खेलना छोड़ देते है। अगर हम मानते हैं कि कोई भी नया काम युवावस्था में ही शुरू किया जाना चाहिए तो यह भी मानना चाहिए कि युवा किसी अवस्था या आयु का नाम नहीं बल्कि एक ऊर्जा का नाम है। जिसने अपने मन और अपनी आत्मा की ऊर्जा को जगा लिया है या जगा रक्खा है, वह युवा है , भले ही वह कुछ भी हो।"
जापान के एक 105 वर्षीय बुजुर्ग युवा
हिडकिची मियाजाकी ने जब 100 मीटर के फर्राटा दौड़ को 42 सेकण्ड में जीत कर पुरस्कार लिया तो वे बच्चों की
तरह किलकारियां मार रहे थे और उसेन 
बोल्ट उन्हें नमन कर रहा था।
जिन्दगी के अपने मायने और नजरिया 
होते है , जैसे स्वीकार करेंगे,आपको
वैसी ही मिलेगी।
बस उम्र के किसी भी पड़ाव पर और किसी भी हाल में जीना न छोड़े तो जिन्दगी आपको भी नहीं छोड़ेगी और
हमनफस, हमनवाज और हमसफर बन जाएगी।
आप अगर वक्त की इज्जत करेंगे तो वक्त आपकी भी इज्ज़त अफ़जाई करेगा।
मौत तो जिन्दगी के साथ तयशुदा समझौता है, वक्त पर ही आएगी तो हम
वक्त के साथ मुकम्मल जी लें और जीने की कोशिश करें ।
छः दशकों के बाद जिन्दगी तपकर पक जाती है, जीवन के उतार चढ़ाव का एक लम्बा अनुभव हमारे पास होता है, परिवार, रिश्ते नाते, समाज और देश दुनियां कैसे चलती है का गहरा अनुभव भी हमारे पास होता है जिसे वे एक दूसरे को शेयर कर सकते हैं। यही नहीं मौजूदा पीढ़ी के साथ साथ वे बुजुर्ग आने वाली पीढ़ियों को अपने भोगे हुए यथार्थ से अवगत भी करा सकते हैं कि हमने किस मार्ग को अपनाकर क्या खोया और क्या पाया। एक दार्शनिक ने तो कहा ही है कि,
If u r not desirous to attend a library,u try to sit with a learned old man,he is a library with life, emotions, feelings and experiences of life,he is a walking garden,u can have ur favourite flowers from him.
एक बुजुर्ग पुस्तकालय और फूलवारी की तरह होते हैं जहां तुम अपनी पसंदीदा किताबें और फूलों का आनन्द ले सकते हैं। हमारे कहने का यह अभिप्राय सिर्फ ये नहीं कि कोई अपने बुजुर्गों से कुछ सीखे पर यह जरूर सीखे कि वह अपनी आने वाली पीढ़ियों को क्या दे सकता है कि हर शिशु में एक पिता और माता का बीज और गुणसूत्र होता है।
Learn from ur past, whether they r good or bad,good will promote  and bad will make u aware.
हर चीजों से सीखा जा सकता है चाहे वो चीजें अच्छी हों या बुरी हों, दोनों के परिणामों से सीख लेना ही बौद्धिकता है,
होशियारी है। हार जीत, दोनों ही हमें कुछ न कुछ सीखाते हैं कि हम कैसे जीते और कैसे हारे,ये क्यों और कैसे को भी हम उनके अनुभवों से जान सकते और समझ सकते हैं।
वह समाज जहां बुजुर्गों का सम्मान होता है,सफल, प्रगतिशील, समृद्ध और सुरक्षित होता है।
हमारी प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति में यही था तब हमारा समाज सशक्त और समृद्ध था और ज्यों ज्यों इनकी उपेक्षा होती चली गयी, समाज और व्यवस्था पतनोन्मुख होती चली गयी। आज जापान जैसा छोटा सा देश इसलिए इतना सशक्त और सामर्थ्यवान है कि वहां 
बुजुर्गों का बड़ा सम्मान होता है। इसलिए बुजुर्ग हर समाज की थाती और धरोहर होते हैं,यह चेतना बनी रहनी चाहिए।
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सबके अपने-अपने तल दिवस : ११ ०९ २५ 
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प्रकृति या परमात्मा ने सबको अपने तरीके से सृजित किया है और सबके मन मस्तिष्क हृदय बुद्धि और विवेक के अपने अपने तल होते हैं और जो जिस तल के होते हैं उसी तल पर उगते पनपते फूलते फलते हैं। उनके सोंचने समझने और काम करने के तरीके भी इसलिए अलग अलग होते हैं। इसी गुण को दृष्टि और दृष्टिकोण कहते हैं,जिसकी जैसी दृष्टि होती है वैसा ही उसका दृष्टिकोण भी होता है और यह स्थिर गुणधर्म नहीं है बल्कि परिवर्तनशील है। किसी व्यक्ति विशेष का  जीवन के बारे में सोंचने का जो दृष्टिकोण आज है, कोई जरूरी नहीं है कि कल भी वही रहेगा। बदलते संसार और परिवेश में होते बदलाव का असर मनुष्य के मनोभावों पर भी पड़ता है और उनके अनुरूप चीजें बदलती चली जाती हैं।
रोटी का सीधा सम्बन्ध भूख और उदर से होता है और उदर जब तृप्त होकर शान्त हो जाता है तो दिल और दिमाग के दरवाजे खुलने लगते है।
सृजनात्मकता का सम्बन्ध * उदर दिल और दिमाग से सीधा होता है।
भुख ( उदर की क्षुधा) भावों को उगने ही नहीं देता है और भाव नहीं होंगे तो विचार कहाँ से आएँगे। विचार नहीं होंगे तो सांसारिक जीवन में क्रियाशीलताओं का जन्म कैसे होगा।
भूख ही * पाप और अपराध की जननी है, उत्प्रेरक और चेतना भी है। यही भूख किसी को अपराधी बना देती है तो किसी और को दूसरी दिशा की ओर उन्मुख कर देती है और वह भूख के खिलाफ शंखनाद कर देता है जो व्यष्टिममूलक और समष्टिमूलक दोनों हो सकता है। बस इसकी मूल प्रवृत्ति और‌ प्रकृति का अवलोकन करते रहिए, मूल के कारण समूहों का बोध होते ही उनका उन्मूलन किया जा सकता है। हमें बस  सोंचते रहना, मंथन और चिन्तन करते रहना है। फिर परिणाम स्वयं ही अपेक्षित हो जाएगा।
अग्नि तब तक प्रज्वलित रहती है जब तक उसे ईंधन मिलता रहता है, ईंधन मिलना बन्द, जलना बन्द। तो आग बुझाने की जरूरत नहीं है, उसके मूल को नष्ट कर दो, आग खत्म हो जाएगी,मूल की खोज सदैव होनी चाहिए। कहीं कोई घटना दुर्घटना यदि घटती है तो हमें लगता है कि अचानक हो गया पर ऐसा नहीं होता है, कपिल मुनि के सांख्य दर्शन के अवलोकन से पता चलता है कि हर घटना और अस्तित्व के अस्तित्व में उसके कारण समूह पहले से मौजूद होते हैं और उसके क्रियान्वयन के लिए किसी तात्कालिक कारण भर की जरूरत होती है। अब तक संसार मे जितनी भी छोटी बड़ी लड़ाईयां या विद्रोह होते रहे हैं,सबका आकलन और विश्लेषण करें,ऐसा ही दिखाई पड़ेगा और यह सिद्धांत इतना व्यवहारिक और सटीक है कि यह निजी जीवन से लेकर वैश्विक स्तर पर लागु होता है।
भाव को ही अवरूद्ध करना होगा, चेतना के प्रवाह की दिशा को ही मोड़ने की जरूरत होगी तभी कुछ मिलने की संभावना है।जीवन, सभी दर्शन और चिन्तन में दो धाराओं से होकर चलता है एक,प्रवृत्ति मार्ग दूसरा,निवृत्ति मार्ग।
सांसारिक मार्ग ही प्रवृत्ति मार्ग है जहाँ हम सब अपनी-अपनी इच्छाओं की तृप्ति में संलग्न और सचेष्ट हैं।मिलने छुटने छुटने मिलने की प्रक्रिया सतत् जारी है
अबाध गति से चल रही है और सबका जीवन ऐसे ही है। देखने में छोटा बड़ा भले ही लगे पर प्रवृत्ति तो दुख देगा ही देगा। फिर निवृत्ति कैसे हो,
दो ही मार्ग है, भोग से उपजी अरूचि या अतिरेक भोग से उपजा अवसाद या विषाद या उसमें * निस्सारता का बोध।
यही निवृत्ति है जिसे एक समय सबको स्वीकारना ही पड़ता है।
इससे तो मुक्ति नहीं है। परन्तु ध्यान रहे * सामर्थ्य के रहते इस निवृत्ति के मर्म को समझ गए तो छोड़ने या छुटने की पीड़ा नहीं होगी। निवृत्ति मार्ग कोई संन्यासी या संत बनना नहीं है बल्कि किसी वस्तु या आदमी के प्रति आसक्ति के भाव से मुक्त करना है ताकि वह * बंधन न बन सके और बंधन ही दुख का जन्म का और मृत्यु का कारण है। ऐसे ही राजनीति और व्यवस्था सृजन और संचालन में होता है।पर हमारी वृत्ति और प्रवृत्ति बंधकर रहने की है और यही सबको मोहग्रस्त कर देता है। कोई सत्ता में है तो वह बंध जाता है और कोई सत्ता से च्युत है तो सत्ता चाहता है,सुख में है तो सुख की निरन्तरता चाहता है,सुख सुविधा ओं से हटना नहीं चाहता और यही भाव दुःखों का सृजन करता है और इसका अतिशय विद्रोह या विप्लव की ओर‌ ले जाने का काम करता है। ऐसी परिस्थितियों से उबरने के लिए समन्वय और सामंजन
की जरूरत होती है।
संसार सदैव समन्वय और सामंजन चाहता है और न करने पर उथल-पुथल की संभावनाएं प्रबल हो जाती हैं। इसलिए किसी अवस्था या भाव से बंधिए मत, निस्पृह भाव रखिए, दुःख होगा पर दुखदाई नहीं होगा। सुख से चिपकिए मत,सुख दुःख का सृजन करता है कि सुख और कुछ नहीं दुःखों और अभावों का अभाव है।
इसलिए स्वतंत्र बनिए, मुक्त बनिए, निवृत्ति भाव रखिए,कुछ भी स्थाई नहीं है,जो कल था,आज नहीं है और जो आज है,कल नहीं रहेगा।
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दुर्गन्ध और सुगन्ध दिवस : १२  ०९ २५ 
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दुर्गन्ध और सुगन्ध प्रकृति की दो अद्भुत विशिष्टताएँ हैं और दोनों के अस्तित्व शाश्वत हैं। दोनों की समुचित उपलब्धता भी है। कर्मों, विचारों,संस्कारों,गुणधर्मों, रचनाधर्मिता और संवेदनाओं आदि के सुगन्ध और इनके विपरीतधर्मा के दुर्गन्ध में मौलिक अन्तर क्या है, एक( सुगन्ध) के परासरण( वायुमंडल में फैलना)
की प्रक्रिया मंद होती है और दूसरे(दुर्गन्ध) की प्रक्रिया तीव्र होती है जैसे अफ़वाह तेजी से फैलते हैं और वह सच को ढांक लेता है।
परमात्मा ने संसार में सबको  इच्छा-कर्मस्वातंत्र्य(Freedom of Will and Action) प्रदान किया है कि आप क्या चयन करते हैं और कैसे क्रियान्वित करते हैं, सुगन्ध चुनते हैं कि दुर्गन्ध चुनते हैं पर ध्यान रहे कि आपके विचार ही कर्म हैं और कर्मजनित गुणधर्म और संस्कार ही आपकी पहचान और आपका अस्तित्व है। 
इस विराट सामाजिक आधारभूत संरचनाओं में कुछ लोगों की वृत्ति और प्रवृत्ति दोनों दुर्गन्ध फैलाने की होती है और कुछ लोग इसके विपरीत सदैव सुगन्ध फैलाते रहने का काम करते हैं और जैसा कि हमनें पूर्व में कहा है कि प्रकृति में दोनों एक साथ उपलब्ध रहते हैं और क्रियाशील भी रहते हैं।
ध्यान रहे कि हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व ही दो विरोधाभाषी धाराओं से निर्मित और संचालित है जो हमारे दैनिक क्रियाकलापों से परिलक्षित होते रहते हैं और इसके लिए किसी साक्षी की जरूरत नहीं होती है।हम इसके स्वयं साक्षी होते हैं कि हमारे बाह्याचार को तो लोग देख सकते हैं परन्तु आन्तरिक भावों और 
अनुभूतियों के अवलोकनकर्ता तो हम स्वयं ही होते हैं इसलिए आत्मसाक्षी से बड़ा साक्ष्य कुछ नहीं होता है और जो भी आत्मसाक्षी भाव से काम करते हैं,कभी दुर्गन्ध नहीं फैला सकते हैं कि उनकी वृत्ति और प्रवृत्तियों पर अब स्वयं उनकी नजरें रहती हैं।
हमारे अच्छे, साकारात्मक, रचनात्मक और विचारोत्तेजक सोंच और कर्म ही हमारे जीवन के सुगन्ध हैं और ठीक इसके विपरीत वे दुर्गन्ध हैं।
हम और हमारी प्रवृत्ति अगर सुगन्ध फैलाने वाली है तो हमें ही नहीं अन्य लोगों को भी इसकी अनुभूति होते रहती है और दुर्गन्ध की भी अनुभूति होती रहती है।
सद्गुरु कबीर साहब ने बड़ा अच्छा कहा है कि,
कबीरा संगति साधु की
ज्यों गंधी का वास
जो कुछ गंधी दे नहीं 
तो भी वास सुवास,
अर्थात् इत्र या सुगंधित पदार्थ बेचने वाला सुगंध ही फैलाते रहता है,उससे कुछ मिले या न मिले,सुगन्ध तो मिलते ही मिलते हैं। अच्छे लोगों का सान्निध्य ही सत्संग हैं। इस सत्संग का अभिप्राय वो साधु, संतों, संन्यासियों आदि का साथ ही सिर्फ नहीं है बल्कि जिनके भाव, विचार, व्यवहार और आचरण सही हो,उनका सान्निध्य भी सत्संग ही है और कहा भी गया है,
One man is identified with the persons who r his friend and foe.
एक व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का परिचायक उसके मित्र और शत्रु होते हैं जिससे उसके मानसिक और वैचारिक स्तर का बोध हो जाता है कि हमने दोस्त और दुश्मन कैसे और किस प्रकार के रखे हैं। गोस्वामी जी ने यहां भी बड़ा खूब कहा है,
सात स्वर्ग अपवर्ग सुख
धरीय तूला एक अंग
मिले न ताही सकल मिले
जो सुख  लव सत्संग
अर्थात् सारे स्वर्ग के सुख को एक तरफ रखा जाए तो भी सत्संग के सुख की बराबरी नहीं कर सकता है अर्थात् अच्छे लोगों का साहचर्य सदैव हमें सुवासित करता रहता है।
मित्रता भाव विचार योग्यता क्षमता आदि को बताता है तो शत्रुता सामर्थ्य को बताता है कि हम किनके सान्निध्य में रहते हैं और हमारे वैर भाव किन किन लोगों के साथ है।
हम सब जीवन में सच झूठ बोलते ही रहते हैं
पर सच और झूठ की भी अपनी प्रकृति और गुणधर्म होते हैं कि ऐसे तो हमें सच ही बोलने की आदत रखने की कोशिश करनी चाहिए पर वैसा झूठ भी नहीं बोलना चाहिए जो किसी विध्वंस या विनाश को जन्म दे। अगर हमारे एक झूठ बोलने से किसी की प्रतिष्ठा बच रही हो,प्राण रक्षा हो रही हो तो वह झूठ अनेक सच से भी श्रेष्ठ है। परन्तु झूठ बोलने की प्रवृत्ति भी घातक होती है कि हमें इसे स्वभाव में शामिल करने से सदैव बचना चाहिए कि झूठ माहौल को दुर्गन्धित करते रहता है और सच सदैव सुगन्ध फैलाने का काम करता है। परन्तु आज के मतिभ्रष्ट समय के कालखंड में सच बोलने में बड़ी सावधानी और समझ की जरूरत होती है।
झूठ और अफवाहों का चोली दामन का साथ है जो दोनों साथ साथ चलते हैं पर सच को सदैव अकेले चलना पड़ता है जिसके लिए बड़े साहस, सामर्थ्य और आन्तरिक बल के साथ साथ ईमानदारी की जरूरत होती है जिसके लिए तपश्चर्या की जरूरत होती है।
सांच बराबर तप नहीं 
झूठ बराबर पाप
जाके हृदय सांच है
ताके हृदय आप
अर्थात् सच बड़ा को तप या साधना नहीं और झूठ से बड़ा कोई पाप नहीं है और जिनके हृदय में सच का वास है, वहीं ईश्वर का भी वास होता है।
इसलिए कोशिश करते रहना है कि हम सुगंधित रहें और सबको सुवासित करते रहें।
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शब्दों के आधार और धार दिवस : १४ ०९ २५ 
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शब्दों में आधार होने के साथ साथ धार भी होनी चाहिए ताकि कानों से गुजरते हुए वे हृदयस्थ हो जाएं और पढ़ने सुनने वाले के हृदय झंकृत और उद्वेलित हो जाएं।
शब्द स्वयं में ऊर्जा होते हैं कि इनका सृजन अक्षरों से होता है और अक्षर का अर्थ होता है जिसका क्षय या क्षरण न हो और जिसका क्षय या क्षरण नहीं होता, ऊर्जा ही है।
हम जागने के बाद और सोने से पूर्व कुछ न कुछ लिखते बोलते और देखते रहते हैं जो अनेक कारकों और कारणों से प्रभावित होते हैं जिसकी प्रतिक्रिया लेखन या वाचन में होती है जो एक श्रृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया है। हम जो कुछ देखते, सुनते या पढ़ते रहते हैं उनकी सहज प्रतिक्रिया हमारे 
मनो मस्तिष्क में होती रहती है जिनके सम्बन्ध हमारे चित्त से होती है जहां अतीत की स्मृतियां संग्रहित होती हैं। ये स्मृतियां जब वर्तमान की अनुभूतियों और अनागत भविष्य की आशंकाओं से प्रतिक्रिया करती हैं तब हमारे मन में नाना प्रकार के भाव बनते हैं और फिर विचारों का सृजन होता है और यह सृजन हमारे विचारों का समानुपातिक होता है,फिर उनकी अभिव्यक्ति के लिए हम शब्दों के चयन करते हैं जो वाचन या लेखन के माध्यम से प्रकाशित होते हैं जो यकीनन किसी के लेखकीय या वाचक प्रतिभा के परिचायक होते हैं।
शब्दों की महिमा के क्या कहने, अनिर्वचनीय है,एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ हमें 
अलग अलग तरीके से सोचने के लिए विवश कर देते हैं पर कोई भी उसका अर्थ उतना ही निकाल पाने में सक्षम होता है जितना उनका अध्ययन चिंतन और सोंचने की शक्ति होती है। एक शब्द कनक है जिसका भावपूर्ण प्रयोग कवि ने करते हुए कहा है,
कनक कनकते सौगुना 
मादकता अधिकाय 
एक खाए बौराए जग
एक पाए बौराए,
अब देखा जाए कि कनक एक ही है पर एक कनक( धतूरा) को खाने से लोग बौरा जाते हैं अर्थात मत्त हो जाते हैं और एक कनक ( सोना ) है जिसे पाकर लोग नशे में या अहंकार में आ जाते हैं।
शब्दों की अपनी गति,लय,धार और वजन होते हैं। सही शब्दों को भी सही जगह नहीं मिलने से वे अर्थहीन हो जाते हैं और अपनी गरिमा को देते हैं इसलिए किसी के पास शब्दों के भंडार होने के बावजूद यदि चयन करने का हुनर नहीं है तो वे विष या अमृत का काम कर जाते हैं,कहा भी गया है कि,
शब्द संभारे बोलिए 
शब्द के हाथ न पांव 
एक शब्द कर औषधि 
एक शब्द कर घाव।
इसलिए बड़ा संभलकर बोलना लिखना पड़ता है कि लोग अपने अपने भाव विचार और अपनी अपनी समझ के अनुरूप अर्थ निकालने का काम करते हैं, इसलिए ऐसा बोलिए और लिखिए जिस पर सवाल खड़ा किए जाने पर उसका सटीक जवाब दिया जा सके।
आमतौर पर आजकल सोशल मीडिया पर पोस्टों को
अग्रसारित करने की जबरदस्त परम्परा सी बन गयी है जिससे हमारे भाव परिलक्षित तो होते हैं पर हमारी मौलिकता नष्ट हो जाती है,हर व्यक्ति को इस दिशा में मौलिक बनने की कोशिश करनी चाहिए ताकि उनके भीतर की संभावनाएं जागृत होती रहें।
शब्द हमारे सम्पूर्ण व्यक्तित्व का तो नहीं परन्तु उसके बड़े हिस्से का परिचायक जरूर होते हैं।
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बुद्धि और विवेक : दिवस : १५ ०९ २५ 
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बुद्धि और विवेक तो परमात्मा ने सबको दे रखी है पर ये चेतना सबकी क्रियाशील नहीं होती है और होती भी है तो रचनात्मक और सृजनात्मक नहीं होती है।
विनाश सहज और बड़ा सरल है परन्तु सृजन में बड़ी ऊर्जा खर्च होती है, मानवीय संसाधनों और भावनाओं का बड़ी मात्रा में प्रयोग होते हैं पर हम मनुष्य इस पर कभी गंभीरता से विचार नहीं करते हैं।
चाहे किसी आधारभूत संरचना का निर्माण हो या किसी योजना का निर्माण हो या किसी रिश्ते का निर्माण हो, बड़ी ऊर्जा खर्च होती है और हम एक झटके में इसे खत्म कर देते हैं। जरा सोचिए बनाने वाले को कितना दुःख और कितनी पीड़ा होती है।
ये बुद्धि और विवेक का ही नहीं हृदय और आत्मा का सवाल है। चीजें बाहर टूटती हैं और पीड़ाएं भीतर होती हैं,चोट बाहर लगती है,रोता हृदय है और आंखें उसे दिखाती हैं।
जीवन सिर्फ सुख सुविधाओं का सामूच्चय नहीं है, सिर्फ भौतिक नहीं है, अनेकानेक सूक्ष्म भावों का भी समावेशन होता है इसलिए जीवन को सिर्फ भौतिक नजरिए से ही नहीं सूक्ष्म भावों से भी देखने और आकलन करने की कोशिश करते रहिए। सारे भौतिक पदार्थ यहीं धरे के धरे रह जाएंगे और जो जाएगा वह सूक्ष्म चेतना और अनुभूतियां ही होंगी पर हम तमाम उम्र उन्हीं के लिए परेशान रहते हैं जो यहीं रह जाने वाला है    
और करिश्मा ये है कि इस यथार्थ को जानते समझते हुए भी हम जीवन भर एक दूसरे के साथ धोखा फरेब करते रहते हैं जो अन्तकाल में सीने पर एक बोझ बन जाती है।
जीवन यात्रा भले ही जीवन भर यातनामय और संघर्षमय हो पर अंतिम यात्रा भारमूक्त हो,इस पर सदैव चिन्तन करते रहें, निस्संदेह वह यात्रा सफल होगी।
घर धन धान्य से परिपूर्ण रहे, यथेष्ट प्रयास और प्रयोग करते रहें पर,यश और कीर्ति मिलती रहे ,पद और कद बढ़ता रहे परन्तु उसमें उसमें* आह न हो * वाह हो।
इतिहास में वे सब भी याद किए जाते हैं जिन्होंने बड़े बड़े विध्वंस किए हैं पर उनके नाम श्रद्धा और सम्मान के साथ नहीं लिए जाते हैं लेकिन जिन्होंने सृजन और स्थापना के काम किए हैं वे श्रद्धा और सम्मान के पात्र होते हैं।
इसलिए जीवन का वर्णपट छोटा हो या बड़ा हो, रचनात्मक और सृजनात्मक बनने की सदैव कोशिश करनी चाहिए कि यही आत्मतत्व का यथार्थ है और व्यवहार भी है। हम भी यहीं चाहते हैं कि कोई हमारे साथ वैसा व्यवुन करे जो हमें पसन्द नहीं है तो हमें भी इसका ध्यान रखते हुए अपना व्यवहार आचरण रखना चाहिए।
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धर्म और तात्कालिक धर्म : १६ ०९ २५ 
( यह रेलिजन या लोक प्रचलित धर्म के अर्थ में नहीं है)
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कल हमारे एक प्रिय संवाद मित्र और सहयोगी  हमारे आवास पर बहुत समय के बाद ढेर सारी जिज्ञासाओं के साथ आए और बहुत से विषयों पर संवाद किए जिनमें उनके दो सवाल उनके लिए बड़े महत्त्वपूर्ण थे।
अगर कोई हमें यह समझ ले कि हम तो अब बहुत सहनशील और समझदार हो गए हैं,किसी के साथ झगड़ा झंझट नहीं कर सकते हैं,हिंसक प्रवृत्ति नहीं रख सकते हैं तब हम किसी के गलत या नाजायज़ व्यवहार का प्रतिकार कैसै करें और अपनों के ही अन्याय का विरोध कैसे करें।
उनके सवालों के जवाब देने के पहले हमनें उनको दो प्रसंग सुनाए। पहला गीतोपदेश का आरम्भिक परिदृश्य और एक संन्यासी की
कथा।
पहले परिदृश्य में कृष्ण के सम्मुख अर्जुन हतोत्साहित होकर खड़ा है,कंठ सुख रहा है और हाथ कांप रहे हैं। युद्ध के लिए दोनों सेनाएं एक दूसरे के सम्मुख खड़ी हैं तब कृष्ण ने अर्जुन के इस मोह और भ्रम को दूर करने के लिए निष्काम कर्म का ज्ञान दिया जिसकी व्याख्या हमने तात्कालिक धर्म अर्थात् जो सवाल या समस्या सम्मुख है,उसका निदान औचित्यपूर्ण तरीके से ढुंढना और अपने वांछित हक या अधिकार के लिए लड़ना ही तात्कालिक धर्म है के रूप में किया है जो निश्चित कर्म और विहीत कर्तव्य है और जो इससे विमूख होते हैं,वे पतनोन्मुख हो जाते हैं, नष्ट हो जाते हैं और आने वाला समय उन्हें धिक्कारता है, उन्हें कायर,क्लीव और नपुंसक कहता है। दीर्घकालीन धर्म तो प्रकृति और ब्रह्माण्ड का स्वभाव और गुणधर्म है, मनुष्यों की वृत्ति और स्वाभाविक गुण है। परन्तु जो सवाल सम्मुख है और वह सवाल हमारे अस्तित्व का है, हमारे अधिकार का है,उसका प्रतिकार करना ही तात्कालिक धर्म है।इस सवाल का स्वरूप बहुआयामी भी हो सकता है। कृष्ण ने इसी यथार्थ को अर्जुन को समझाया कि हम शान्ति प्रस्ताव लेकर कुरु सभा में जाकर तुम्हारे लिए वाजिब हक की मांग की थी तो दुर्योधन ने सुई की नोक के बराबर भी जमीन न देने की घोषणा करते हुए युद्ध की चुनौती दी। अब तुम्हारे सामने दो विकल्प खुले हुए हैं या तो पूर्व के जीवन को स्वीकार करते हुए आत्मसमर्पण कर दो या धर्म, न्याय, अधिकार के लिए शस्त्र उठाओ और युद्ध क्षेत्र में शस्त्र उठाकर शत्रुओं का प्रतिकार करना ही निष्काम कर्म है जिसे हमनें* तात्कालिक धर्म के रूप में व्याख्यायित किया है और अर्जुन का भ्रम और संशय दूर हो जाता है।वह गांडीव उठाकर युद्ध के लिए उद्धत हो जाता है।
दूसरा प्रसंग एक संन्यासी का है जो एक गांव से होकर गुजर रहा था जहां उसने कुछ बच्चों को एक गहरे गड्ढे में गिरे एक सांप को ढेला मार रहे थे। सांप घायल अवस्था में निरीह पड़ा हुआ था।
सांप ने संन्यासी से बड़े आहत स्वर में पुछा कि मैं तो यहां आराम से पड़ा हुआ, जीवन व्यतीत कर रहा था, फिर ये बच्चे मुझे क्यों मारते हैं। संन्यासी ने बच्चों को समझा दिया कि ये तो किसी को डंस नहीं रहा है,अपने गड्ढे में पड़ा हुआ आराम से रह रहा है,अब इसे न मारना। बच्चे मान गए और चले गए। कुछ दिनों के बाद वह संन्यासी फिर उसी रास्ते से गुजर रहे थे।
उन्होंने सांप को फिर उसी घायल अवस्था में देखा तो पुछा कि अब तुम्हारा ये हाल क्यों है,सांप ने सब बताया।तब संन्यासी ने कहा हमने तुम्हें डंसने से तो मना किया था पर फूफकारने से तो मना नहीं किया था। वह सांप जो वास्तव में नाग था। वह सब समझ गया। अगली बार जब बच्चे आए तो वह तन कर खड़ा हो गया और फन फैलाकर जोर से फूफकारा, बच्चे भयाक्रांत होकर भाग गए और फिर कभी नहीं आए।
निष्कर्ष यह है कि स्वयं के निज धर्म अर्थात् कर्तव्यों और सामर्थ्य को भूल जाना ही अधर्म और पाप है और इसी से हमारे हक और अधिकार छीने या छीन लिए जाते हैं। वह नाग भूल गया था कि हमारे पास असीम शक्ति है और जब उसे इसका भान हुआ तो उसने अपनी रक्षा करनी सीख ली और सुरक्षित हो गया।
इसे ही तात्कालिक धर्म ( त्वरित कर्म या तात्कालिक कर्तव्य) कहते हैं जिसका पालन करना परम गुणधर्म है।
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हिन्दी पखवाड़ा के क्रम में : दिवस : १७ ०९ २५ 
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केवल कविताएं और साहित्य सृजन से हिन्दी का स्वरूप विराट और वैश्विक नहीं होगा,नये चिन्तन,नये आयाम,नयी दिशा और धारा देनी होगी तभी हिन्दी आधार वाली और धारदार होगी और इसके बीज 
घर में बच्चों के संस्कार में बोने होंगे कि वे आरम्भिक काल से ही हिन्दी की महत्ता, उपयोगिता और उपादेयता को समझ सकें।
हमारा ये भी कहना नहीं हैं कि वे अंग्रेजी या अन्य क्षेत्रीय भाषाएं न सीखें न पढ़ें न लिखें परन्तु अभिव्यक्ति का माध्यम हिन्दी को बनाएं कि हिन्दी हमारी मातृसत्तात्मक सभ्यता और संस्कृति है। यह सही है कि जो जिस क्षेत्र में निवास करते हैं,उनकी श्रेष्ठ अभिव्यक्ति वहां की क्षेत्रीय भाषा ही हो सकती है परन्तु जब सारे देश की बात होगी तो लोग हिन्दी ही अच्छी तरह बोल और समझ सकते है और इससे हमारी राष्ट्रीय पहचान भी बनती है।
घर में बच्चों को सरस सहज ग्राह्य बाल साहित्य पढ़ने की आदत लगाएं कि कोई हिन्दी भाषी या क्षेत्रीय भाषा भाषी उन भाषाओं में तो निष्णात हो सकते हैं, अंग्रेजी के बड़े विद्वान भी हो सकते हैं पर वे शेक्सपियर, वर्ड्सवर्थ,किट्स,शेली
टेनिसन आदि नहीं हो सकते हैं और एक यूरोपीय हिन्दी का विद्वान तो हो सकता है पर वह कालीदास, कबीर,तुलसी,सुर, भारतेन्दु, प्रेमचन्द आदि नहीं हो सकता है।
इसलिए निजता की रक्षा करना हम ही अपने बच्चों को सीखा सकते हैं।
अंग्रेजी वैश्विक भाषा है, कोई दो राय नहीं लेकिन चीन,जापान, कोरिया जैसे स्वदेशी भाषा में ही विकसित और सशक्त हुए हैं। हां, तकनीकी शब्दावली के लिए अंग्रेजी हमारी विवशता हो सकती है पर इस दिशा में भी शोध और अनुसंधान हो रहे हैं कि उनके सहज और सरल विकल्प हिन्दी में खोजे जाएं और उन्हें व्यवहार में लाया जाए।
इस देश में इसी देश की सभ्यता संस्कृति और राष्ट्रभाषा से ऐसा मजाक किया गया जिसपर कभी किसी की नजर नहीं गयी या गयी भी तो किसी ने उसे गंभीरता से नहीं लिया जो हमारे पतनोन्मुख होने के कारण बनें। किसी भी देश में साहित्य, विज्ञान, भौतिक, शैक्षणिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक विकास आदि एक प्रवाहमान प्रक्रिया है, विकास कमोबेश होते रहते हैं पर जिनके कंधों पर इन सबके दायित्व होते हैं, अपेक्षाकृत उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। हम बगैर नाम लिए ही कहना चाहेंगे कि आज जिन बड़े बड़े नेताओं, राजनेताओं,शीर्ष पर बैठे लोगों को हम उद्धृत करते हैं उनकी अधिकांश रचनाएं अंग्रेजी में हैं जिनके अनुवाद आज हम हिन्दी में पढ़ते हैं। आप गुप्त जी की रचना स्वदेश को याद करें,
जो भरा नहीं है भावों से
बहती जिसमें रसधार नहीं 
वह हृदय नहीं पत्थर है
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं 
और स्वदेश क्या है, मातृभूमि और मातृभूमि जुड़ी हुई है मातृसत्तात्मक सभ्यता, संस्कृति और मातृभाषा से जिसके लिए पराधीन भारत से लेकर स्वतंत्र भारत में बड़े बड़े नारे दिए गए परन्तु जीवन शैली कभी देशज नहीं हो सका, हां,दो चार अपवाद हो सकते हैं।
आजादी के बाद से किसी भी सरकार ने इस विषय पर ध्यान नहीं दिया कि वैश्विक स्तर की तरह यहां उच्च कोटि के हिन्दी साहित्य को सस्ते दरों पर प्रकाशित करवाकर जन जन तक पहुंचाया जा सके ताकि हर अच्छा और सच्चा हिन्दुस्तानी अपनी सभ्यता, संस्कृति और साहित्य से परिचित हो सके। आज जितने बड़े बड़े प्रकाशक हैं,वे हिन्दी साहित्य का प्रचार प्रसार करने के लिए, व्यवसाय करने के लिए हैं और करें भी क्यों नहीं कि उन्होंने पूंजी लगाई है। आज कितने हिन्दी भाषा भाषियों के घर में भारतीय आध्यात्मिक और दर्शन से सम्बंधित ग्रन्थ उपलब्ध हैं, कितने घरों में वैदिक, औपनिषदिक, षट्दर्शन आदि से सम्बन्धित ग्रन्थ देखे जा सकते हैं, हिन्दी साहित्य के उच्च कोटि के काव्य,उपन्यास,नाटक
इतिहास, दर्शन, संस्मरण,आदि की इतनी कीमत है कि किसी गरीब के घर की महीने भर की उसमें सब्जियां आ सकती है। हम सिर्फ हिन्दी के साहित्यकारों और साहित्य प्रेमियों को छोड़ दें तो इस  दिवस के लिए कुछ नहीं बच जाएगा। आज भी न्यायालयों की बहस सुनवाई और फैसले अंग्रेजी में बदस्तूर जारी हैं जो आम जन की पहूंच से बाहर है और यही वजह है कि हिन्दी दिवस एक औपचारिक दिवस बन कर रह गया है। कुछ हिन्दी प्रेमी और साहित्यजीवी एक पखवाड़े तक इसे जिन्दा रखते हैं और फिर अगले साल का इन्तजार करते हैं।
हम यह भी नहीं कहना चाहते हैं कि हिन्दी की सेवा नहीं हो रही है, प्रचार प्रसार नहीं हो रहा है। हर वर्ष हजारों पुस्तकें छप रही हैं,कवि सम्मेलनों के आयोजन भी हो रहे हैं परन्तु फिर भी हिन्दी घर घर नहीं पहूंच रही है जिस पर परिचर्चा करने की जरूरत है। भारतेंदु जी ने कहा भी था,
निज भाषा उन्नति कहे
सब भाषा की मूल 
निजता को जगाने की जरूरत है कि स्वदेश हमारे हृदय में जीवित रहे और यही किसी भी जीवित राष्ट्र की अस्मिता और अस्तित्व की पहचान है। 
आपमें से बहुतों ने जिस समय सोवियत संघ था,उसका एक प्रकाशन संस्थान था,ताश पब्लिकेशन्स,जो सस्ते से सस्ते दरों पर साम्यवादी साहित्य के साथ साथ हर वर्ग के हर विषय की उच्च कोटि की किताबें प्रकाशित करता था जो सोवियत संघ के पतन के बाद खत्म हो गया।अब आप कहेंगे कि एन बी टी तो हमारे यहां है तो जरा उनके प्रकाशित पुस्तकों के मुल्य देख लें तो समझ में आ जाएगा कि हम आज भी साहित्य सर्जना के क्षेत्र में अभिरुचि क्यों खोते जा रहे हैं। हो सकता है कि उस समय के आर्थिक बाजार की तुलना में आज चीजें महंगी हुई हैं तो सरकारें क्या कर रही है,इस पर भी मंथन करने की जरूरत है। जितने भी सरकारी साहित्य संस्थान हैं सब पर सियासत का कब्जा है,ऐसा भी नहीं है कि वहां अच्छे लोग नहीं हैं परन्तु वहां भी न्यायप्रिय व्यवस्था का अभाव है। पुस्तकें भी पिक एंड चूज की शिकार होती हैं,ऐसी समीक्षा और टिप्पणियां आती रही हैं। जितनी बड़ी बड़ी हिन्दी पत्रिकाएं हैं, वहां भी ऐसा ही खेल चलता रहता है। साहित्य में आज जितने सियासत हो रहे हैं उतनी सियासत तो सियासत में भी नहीं होती है।
अब समय है कि सबको केन्द्र और राज्य सरकारों का ध्यान इधर आकृष्ट कराते रहना होगा कि सरकारें हिन्दी को लोकप्रिय और जनभाषा बनाने की दिशा में गंभीरता से विचार करें ताकि अच्छी किताबें सस्ती दरों पर सबको उपलब्ध हो सके,लोग खरीदें और पढ़ें।
हमें भी घर में हिन्दी पढ़ने लिखने सीखने और बोलने की आदत बच्चों में लगाने की लागातार कोशिश करनी चाहिए। 
अंग्रेजी के साथ साथ अपने देश की इच्छानुसार क्षेत्रीय भाषा का भी ज्ञान हासिल करने की कोशिश करें परन्तु हिन्दी को शीर्ष पर रखें।
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कौन हमसे प्रेम करता है दिवस १८ ०९ २५ 
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कौन हमसे प्रेम करता है और कौन हमसे घृणा करता है,यह हमारे सोंचने का विषय नहीं होना चाहिए कि सबकी मनोवृत्तियों और जरूरतों की कसौटी पर कोई खरा नहीं उतर सकता है।
हां,ये जरूर ध्यान रहे कि आप सबके प्रति *
स्वात्म प्रतिबिम्ब का भाव रखने का सतत् 
प्रयास करते रहें और एक समय ऐसा भी आएगा कि हमारे भीतर समरसी और समदृष्टि के भाव जन्म लेने लगेंगे और फिर 
हम इस भाव से बिल्कुल ही मुक्त हो जाएंगे।‍
पर ऐसी मनोवृत्ति का सृजन करने और उसे पुष्पित पल्लवित करने में बड़े जतन और धैर्य की जरूरत होती है।
हो सकता है जो व्यवहारिक भी हैं कि एक ही संगोष्ठी में जिसमें हम मौजूद रहते हैं और हमें जितने सम्मान की अपेक्षा रहती है न मिले तो क्षोभ और क्लेश होना क्षण भर के लिए सहज और स्वाभाविक भी लगता है पर यह संसार है जहां सबकुछ हमारी कसौटी पर खरा नहीं उतर सकता है बस हमें अगले समय का इन्तजार करना है और अपने प्रयासों को जारी रखना है।
विश्वास और आत्मविश्वास में बड़ी शक्ति होती है जो हमें घोर निराशा और अवसाद के क्षणों में भी जीने का साहस देती है, जिजीविषा को मजबूत करती है और संघर्षों के लिए अनुप्रेरित और अनुप्राणित भी करती है। इन दोनों भावों में अद्भुत शक्ति है जो हमारे भीतर की सोयी 
ऊर्जा और शक्ति को जगाने का काम करती है और यह सिर्फ भावनात्मक या आध्यात्मिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक भी है कि हम हमारे शरीर के जैव रासायनिक प्रतिक्रियाओं के परिणाम हैं जिसे हम व्यवहारिक रूप में प्रयोग कर अनुभव भी कर सकते हैं।
हमारे शरीर के भीतर अनेक प्रकार की अन्त:स्रावी ग्रंथियों से हमारे भाव विचार के अनुरूप रसों का स्राव होता रहता है जिससे हमारे भीतर प्रतिक्रिया होती रहती है जिसे हम बाहर से तो देख नहीं सकते पर उसकी अनुभूति कर सकते हैं।
जब हम किसी बाह्य कारण या कारकों से अचानक डर जाते हैं तो हमारे शरीर के रोएं खड़े हो जाते हैं, मुंह कंठ सुखने लगते हैं,यह एक हार्मोनिक स्राव है जिसे अधिवृक्क ग्रंथी कहते हैं जिससे भय पैदा करने वाले रस पैदा होते हैं और यह मस्तिष्क को सक्रिय कर देता है।
वैसे ही प्रेम, घृणा उत्तेजना,ईर्ष्या,क्रोध आदि के भाव भी हमारे भीतर जैव रासायनिक प्रतिक्रिया पैदा करते हैं और हमारी आवाज और आंखों का आकार प्रकार बदल जाते हैं,इनका अवलोकन करते रहें जो एक सूक्ष्म बदलाव की ओर ले जाएगा।
यही नहीं हमारे समस्त भाव राग विराग आदि हम जिनके प्रति रखते हैं वे सब एक ऊर्जा तरंगों के माध्यम से उन्हें संप्रेषित भी होते रहते हैं और उन क्षणों में अगर वे भी हमें स्मरण कर रहे हों तो उन्हें सूक्ष्म तरंगों की अनुभूति भी हो सकती है, इसलिए कहा भी जाता है कि हम भले न देख रहे हों पर हम सबकी नजरों में हैं और इसलिए हमें हमारे भाव विचार परिष्कृत और समभाव रखने की जरूरत होती है। शत्रुता और मैत्री भाव के सृजन के आन्तरिक भाव और सत्य यही हैं।
किसी भी मत पंथ विश्वास या विचार आदि में हम मनुष्यों के सम्बन्ध उस परम चैतन्य ऊर्जा से ऐसा ही होता है और यह भी एक अनुभूत प्रयोग है जिसे सब करके देख सकते हैं।
हम जब किसी परिचित या अपरिचित के यहां जाते हैं और जिस भाव से जाते हैं पारस्परिक अनुभूतियां होती रहती हैं जो हम सबके व्यवहार आचरण वाणी आदि से परिलक्षित होते रहते हैं और हम सहजता से कह देते हैं कि अमूक का व्यवहार वाणी सही नहीं थे,यह सहज क्रिया और प्रतिक्रिया का खेल है, ऊर्जा का आदान-प्रदान है।
हम छूपकर भी नहीं छूप सकते और प्रकट होते रहते हैं इसलिए खुले रहिए कि जीवन व्यवहार यही है। हां,ये आचरण व्यवहार राजनीति में संभव नहीं है कि वहां घात प्रतिघात चलते रहते हैं, सबकुछ काल, जरूरत और नीतियों के अनुरूप बदलते रहते हैं इसलिए वहां कुछ भी स्थाई या अस्थाई नहीं हैं जिसका अवलोकन हम सब रोज करते रहते हैं और इसलिए कहा जाता है कि सियासत में रिश्तेदारी नहीं होती और रिश्तेदारी में सियासत नहीं होनी चाहिए।
काल क्षीप्र गति से चलायमान है, करवटें बदलते रहता है,इसकी गतियों से सदैव सावधान और सचेत रहने की जरूरत होती है और इसीलिए हमें अपेक्षाओं  और उपेक्षाओं की मात्रा से भी बचने की जरूरत होती है कि इससे दुःख अपेक्षाकृत कम होता है।
संयम स्वयं के विरुद्ध एक युद्ध है पर जो इसमें जीत जाता है,अजय हो जाता है,उसे पराजित करना कठिन हो जाता है कि संयम अनेक साहसिक गुणों को जन्म देता है और धैर्य इसका सहचर है,साथ ही साथ हमारा सर्वोत्तम मित्र भी हैं, इन्हें साथ रखिए, बड़ी शक्ति और ऊर्जा मिलती है। जब सब साथ छोड़ देते हैं तो यही दो हमारे संगी साथी होते हैं।
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ज्ञात से अज्ञात की ओर : दिवस : १९ ०९ २५ 
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हमारा मन और मस्तिष्क सिर्फ वही जान सकता है जो हमनें अबतक अपनी 
ज्ञानेन्द्रियों से अनुभवों के आधार पर प्राप्त किया है जिसे इन्द्रियजनित ज्ञान भी कहते हैं और जो ज्ञात है और इन्हीं अनुभवों के आधार पर हम अज्ञात की खोज‌ और शोध में लगे रहते हैं और नित नवीन संभावनाओं की खोज करते रहते हैं।
आदिकाल में भी चाहे संसार का कोई कोना हो,हम उन्हीं पर कुछ कहते रहे हैं जो किसी न किसी रूप में अपने अस्तित्व में रहा है,चाहे वह दृश्य हो या अदृश्य हो पर वह ज्ञात है,भले ही उसका स्वरूप जिस अवस्था में उपलब्ध रहता है, वही ज्ञात है।
अब कोई इसपर वैज्ञानिक खोजों पर सवाल उठा सकता है या आध्यात्मिक जगत में भी सवाल उठा सकता है कि अज्ञात चीजें कहां से निकल कर आती हैं।
मनुष्य की सबसे क्रान्तिकारी खोज आग को मानी जाती है, क्या मनुष्य को जानने के पूर्व आग अपने अस्तित्व में नहीं थी,थी परन्तु क्यों और कैसे थी,हम मनुष्यों के लिए अज्ञात थी। उस काल के मनुष्यों से आकाशीय बिजली को देखा, गर्मी के दिनों में पेड़ों के घर्षण से उपजी आग को देखा, आकाशीय बिजली के गिरने से लगी आग को देखा और जो आग अज्ञात थी,ज्ञात हो गयी पर वह हकीकत में अपने अस्तित्व में थी।
वैसे ही जितने भी आविष्कार आजतक हुए हैं वे अज्ञात से ज्ञात की खोज तो हैं पर सब खोजों की बुनियाद अतीत में कहीं न कहीं है,दबी हुई है,राख के नीचे की आग है,उसे उधेड़कर निकालना है और वह ज्ञात हो जाता है।
2001 के पूर्व दूर शल्यचिकित्सा एक कल्पना भर थी पर दूरदर्शन की तकनीक ने इसे सहज बना दिया जिसे tele surgery कहा जाता है,ऐसा हुआ कि वर्ष 2001में एक शल्य चिकित्सा न्यूयॉर्क में होती है जिसमें एक सर्जन रोबोटिक तकनीक से फ्रांस के एक मरीज का गाॅलब्लाडर का सफल आपरेशन कर देता है जिसे transatlantic
telesurgery or 
Lindebergh operation कहा जाता है और यह सब दूरदर्शन पर होता है जिसका नियंत्रण न्यूयॉर्क में बैठे शल्यचिकित्सक के हाथों में होता है। यह सारा खेल‌ दूर नियंत्रण और तकनीक का है पर इसकी जड़ें अतीत में हैं जिसे दूरानुभूति या टेलिपैथी भी कहा जाता है। भारत में भी इसका सफल प्रयोग हाल के दिनों में हुआ है।
मन और मस्तिष्क में बड़े गहरे सम्बन्ध हैं जिनपर जैव रासायनिक विज्ञान और मनोविज्ञान के शोध अनवरत जारी हैं जिसमें अभी असाध्य रोगियों के इलाज पर शोध किए जा रहे कि मानसिक ऊर्जा और शक्तियों के प्रयोग से बीमार कोशिकाओं को पुनर्जीवित किया जा सके और रोगों को 
निर्मूल किया जा सके परन्तु इसमें चिकित्सक से ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका स्वयं रोगी की होती है और यह विज्ञान कम आत्मिक और ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का उपयोग ज्यादा है। यह पद्धति आज की नहीं बल्कि इसकी जड़ें प्राचीन काल में हैं जिसमें एक संन्यासी चिकित्सक अपनी मानसिक शक्तियों का प्रयोग से उस रोगी के भीतर की सुषुप्त ऊर्जाओं को जागृत करता है और उन्हीं शक्तियों से बीमार और मृत कोशिकाओं और ऊतकों को पुनर्जीवित कर देता है। इसी तरह से किसी स्वस्थ व्यक्ति को मारा भी जा सकता है और इसपर भी यू एस में सफल प्रयोग हुआ है।
एक मृत्युदंड प्राप्त व्यक्ति को बिजली के झटके से मारना था पर उसे बिजली के झटके के बजाय काल्पनिक सर्पदंश से मार दिया गया। उसे एक विद्यूत कुर्सी पर बैठाकर उसकी आंखों पर पट्टी बांध दी गयी। उसे कहा गया कि तुम्हें सांप से डंसवाकर मारा जाएगा और दो तेज पिन उसकी एक बांह में चुभाए गए और कुछ ही मिनटों में वह आदमी मर गया। इसकी पुष्टि के लिए उसकी शव परीक्षा की गयी और सुखद आश्चर्य की बात है कि प्रयोग सफल रहा और उसके शरीर में सांप के जहर पाए गए। यह मन और मस्तिष्क के ऊपर उस चेतना की प्रतिक्रिया है जो मन और मस्तिष्क ही पैदा करते हैं तो जो मन और मस्तिष्क मार सकते हैं वे किसी को पुनर्जीवित भी कर सकते हैं और यह मन की ज्ञात शक्ति और ऊर्जा है। मन और मस्तिष्क को यह समझा देना कि यह संभव है और किया जा सकता है फिर उसी दिशा में अनवरत प्रयास किया जाए तो मन और मस्तिष्क की सूक्ष्म विद्यूत चुम्बकीय तरंगे उसमें जैव रासायनिक प्रतिक्रिया करेंगी और वे औषधि बन जाएंगी।
अब आप आत्मा को ही ले लें,अगर ये अस्तित्व में नहीं थी तो चार्वाकों ने, लोकायतों ने, बौद्धों ने या अन्य अनात्मवादी दार्शनिकों ने इसका विरोध क्यों किया, अनात्मवादी दर्शन क्यों विकसित किए गए,जो ज्ञात है वहीं विवाद और बहस है,जो है ही नहीं उस पर बहस या विवाद का क्या औचित्य है?
मन और मस्तिष्क के भीतर जो संग्रहित हैं,वही चेतना या चित्त के आधार हैं और उन्हीं आधारों पर हम सब चिन्तन,खोज और शोध करते रहते हैं।
अब यह जानना भी जरूरी है कि हर दो के मध्य कुछ न कुछ होता है तो इस ज्ञात और अज्ञात के मध्य भी कुछ अवश्य ही होगा और जो है वह अज्ञेय है जो सदैव ज्ञात और अज्ञात के मध्य बना रहेगा और हमें जिज्ञासु बनाए रखेगा।
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मन की यात्रा दिवस : २० ०९ २५ 
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मन और मस्तिष्क के सम्बन्ध वैज्ञानिक और आध्यात्मिक, दोनों दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण है। अगर जैव‌ रासायनिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो इन दोनों का सम्बन्ध और संयोजन
एक आधुनिक संगणक या कम्प्यूटर के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर की तरह है। मस्तिष्क मनुष्य के शरीर का बड़ा ही महत्वपूर्ण अंग है जो हमारी समस्त भौतिक और मानसिक क्रियाशीलताओं का नियमन, संचालन और नियंत्रण करते रहता है और मन मस्तिष्क के जैव रासायनिक क्रियाओं प्रतिक्रियाओं और विद्यूत चुम्बकीय तरंगों से संचालित होता है। यही आध्यात्मिक विज्ञान में अंतःकरण चातुष्य के नाम से जाना जाना जाता है जिसमें काफी चिन्तन मनन के उपरान्त हमनें दो और विभागों या अवयवों को भी जोड़ा है जो विवेक और प्रारब्ध हैं,ऐसे इसके चार विभाग हैं जिन्हें मन, चित्त, बुद्धि
और अहंकार कहा जाता है जो हमारा **
Inner sense of Organs हैं, इन्हें आन्तरिक कारक/कारण भी कहा जाता है और ज्ञानेंद्रियां तथा कर्मेंद्रियां बाह्य कारण या कारक हैं जिनके माध्यम से अमूर्त मन की मूर्त अभिव्यक्ति होती रहती है। इसे हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि राजनीति शास्त्र में सरकार एक अमूर्त अवधारणा है जिसकी मूर्त अभिव्यक्ति कार्यपालिका और नौकरशाही व्यवस्था होती है। हमारा मस्तिष्क जो हमसे चाहता है,मन उसकी योजनाएं बनाता है और बाह्यकरण उनका निष्पादन करते रहते हैं।
मन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य चित्त की स्मृतियों और पारिवेशिक तथा जैविक और तात्कालिक मांगों की पूर्ति की योजनाएं बनाना है और हमारे अंगतंत्र उनकी पूर्ति में लग जाते हैं। जिज्ञासा और जिज्ञासा जनित अन्वेषण,खोज,शोध आदि इसके अनवरत क्रियामाण कर्म हैं जो यह मस्तिष्क के सहयोग से अनवरत करता रहता है।
अन्वेषण एक सतत् प्रक्रिया है जो सबकी सहज वृत्ति है और यही वास्तविक धर्म है अर्थात् सदैव ज्ञात से अज्ञात की खोज की ओर बढ़ते हुए सुखों की खोज करना और दूसरे दृष्टिकोण से वास्तविक सत्य की खोज करना,यही जिज्ञासा जनित अन्वेषण है।
एक साइबर अपराधी नित इस खोज में लगा रहता है कि कैसे किसी को ठगा जाए और पकड़ में आने से भी बचा जाए और ऐसे ही साइबर नियंत्रण वाले लोग उन्हें पकड़ने की जुगत 
खोजने का अन्वेषण करते रहते हैं। एक बेहतरीन रसोइया नये नये व्यंजनों पर प्रयोग करता रहता है,एक शल्यचिकित्सक शल्यक्रिया की बेहतरीन खोज करते रहता है,एक खगोल भौतिकीविद् अंतरीक्ष खंगालते रहता है और जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में ये अन्वेषण चलते रहते हैं जो आदिकाल से चला आ रहा है पर क्या इन अन्वेषणों या खोजों की कोई सीमा या अन्त है तो जवाब आएगा नहीं और यही सत्य है।
मनुष्य के दो प्रकार के मन होते हैं,शान्त और स्थिर मन और अशान्त तथा अस्थिर मन परन्तु सच तो यह है कि कुछ अपवादों को छोड़कर ( वैरागी,संत, संन्यासी,योगी आदि)
हम सबका मन सदैव अशान्त,अस्थिर,संशयपूर्ण और अनिश्चय की अवस्था में रहता है और वह शान्ति की खोज करता रहता है जिसके लिए उसने स्वयं अनेकानेक उपाय बना रखे हैं या खोजता रहता है। आमोद प्रमोद के साधन,कलाकारी,लेखन,चिन्तन व लेखन,
गीत संगीत, कर्मकाण्ड, पूजा-पाठ,
पूजास्थलों के भ्रमण,नशा, बागवानी, पुस्तकों के अध्ययन, खेलकूद, तीर्थयात्रा,दान पूण्य आदि सभी उन्हीं की श्रेणी में आते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें दूसरों की शान्ति भंग करने में शान्ति की अनुभूति होती है और वे दिन रात इसी षडयंत्र में लगे रहते हैं पर शान्ति फिर भी नहीं मिलती की शान्ति बाहर की नहीं भीतर की खोज है, भीतर का अन्वेषण है। एक बड़ी सुंदर कहानी हमने बचपन में पढ़ी थी जिसमें कहानीकार कहता है,
तीर्थ धाम खुब घुमें,दूर दूर की यात्राएं की, मनों सोना गलाया पर मन न गला,
कितनी बेहतरीन बात है और कितना बड़ा सच है। लेखक यह बताना चाहता है कि हजारों लाखों रुपए (सोना) खर्च कर तीर्थयात्राएं की परन्तु मन के अवसाद न मिटे,मन न गला,मन को शान्ति न मिली। भला जो भीतर से बेचैन है,बीमार है,रुग्ण है,उसे *धरम करम से क्या हासिल होने वाला है। वे बेचैन समुद्री लहरें हैं जो तट से टकराती,सर धूनती
और फिर समुद्र में आकर मिल जाती है
और यही मिलन शान्ति है,असीम से, अनन्त से,विराट से,
मन का महामन से मिलन ही वह शान्ति है जो किसी क्रियाशीलता में नहीं मिल सकती है। शराब या किसी नशा का प्रभाव जबतक मस्तिष्क के ऊपर है, दुनियां रुमानी लगती है,जबतक किसी मनोरंजक कार्य में संलग्न है तबतक मन उसमें रमा हुआ है, काम खत्म और फिर वही बेचैनी, जरूरत और खोज शुरू हो गयी,हम एक क्षण पूर्व कुछ और थे और एकाएक कुछ और हो जाते हैं। यह रुपान्तरण भी हमारा बाहरी ही नहीं भीतरी हो जाता है। बाहर सबकुछ सुन्दर शान्त और स्थिर है पर भीतर बेचैनी है तो सुन्दर में भी असुन्दर ही नजर आएगा। इसलिए आजकल लोग ऐसी-ऐसी दवाएं ले रहे हैं जो उनको बहुत देर तक बहुत दूर तक एक अनजानी दुनियां में लेकर चली जाती है जहां उनका अस्तित्व ही खत्म हो जाता है,बोध और चेतना खत्म तो सब खत्म और ऐसे ही एक दिन आदमी शान्ति और सुकून की खोज करते करते अपनी जीवन यात्रा पुरी कर लेता है।
मृत्यु सबके लिए एक पीड़ादायक अनुभव है। मरने के समय शान्ति की अनुभूति कौन करता है,या तो वैरागी या संन्यासी जिसने संसार की निस्सारता को जान लिया या विक्षिप्त जिसकी चेतना नष्ट हो चुकी है,तीसरा तो कोई नजर ही नहीं आता है। बुद्ध महापरिनिर्वाण को प्राप्त कर रहे हैं,सारे शिष्य विलाप कर रहे हैं परन्तु सुभूति बिल्कुल स्थिर है,मौन है, शान्तचित्त बैठा हुआ है फिर ऐसा क्यों हुआ, आनन्द,सुभद्र,महाकस्सप आदि उनके श्रेष्ठतम शिष्य तो थे लेकिन अरहत्त्व की, सम्यक् सम्बोधि की प्राप्ति उन्हें नहीं हुई थी,सुभूति मुक्त हो चुका था। जो भीतर से तृप्त हो चुका है,खाली हो चुका है, शून्य हो चुका है,शान्ति के साथ मृत्यु को,महाप्रयाण को स्वीकार करेगा और शायद अन्वेषण की यही सच्चाई है और यही अन्त भी है कि एक यात्रा समाप्त होकर दूसरे का सूत्रपात होता है और एक सच फिर लौटकर वापस आता है कि यह सदैव रहस्य है कि मृत्यु जीवन का अंत है कि एक नयी शुरुआत है।

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वेदों की कीमत : दिवस : २१ ०९ २५ 
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मोतीलाल बनारसी दास के प्रकाशन में वेदों की कीमत मात्र 3600/- रुपए हैं और एक अन्य प्रकाशन में लगभग 6000/- रुपए हैं और कहा जाता है वेदों को पढ़ो।
जिस हिन्दू गरीब का घर चार से छः हजार रुपए में चलता है,उसे वेद, उपनिषद्, षट्दर्शन,पुराण आदि पढ़ने की सलाह दी जाती है, क्यों नहीं क्षोभ, निराशा और आक्रोष पनपेगा। इसलिए जो समझा दिया जाता है कि हमारे ग्रन्थों में यही लिखा है और हम मुर्ख बगैर तर्क वितर्क के सीधे उन्हें मान लेते हैं और जानने के संसाधनों का ऐसा ही अभाव है। 
यह ठीक है कि आज वैश्विक स्तर पर मार्क्सवाद या साम्यवाद लुप्तप्राय(विचार या सिद्धान्त नहीं शासन तंत्र) सा हो गया है पर जो थोड़ा सा भी पढ़ा लिखा और जागरूक है,इस दर्शन को जानता है कि चीन, तत्कालीन सोवियत संघ और अन्य साम्यवादी संगठनों ने इसे घर घर पहुंचाने का काम मुफ्त या अत्यन्त सस्ते दरों पर किया और लोग उससे अवगत हो सके,उसकी अच्छाइयों बुराईयों को जान सके तो जबतक कोई किसी को पढ़ेगा नहीं जानेगा कैसे और जानेगा नहीं तो समझेगा कैसे। 
सभी प्रबुद्ध लोगों को चाहिए कि सभी वैश्विक मत पंथों के श्रेष्ठ साहित्यों को पढ़ें और तुलनात्मक अध्ययन और विश्लेषण करें, उनकी अच्छी बातों पर चर्चा करें और स्वीकारने की कोशिश करें कि सब जगह अच्छी चीजें अवश्य होती हैं और कहा जाता है कि
Let the knowledge come from all the directions
प्रकाश और चेतना को हर दिशाओं से आने दो कि उससे ही बाहर भीतर का अंधेरा दूर हो सकता है।
इस समस्त संसार में कोई सर्वश्रेष्ठ नहीं है पर श्रेष्ठता तो हर जगह हर कालखंड में मौजूद रही है, हमें चयन करना है और चयन करने की हमें पुरी आजादी है। पर चयन करना एक बड़ा गुण है जो सबकी वृत्ति, प्रवृत्ति और विवेक पर निर्भर करता है। हम बाजार में महज सब्जियां खरीदने जाते हैं तो छानबीन करके लेते हैं फिर विचारों का चयन छानबीन कर क्यों न करें।
अच्छी किताबें और अच्छे साहित्य एक साथ हमारे सृजन और विनाश का कारण बन सकते हैं।
हम इस बात पर हमेशा जोर दिए हैं कि मन और मस्तिष्क को सदैव समझने की कोशिश करते रहिए,ये सदैव स्मृतियों का संग्रह करते रहते हैं और अवचेतन मन में जीवित रहते हैं और अनुकूलता पाकर जाग जाते हैं और हमारी वर्तमान चेतना और क्रियाशीलताओं को प्रभावित करते रहते हैं और हम सोंचते ही रह जाते हैं कि आखिर ये सब हो कैसे रहा है,हम किसी वस्तु या व्यक्ति को देखकर अतीत से उसका रिश्ता जोड़ने लगते हैं।
प्रकृति भी श्रेष्ठ का ही चयन करती है, समाज चाहे जैसा भी उसे भी श्रेष्ठ की जरूरत होती है। इसलिए श्रेष्ठ बनने के लिए श्रेष्ठ विषय, वस्तु, विचार, साहित्य और व्यक्तियों का चयन करना सीखिए और अपनी अगली पीढ़ी को भी सीखाइए, यही श्रेष्ठ जीवन है।
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आत्मप्रशंसा और आत्मनिन्दा : २२ ०९ २५ 
( self praise/ Self admiration and self Condemnation/ Self denigration)
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हिन्दी इसलिए अद्भुत और अनुपम है कि इसमें अद्भुत अद्भुत शब्द और उनके प्रयोग और अनुभुतियां हैं जिनकी
अनुभूतियां करनी पड़ती है और लोग अपने शब्द ज्ञान और समझ के अनुरूप करते भी हैं।
किसी अन्य व्यक्ति की प्रशंसा करना बड़ा कठिन और असहज काम लगता है और इसलिए लोग बड़ी सोच-समझ के साथ स्थान,काल, पात्र और जरूरत के हिसाब से प्रशंसा करते हैं परन्तु पर निन्दा के लिए आमतौर पर किसी चिन्तन मनन की जरूरत नहीं होती है।
निम्न स्तर से लेकर उच्च स्तर के लोगों को हमने निजी तौर पर ऐसा करते देखा है जो हम मनुष्यों की सहज वृत्ति और प्रवृत्ति दोनों है पर निन्दा से उन लोगों को परहेज करना चाहिए जो विवेचक और आत्मचेतना से युक्त होते हैं।
प्रशंसा और निन्दा के साथ आत्म शब्द को जोड़ देने से अनेक ऐसे  शब्द बनते हैं जो हमारे स्व से जुड़े होते हैं और हमारे व्यवहार आचरण और व्यक्तित्व के बड़े हिस्से होते हैं और उनमें से दो शब्द आत्मप्रशंसा और आत्मनिन्दा है जो हमारे व्यक्तित्व की श्रेष्ठता के परिचायक हैं,वैसे दोनों बड़े विरोधाभास भी पैदा करते हैं कि दोनों के लिए बड़े आत्मबल और साहस की जरूरत होती है।
ऐसे तो वेदों, उपनिषदों,गीता,अन्य भारतीय दर्शन और चिन्तन ( अनात्मवादी और अनिश्वरवादी चिन्तन को छोड़कर) में आत्मा को * निराकार, निर्गुण, कालातीत, अविनाशी, अजन्मा,अक्षर,साक्षी भाव आदि कहा गया है परन्तु स्व के प्रकटीकरण करने के लिए जब यह पंचभूत्वा शरीर धारण करती है तब यह आठ गुणों को धारण कर लेती है जो* ज्ञान,विवेक, सुख, शान्ति,प्रेम,आनन्द, शक्ति और पवित्रता है जो वास्तव में प्रकृति के त्रिगुणात्मक सत्ता,यथा, सतोगुण, तमोगुण और रजोगुण का ही विस्तार मात्र है और मनुष्य के भीतर ज्यों ज्यों चेतना का विकास होता जाता है त्यों-त्यों इनमें पारस्परिक गुणात्मक परिवर्तन होते रहते हैं और व्यक्ति के व्यवहार आचरण और प्रवृत्तियों में तदनुरूप बदलाव भी होते रहते हैं जैसे एक जलाशय में जैसे जैसे जल की मात्रा बढ़ती चली जाती है,उसके जल की निर्मलता बढ़ती चली जाती है।हम मनुष्यों की सिर्फ बाह्य दृष्टि में ही बदलाव नहीं होते बल्कि अन्तर्दृष्टि भी विकसित होती चली जाती है और हमारा आकलन, विश्लेषण और मूल्यांकन के भाव ईमानदार होते चले जाते हैं।
ईमानदारी निस्संदेह एक बड़ा सराहनीय मानवीय गुण है जिसे हमें बचपन से ही पढ़ाया बताया जाता रहा है पर सबके सब इसके प्रति ईमानदार नहीं होते परन्तु कुछ लोग निस्संदेह ईमानदार होते हैं जिनके उदाहरण दिए जाते रहे हैं। ईमानदार होना और ईमानदार दिखने की कोशिश करना दोनों दो अलग-अलग विषय हैं कि आमतौर पर लोग ईमानदार दिखना चाहते हैं पर भीतर से वे ईमानदार नहीं होते हैं।
जो व्यक्ति स्वयं के प्रति ईमानदार होते हैं उन्हें के भीतर आत्मनिन्दा और आत्मप्रशंसा के भाव सहजता से होते हैं।
आत्मनिन्दा और आत्मप्रशंसा के दो भाव बताए जाते हैं, साकारात्मक और नाकारात्मक और इनके प्रति भी एक व्यक्ति को ईमानदार होना चाहिए।
आत्मनिन्दा मनुष्य को कभी कभी हतोत्साहित भी करता है कि हम स्वयं को अपनी गलतियों के लिए प्रताड़ित करते हैं या करते रहते हैं परन्तु 
यह आत्मसुधार का भी श्रेष्ठ मार्ग है कि हम गलती तो स्वभावगत गुणधर्म के कारण करते ही रहते हैं पर उसकी आत्मनिन्दा करके उसमें सुधार कर लेना बड़ी उपलब्धि मानी जाती है कि उक्त गलती की पुनरावृत्ति न हो और उससे सदैव बचने की कोशिश करें कि यकीनन जो गलत है सो गलत है यद्यपि ऐसी अनेक गलतियां हैं जिन्हें हम सुखानुभूति से जोड़कर भी चलते रहते हैं। वैसे ही आत्मप्रशंसा या आत्मश्लाघा या आत्ममुग्धता की अवस्था भी है और इसके  बारे में कहा गया है कि
आत्मप्रशंसा मरणं
अर्थात् आत्मप्रशंसा या आत्मश्लाघा मरण के समान है,इससे व्यक्ति के भीतर अहंकार का जन्म होता है। कभी कभी हम आत्ममुग्धता के शिकार हो जाता करते हैं जिससे हम भ्रम और अवमूल्यन के शिकार भी हो जाते हैं परन्तु निजी तौर पर हम दोनों के साकारात्मक रुपों को स्वीकार करने के पक्षधर हैं कि आत्मनिन्दा हमें परिष्कृत और परिमार्जित करने का काम करती है और अपने श्रेष्ठ गुणों की आत्मप्रशंसा करना हमें और श्रेष्ठ प्रदर्शन की ओर उन्मुख भी करती है।
परन्तु ध्यान रहे कि दोनों के अतिवाद से सदैव बचने की कोशिश करते रहनी चाहिए, दोनों में सही समन्वय और संतुलन बनाए रखना चाहिए ताकि न हमारे भीतर निराशा हो और न हम अहंकार के शिकार हो जाएं।
अगर कोई बेहतरीन रसोइया है, बेहतरीन कलाकार या रचनाकार है, संगीतकार या गीतकार है या किसी गुण हुनर में महारत हासिल है तो और बेहतर करने के लिए आत्मप्रेरणा एक सबल कारक सिद्ध होती हो सकती है और यही कारण है कि एक बेहतरीन रसोइया अपने बनाए व्यंजन को पहले चख कर देख लेता है तब उसे खाने को परसता है।
हो सकता है और ऐसा ही है भी कि सबकी अलग-अलग अनुभूति और समझ होती है, हमारी समझ यही कहती है जिसे हम सदैव आपके सम्मुख स्वाद लेने और आकलन करने के लिए प्रस्तुत करते रहते हैं पर बेफिक्र रहते हैं कि लोग क्या कहते हैं या क्या कह सकते हैं।
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युद्ध और संघर्षों दिवस : २३    ०९ २५ 

युद्ध और संघर्षों की गाथा
अनन्त है
युद्ध ही गाथा लिखते हैं 
इतिहास रचते हैं 
विनाश के गर्भ में न्याय 
धर्म अधिकार और शान्ति
की रचना करते हैं
जब जब अनर्थ अन्याय अधर्म अनाचार अपने चरम पर पहुँचता है तो
युद्ध का शंखनाद होता है
हाँ
पर ध्यान रहे कि युद्ध हो पर परमार्थिक हो
न्यायार्थ हो धर्मार्थ हो
सत्य के रक्षार्थ हो
जानकी के रक्षार्थ हो
पांचाली के पत के रक्षार्थ हो
पाण्डवों के अधिकारार्थ हो 
दीन हीन वंचित पीड़ितों के
सम्मानार्थ हो
 राष्ट्र धर्म के रक्षार्थ हो
सभ्यता संस्कृति के मान सम्मान के लिए हो
यह भी सत्य है कि जब जब युद्ध हुए हैं 
धन जन संपदा का विनाश हुआ है
मानवता कराही है
बच्चे अनाथ हुए हैं 
लोग आश्रयहीन हुए हैं
धरती प्रदूषित हुयी है
और आकाश कम्पयमान
हुआ है
जतन करो कि युद्ध न हो
पारस्परिक संवाद हो
सह अस्तित्व की बात हो
परन्तु स्मरण रहे कि 
जब सारे मार्ग समाधान के 
बन्द हो जाएँ तो
 युद्ध ही अंतिम विकल्प है।
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कार्य और सोंच दिवस : २५   ०९ २५ 
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सामान्य मनोविज्ञान और अध्यात्म दर्शन दोनों कहते हैं कि मनुष्य को हर काम शुरू करने के पहले एकबार जरूर सोचना चाहिए ताकि हम उसके दूरगामी परिणामों से बच सकें और यह सोंच हमारी बुद्धि और पूर्वानुभवों
दोनों से जुड़ी क्रियाशीलताएं हैं।यह मनोविज्ञान और अध्यात्म दोनों के कारण और कार्य के सिद्धान्त के उपर काम करता है।
हर अच्छे बुरे परिणाम हमारे कृत्यों के ही प्रतिफल होते हैं और यह सीधा हमारी मस्तिष्क से निकल कर मन में सृजित सोंच की उपज होती है।
हमारे अनुभव सदैव पुराने होते हैं पर बुद्धि सदैव नवीन होती रहती है और दोनों ही हमारी क्रियाशीलताओं के उत्प्रेरक तत्त्वों के काम करते हैं। हमारे कार्य के स्वरूप त्वरित या  क्रियामाण, अल्पकालिक और दीर्घकालिक प्रकृति के होते हैं जो हमें समयानुकूल प्रभावित करते हैं।
त्वरित या क्रियामाण प्रभाव भी हमारे कर्मों के ही प्रतिफल होते हैं जैसे जहर या नशे के पदार्थों का प्रभाव त्वरित होता है जो क्रियामाण कर्म है और आमतौर पर इसे गंभीरता से सोंचने का समय नहीं मिलता है या हम बुद्धि नहीं तत्काल सुख की कामना से जोड़कर चलने के कारण इसपर विचार नहीं करते और इस प्रकार के कार्यों की पुनरावृत्ति प्रायः होती रहती है परन्तु ऐसे कामों के दूरगामी परिणाम कभी अच्छे नहीं होते हैं।
हमारे वो हर कृत्य जो बगैर परिणामों और प्रतिक्रिया को सोचें बगैर किए जाते हैं और जिनके पीछे साकारात्मक या रचनात्मक या रक्षात्मक चेतना नहीं होती, प्रायः घातक होते हैं। हमारे जीवन में कुछ ऐसी विकट या 
आपातकालीन परिस्थितियां जब उत्पन्न हो जाती है तो वहां बुद्धि से ज्यादा प्रतिउत्पन्नमतित्व की जरूरत हो जाती है और हमें तत्क्षण निर्णय लेने की जरूरत आन पड़ती है। मान लिया कि किसी ने हम पर हमला कर दिया या कोई दुर्घटना घट गयी हो तो हमें त्वरित कार्रवाई करने की जरूरत हो जाती है जिसमें हमें रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक होने की जरूरत हो जाती है। परन्तु जहां त्वरित कार्रवाई न हो वहां एक साकारात्मक और बौद्धिक सोंच और चिन्तन की जरूरत हो जाती है कि हमें परिणामों के मद्देनजर योजना बनाने और काम करने की जरूरत होती है ताकि भविष्य में किए गए कामों के लिए पश्चाताप न करना पड़े कि गया समय लौटकर नहीं आता और किए गए कामों को सुधारा नहीं जा सकता है, हां,उनकी पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है।
हमारे मस्तिष्क की एक क्रियाशीलता Plasticity of brain कहलाता है और इसमें जब हमारी सोंच साकारात्मक और रचनात्मक होती है तो डोपामाईन,सार्टेनीन और एंडौर्फिन रसों का स्राव होना शुरू हो जाता है जो हमारे भीतर खुशी, उत्तेजना,
उत्साह, नवीन ऊर्जा आदि का सृजन करते हैं और हमारे काम सही और परिणाम भी अच्छे होते हैं। कहा भी गया है,
बिना विचारे जो करे
सो पाछे पछताय 
काम बिगाड़े आपना 
जग में होत हंसाए
इसलिए हमें महत्तम कोशिश करनी चाहिए कि किसी योजना बनाने या काम करने के पूर्व उसे ठोक बजाकर देख लेना चाहिए ताकि उसके दूरगामी परिणाम निराशाजनक और विध्वंसक न हो कि उससे हम सिर्फ व्यक्तिगत रूप में ही प्रभावित नहीं होते बल्कि हमारे आश्रित हमारा परिवार और लोग भी प्रभावित होते हैं।
हर कार्य एक सही और औचित्यपूर्ण सोंच से उत्प्रेरित और अनुप्राणित होना चाहिए जिससे हमारा अस्तित्व अनाहत रहे,हमारा मान सम्मान, प्रतिष्ठा और प्राण खतरे में न पड़ें।
जीवन संभावनाओं का खेल है जहां कभी कभी अप्रत्याशित घटनाएं भी घटती रहती है और ऐसी परिस्थितियों में हमें अपनी बौद्धिक चेतना का प्रयोग करना चाहिए और संभावित जीवन के लिए ठोस योजनाबद्ध तरीके से काम करना चाहिए और ऐसे समन्वय और संतुलन करके चलने वाले, अप्रत्याशित घटनाओं को छोड़कर कभी संकटों में नहीं पड़ते हैं या उनकी संभावनाएं कम होती है।
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उपनिषद् : दिवस : २६   ०९ २५ 
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प्रख्यात जर्मन दार्शनिक और चिन्तक शौपेनहावर ने जब औपनिषदिक दर्शन का अध्धयन और विश्लेषण किया तो उनके मुंह से सहजता से यह फूट कर निकल पड़ा कि,
हमनें अबतक समस्त वैश्विक दर्शन और चिन्तन का अध्ययन मनन किया परन्तु भारतीय औपनिषदिक दर्शन को पढ़ने के बाद शायद कुछ पढ़ने को शेष नहीं रह गया कि यह सिर्फ हिन्दूओं का धर्म दर्शन नहीं बल्कि समस्त मानवीय चेतना का सार, आचरण, व्यवहार और परम सत्य की खोज है।
ऐसे तो उपनिषदों की संख्या 108 बतायी जाती है जिनमें से आद्य शंकराचार्य ने 11 उपनिषदों पर भाष्य लिखा और उन्हें 
प्रामाणिक माना जाता है,ऐसे सबके सब उपलब्ध भी नहीं हैं। उनमें से सबसे प्राचीन और वृहद्* बृहदारण्यक उपनिषद् है जिसमें कुल छः अध्याय और 435 श्लोक ( पद) हैं और इसका कालखंड ई पू 7वीं सदी से 8वीं सदी माना जाता है। इसके मूल रचनाकार याज्ञवल्क्य ऋषि को माना जाता है यह वेदांत का प्रथम सोपान है जिसमें ब्रह्म चेतना ( ब्रह्मा नहीं,परम सत्य की अवधारणा और उसकी खोज) और सत्य की खोज करते हुए समस्त मानव जाति के लिए मंगलकामनाएं की गयी है जो बगैर किसी भेदभाव आदि के समरसी और समावेशी भावों से युक्त है जो आदि उपनिषद् की विराटता और हिन्दू जीवन दर्शन चिन्तन की उदारता और सहृदयता को स्पष्ट करता है। जीवन जिसे पंचभूत्वा, त्रिगुणात्मक और नाशवान भी कहा गया है,उसका अस्तित्व भी सबकी मंगलकामनाओं से जुड़ा हुआ है और शायद इसीलिए उक्त जर्मन दार्शनिक ने अपने उद्गार व्यक्त किए होंगे।
उपनिषदों का सृजन गुरु शिष्य परम्परा की अद्भुत उपलब्धि और मानव जाति के लिए अनुपम देन हैं जहां ग्रीको रोमन परम्परा सुकरात से शुरू होकर अरस्तू पर आकर खत्म हो जाती वहीं औपनिषदिक परम्परा 8वीं सदी ई पू से शुरू होकर ई 2 तक चली आती है जो एक समृद्ध परम्परा रही है।
उसी बृहदारण्यक उपनिषद् का एक श्लोक है,
सर्वे भवन्तु सुखिन 
सर्वे सन्तु निरामया
सर्वे भद्राणि पश्यन्ती 
मा कश्चित दुःखभाग्भवेत्,
जिसका सीधा अर्थ यह है कि,
सभी सुखी हों,सभी निरोगी और रोगमुक्त रहें,सभी सबके लिए मंगलमय कल्याणकारी दृष्टि रखें और दुःख किसी को न हो।
अब इसे समझने, आत्मचिंतन करने और आत्मसात कर जीवन मार्ग पर चलने बढ़ते रहने की प्रार्थना की गयी हो और इससे श्रेष्ठ जीवन दर्शन और मार्ग क्या हो सकता है जिसे हमारे ऋषियों महर्षियों ने संसार को एक मार्ग के रूप में दिया है।
आज समस्त संसार उद्वेलित है, हिंसाग्रस्त है,सुख शान्ति विहीन है, छद्मावरण में स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में लगा हुआ है और आज इसी श्लोक के मर्म को समझने की जरूरत है।
इस पद या श्लोक की प्रासंगिकता आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कल था और कल भी रहेगा। हम सब अपनी वास्तविक वृत्ति और प्रवृत्तियों को विस्मृत कर गए हैं और करते भी जा रहे हैं कि परमात्मा सभी मनुष्यों को इस धरती पर सर्वकल्याण और सर्वमंगल की कामनाओं के साथ भेजा है कि हम सबके कल्याण,सुख, स्वस्थ्य, समृद्धि और शान्ति की कामना करें और जीयो और जीने दो की भावना से अनुप्राणित होकर जीवन यात्रा पुरी करें कि मरने के बाद हमारे साथ कुछ नहीं जाता बस हमारे कृत कर्मों के संस्कार और गुणधर्म जाते हैं और इसलिए हम सबको महत्तम कोशिश करनी चाहिए कि मरने के समय सीने पर कोई बोझ नहीं हो और हम मुक्त होकर इस मृण्मय संसार से विदा ले सकें।
आप चाहें जिस भी मत,पंथ, विचार, विश्वास या सम्प्रदाय आदि के हों, जीवन का श्रेष्ठ मार्ग यही है और यही मुक्ति,मोक्ष, निर्वाण या साल्वेशन का सही रास्ता है कि मरण चाहे किसी का हो,जिस भी विधि से उसकी अन्त्येष्टि होती हो,पर मृत्यु तो एक ही है जो सबके लिए शाश्वत और सनातन सत्य है जिसे सबको स्वीकार कर सत्य को स्वीकार करना चाहिए।
इसलिए क्यों न हम समरसी समावेशी बनकर सबके सुख शान्ति और आरोग्य की कामना करें और शुभकामनाएं देते लेते रहें।
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ऋणभार दिवस : २७  ०९ २५ 
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हमारे जीवन की सार्थकता इसमें नहीं कि हम कितने बरसों तक जीवित रहते हैं, सार्थकता तो इस बात में होती है कि हम कितने बरसों तक जीवन को जीते हैं और समय और समाज को क्या देते हैं। हम जन्म से लेकर मरण तक तो सबसे लेते ही रहते हैं,इसी क्रम में यह अवलोकन करते रहिए कि जिन लोगों ने आपको खड़ा होने और स्थापित होने में सहयोग किया है, उन्हें हमनें क्या दिया या उनके लिए क्या किया है।
हमारे उपर अनेक ऋणभार होते हैं, माता-पिता,पारिवारिक सदस्यगण, मित्र मंडली,शिक्षक,ऋषि, प्रकृति,देव,पंचभूत, पड़ोसी,समाज,धरती और मातृभूमि या राष्ट्र, हम सब इनके ऋणभार से दबे होते हैं पर इनकी अनुभूतियां सबको नहीं होती है और जिन्हें नहीं होती, उन्हें संवेदनशील मनुष्य नहीं समझा जा सकता है।
इस समस्त संसार में कोई चाहे जिस भी मत,पंथ, विचार, विश्वास, मार्ग, सम्प्रदायगत विचार आदि का हो लेकिन वह उपरोक्त से जुड़ा ही होता है कि उसके सृजन,विकास और स्थायित्व में इन सबका योगदान होता है।
माता-पिता अपने रक्तांश से हमारा सृजन और पालन-पोषण करते हैं और हमारे अस्तित्व का निर्माण भी करते हैं जिसमें इस प्रकृति,पंचभूतों,आर्ष ज्ञान, ईश्वरीय चेतना,शिक्षक,समाज,
मित्र, समाज आदि सबका अंशदान और योगदान होता है और इन सबमें सर्वोपरि मातृभूमि और मातृसत्तात्मक सभ्यता, संस्कृति और संस्कारों का सामूच्चय होता है जिनके बीच हमारा सृजन और विकास होता है। हम इस धरती के किसी न किसी भू-भाग का हिस्सा होते हैं और धरती के उस भू-भाग के अन्न,जल,वायु, जलवायु आदि से हम पोषित होते हैं, हमारे शरीर के साथ साथ हमारे सभी गुणधर्म और संस्कारों का निर्माण होता है और इसलिए हमारे लिए** मातृभूमि और मातृसत्तात्मक संस्कार और संस्कृति सबसे ऊपर होती है। हमारे अस्तित्व का आधार हमारी मातृभूमि होती है। कोई भी राष्ट्र कोई जड़ सत्ता नहीं बल्कि जीवन्त चेतना होती है, प्राणवान ऊर्जावान 
शक्ति होती है जो जड़ 
दिखाई तो देती है परन्तु हमारे भीतर प्राणों का संचार करती है और यही कारण है कि कहा भी गया है कि,
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी,
जिसने जन्म दिया वह माॅं और जिस धरती पर हमनें जन्म लिया वह,जिसके रजकणों ने हमें जीवन दिया वह मातृभूमि स्वर्ग से ही ऊपर और श्रेष्ठ है। जब देश रहेगा तो हमारा सर्वस्व रहेगा,हमारा अस्तित्व रहेगा,हम हमारे राष्ट्र की पहचान हैं और हमारा राष्ट्र हमारी पहचान है इसलिए किसी के लिए भी उसकी मातृभूमि जाति,वर्ग,भाषा,मत,पंथ, विश्वास, सम्प्रदाय आदि से ऊपर होना चाहिए और इसके ऋणभार को सदैव स्मृतियों में रखना चाहिए।
जैसे हम अपने माता-पिता,शिक्षक, मित्र, समाज आदि का सम्मान करते हैं,उनकी प्रतिष्ठा,मान सम्मान के लिए सबकुछ करने को आतुर रहते हैं वैसे ही देश के प्रति भी निष्ठावान और समर्पित रहना चाहिए,
आजादी की लड़ाई में जिन लोगों ने अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया,वे बस अच्छे और सच्चे हिंदुस्तानी थे,उनकी एक ही जाति,एक ही विश्वास और एक ही कर्तव्य था कि भारत भूमि को पराधीनता से मुक्त करवाया जाए और आज भी इसी श्रेष्ठ भावना की जरूरत है।
इस सन्दर्भ में मैक्सिम गोर्की की विश्वप्रसिद्ध एक उपन्यास है,*माॅं जिसकी कथानक यह सिद्ध करती है कि मातृभूमि के लिए,उसके मान, सम्मान, प्रतिष्ठा, अक्षूण्णता आदि के लिए सबकुछ कुर्बान किया जा सकता है। उपन्यास का सार यह है कि एक युवक अपने राज्य से बगावत करके बागी हो जाता है और उस राज्य पर दुश्मनों के साथ मिलकर कब्जा करना चाहता है पर उसकी माॅं चहारदीवारी के भीतर किले में है और वह चाहता है कि उसकी माॅं बाहर आ जाए तो वह सबकुछ विध्वंस कर दे। एक दिन कुछ गंभीर निर्णय लेकर वह वृद्धा माॅं किले से बाहर आती है। उसका बागी बेटा बड़ा खुश होकर माॅं की गोद में सर रखकर लेट जाता है और बोलता है कि,
माॅं,तुम आ गयी न,अब मैं इस राज्य को नष्ट करके अपना अधिकार जमाऊंगा।
माॅं ने अपने इकलौते बेटे को एकबार गौर से देखा और कपड़े में छुपाकर रखे कटार निकालकर उसकी छाती में घोंप दिया और फिर अपनी छाती में भी घोंप कर स्वयं को मार लिया और कहा, मैं अपने देश से दगा नहीं कर सकती और बेटे, तुम्हारे बगैर भी जीवित नहीं रह सकती और यही एक रास्ता था।
अब इस कथानक से सहजता से समझा जा सकता है कि क्यों माॅं और मातृभूमि को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ और ऊपर कहा गया है।
कौन जानता है कि मरने के बाद क्या होता है परन्तु जीवन काल में ही हमें सारे ऋणभार से मुक्त होने की महत्तम कोशिश करनी चाहिए।

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क्रिया या कार्यशीलता अकारण २८ ०९ २५ 
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कोई भी क्रिया या कार्यशीलता अकारण और लक्ष्यहीन नहीं हो सकती है।
हम चाहे बोल रहे हों,लिख पढ़ रहे हों,कुछ सोंच रहे हों या जो कुछ भी कर रहे हों सबके पीछे कुछ कारण समूह और लक्ष्य होते ही होते हैं।
लक्ष्यों को सीधे आर्थिक लाभों या अर्थोपार्जन से ही जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए कि जीवन बहुआयामी है जिसके अनेक आयाम होते हैं और वही हमारे लक्ष्य भी होते हैं।
हमारी सांसों का आना जाना भी एक क्रियाशीलता ही है जो हमारी सारी क्रियाशीलताओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है कि यह हमारे जीवन और अस्तित्व का आधार है, सांसें जबतक चल रही है हम अपने अस्तित्व में रहते हैं और सांसें खत्म तो उसके साथ सारे व्यापार खत्म और इसलिए कहा भी जाता है कि हमारी एक एक सांस गिनती की होती है,न एक ज्यादा और न एक कम और इसी के मध्य हमारा जीवन चलता रहता है। इसलिए सांसों का रिश्ता हमारे कार्यकलापों से भी जुड़ा होता है।
भौतिक जगत में तो यह हमारे अस्तित्व का आधार है ही, आध्यात्मिक जगत में भी इसके बड़े महत्त्व हैं कि इसपर ही ध्यान धारणा और समाधी का भी आधार है। योग में इसके आधार पर ही योगासन और प्राणायाम संचालित होते हैं। किस आसान में सांसें बाहर जाएंगी और किसमें भीतर आएगी और किसमें सांसों को थामकर रखा जाएगा,सब निर्धारित हैं और इसमें कोई भी त्रुटि लाभ के बजाय हानि पहुंचा सकती है, इन्हें रेचक,पूरक और कुंभक कहा जाता है।
कोई भी यौगिक क्रियाओं में श्वास साधन बड़ा महत्वपूर्ण होता है जिससे आन्तरिक आधियों व्याधियों पर नियंत्रण के साथ साथ निर्मूल भी किया जा सकता है।
सहज योग,क्रिया योग,विहंगम योग, भावातीत योग और विपश्यना या विपस्सना योग में श्वास संचालन और नियंत्रण ही मूलाधार है और इनमें विपश्यना या विपस्सना तो इसी पर टिका है।
विपश्यना योग विज्ञान की सर्वाधिक प्राचीन परम्परा मानी जाती है जिसके साधना का इतिहास लगभग हजारों वर्ष पुराना है या तो अज्ञात है। योग परम्परा में इसपर प्रयोग करने वालों में सबसे महत्वपूर्ण नाम गौतम सिद्धार्थ का है जिन्होंने अपने** अट्ठंगिकोमग्गो या आष्टांगिक मार्ग में इसी पर बल दिया है जो या तो बड़ा सहज या सरल है या बड़ा कठिन है।
इस यौगिक क्रिया में किसी बाहरी उपादान की जरूरत नहीं होती है बस तन,मन, हृदय और मस्तिष्क को सांसों पर केंद्रित करना है। हम किसी भी परिस्थिति में बैठे हों या सुखासन या सिद्धासन या पद्मासन में बैठे हों या किसी आसन के ऊपर बैठे हों,कुछ नहीं करना है बस आती जाती सांसों पर ध्यान केन्द्रित कर देना है कि कौन सी सांस भीतर आ रही है और कौन सी सांस बाहर जा रही है,इसका गंभीरता से अवलोकन करते रहना है और हम स्वयं निर्विचार और विचारशून्यता की अवस्था में पहुंच जाएंगे जबकि अन्य यौगिक क्रियाओं में यह कहा जाता है कि मन को पहले शान्त और स्थिर कर लें फिर ध्यान की अवस्था में जाएं और यह क्रिया स्वत:स्फूर्त हमें निर्विचार और शान्त कर देती है कि हमारी समस्त मानसिक शक्तियां सांसों के आवागमन पर केंद्रित हो जाती हैं।
हमनें भी सामान्य अवस्था में तो नहीं परन्तु किसी परिस्थिति विशेष में इसका प्रयोग और इसकी अनुभूति की है।
निर्धन वह नहीं होता जो धनहीन है बल्कि जिसके भीतर कुछ भी देने के भाव नहीं हों,वह निर्धन है। परमात्मा ने सबको अलग अलग तरीके से कुछ न कुछ अद्भुत दे रखा है जिसे हमें देते बांटते रहना चाहिए और यही श्रेष्ठ जीवन का आधार है और यह क्रियाशीलता भी अकारण या लक्ष्यहीन नहीं है कि इससे हमें सुखानुभूति होती है।
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बड़प्पन धन से ऊपर की चीज है। दिवस : २९  ०९ २५ 
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आज एक छोटी सी पर अद्भुत कहानी।

धन बड़ी चीज है निस्संदेह,बहुत कुछ इससे खरीदी जा सकती है और किया जा सकता है,इसके साथ अनन्त संभावनाएं बनती बिगड़ती हैं। परन्तु इसी संसार में जहां बहुत कुछ धन के उपयोग से किया जा सकता है वहीं व्यक्ति की निजता का,उसके श्रेष्ठ गुणधर्म और संस्कारों इससे कोई सरोकार नहीं होता है।
एक बड़े शहर में एक छोटे बच्चे को किसी रेस्तरां में बैठकर बढ़िया 
डिश खाने की इच्छा हुई और उसने वेटर को मीनू लाने को कहा। उसने मनपसंद डिश को देखा और अपनी जेबें टटोली तो पाया कि उससे कम पैसे उसकी जेब में हैं। फिर उसने दूसरी डिश देखी तो पाया कि उससे बीस रुपए अधिक जेब में हैं और उसने वही आदेश दिया जिससे उसका पेट तो भर जाता परन्तु मन और इच्छा की तृप्ति नहीं होती पर उसने ऐसा ही किया।
खाना खाने के बाद उसने बिल के पैसे प्लेट में रखा और चुपचाप उस बीस रुपए को ग्लास के नीचे दबाकर चला गया कि वेटर को टिप्स देने के लिए उसके पास वही पैसे थे जिससे वह एक आइसक्रीम खा सकता था पर उसने ऐसा नहीं किया और वही किया जिससे उसके आत्मसम्मान की रक्षा हो सकती थी।
हो सकता है कि बहुतों के लिए यह छोटी सी घटना या लघु कहानी हो,पर इसका संदेश तो विराट और मन को उत्प्रेरित कर देने वाला है।
एक छोटे बाल मन को भी अपने आत्मसम्मान का बोध है कि आइसक्रीम भले न खाया जाए पर वेटर को टिप्स जरूर दिया जाए ताकि वेटर के मन में उसके प्रति सम्मान का भाव जगे और वह स्वयं भी अपने को आहत न समझे।
हमारे जीवन में भी ऐसे अनेक क्षण आते हैं जहां हमें हमारे आत्मसम्मान को सोचना चाहिए पर हम ऐसा अनदेखा कर देते हैं जो हमें हमारे आत्मसम्मान और आत्मगौरव को कालान्तर में आहत कर देता है और उसे सुधारा नहीं जा सकता है।
हमें हमारे आत्मसम्मान के साथ साथ दूसरे के आत्मसम्मान को भी आहत न करने की कोशिश करते रहनी चाहिए कि श्रेष्ठता कोई बाजार में क्रय विक्रय का विषय नहीं होता बल्कि निजता का श्रेष्ठ गुण होता है।
फिर कोई कितना भी प्रिय क्यों नहीं हो,अगर उनके व्यवहार आचरण आदि से हम आहत होते हों, हमारी भावनाएं आहत होती हों तो उनका परित्याग कर देना ही श्रेयस्कर होता है।
मनुष्य तो बस मनुष्य ही होता है परन्तु उसका व्यवहार, आचरण, सदाशयता, आत्मसम्मान की भावना आदि उसे एक अलग पहचान देते हैं और उसे श्रेष्ठ बनाते हैं।
पद,कद,प्रभाव, सामर्थ्य आदि परिवर्तनशील विषय हैं पर एक श्रेष्ठ व्यक्ति सदैव श्रेष्ठ ही रहता है इसलिए हमें सबके प्रति सम्मान और आदर का भाव रखने की जरूरत होती है कि आज कोई ऊंचाई पर है तो कल नीचे भी आ सकता है और नीचे वाला ऊपर भी जा सकता है परन्तु श्रेष्ठ गुणधर्म धारक अपने व्यवहार और आचरण में कभी बदलाव नहीं लाता जैसे सूरज कितना भी बादलों से ढका हो,उसकी किरणें फूटकर बाहर निकलती हुई उसके अस्तित्व को दर्शाते रहती हैं।
आत्मसम्मान सबके भीतर होता है और होना भी चाहिए और हमें सबका सम्मान भी करना चाहिए।
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राष्ट्र वेदना और चिन्तन : दिवस : ३० ०९ २५ 
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सुकरात एक सत्यान्वेषी था,वह सत्य, न्याय, अधिकार आदि की बातें करता था पर आत्ममुग्धता का, मिथ्या अहंकार का शिकार न था और सबसे बड़ी बात यह थी कि वह एथेंस के शत्रुओं से मिलकर या षडयंत्र कर एथेंस के विनाश की बातें नहीं करता था।
वह एथेंस की गलियों में घुम घुम कर युवकों से यही सब सवाल पुछा करता था जो तत्कालीन शासकों को नागवार गुजरता था, उन्हें भय था कि यह हमारे सत्ता और तंत्र को नष्ट करना चाहता है और उसे जहर का प्याला पीकर मरने का मृत्युदंड दे दिया पर यहां एक विषय उल्लेखनीय है वह अपने राज्य का विनाश या विखंडन का अभिलाषी नहीं था।
बौद्धिक चिन्तन एवं मार्गदर्शन देने वाले व्यवस्था और तंत्र में बदलाव लाने की बातें कर सकते हैं जैसे विदूर चाहते थे कि कौरव पाण्डवों को उनके वांछित और और औचित्यपूर्ण अधिकार दे दें परन्तु वे 
कुरुवंशियों के विनाश और हस्तिनापुर के विध्वंस की शर्तों पर ऐसा नहीं चाहते हैं और इसलिए वे श्री कृष्ण के प्रस्तावों का समर्थन करते हैं।
वैज्ञानिक, दार्शनिक, उत्पादक और शिक्षक इन चारों की किसी राष्ट्र निर्माण में बड़ी भूमिका होती है और इनमें श्रेष्ठ शिक्षक होते हैं जिनसे उपरोक्त तीनों का सृजन होता है और शिक्षक जो बुनियादी तौर पर एक साहित्यकार ही होता है,अपने आप में वैज्ञानिक, दार्शनिक और उत्पादक भी होता है जो एक सबल, सशक्त, समृद्ध और स्वस्थ राष्ट्र की कल्पना करता है और अपने मातृभूमि या राष्ट्र को बाह्य और आन्तरिक शत्रुओं से रक्षा की सफल नीतियों और कुटनीतियों का सृजन करता है और यही भूमिका उसके चरित्र और व्यक्तित्व को सार्थक बनाने का काम करता है और ऐसे ही शिक्षक सुकरात और चाणक्य थे जिन्होंने एथेंस जैसे बौद्धिक नगर राज्य को एक नयी दिशा दी थी और चाणक्य ने अखंड भारतवर्ष का निर्माण किया था।
शासक अगर प्रजा वत्सल, लोकप्रिय, न्यायी, राष्ट्र के प्रति समर्पित और निष्ठावान, कर्तव्यनिष्ठ,
सर्वजनसुखाय सर्वजनहिताय न हो तो उसका विरोध होना चाहिए जो पूर्वाग्रहों से दूराग्रहित नहीं होना चाहिए बल्कि औचित्यपूर्ण होना चाहिए कि शासकों का बदलते रहना एक यंत्रवत क्रियाशीलता है परन्तु राष्ट्रीय एकता, अखंडता, अक्षूण्णता, सम्प्रभूता सर्वोपरि है। गोस्वामी जी ने भी कुछ ऐसा ही कहा है,
जाके राज न प्रजा सुखारी 
सो नृप अवस नरक अधिकारी 
किसी भी राष्ट्रीय नागरिक का यह प्रथम कर्तव्य होना चाहिए कि उसके लिए सबसे ऊपर राष्ट्रधर्म होना चाहिए और शहीदे आजम भगत सिंह ने भी ऐसा ही कहा था कि,
राष्ट्रधर्म से ऊपर कोई धर्म नहीं होता।एक सिख के लिए केश की बड़ी प्रतिष्ठा और इज्जत होती है और अपने राष्ट्रीय हित के लिए मुझे केश तो क्या गर्दन भी कटवाने की जरूरत पड़ी तो गर्दन भी कटवा दुंगा और ऐसा ही उन्होंने किया भी था।
यही आज का शाश्वत सनातन सत्य है जो कल भी था और कल भी रहेगा।
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आज की बात १ १० २५ 
--नवरात्र(नव रात्रियों का समाहार)।
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वैसे तो आज नवरात्र की पूर्णाहुति की तिथि है पर नवरात्र की महिमा और सार्थकता को हमने लिपिबद्ध करने की कोशिश भर की है। नवरात्र पर इस आलेख का अवलोकन करने का कष्ट करें।
आज की तिथि से आठ दिनों पूर्व,भारतीय पौराणिक , धार्मिक एवं अध्यात्मिक दृष्टिकोण से
शक्ति सृजन, संरक्षण और संवर्धन तथा
शक्ति साधना के महा आयोजन के पर्व 
'नवरात्र' की साधना शुरू होती है।
शक्ति सृजन, ऋद्धियों- सिद्धियों की प्राप्ति,स्वयं चैतन्य बोध, अहंकार नाश, 
बुद्धि और विवेक के जागरण, आध्यात्मिक साधना और शिव( पुरूष)
और शक्ति(प्रकृति) के समाहार को जानने और आत्मसात करने की नौ रात्रियों की अर्थात् नव अहोरात्र की सुमंगल यात्रा है। वैसे शक्ति साधना की
अवधारणा हमारे यहाँ काफी प्राचीन है
और प्राचीन वैश्विक स्तर पर भी अन्य रूपों में संधारित होता रहा है। वैदिक काल से लेकर सैंधव सभ्यता में भी पाशुपत शिव और मातृ शक्ति की आराधना- साधना के प्रमाण मिलते है।
        इस नवरात्र में प्रयुक्त 'रात्रि' शब्द जिससे अंधकार का बोध होता है, हिन्दु आध्यात्मिक दर्शन और चिंतन में ' स्वयं प्रकाश जागरण' ' शिव- शक्ति साधना' और 'सिद्धि प्राप्ति' का साधन है।यह अंधकार( असत्) से प्रकाश ( सत्) की
और ले जाने वाली साधना की ' नवरात्र'
है न कि नौ दिनों तक चलने वाला कोई
त्योहार या मेला।
भारतीय मनीषियों ने इस नवरात्र की आध्यात्मिक और मानसिक तथा शारीरिक क्षमताओं को बढाने वाली क्रियाओं की अद्भुत व्याख्याएँ भी दी है।
यह ' नौ दिवसीय आत्म- शरीर शुद्धिकरण व्रत' , नौ दिनों तक विभिन्न 
अलग-अलग विधि- विधानों और क्रियाओं से संचालित होने वाली साधना है जिससे साधक को अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों की प्राप्ति होती है। आभार तौर पर इस नवरात्र में व्रतधारी सुबह से शाम तक इसके क्रियाओं की समाप्ति 
कर देते है परन्तु आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसके साधना का समय ब्रह्म मुहूर्त और रात्रि वेला है। यह शुद्ध ध्वनि विज्ञान और ऊर्जा के रूपान्तरण और  समावेशीकरण के सिद्धांत पर आधारित है। दिन के समय 
वातावरण में कोलाहल और कई प्रकार के प्रदूषण होते है परन्तु उन दो वेला में 
सब कुछ स्थिर और स्वच्छ होता है। हवन कुंड से निकली अग्नि और धुआँ 
वातावरण को शुद्ध और परिष्कृत कर देते है। मंत्र और वाणी के उच्चारण से
ध्वनित ऊर्जा का प्रसारण,  वातावरण में
सकारात्मक ऊर्जा का सृजन करते है और साधक उसकी ऊर्जा से प्राणवान होते हैं ।
जहाँ सीधे व्यवहारिक जीवन से जुड़ने का सवाल है तो यह नवरात्र हमारे शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के सशक्तिकरण से जुड़ा हुआ है। यह ऐसे तो मूलतः चार ॠतुओं के संधिकाल से जुड़े होने के कारण चार बार एक वर्ष मे होते हैं पर दो गुप्त और दो प्रत्यक्ष होते है और यही वासंती नवरात्र और शारदीय नवरात्र के रूप में मनाये जाते हैं । छः - छः माह के अन्तराल में हमारे
आहारीय और अन्य प्रदूषणकारी कारकों के कारण हमारा शरीर व्याधियों से प्रभावित होता रहता है और रोग ग्रस्त शरीर मानसिक व्याधियों को भी जन्म देता है। उन्हीं व्याधियों से बचने के लिए
यह नवरात्र साधना है। नौ दिन विधि विधान से साधना, दिन चर्या और आहार - विहार की शुद्धि हमारे शरीर के " नवांग आंगिक तंत्र " अर्थात् " Nine Organic System of Human Bidy" को परिष्कृत और पुष्ट कर देती है। शरीर के अंदर जमा विषैले पदार्थ या तो बाहर निकल जाते हैं  या नष्ट हो जाते हैं। यह प्रक्रिया एक वर्ष में दो बार की जा सकती है जो शरीर मन और आत्मा के सहमना सम्बन्ध को बनाये रखने मे सहायक होती है। यही तो अध्यात्म धर्म कर्मकांड लौकिक जीवन और आत्म शुद्धिकरण का पर्व है। यही कारण है कि इसे " षष्ठ मासिक शुद्धिकरण नवरात्र साधना व़त" भी कहते हैं ।
पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि चैत्र प्रतिपदा को ही ब्रह्माण्डीय शक्ति,
सृजन करने हेतु आद्द शक्ति के रूप में 
अवतरित हुयी थी जिनका आह्वान इन्हीं 
चार नवरात्रों में सबके सुख शान्ति आरोग्य समृद्धि और कल्याण के लिए किया जाता है।ऐसा देवी भागवत  दुर्गा 
सप्तशति और अन्य पुराणों में उल्लेखित है।
जहाँ तक भारतीय दर्शन और चिंतन तथा धार्मिक , आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों पर नारी को स्थापित करने का प्रश्न है, कहा गया है कि,
"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता" अर्थात् जिस स्थान/ घर में नारी को सम्यक् सम्मान मिलता हो या दिया जाता हो ,वहाँ देवता अर्थात् ( सुख शान्ति समृद्धि आरोग्य और विकास)
का वास होता है और यही वजह है कि हमनें नारी को मर्यादित स्थान दिया है।
हाँ, ये बात अलग है कि इस संस्कार के 
समावेशन न होने के कारण समाज मे प्रदूषण है जो आए दिन लज्जाजनक और दुखद घटनाओं को सुनने के लिए बाध्य होते है। नवरात्र वास्तव मे भारतीय सभ्यता और संस्कृति के उन उच्चतम मूल्यों की स्थापना करता है जो अन्यत्र दुर्लभ है। इसे आधुनिक सन्दर्भ और प्रसंग में ज्यादा प्रभावकारी बनाने की जरूरत है। आज घरेलू हिंसा और 
अमानवीय अत्याचार से हमारा देश अपेक्षाकृत ग्रसित है और नवरात्र का आयोजन इसी देश में व्यापक पैमाने पर होता है। आज का आधुनिक संसार इसे हिन्दु धर्म और सामाजिक परम्पराओं से भले जोड़कर देखे, पर एक समय था जब पुरी दुनियाँ में किसी न किसी रूप में सारे प्राचीन समाज ने ज्ञान की; सौन्दर्य की, धन- लक्ष्मी की, युद्ध की और सृजन की देवी के रूप मे शक्ति अर्थात् सृजनकारी प्रकृति ( नारी शक्ति)
की पूजा की है जो आज भी साहित्यों
मे द्रष्टव्य है।
यह हमारे यहाँ " दशहरा" से भी प्रसिद्ध है और आमजनों की भाषा में यह विजयादशमी या दशहरा ही है कि नवरात्र का जब दशमी तिथि के साथ समाहार होता है तब यह विजयादशमी या दशहरा कहलाता है और इस दशहरे की पृष्ठभूमि में अनेकानेक कथाएँ हैं ।
यह सिर्फ त्योहार नहीं धर्म और दर्शन, सामाजिक परम्पराओं, कर्मकांड, अध्यात्म और विज्ञान का मणिकांचन योग से सृजित साधना पर्व है और दशहरा त्योहार है।
तो आइए, विश्व मंगलकामना के लिए शक्ति का आह्वान करें और नारी की सृजनात्मकता शक्ति का सम्मान करें।
समस्त विश्व में शान्ति हो
सद्भावना हो प्रेम हो करुणा हो।
सबका कल्याण हो।
नवरात्र की पूर्णाहुति तिथि महानवमी ( माॅं सिद्धिदातृ) की हार्दिक मंगलकामनाएँ एवं बधाईयाँ ।

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परिवर्तनशील और अपरिवर्तनशील ३ १० २५ 
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सीख और अनुभव के अनेक स्रोत होते हैं और अनुभव की भिन्नताओं के अनुरूप ही हमारी चेतनाएं विकसित होती रहती हैं और इसी चेतना से हम समस्त क्रियाशीलताओं का अवलोकन करते रहते हैं। इस चेतना का सम्बन्ध हमारे प्राप्त और अर्जित संस्कारों से होता है, अध्ययन चिन्तन मनन और आत्मविश्लेषण से होता है। जिन वस्तुओं विषयों व्यक्तियों या जीवधारियों को हम देखते समझते हैं, जानने पहचानने की कोशिश करते हैं, उसके मूल में यही चैतन्य शक्ति क्रियाशील रहती है और यही कारण है कि एक बिन्दु पर जब दस लोग अपनी अपनी राय रखते हैं तो सब अलग-अलग होते हैं और सापेक्ष‌ होते हैं लेकिन जिन बिंदुओं पर सबकी सहमति होती है, वे निरपेक्ष और शाश्वत हो जाते हैं।
जितने भी लोग इस संसार में हैं सबकी लिखने पढ़ने की अपनी अपनी भाषाएं होती हैं और कुछ लोग इतने मेधावी और जिज्ञासु होते हैं कि वे एक नहीं अनेक भाषाओं को पढ़ लिख सकते हैं। परन्तु पढ़ने और लिखने की प्रवृत्तियां भी अलग-अलग होती हैं जो उनकी प्रवृत्तियों पर निर्भर करता है। किताबों के भी तो विभिन्न स्वरूप होते हैं जो कविता, कहानी,उपन्यास,संस्मरण,जीवनी और अन्य विषयक होते हैं और इनके अलावा लोग पत्र पत्रिकाएं, अखबार आदि भी पढ़ते हैं। यह सबकी अपनी-अपनी आदतों और प्रवृत्तियों पर निर्भर करता है कि लोग किसी विषय को किस रूप में देखते और पढ़ते हैं। अखबार को ही ले लें, कुछ लोग अखबारों को सरसरी निगाहों से उसके हेडलाइन्स को देखकर छोड़ देते हैं,कुछ महत्वपूर्ण खबरों को गंभीरता के साथ पढ़ते हैं,कुछ लोग खेल,कुछ लोग फिल्म या साहित्य या राजनीति या राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय  खबरों का अवलोकन करते हैं पर विरले ही अखबार को आद्योपांत पढ़ते हैं और उनकी यही प्रवृत्ति किसी विषयवस्तु और आदमियों पर भी लागू होती है। हम जब लोगों से मिलते हैं तो उन्हें पढ़ने और समझने की कोशिश करते हैं परन्तु किताबों से भिन्न होते हैं। किताबों के विषय-वस्तु कभी नहीं बदलते परन्तु मनुष्य तो क्षण क्षण में परिस्थितियों के अनुरूप बदलते रहते हैं और इसलिए आदमी को किताबों की तरह नहीं पढ़ा जा सकता है पर ध्यान रहे कि कुछ लोग किताबों की तरह खुले होते हैं और उनके बुनियादी गुणधर्म किताबों की तरह स्थिर होते हैं और ऐसे लोगों को जब भी अवलोकन किया जाएगा तो परिस्थितिजन्य कुछ बदलावों को छोड़कर शेष सबकुछ वैसे ही रहते हैं जैसा उनको पहले देखा गया था और ऐसे लोग अद्भुत अनुभूति देते हैं।
बदलाव एक वैज्ञानिक सत्य है जो क्षणिकवाद के दर्शन से अनुप्रेरित और अनुप्राणित है, हमारे शरीर की कोशिकाओं में भी बदलाव आते रहते हैं, कोशिकाओं के बदलाव से उतक और ऊतकों के बदलाव से अंग और अंगतंत्र के स्वरूप भी बदलते रहते हैं। बालपन से किशोरावस्था, किशोरावस्था से युवावस्था, युवावस्था से प्रौढ़ावस्था और प्रौढ़ावस्था से वृद्धावस्था में रूपांतरण इसी बदलाव की परिणति है,ठीक ऐसे ही ऋतु परिवर्तन और ऋतु परिवर्तन के साथ प्रकृति में परिवर्तन होते रहते हैं परन्तु नहीं बदलते हैं जीवन के स्थायी मोल और मूल्य जिसके दम पर यह संसार चलता रहता है।
इसी बदलाव की बुनियाद पर तथागत सिद्धार्थ ने आत्मा की अनश्वरता को अस्वीकार किया था परन्तु उनकी अस्वीकृति भी शाश्वतता पर नहीं टिक पायी कि उन्होंने आत्मा की जगह * चित्त ( psycho mind,mentality,psyche,attitude etc.) को माना परन्तु उन्हें इस बात की विस्मृति हो गयी कि चित्त तो अवचेतन मनो मस्तिष्क ही है जो स्मृतियों का संग्रहण केन्द्र हैं जहां अतीत की सारी स्मृतियां संग्रहित रहती हैं और उसी में** प्रेम,
करूणा,दया, क्षमा, अहिंसा,त्याग,सहयोग
सह अस्तित्व की भावनाएं आदि सुरक्षित रहती हैं जिनको वो मौलिक अपरिवर्तनीय गुण मानते हैं और अगर ये अपरिवर्तनीय हैं तो उनका और नागार्जुन का क्षणिकवाद का दर्शन गलत हैं।
यह सत्य हैं कि इस मृण्मय संसार में सबकुछ क्षणभंगुर और परिवर्तनशील हैं परन्तु कुछ विषय इससे परे हैं और उन्हीं का अवलोकन करने की जरूरत है।
हमारे रिश्ते नाते की गर्माहट बदलती रहती है परन्तु रिश्ते नहीं बदलते हैं,उनके अर्थ और भाव नहीं बदलते हैं और जो नहीं बदलते हैं उन्हें ही सत्य, सनातन और शाश्वत कहा जाता है।

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गमों को रोज दावत देता हूॅं 
५ १० २५ 

गमों को रोज दावत देता हूॅं 
घर के दरवाजे खुले रखता हूॅं 

रंजोगम की भीड़ है सीने में
किसी से पर कुछ न कहता हूॅं 

अंधेरों में बसर करता रहा हूॅं 
रौशनी हो जला दिया रखता हूॅं 

दुनिया का हिस्सा हूॅं पर जूदा हूॅं 
न मानो सबकी खबर रखता हूॅं 

बेचैनियां हमारे हिस्से में रहे
अनीश सबके लिए दुआ करता हूॅं ।

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पंचभूत्वा शिव और दक्षिण भारत। ६ १० २५ 
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यद्यपि कि उत्तरापथ अर्थात् उत्तर भारत को शैवमत और परम्पराओं का प्रदेश कहा जाता है परन्तु शिव के पंचभूत्वा गुणधर्म और सत्ता का परिचय जो दक्षिणापथ अर्थात् दक्षिण के दो राज्यों तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश ने दिया है,वह अद्भुत और अप्रतीम है।
हालांकि एतिहासिक विवेचना से यह पता चलता है कि शिव सत्ता को कर्मकाण्ड एवं आध्यात्मिक रूप से स्थापित करने का काम जो दक्षिण में किया गया उसे भारत के किसी अन्य प्रदेशों में नहीं किया गया। चोल वंश के सम्राटों ने न भारतीय सीमाओं के अन्दर बल्कि दो पू एशियाई देशों में भी शैवमत से सम्बन्धित विशाल और दर्शनीय मंदिरों की स्थापना की। भारतीय सीमाओं के भीतर तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश तो अद्भुत शिल्प और स्थापत्य कला के नमूनों के रूप में जिन छ: विश्वविख्यात मंदिरों को बनाने का काम किया, संभवतः शिवभक्त और साधक भी इनसे अनभिज्ञ ही होंगे।
आज का आधुनिक भौतिक विज्ञान जिन पांच पदार्थों से जीवन सृजन की बातें स्वीकार कर रहा है उसे भारतीय तत्त्वज्ञानियों ने सदियों पूर्व कह दिया था कि,
क्षिति जल पावक गगन समीरा 
पंचतत्व से बना सरीरा,
अर्थात् मिट्टी,जल, अग्नि,वायु और आकाशीय पदार्थों से ही जीवन का सृजन होता है और उसके प्रतीक स्वयंभू शिव ही हैं और इसी सत्य को भौतिक रूप से दृश्यमान जगत में अधोलिखित छः मन्दिरों के द्वारा स्थापित किया गया है।
इनमें पहला स्थान आन्ध्र प्रदेश के तंजावूर जिले का जगत प्रसिद्ध वृहदेश्वर शिव मंदिर है जो पृथ्वी( मिट्टी) तत्त्व का प्रतीक है जो शिल्प और स्थापत्य कला का अनुपम नमूना है।
इसी के समतुल्य तमिलनाडु के कांचीपुरम का एकाम्बेश्वर शिव मंदिर है और यह भी पृथ्वी तत्त्व का ही प्रतीक है।
तीसरा तमिलनाडु के ही तिरूवनाईकवलम् में जम्बुकेश्वर शिव मन्दिर है जो जल तत्त्व का प्रतीक है और इसकी विशेषता है कि जल का अन्तर प्रवाही स्रोत इसके नीचे है।
तमिलनाडु के ही तिरूवन्नामलाई में अरूणाचलेश्वर शिव मंदिर है जो अग्नि तत्त्व का प्रतीक है।
आन्ध्र प्रदेश के तिरूपति में श्री कालहस्तिश्वर शिव का मन्दिर है जो वायु तत्त्व का प्रतीक है और अन्तिम वायवीय या आकाशीय तत्त्व का प्रतीक थिल्लईनटराज शिव मन्दिर है जो तमिलनाडु के ही चिदम्बरम में अवस्थित है।
शिव की विराटता और व्यापकता का बोध इसी से होता है कि 
जब कुछ नहीं था,तब भी शिव सत्ता थी,जब कुछ है तब भी शिव है और जब कुछ नहीं रहेगा तब भी शिव सत्ता रहेगी कि कुछ‌ नहीं और कुछ से ही सबकुछ सृजित, विकसित और स्थापित हुआ है इसलिए शिव समस्त जगत में सिर्फ देवता नहीं,एक परम चेतना हैं और जो इस कल्याणकारी चेतना से युक्त है, शिव है चाहे उस सत्ता का नाम जो भी रख दिया गया हो,
Nothingness is the ultimate force which creates Something and Something creates Everything and as Shiva stands for nothingness
and the whole Universe emerged out from the Nothingness which is the ultimate truth even of the Modern Cosmos Theory.
शून्य और एक का सिद्धान्त ही सृष्टि सृजन का, ब्रह्माण्डीय चेतना और व्यवहार का दर्शन और व्यवहार है।
जय शिव 

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सनातन और शाश्वत मार्ग,नियम और धर्म : ८ १०  २५ 
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आजकल हमारे भारत वर्ष में ही नहीं सीमाओं से परे भी अनेक तथाकथित प्रगतिशील और बौद्धिक संगठनों और लोगों के द्वारा इस शब्द पर काफी सवाल उठाए जा रहे हैं कि सनातन आखिर है क्या और इसका यथार्थ क्या है और यह आलेख उनके लिए विशेष रूप से है जो इसपर अज्ञानता और अविद्या के कारण तंज कसते नजर आते हैं।
शाब्दिक व्यूत्पत्ति के आधार पर बड़ी सहजता के साथ कहा जा सकता है कि जिनके मोल और मूल्य शाश्वत, चिरन्तन,दिव्य, अपरिवर्तनीय,सार्वभौमिक और सार्वकालिक हो,वही सनातन है( Eternal,
Universal,Omnipresent and the Ultimate Truth)और चूंकि आज हिन्दू और हिन्दूत्व के  जीवन दर्शन,चिन्तन, मार्ग तथा आध्यात्मिक मोल एवं मूल्यों के साथ इसे जोड़कर देखने और व्याख्या करने की बातें हो रही है तो इस आलेख के माध्यम से आप सबके अवलोकनार्थ रखने की कोशिश कर रहा हूॅं और चूंकि कुछ लोगों का कहना है कि तथागत सिद्धार्थ ने इस शब्द को पहले बताने का प्रयास किया है, इसलिए यह बौद्ध दर्शन की चेतना है। पर उन तमाम लोगों को जानने की, समझने की कोशिश करनी चाहिए कि इसके मूल में वैदिक,वेदान्तिक या औपनिषदिक,अन्य संहिताओं,आरण्यक और षट्दर्शन के दर्शन और चिन्तन हैं। चूंकि तथागत सिद्धार्थ को अनात्मवादी और अनिश्वरवादी दर्शन को स्थापित करना था इसलिए उन्होंने वेद,वेदान्त और औपनिषदिक दर्शनों को नहीं स्वीकार किया कि तब उन्हें ** आत्मा और ईश्वरीय सत्ता को स्वीकार करना पड़ता और जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वे तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आधारभूत संरचनाओं में एक बदलाव लाना चाहते थे , नहीं ला पाते परन्तु ध्यान रहे कि भाषा बदली, संदेश बदले, मार्ग बदले पर समस्त चिन्तन वैदिक और औपनिषदिक ही था जिसकी चर्चा हम नीचे कर रहे हैं जो गंभीरता के साथ अवलोकन करने और विश्लेषण करने का विषय है।
तथागत सिद्धार्थ से जब उनके शिष्य और विरोधी जिज्ञासा वश प्रश्न पुछा करते थे‌ तो वे‌ लगभग सभी शंकाओं का समाधान करके उनकी जिज्ञासा शान्त कर देते थे परन्तु* आत्मा, ईश्वर, स्वर्ग, नर्क आदि जैसे बारह प्रश्नों के उत्तर में या तो मौन‌ हो जाते थे या उन्हें अव्याकृत ( व्याकरण सम्मत नहीं होना या अनर्गल या अप्रासंगिक) कहकर टाल जाया करते थे कि ऐसा नहीं था कि वे उनका जवाब नहीं दे पाते बल्कि अनावश्यक वाद-विवाद से बचने और अपने ज्ञानार्जित बातों को रखने के लिए मौन हो जाते थे।
तथागत ने कभी लोग प्रचलित मतों, विश्वासों, विचारों आदि के लिए अमर्यादित और अपशब्दों के प्रयोग नहीं किए बल्कि उन्हीं की बातों और तथ्यों को परिष्कृत और परिमार्जित करके उन्हीं की ग्राह्य भाषा में समझाने की कोशिश करते थे लेकिन अपने विचारों, दर्शन और चिन्तन को किसी पर थोपने का काम नहीं करते थे। वे स्वयं कहा करते थे,
न तो मैं गुरु हूॅं और न किसी का संदेश वाहक या भगवान हूॅं, मैं मात्र पथ-प्रदर्शक हूॅं, मार्ग बताने वाला हूॅं जिस पर आपको स्वयं चलना है और हमारी बातों का, उपदेशों का अंधानुकरण भी नहीं करना है बल्कि उस पर चलने के पूर्व उसके सत्य को जान लेना है और यदि वह आपके मति युक्ति और विवेक से स्वीकार्य हो तो उसे आत्मसात करके उसका अनुगमन करना है।
उनके महापरिनिर्वाण काल में भी जब उनके प्रिय शिष्य विलाप कर रहे थे तो उन्होंने आनन्द से पुछा कि हे
आनन्द!
तुम किसके लिए विलाप कर रहे हो,अगर गौतम सिद्धार्थ के लिए कर रहे हो तो व्यर्थ है कि वह तो रहा ही नहीं और जो तुम्हारे सम्मुख है वह तो तथागत सिद्धार्थ है, बुद्ध है जो तुम भी बन सकते हो फिर विलाप किसके लिए,जो था वो है ही नहीं और जो है वह तुम भी बन सकते हो, फिर इस विलाप का कोई औचित्य नहीं है। पंच स्कंधों से नाम रुप शरीर को तो नष्ट होना ही है और यही इसकी प्रकृति है जो शाश्वत सत्य है और सत्य को स्वीकार करना ही धर्म है।
फिर आनन्द कहता है कि हे भन्ते!
आपके महापरिनिर्वाण के बाद हमारा क्या होगा,इसके जवाब में उन्होंने कहा,
हमनें जो कुछ अपने धम्मदेसना में कहा है वही तुम्हारे शास्ता ( मार्गदर्शक) होंगे और तुम्हें स्वयं ही स्वयं की खोज करनी होगी और इसके लिए आत्मशरण से बड़ा मार्ग कोई नहीं है,
अत्त सरणा अनय सरणा धम्म सरणा विहरथ,
अप्प दीपो भव।
हे आनन्द!
तुम्हें किसी की शरण में जाने की जरूरत नहीं है,अपनी आत्म शरणागत हो जाओ, धर्म ( विहीत कर्म एवं कर्तव्य, परिष्कृत व परिमार्जित व्यवहार आचरण, सनातन मार्ग) की शरण में विचरण करो, हमारे वचन तुम्हारे मार्गदर्शन करेंगे,अपना प्रकाश स्वयं बनो अर्थात् जो कुछ बाहर है,उससे प्रज्ञा की प्राप्ति नहीं हो सकती है,जो भीतर की चैतन्य ऊर्जा है उसे जागृत करो जिससे * बुद्धत्व या अर्हत्व की प्राप्ति हो सकेगी।
यही मार्ग है जिसकी व्याख्या भारतीय वेदांत और औपनिषदिक दर्शनों में की गयी है। उनके पहले गुरु तत्कालीन मगध के महान वेदान्तिक आलार कलाम हैं और दूसरे गुरु उद्दात रामपुत्त हैं जिन्होंने वैदिक और औपनिषदिक दर्शन के अलावा योग, ध्यान,साधना आदि की विधियां बताई थी। फिर वे चार्वाकों के सम्पर्क में आए परन्तु किसी मार्ग से उन्हें उस सत्य और ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई जिसकी उन्हें तलाश थी और तब अन्त में उन्होंने अतिवादी भाव से मुक्त होकर उसकी बोध की जिससे उनकी प्रज्ञा जागृत हुई और उन्होंने बुद्धत्व की प्राप्ति की।
वह मार्ग आत्मचिंतन से उपजी मध्यम मार्ग की धारा थी जिससे उन्होंने सत्य सनातन चार आर्य सत्य, आष्टांगिक मार्ग, मध्यम मार्ग और प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धान्तों की स्थापना करते हुए कहा,
एसो धम्मं सनन्तनो 
एसो धम्मं संखारा 
एसो धम्मं 
 पटिच्चसमुप्पाद् 
अर्थात् यही सत्य सनातन धर्म (मार्ग) है,
यही परिष्कृत संस्कार है और यही प्रतीत्यसमुत्पाद का शाश्वत नियम है। यहां बुद्ध ने औपनिषदिक दर्शनों में कर्मजनित फलाफल के सिद्धान्त और कपिल मुनि के सांख्य दर्शन के कारण और कार्य के सिद्धान्तों को लोकभाषा पाली में प्रचारित और प्रसारित किया जो सनातन शाश्वत परम्पराओं का ही लोकप्रिय रूपांतरित दर्शन था।
उल्लेखनीय है कि उन्होंने स्वयं कहा है कि मैं किसी नवीन धर्म या मत की स्थापना नहीं कर रहा हूॅं बल्कि उन व्यवहारिक और सनातन मार्ग को बता रहा हूॅं जिन्हें अपनाकर संसार चक्र से मुक्त हुआ जा सकता है।
इसी सत्य सनातन मार्ग को वैदिक, वेदान्तिक या औपनिषदिक दर्शन और चिन्तन में परम सत्य की खोज का मार्ग कहा गया है और परम सत्य क्या है जिसे ऋग्वेद कहता है,
एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति,
वह सत्य अर्थात् सत्य का सार तो एक ही है(
ब्रह्म, ब्रह्मा नहीं) है जिसके जानने और व्याख्या करने के मार्ग अनेक हैं जिन्हें ज्ञानियों ने अलग-अलग तरीके से 
व्याख्यायित किया है।
भगवान बुद्ध ने भी यही कहा परन्तु उनके मार्ग सिर्फ भिन्न हैं। उन्होंने सनातन सत्य के बाह्याचार या कर्मकाण्ड को नकारते
हुए आन्तरिक शूचिता, पवित्रता और ज्ञानार्जन पर बल दिया और सनातनता के भी यही दो रूप हैं। कर्मजनित संस्कारों के प्रति जागरूक होने की बात कही कि प्रकृति में ही सत्य है और प्रकृति के सत्य,नियम,
विधान को समझना ही सनातन नियमों को समझना है और इसी सनातन नियम को वैदिक और औपनिषदिक दर्शन में दो भागों में विभक्त किया गया है,ऋत जो ब्रह्माण्डीय क्रियाशीलताओं का आधार है और प्राकृतिक नियम जो प्राकृतिक या सांसारिक नियमों का आधार है और यही शाश्वत सत्य और सनातन नियम या धर्म हैं।
ऋत के अनुरूप ही समस्त ब्रह्माण्डीय कार्यकलापों का संचालन नियमन और नियंत्रण होता है। सृजन,लय और प्रलय इसी पर आधारित है।
ऋतुएं एवं मौसम, जलवायु, पर्यावरण, प्राकृतिक आपदाएं,
जड़ चेतन आदि के नियमन नियंत्रण इसी ऋत से होते हैं और सांसारिक जीवन का नियमन संचालन और नियंत्रण प्राकृतिक विधि से होता है। सांसारिक विधियां, परम्पराएं, कर्मकाण्ड आदि युगधर्म के अनुकूल बदलते रहते हैं परन्तु ऋत के सिद्धान्तों में कोई परिवर्तन नहीं होते हैं और इसीलिए इसे सनातन धर्म कहा गया है जिसके आध्यात्मिक पक्ष में करूणा, क्षमा, त्याग,
प्रेम, शान्ति,सह अस्तित्व,सद्भावना, सुख भाव,आनन्द, मुक्ति या मोक्ष आदि के भाव समाहित होते हैं और हिन्दू आदिकाल से इसे स्वीकार कर मानते रहे हैं और ध्यान रहे कि हम हिन्दू की बात उन वैदेशिक सन्दर्भों में नहीं कर रहे हैं बल्कि वैदिक सनातन धर्म की बात कर रहे हैं जिन्हें आज हिन्दू कहा जाता है।
इसी सनातन को परिभाषित करते हुए ऋषि गौतम ने कहा है,
यतो अभ्युदय नि:श्रेयस स सिद्धि धर्म,
सांसारिक वैभव सुख ऐश्वर्य की प्राप्ति (प्रेय) करना और अन्त में जीवन के अन्तिम लक्ष्य श्रेष्ठ परम सत्य ( श्रेय) को प्राप्त करके सिद्धि करना ही धर्म है अर्थात् जीवन के सनातन मार्ग की प्राप्ति और सिद्धि है।
वेदान्त दर्शन और औपनिषदिक चिन्तन ही हिन्दू जीवन दर्शन में सनातन सत्य का मार्ग है और मनुष्य योनि में जन्म लेकर मनुष्यत्व की सिद्धि ही सत्य की खोज है,परम सत्य की अनवरत और‌ निरन्तर खोज का मार्ग ही हिन्दू आध्यामिक मार्ग का सनातन सत्य है जो प्रकृति से ब्रह्माण्ड तक के सभी जड़ चेतन में इसी सत्य को देखता और तादात्म्य स्थापित करता है। वह 
विविधताओं में एकत्व स्थापित करता है,स्व की चेतना को पर चेतना में खोजता है,
अनेकता में एकता की खोज करता है और इसलिए गीता में जो वेदान्त और औपनिषदिक दर्शन के मध्य में अवस्थित है,कहा गया है,
सर्वधर्मान्परितज्य
मामेकम् शरणं व्रज
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच।
अर्थात् तुम सारे धर्मों ( कर्म एवं कर्तव्यों) का परित्याग कर हमारी शरण (सत्य) में आ जाओ,हम तुम्हें सारे पाप कर्मों से मुक्त कर दुंगा,अब इसके भाव को समझने की जरूरत है।
अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़ रथ पर खड़ा है, धर्म विमुख अर्थात् तात्कालिक धर्म (कर्म और कर्तव्यों) से मोहग्रसित होकर विमुख हो चुका है और अपने विहीत कर्तव्यों से विमुख होना ही पाप है। तब श्री कृष्ण कहते हैं कि तुम हमारी अर्थात् सत्य की शरण में आ जाओ अर्थात् तात्कालिक धर्म का पालन करो,यही पापों से मुक्ति का मार्ग है और अपने विहीत कर्म और कर्तव्यों का पालन करना ही सनातन सत्य है, मार्ग है, संस्कार और संस्कृति है।
सनातन और शाश्वत सिर्फ धर्म या नियम ही नहीं जीवन का उच्चतम आध्यात्मिक मार्ग है जो नैतिकता,
शूचिता, पवित्रता, वैश्विक प्रेम और बन्धुत्व,उच्च मानवीय मोल और मूल्यों से अनुप्रेरित और अनुप्राणित है और स्वामी विवेकानन्द जी और महान शिक्षाविद तथा दार्शनिक सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी ने भी ऐसे ही सन्दर्भित विचार दिए हैं जिसकी चर्चा राधाकृष्णन जी ने The basic and fundamental principles of Hinduism में की है
कि परम सत्य की अनवरत और निरन्तर खोज ही जीवन का श्रेष्ठ लक्ष्य है,मानव सेवा ही शिव सेवा है और इसी सत्य सनातन की खोज हिन्दू जीवन दर्शन है जिसे ई पू छठी शताब्दी में जैन और बौद्ध दर्शन में भी पाया जाता है जो इसी विशाल वटवृक्ष की शाखाएं हैं।
इसलिए जो अनादि है, अनन्त है, सार्वकालिक और सार्वभौमिक है,वही सनातन है,वही श्रेष्ठ है और हिन्दू जीवन दर्शन और चिन्तन का आधार यही खोज है।
इदं सत्य इदं मार्ग और‌ समस्त भारतीय दर्शन और चिन्तन ( जैन, बौद्ध,सिख, हिन्दू सहित) इसी सनातन मार्ग के अनुगामी हैं जिसका मूल,जिसका गोमुख और गंगोत्री हमारे वैदिक,वेदान्तिक और औपनिषदिक ज्ञान और षट्दर्शन हैं और इन्हीं से अनुप्रेरित और अनुप्राणित होकर तथागत सिद्धार्थ ने अपने मार्ग को भी सनातन मार्ग बताया है जिसकी सर्वप्रथम उद्घोषणा अथर्ववेद में की गयी थी,यथा,
अथर्ववेद के 10:08:23 में कहा गया है कि,
सनातन:मेनमाहुरताद्य स्यात् पुनर्गव
अहोरात्र प्रजायते अन्यो अन्यस्य रूपयों: 
अर्थात् सनातन वह है जो चिरन्तन चिर नवीन है,जो काल के बदलने पर भी नहीं बदलता, शाश्वत और सदैव नया रहता है। अहोरात्र ( दिन रात) के होने पर भी जो परिवर्तन होते हैं, उससे जो अप्रभावित रहे,वही सनातन है।
हिन्दू जीवन दर्शन और चिन्तन में कहीं आक्रामकता या बलात् प्रभावित करने की कोशिश नहीं की गयी है बल्कि वह समस्त संसार के कल्याण की बातें करता है और तभी तो ऋग्वेद कहता है( 9: 63:05)
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्
अर्थात् समस्त विश्व को सदाचारी बनाना है कि जीवन संतुलित, संयमित और मर्यादित रहे। 
पुनः अथर्ववेद समस्त संसार के आरोग्य की कामना करते हुए कहता है (04:13:06) 
भगवानयं भगवत्तर:
अयं मे विश्वभेषजोयं 
शिवाभिमर्शन:
अर्थात् मेरे हाथ भाग्यवान हैं,यह सब रोगों का निवारक है,यह सब मंगल लाने वाला है और ऐसी सदाशयता और सद्भावना आज भी हिन्दू समाज में व्याप्त है।
हिन्दू जीवन दर्शन और चिन्तन इसी सनातन मूल्यों की बात करते हुए समस्त मानव समाज में ज्ञान और चेतना का प्रचार प्रसार करना चाहता है जिसकी उद्घोषणा ऋग्वेद ( 03: 38:07)
करते हुए कहता है,
ज्योतिर्वर्णित तमसो
विज्ञानन्नारे 
स्याम दूरितादभिके।।
अर्थात् हम ज्ञान की ज्योति लेकर ही मनुष्य को अज्ञान र अविद्या के अंधकार से मुक्त कर सकते हैं और मनुष्य तभी दुष्कर्मों से बचकर भयरहित जीवन जी सकता है और मुक्त हो सकता है,
क्या ऐसे उच्च मानवीय मोल और मूल्य अन्यत्र दिखाई पड़ते हैं और अगर कहीं है तो इसी सनातन हिन्दू जीवन दर्शन में है। ठीक इसी प्रकार की मंगलकामनाएं बृहदारण्योकोपनिषद्
( शुक्ल यजुर्वेद) में की गयी है जो उच्चतम मानवीय मोल और मूल्य हैं,यथा,
ऊॅं असतो मा सद्गमय 
तमसो मा ज्योतिर्गमय 
मृत्योर्मा अमृतम् गमय 
अर्थात् 
हे परमात्मा! हमें असत् से सन्मार्ग की ओर ले चल,अज्ञान अविद्या के अंधकार से 
प्रकाश ( ज्ञान) की ओर ले चल और मृत्यु के भय से मुक्त करते हुए अमरत्व ( सार्थक और सिद्ध जीवन) की ओर ले चल।
ऐसे तो हमारे वैदिक और औपनिषदिक दर्शन में शाश्वत सनातन मोल एवं मूल्यों की ही विशद्‌
व्याख्याएं की गयी हैं परन्तु प्रमुख शब्द बड़े गुढ़ और प्रतीकात्मक हैं जिसे सरलता र सहजता से समझना कठिन कार्य है फिर भी आज उन पर चर्चाएं हो रही हैं और उनके ज्ञान को सहज बनाया जा रहा है।
ब्रह्म की चेतना को वैदिक साहित्य में* ब्रह्म सनातनो कहा गया है अर्थात् ब्रह्म सनातन और शाश्वत सत्य है और कालान्तर में इसकी विशद् व्याख्या औपनिषदिक दर्शनों में की गयी।
इसलिए सत्य सनातन सिर्फ धार्मिक व्याख्या भर नहीं जीवन का एक सुनियोजित सुनिश्चित मार्ग भी है जो वैश्विक है।
इति परम सत्य इति सनातन।
धर्म चर सत्यम् वद्,
सत्य का आचरण करते रहो और विहीत कर्म और कर्तव्यों का पालन करते रहो,यही मुक्ति मार्ग है कि यही सनातन और शाश्वत धर्म तथा कर्म है और यह भी विचारणीय है कि हजारों साल पहले भी हम प्राकृतिक पदार्थों यथा, समस्त जड़ चेतन की( पेड़,पौधे, पहाड़,नदी,सागर,पशु पक्षी,जीव जन्तुओं आदि) पूजा कल भी करते थे,आज भी करते हैं और इसका अभिप्राय यह नहीं कि हम अंधविश्वास और अंधश्रद्धा के शिकार हैं बल्कि वे समस्त मानव समाज के जीवित रहने के लिए उत्तरदाई हैं,वे सब हमारे जीवन के आधार हैं। इसलिए वन, पर्यावरण, जलवायु, पारिस्थितिकी तंत्र आदि की रक्षा की बातें हम आदिकाल से करते आ रहे हैं और हम एक साथ बहुदेववादी, कर्मकाण्डी होते हुए,द्वैत अद्वैत द्वैताद्वैत विशिष्टाद्वैत आदि को मानते हुए,सगुण भी हैं और निर्गुण भी हैं पर हमारी आत्मचेतना एकात्मवादी ही है और एक ही सत्य सनातन ब्रह्म की अवधारणा में विश्वास करते हैं और कहते हैं
एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।
यह सत्य सनातन और शाश्वत जीवन दर्शन के मोल और मूल्य हैं जो कहता है,
वसुधैव कुटुम्बकम् 

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John Milton ने अपनी दो विख्यात रचनाएं १० १० २५ 
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आज से लगभग चार सौ साल पहले अंग्रेजी साहित्य के महान कवि John Milton ने अपनी दो विख्यात रचनाएं लिखी,
The paradise Lost और The ParadiseRegained जिसमें पहली ही रचना में उसने कहा था,
It is better to reign in hell than to serve in heaven.
अब इसके सामान्य अर्थ को समझना तो सहज है कि स्वर्ग में चाकरी करने से बेहतर नर्क में शासन करना श्रेयस्कर है। अब इसकी गहराईयों में जाकर इसके भावों को समझने की कोशिश कीजिए कि आखिर कवि ने ऐसा क्यों कहा होगा।
यह प्रसंग ईश्वरीय सत्ता और उसके विधान तथा बुराईयों और अति महात्वाकांक्षाओं के भाव से उपजे नाकारात्मक शक्ति और ऊर्जा के बीच के द्वन्दों और संघर्षों को दर्शाता है। साथ ही निजी स्वाधीनता, स्वतंत्र अस्तित्व, महात्वाकांक्षा,पर नियंत्रण से मुक्ति, नेतृत्व क्षमता आदि को भी दर्शाता है। यह तो निर्विवादित रूप से मान्य है कि व्यक्ति श्रेष्ठ गुणों और क्षमताओं से युक्त एक प्राणी है जो अन्य प्राणियों की तुलना में श्रेष्ठ है परन्तु प्रकृति में सर्वश्रेष्ठ नहीं है, सर्वश्रेष्ठ तो एक ही सत्ता है और वह ईश्वरीय सत्ता है। परन्तु किसी व्यक्ति के भीतर जो कुशल संगठनात्मक शक्ति,कुशल नेतृत्व क्षमता,कुशल प्रबंधन और योजना निर्माण की शक्ति होती है,वह समय के लिए एक चुनौती बन जाता है।
ऐसी ही कुछ कहानी ईश्वर और उसके सर्वश्रेष्ठ देवदूत लूसीफर के बीच की है जिसकी पृष्ठभूमि में बाईबल और ब्रिटिश साम्राज्य के सम्राट और आम जन के बीच की भावनाओं का द्वन्द्वात्मक संघर्षो और अन्त में Just r the ways of God and justifiable to 
mankind की अवधारणा और दर्शन को औचित्यपूर्ण बताने की कोशिश की गयी है।
स्वयं मिल्टन एक लोकतांत्रिक गणराज्यवादी विचारधारा का पोषक है जो सम्राट की निरंकुशता और तानाशाही प्रवृत्ति के विरुद्ध सोचता और लिखता है।
वह स्वाधीनता की अनुभूतियों के साथ जीना चाहता है और यह भी चाहता है कि सबको समान रूप से 
स्वाधीनता के साथ जीने का अधिकार मिलना चाहिए। यही वजह है कि वह लूसीफर के माध्यम से ईश्वर ( सम्राट) को चुनौती देता है और उपरोक्त कथन को व्यक्त करता है।
चूंकि लूसिफर सर्वश्रेष्ठ देवदूत है तो उसका महत्वाकांक्षी होना सहज वृत्ति है पर अति महात्वाकांक्षी और दर्पवान होना सदैव संकट को आमंत्रित करता है और पतन के मार्ग को खोल देता है। यही भाव मिल्टन द पैराडाइज लौस्ट में दिखाना चाहता है जो अपने आप में अनेक भावों को समेटे चलता है।
स्वतंत्र अस्तित्व और स्वाधीनता के साथ अपनी छोटी सी दुनिया में स्वबोध और आत्मनिर्भर होकर रहना और अपने निर्णयों के साथ जीना जीवन का एक बड़ा महत्वपूर्ण और सबल पक्ष है परन्तु यह भी हमें ध्यान रखना चाहिए कि 
A man is born free but he is everywhere in chains.
हम मनुष्य बहुत सक्षम,योग्य, साधन-संपन्न, सामर्थ्यवान आदि हो सकते हैं परन्तु उस अस्तित्व के रक्षार्थ हम हर जगह बंधनों में हैं और वो बंधन परोक्ष‌ और प्रत्यक्ष दोनों होते हैं।
कोई व्यक्ति* मुखिया, विधायक, सांसद, राज्यपाल,मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति या न्यायाधीश या मुख्य न्यायाधीश हो सकता है परन्तु एक लोकतांत्रिक गणराज्यवादी व्यवस्था में सदैव‌ सक्षम और सर्वमान्य तथा सामर्थ्यवान नहीं हो सकता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंतिम शक्ति जनमत के हाथों में होती है। एक निश्चित अवधि के बाद आपकी अवस्था एक आम आदमी की तरह‌ हो जाती है।
इसी यथार्थ को मिल्टन दिखाना चाहता है कि अंतिम सत्ता ईश्वर और जनमत ( नर ही नारायण है) के हाथों में होती है।
हां, हमें निजता के साथ स्वतंत्र और स्वाधीन और महात्वाकांक्षी होना चाहिए पर अति से बचना चाहिए।

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अतीत सुधारा नहीं जा सकता ११ १० २५ 
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अतीत सुधारा नहीं जा सकता है परन्तु उसे आईना बनाकर सीख ली जा सकती है कि अतीत की गलतियों की पुनरावृत्ति से बचा जाए और अच्छे कर्मों को दुहराया जाए और उन्हें फिर से वर्तमान में जीने की कोशिश की जाए और यही प्रवृत्ति हमें हमारे भविष्य की रचनाएं करती रहती है।
करिश्मा ये है कि हम आमतौर पर अच्छी चीजें भूल जाते हैं और बुरी चीजें याद रहती हैं जबकि हमारा चित्त तो एक संग्रहालय है जहां सबकुछ संग्रहित रहता है और वही वर्तमान में हमारी क्रियाशीलताओं के आधार बनते हैं और हम समझते हैं कि आखिर ये सब कैसे हो रहा है। 
अतीत बस सीखने के लिए है, उस पर न तो पश्चाताप करने से कोई लाभ नहीं उल्टे हानि होती है कि हम अवसादग्रस्त होने लगते हैं और उससे हमारा वर्तमान भी प्रभावित होता है और वर्तमान सदैव भविष्य को प्रभावित करता है।
वास्तव में अतीत, वर्तमान और भविष्य एक दूसरे से इस कदर गहराईयों में जुड़े रहते हैं कि वर्तमान में हम जो कुछ भी करते हैं,वे अतीत की स्मृतियों से स्वत: स्फूर्त जुड़ जाते हैं जो एक मनोवैज्ञानिक और जैव रासायनिक प्रतिक्रियाओं का प्रतिफल है इसलिए वह वर्तमान जो बिल्कुल सम्मुख है,वही सत्य है और दो में से एक भूत है,मृत है और एक भ्रम है, कल्पना है और अंधकार के गर्भ में है।
पर ध्यान रहे कि जो अतीत और वर्तमान का सही समन्वय और संतुलन बनाकर चलना सीख लेते हैं,वे अनिश्चित भविष्य की कुछ निश्चित कल्पनाएं तो कर ही सकते हैं।
हम स्वयं ही अपनी पहचान होते हैं जिसके पीछे भी हम ही होते हैं और आगे भी हम ही होते हैं और जो पीछे है हमारा अतीत है और जो वर्तमान है वह अतीत की परछाई है और भविष्य दोनों के समन्वय और संतुलन का परिणाम है।
हां,कुछ घटनाएं हमारे जीवन में आकस्मिक भी होती हैं जिनका अतीत से कोई जुड़ाव प्रत्यक्ष तो नहीं होता है परन्तु कहीं न कहीं जरूर होता है और इसका अनुभव तब होता है जब हम गहराईयों में जाकर स्वयं का आकलन और विश्लेषण करते हैं।
यश अपयश,
दुःख सुख, सफलता विफलता, उत्थान पतन आदि की क्रियाशीलताएं भी कुछ ऐसी ही होती हैं जो हमारे जीवन में या तो बिल्कुल स्पष्ट या रहस्यमय होता है पर सबकुछ जो होना है होते रहता है,चलते रहते है और फिर काल अपने तरीके से उसे नियमित और नियंत्रित भी करता है।
तब हमें सिर्फ वर्तमान में जीना है और जीने की महत्तम कोशिश करनी है कि अतीत अचानक से जीवित भी होता रहता है जो दुखद और सुखद दोनों ही हो सकता है और यह पुनर्जीवित होना हमारे वश में नहीं होता है। आप बाइक से कहीं जा रहे हों,ब्रेक, ईंधन, ट्यूब में हवा आदि सब सही हों पर रास्ते में अचानक ट्यूब का पंक्चर हो जाना,ब्रेक फेल हो जाना जैसी दुर्घटनाओं का हो जाना अचानक से दुःख सुख के आने जैसा है जिनके जवाब हमारे या विज्ञान के पास नहीं होते हैं तो हम यह कहकर स्वयं को समझाते हैं कि क्या करना है,ऐसा होना था, इन्हें ही समझना जीवन को समझना है कि सबकुछ निश्चित है पर अनिश्चित है कि कब कहां और कैसे क्या हो सकता है।
इसलिए वर्तमान को जीना ही जीवन का सत्य है, अतीत मृत है, भविष्य अनिश्चित है, जीवन निश्चितताओं और अनिश्चितताओं का एक सुनियोजित चक्र है इसलिए अच्छा और नेक करते रहिए, विचारों को परिष्कृत और परिमार्जित करते रहिए कि विचार और कर्म तो हमारे वश में जरूर रहते हैं।
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हम और हमारे संकट १२ १० २५ 
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हम किस आधार पर स्वयं को * सभ्य और सुसंस्कृत कहें जबकि हमारी बच्चियां और महिलाएं न घरों में सुरक्षित है न बाहर और समाज सरकार मौन है,
अभी दो तीन दिनों पूर्व ओडिशा की एक मेडिकल छात्रा जो दुर्गापुर में पढ़ रही है,के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया जो बंगाल की संस्कृति बन गयी है और ऐसी दरिंदगी का शिकार झारखण्ड की बच्चियां भी हो रही है और हम तथाकथित सभ्य और मध्यलोक के लोग **
आओ खेलें खेल कर रहे हैं।
एक निर्भया कांड ने पुरे देश को उद्वेलित कर दिया पर क्या बंगाल, झारखण्ड और बिहार की निरीह बच्चियों का कोई मोल 
और मूल्य नहीं है।
यह देश की गिरती कानून व्यवस्था की पतनोन्मुख होने का प्रमाण है और हम इसके लिए जिम्मेदार हैं।
हम ऐसे अधोपतन के लिए थोपा थोपी का खेल खेलते हैं परन्तु कभी गंभीरता से इस पर विचार नहीं करते हैं कि सूरसा मुख की तरह फैलते इस अन्याय और अत्याचार के दमन‌ और निर्मूलन के लिए हम और सरकारें क्या कर रहे हैं,एक तरफ हम ** राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस, महिला दिवस,
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसे आयोजनों का उत्सव मनाते हैं वहीं बेटियां रोज पाशविक कृत्यों का शिकार हो रही हैं।
उल्लेखनीय है कि यह‌ सिर्फ गिरती हुई कानून व्यवस्था का ही परिचायक नहीं है बल्कि सामाजिक मोल और मूल्यों के पतनोन्मुख होने के भी प्रमाण हैं।
इसे सामाजिक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी देखने और समझने की जरूरत है कि हम आज इतना असुरक्षित महसूस क्यों कर रहे हैं, अरबों खरबों का बजट आन्तरिक सुरक्षा पर खर्च किए जाने के बावजूद मीडिया लूट, हत्या, डकैती, अपहरण, बलात्कार आदि की खबरों से भरी रहती है मानो हम अखबार नहीं अपराध खबरें पढ़ रहे हैं, दूरदर्शन नहीं अपराध दर्शन कर रहे हैं,इनके मूल में जाकर झांकने की जरूरत है।
ईलाज बुखार की हो रही है पर बुखार है कि उतरता ही नहीं है,असल में मलेरिया और ईलाज में ऐन्टीबायोटिक्स दिए जा रहे हैं,कुनैन नहीं तो मरीज को मरने से कौन बचाएगा।
संकट का स्वरूप बहुआयामी है और हम एक संकट की बात कर रहे हैं। प्राकृतिक आपदाएं भी एक संकट है जिनमें भूकंप, ज्वालामुखी,सुनामी, भूस्खलन आदि की घोषणाएं नहीं की जा सकती हैं कि इनका होना और जानना अभी भी विज्ञान की सीमाओं से परे है,वैसे ही कुछ संकट बाहरी और भीतरी होते हैं जो वायरस की तरह होते हैं जिन्हें नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता पर वे अपने अस्तित्व में बने रहते हैं जिनकी पहचान का संकट है।
वायरस को तो इलेक्ट्रॉनिक संयंत्रों से, उपकरणों से देखा जा सकता है पर कुछ संकट ऐसे होते हैं जिनकी अनुभूतियां होती हैं,वे स्थूल नहीं होतीं पर होती हैं।
यह संकट सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक,
शैक्षणिक,नियोजन, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक होती है जो अति सूक्ष्म तरीके से हमें प्रभावित करती रहती हैं और हम इसकी छद्मवेशी स्वरूप और मंथर गति के कारण पहचान नहीं पाते हैं और पहचान तब पाते हैं जब ये हमारे घरों में घर कर पसर कर फैल चुके होते हैं। जैसे कैंसर यदि पहले चरण में पहचान में आ जाता है तो उसका ईलाज संभव हो सकता है परन्तु वह अंतिम स्तर पर आ जाए तो सारी कोशिकाएं सड़ जाती हैं और मृत्यु के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं रह जाता हैं।
इन सभी संकटों के साथ साथ हम अपनी पहचान की संकट से भी जूझ रहे हैं। हम अपनी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान धीरे-धीरे भूलते जा रहे हैं और अपने मूल से कटते जा रहे हैं और इसके ठीक विपरीत वैश्विक स्तर पर लोग अपनी अपनी पहचान और अस्तित्व को बनाए रखने का काम कर रहे हैं।
चीन जैसे राज्य में* डे टौंग ( अतीत की ओर लौटो) जैसे कार्यक्रम चल रहे हैं,लोग फिर से ताओ, कन्फ्यूशियस और बौद्ध दर्शन का पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं और उनमें चीनी सभ्यता और संस्कृति की मौलिकता की खोज कर रहे हैं। मौरिशस,फीजी आदि देशों के लोग भारत में अपने मूल की खोज कर रहे हैं और हम अपने मूल से कटते जा रहे हैं और मूल से कटकर कोई समाज अपने अस्तित्व में नहीं रह सकता है।
लाखों नौजवान डिग्रीयां लेकर भारत की सड़कों पर घुम रहे हैं, रोजगार नहीं है तो फिर नये नये स्कूल, कालेज, महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों के क्या औचित्य हैं,जो सिर्फ कागजी डिग्रीयां दे रहे हों, प्रतियोगिता परीक्षाओं का कोई मापदंड नहीं रह गये हैं, राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएं प्राइवेट एजेंसियां आयोजित कर रही हैं,एस एस सी,सी जी एल आदि परीक्षाओं से छात्रों का भरोसा उठता जा रहा है, झारखण्ड में तो स्वयं वे संस्थान ही शक के घेरे में है जो नौकरी के लिए परीक्षाओं का आयोजन करते हैं,सारे मामले कोर्ट में हैं तो समाज इस संकट से कैसे उबरे और सरकार पर भरोसा कैसे करे जहां** चयन भी सेलेक्टिव हो,कैसे समरसी और समावेशी समाज बने,यह भी अस्तित्व का एक संकट है जो समाज में कुंठा और निराशा पैदा करता है और इसकी परिणति सामाजिक आक्रोश और उद्वेलन में होती है।
सब जगह संकट है पर स्वरूप अलग-अलग है। परिवार और समाज के अपने संकट हैं। हम संवादहीनता और
संवेदनशीलता के शिकार होते जा रहे हैं जो नये संकटों को जन्म दे रहे हैं।
हम निज स्वार्थों और हितों में दूसरों के हित और हिसाबों को भूलते जा रहे हैं कि छोटे छोटे असंतोष बड़े असंतोष को जन्म देते हैं और बड़े असंतोष विद्रोह या विप्लव को जन्म देते हैं।
भारतीय समाज जाति, वर्ग, सम्प्रदाय आदि के चक्रव्यूह में ऐसा फंसता जा रहा है या फंस गया हैं और एक ऐसी सुरंग में जा रहा है जिसमें घुसने का रास्ता तो है पर निकलने का कोई रास्ता नहीं है,तो विकल्प की संभावनाओं पर विचार करना होगा।
सामाजिक और आर्थिक संकट ,सभी संकटों के मूल में है और इसे समझना सबसे महत्वपूर्ण है और तभी आने वाला कल संभावित संकटों से बच सकता है।
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जीवन क्षणभंगुर हैं, १३ १० २५ 
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माना के जीवन क्षणभंगुर हैं,
कब, कहां और कैसे क्या हो जाता है, कोई नहीं जानता और न कोई विज्ञान बता सकता है। ये सब मानवीय क्षमताओं के परे का विषय है, कोई इस पर किसी प्रकार की संभावनाओं का आकलन तो कर सकता है पर उसकी कोई गारंटी नहीं दी जा सकती है,बस संसार ऐसे ही चलता रहता है।
यह जीवन परिभाषित और अपरिभाषित दोनों है,एक का सच दूसरे का झूठ है और एक का झूठ दूसरे का सच है।
जब हम इतिहास का अवलोकन करते हैं तो ऐसा ही दिखाई पड़ता है, यहां तक कि हम  जब अपने अतीत का भी अवलोकन करते हैं तो एक साम्य सा दिखाई पड़ता है जो बड़ा सहज और सरल भी है कि इतिहास भी हम सबका ही सामूच्चय है।
एकबार तथागत सिद्धार्थ के एक शिष्य ने उनसे भिक्षाटन के दौरान पुछा,
हे भन्ते, हे प्रज्ज्वलित ज्ञान के पूंज,
जीवन जब इतना दुःखों और संघर्षों से भरा हुआ है फिर मनुष्य संसार में जीने की कामना क्यों करता है, क्यों घर गृहस्थी की बातें करता है?
तथागत ने उसी सधे लहजे में कहा,
हे मेरे प्रिय श्रमण,
गृहस्थ जीवन और श्रमण जीवन में बड़ा साम्य है,दुःख और संघर्ष दोनों जगह है और दोनों का अस्तित्व में रहने से ही इस संसार का निर्माण होता है। हम श्रमण उन्हें यह बताने के लिए गृहस्थ जीवन का त्याग करते हैं कि इससे उन्हें निरासक्ति भाव का बोध हो और सांसारिक सुख भोग उन्हें बांधकर भी न बांध सके,वे इच्छाओं, कामनाओं, वासनाओं और तृष्णाओं के वशिभूत न रह सकें और जो गृहस्थ इसकी अनुभूति कर लेते हैं,वे गृहस्थ जीवन में भी श्रमण या संन्यास की अनुभूति कर सकते हैं। उन्हें सांसारिक सुख भोग को भोगते हुए भी तृण नोक पर पड़े ओस की बुन्दों की तरह सुखों की अनुभूति होने लगती है जो सूर्य किरणों के पड़ते ही तिरोहित हो जाते हैं,इसी बोध का नाम क्षणवाद है। तुम्हें भूख प्यास लगती है,भोजन करने के उपरान्त पानी पीते हो और क्षूधा तृप्ति होते ही उनकी उपयोगिता तत्काल समाप्त हो जाती है और फिर उनकी आवश्यकता उत्पन्न होती है। यही तो जीवन है,यही संसार है जिसे समझ लेना ही जीवन के सार और निस्सार को समझ लेना है। जो सदैव हमारे साथ है,जन्म से लेकर मृत्यु तक जिसकी शाश्वत अनुभूति साथ साथ चलती है,वही सत्य है और उसी परम सत्य को जान लेना अर्हत हो जाना है, बुद्ध हो जाना है। जो क्षण क्षण बने और मिटे,वह सत्य होते हुए भी, शाश्वत होते हुए भी शाश्वत नहीं है कि भूख प्यास और अन्य भौतिक सुख सुविधाएं कारण समुदय से जुड़ी हैं,कारण जुड़े तो सृजित हुए और कारण हटे तो नष्ट हो गये और जो नाशवान है, शाश्वत कैसे हो सकता है।
बस इसी तरह हम सबको इस संसार के सार और निस्सार को समझना है,सुख भोग करना है पर आसक्ति भाव से नहीं कि या तो हम भोगने लायक नहीं रह जाएंगे या वो भोग नहीं मिलेंगे और दोनों अवस्थाएं ही पीड़ादायक हैं।
इसलिए हमारे भारतीय जीवन दर्शन में जीवन को भोगने को दो ही मार्ग हैं, आसक्ति भाव और निरासक्ति भाव जिनमें निरासक्ति भाव ही श्रेयस्कर है कि इस मार्ग में सुख दुःख के आने जाने पर हम पीड़ित नहीं हो सकेंगे।
दुःख है,कल नहीं रहेगा,सुख है कल नहीं रहेगा,जो आज है कल नहीं रहेगा और जो कल था आज नहीं रहेगा। दोनों में मात्रात्मक और गुणात्मक परिवर्तन होते रहते हैं और यही जीवन है,यही संसार है।
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धर्म कर्म और परिवर्तन : १५ १० २५ 
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बदलना या बदलाव क्यों जरूरी है कि बदलाव प्रकृति का शाश्वत नियम और विधान है।
हम आप यदि बदलते समय र परिवेश में स्वयं को नहीं बदलेंगे तो समय हमें बदल देगा।
ब्रह्माण्डीय क्रियाशीलताएं भी ऋत के अनुरूप बदलती रहती हैं जिससे जीवन चक्र चलता रहता है पर उस बदलाव में भी जो मौलिकता है,जो गुणधर्म हैं, नहीं बदलते हैं और यह भी शाश्वतता में सम्मिलित हैं।
इसी तरह हम सबको बदलते समय और परिवेश में समयानुकूल परिवर्तन करते रहना चाहिए। पर ध्यान रहे कि यह परिवर्तन ऐसा हो कि हमारी मौलिकता न बदले। 
समय की मांग के अनुरूप हमें हमारे व्यवहार,आचरण,
वाणी,लेखनी,सोंच विचार आदि में बदलाव करते रहना चाहिए और अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो संसार चक्र में स्वयं को समायोजित नहीं कर पाएंगे और जीवन के इन भाग-दौड़ और 
संघर्षों में बहुत पीछे रह जाएंगे और जीवन निरर्थक हो जाएगा।
बदलाव हो पर हमारी 
सद्भावनाएं,शुभेच्छाएं,
परमार्थिक चेतना और समेकित रूप में शिवत्व बोध ( सर्वकल्याण की भावना) नहीं बदलनी चाहिए।
इसीलिए हमारे वैदिक साहित्यों में कहा भी गया है कि,
सत्यम् वद धर्मं चर, अर्थात् वाणी सत्य हो और आचरण में धर्म हो। अब यहां यह समझना बहुत जरूरी है कि सत्य बोलने का अभिप्राय सिर्फ सत्य ही बोलना नहीं है बल्कि सत्य जो है उसके पक्ष में रहना है चूंकि सत्य ही धर्म है और धर्म ही न्याय है।
धर्म तो ऐसे देखने में एक छोटा सा शब्द लगता है परन्तु इसके अर्थ और महत्व बड़े वर्णपट के विषय हैं। धर्म को आमतौर पर लोग ** रेलीजन के रूप में लेते हैं परन्तु भारतीय आध्यात्मिक दर्शन और चिन्तन के क्षेत्र में इसकी व्याख्या अनन्त है।
वैदिक और औपनिषदिक दर्शनों में यह कोई मत,पंथ, विचार या विश्वास आदि नहीं है बल्कि जीवन को व्यवस्थित और आन्तरिक अनुशासन के साथ जीने का मार्ग है। सबके कर्म और कर्तव्य उनके जीवन मार्ग और पेशे के अनुसार अलग अलग हैं और यही विहीत कर्म ही धर्म है, मार्ग है। कहा भी गया है,
यो धर्मच्युतं न जीवति
अर्थात् जो अपने धर्म से च्युत हो जाते हैं वे जीवित होते हुए भी जीवित नहीं होते। एक चिकित्सक का मूल धर्म रोगियों की चिकित्सा और सेवा करना है और अगर वह इसे सिर्फ पेशा या जीविकोपार्जन का साधन बना ले तो वह धर्मच्युत होकर पथच्युत हो जाता है। वैसे ही एक सिपाही का धर्म सीमा और देश के भीतर लोगों की सुरक्षा करना है और अगर सिर्फ वह वेतनभोगी कर्मी की तरह काम करता है तो वह धर्मच्युत होकर पथच्युत हो जाता है।
यही धर्म और कर्म का पारस्परिक सम्बन्ध है,यही धर्म का मर्म है जिसे समझना भी हमारा धर्म है।
धर्म की गति ही श्रेष्ठ गति होती है और इसलिए हमारे यहां यह कहा गया है कि सत्यं वद् धर्मं चर,यह दर्शन नहीं सीधे व्यवहारिक मार्ग है।
पुनः कहा गया है,
धर्मो रक्षति रक्षित:, अर्थात् जो धर्म की रक्षा करते हैं, धर्म उनकी रक्षा करता है।
बड़ा गुरू गंभीर विषय है,कौन से धर्म की रक्षा करें,वह जो हमारा मत,पंथ, विश्वास, विचार आदि है या कुछ और है। यह विचार विश्वास आदि तो इस दर्शन का एक लघु अंश है पर विराट अंश तो कुछ और है।
फिर हम लौटकर उसी बिन्दु पर आते हैं जहां से चले थे कि जिनका जो विहीत कर्म और कर्तव्य है,उनका निष्ठापूर्वक और समर्पित भाव से, निष्काम भाव से निष्पादन करना ही धर्म है और यही धर्म उनकी रक्षा करता है।
एक विद्यार्थी का धर्म क्या है, निष्ठापूर्वक, एकाग्रचित्त होकर पढ़ना और परीक्षाओं की तैयारी करना और इसमें जो इसका पालन करते हैं अपने लक्ष्यों तक निश्चित रूप से पहुंच जाते हैं, अर्थात् उनके धर्म ने,उनके विहीत कर्म संलग्नता ने उनकी रक्षा की है। इस सूत्र को भी समझना जरूरी है।
हमारे औपनिषदिक दर्शन और गीता का भी यही संदेश है कि कर्मजनित गुणधर्म ही किसी को श्रेष्ठ बनाने का काम करता है। न जाति से,न वर्ग से,न मत पंथ से और ना ही 
महज कर्मकाण्ड से बल्कि विहीत कर्मों के निष्ठापूर्वक निष्पादन करने से ही श्रेष्ठता की प्राप्ति होती है। एक श्रेष्ठ व्यक्तित्व के निर्माण का भी यही एकमात्र कारण और कारक है।
हर माता-पिता और अभिभावक को इस व्यवहारिक दर्शन को अपने पारिवारिक जीवन में समावेशित करने की जरूरत है और इसी से एक श्रेष्ठ और आदर्श व्यक्ति और नागरिक का निर्माण होता है जो परिवार, समाज और राष्ट्र के विधि विधानों का सम्मान करता है।
हम आजकल हर बुरे प्रभाव और परिणाम के लिए एक दूसरे को आरोपित करते हैं जिसके मूल में इसी धर्म कर्म के मूल भाव की चेतना का अभाव है। परिवेश और समाज तथा राष्ट्र के गिरते मोल और मूल्यों के पीछे इसी का अभाव है और हम यत्र तत्र भटक रहे हैं कि सुधार कैसे हो। बुखार मलेरिया का है और हम ईलाज टायफाइड का कर रहे हैं, बुखार के मूल को समझना और समझाना होगा तभी निदान निकल सकता है नहीं तो * विधवा विलाप करते रहने के लिए विवश रहना होगा।
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हम: हमारी सभ्यता और हमारा जीवन १६ १० २५ 
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हमनें सभ्य सभ्यता और संस्कृति शब्द तो गढ़ लिए परन्तु इसे व्यवहार की कसौटी पर उतारना अभी भी दूर की कौड़ी है।
सभ्य और सुसंस्कृत समाज मानव समाज की एक अद्भुत खोज, कल्पना या अवधारणा रही है जिसपर सदियों से समाजशास्त्र, नैतिक शास्त्र, सामाजिक मनोविज्ञान, अपराध मनोविज्ञान,विधि विशेषज्ञ, दार्शनिक,चिन्तक आदि अभी तक शोध कर रहे हैं, मानवीय व्यवहार, आचरण, प्रकृति, बदलती मानसिक अवस्था आदि का अध्ययन कर रहे हैं,उन पर प्रयोग कर रहे हैं और बावजूद तमाम कोशिशों के हम आजतक स्वयं को सभ्य, परिष्कृत, परिमार्जित और सुसंस्कृत नहीं कह सकते हैं जिस पर सभी प्रबुद्ध और चैतन्य वर्ग को गंभीरतापूर्वक विचार 
करने की जरूरत है।
युगों पहले हम सिर्फ अविकसित,असभ्य,
बर्बर,पशुवत जीवन जीने वाले आदमी भर थे। हमारे और पशुओं के बीच कोई बड़ा फर्क नहीं था। उनकी तरह हमें भी भोजन, पानी,आवास,सहवास
सुरक्षा आदि की जरूरतें थीं जो आज भी है बस उसकी आधारभूत संरचनाएं और उनके आयाम बदल गये हैं।
प्रकृति ने जिस रूप में मनुष्यों को छोड़कर अन्य प्राणियों की रचना की थी,वे लगभग आज भी ( शारीरिक भिन्नताओं को छोड़कर) आज भी अपनी प्रकृति और प्रवृत्तियों में वैसे ही हैं कि उनके पास हम मनुष्यों की तरह स्वबोध, स्वचैतन्य वृत्ति और विवेक नहीं है और इनकी उपलब्ध ता हमें उनसे श्रेष्ठ बनाने का काम करती है। इन्हीं गुणों या क्षमताओं के कारण हम मनुष्यों के भीतर जिज्ञासा नाम की चेतना पैदा हुयी और हमलोगों ने जीवन को बेहतर से बेहतरीन बनाने की कोशिशें की और कर भी रहे हैं। आग से डरने वाला आदमी, बिजली की चमक से घबराने वाला आदमी या अन्य प्राकृतिक सत्ता के तत्त्वों से भयाक्रांत होने वाला आदमी,सबको नियंत्रित करता हुआ एक ऐसी दुनिया में जी रहा है जिसकी उसने उस कालखंड में कल्पना भी न की होगी।
मनुष्यों ने जीने के मार्ग विकसित किए तो जीवन बहुआयामी होता चला गया। हमनें अनेक मत,पंथ, विचार, विश्वास आदि को जन्म दिए। ईश्वर को जानने समझने के लिए अनेक अवधारणाएं भी विकसित की। इस अवधारणा के विकास के क्रम में** नास्तिक, आस्तिक और अज्ञेय
( Theist,Atheist and Agnostic) अवधारणाएं भी विकसित की। कालान्तर में जीवन को और परिष्कृत और परिमार्जित करने के लिए अनेकानेक दर्शन, चिन्तन, राजनीतिक सिद्धान्त,
नीतिशास्त्र आदि जैसे 
शास्त्रों को विकसित किया। विज्ञान को अनेक विभागों में विभक्त करते हुए उसे विभिन्न विषयक बनाने का काम किया।
ग्रहों उपग्रहों और अन्य ब्रह्माण्डीय रहस्यों को खोजने का काम शुरू किया। नयी नयी भाषाओं और शिल्प तथा कलाओं की भी खोज की गयी। विशाल विशाल भवन, मंदिर,गिरजा,
गुरुद्वारा, मस्जिद, अग्नि मंदिर,सिनागोग
आदि बनाकर हमने अपनी श्रेष्ठता साबित की और बताया कि प्रकृति ने श्रेष्ठ प्राणी के रूप में मनुष्यों का चयन करके गलत नहीं किया। परन्तु आज की वैश्विक सभ्यता और संस्कृति को देखकर लगता है कि हमारी सहजता, सरलता और प्रकृति के साथ समन्वय और सामंजस्य कल ही ठीक था और हम वास्तव में आदमी की तरह जी रहे थे और आज हम सभ्य और सुसंस्कृत होकर भी पहले से ज्यादा क्रुर,
हिंसक,असभ्य,बर्बर और पाशविक वृत्तियों वाले हो गये हैं।
पारस्परिक सत्ता और शक्ति की होड़ ने हमें आदमी नहीं रहने दिया। चाहे हिन्दू हों या इस्लाम, यहूदी हों या इसाई,सिख हों या वहाबी,सभी मत पंथों और विचारधाराओं अपने अपने तरीके से जीवन मार्ग दिए। समानता,समता, बंधुत्व,सत्य, न्याय और मानवता का संदेश दिया पर विकृत सत्ता और शक्ति के खेल ने सारी विकृतियों को पैदा किया और हम मनुष्य इसके शिकार होते चले गए। हम भूल गए कि हमारे पूर्वजों ने एक वैश्विक समाज और संस्कृति को जन्म दिया था। अनेकानेक सभ्यताएं और संस्कृतियां जन्म ली, विकसित हुई पर उनमें कहीं संघर्ष नहीं था। सैंधव, चीन,मिस्र,असीरीया,
सीरिया, ग्रीको रोमन,माया,इन्का,आयोनियन,बेबिलोन आदि की सभ्यताओं का हमने सृजन और विकास किया, पारस्परिक व्यापारिक और मैत्री सम्बन्ध बनाए और कभी संघर्ष नहीं हुए परन्तु हमारी विकसित जीवन प्रणाली ने ही हमें ईर्ष्या, द्वेष,हिंसा,
बुरी प्रतिस्पर्धा, श्रेष्ठता की होड़ आदि का शिकार बना दिया और हम अपने स्वर्णिम अतीत को भूलकर वैमनस्यता और पारस्परिक शत्रुता के शिकार हो गए। 
आज की वैश्विक परिदृश्य और परिस्थितियों को देखकर तो ऐसा लगता है कि हमनें सबकुछ सीखा और जाना पर जीवन और इसकी मर्यादा और गरिमा भूल गए। किसी की विपदा और विपत्ति हमारे सुख की संपत्ति बन गयी। हम संवेदनहीन और संवादहीन हो गये। अखबार और मीडिया 
मानों अपराध मीडिया बन गये। हत्या,लूट, बलात्कार, अपहरण, हकमारी आदि मानों 
हमारे संस्कार और आचरण बन गये और हम मूक,बधिर और अंधे होकर उन्हें देखते रहने के लिए विवश‌ हो गये हैं और यही हम मनुष्यों की नियति बन गई है। इस सन्दर्भ 
में विलियम वर्ड्सवर्थ ने कभी ठीक ही कहा था कि,
As long as we were in the laps of nature and natural laws,we were happy and satisfied with our lives but the distance and detachment from them,we continued to be unhappy and full of miseries.
सत्य ही कहा था उसने हम जब तक प्रकृति की नियमों के साथ थे,सुखी और संतुष्ट थे,उनसे दूरियों ने हमें दुखी और पीड़ित बना दिया और शायद इसलिए हमारे बड़ों ने कभी कहा था कि,
वसुधैव कुटूम्बकम् और मनुर्भव अर्थात् यह समस्त धरती हमारा परिवार है,कुटूम्ब है और हमें सदैव मनुष्य बनने की कोशिश करनी चाहिए और आज हमारे इन भारतीय दर्शन और चिन्तन को हमारे ही देश के साथ साथ समस्त विश्व को इसे समझने और आत्मसात करने की जरूरत है और तभी हम आदमी होने की सार्थकता सिद्ध कर सकते हैं अन्यथा हममें और पशुओं ये कोई खास अन्तर नहीं रह जाता है।
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सृष्टि, दृष्टि, जीवन और हम। १७ १० २५ 
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सृष्टि और दृष्टि दोनों स्वाभाविक रूप से बदलती रहती हैं परन्तु एक मौलिक अन्तर के साथ कि सृष्टि के नियम एक निश्चित नियम और विधान के तहत बदलते हैं परन्तु दृष्टि भीतर के बदलते भावों के अनुरूप बदलती है।
आन्तरिक बदलाव जैसे होंगे, दृष्टि भी वैसी ही होगी इसलिए दोनों के बदलाव के धरातल अलग-अलग हैं। 
सृष्टि के नियम शाश्वत और सनातन हैं पर दृष्टि तात्कालिक, वैचारिक और परिस्थितिजन्य कारकों और कारणों के अनुरूप बदलती हैं।
हमारे स्वाध्याय,मनन,
चिन्तन, तर्क वितर्क, बौद्धिकता, अनुभवजनित ज्ञान, विश्लेषण, साहचर्य आदि की परिणति हमारी दृष्टि और दृष्टिकोण का सृजन करती है और जैसी हमारी दृष्टि होगी वैसी ही सृष्टि अर्थात् संसार भी नजर में आएगा। इसलिए हमें हमारी क्रियाशीलताओं पर एक गहरी नजर रखने की जरूरत होती है। हमें स्वयं का अवलोकन करते रहने की जरूरत होती है जिसे हम आत्मावलोकन कहते हैं और आत्मावलोकन से ही आत्मनिरीक्षण या आत्मपर्यवेक्षण की चेतना विकसित होती रहती है जिसे सामाजिक मनोविश्लेषणात्मक विज्ञान भी स्वीकार करता है परन्तु आध्यात्मिक विज्ञान के क्षेत्र में इसकी बड़ी महत्ता है।
आत्मावलोकन और आत्मनिरीक्षण ही दो ऐसे उपादान हैं जो किसी को श्रेष्ठ से श्रेष्ठ बनाने का काम करते हैं।
आत्मावलोकन से हम स्वयं के उपर अपनी बाजदृष्टि रखते हैं और हर गतिविधि पर हमारी नजरें रहती हैं और इसी क्रिया की प्रतिक्रिया आत्मनिरीक्षण को जन्म देती है और हम इनके आधार पर अपनी आत्मदृष्टि में अनवरत सुधार करते हुए बाहर से ही नहीं भीतर से भी स्वयं को परिष्कृत और परिमार्जित करते रहते हैं और इस संस्कार के व्यक्ति आलोचना और निन्दा से न विचलित होकर आत्मसुधार करते रहते हैं।
आत्मसुधार के लिए आत्मावलोकन और आत्मनिरीक्षण से श्रेष्ठ कोई भी साधन नहीं होता कि ये दोनों स्वयं साधना र ध्यान का काम करते रहते हैं।
संन्यास और गृहस्थ जीवन की मौलिकता में जो अन्तर है वह इन्हीं से स्पष्ट होता है। संन्यासी को भी सतत् 
आत्मावलोकन और आत्मनिरीक्षण की जरूरत होती है परन्तु उसका दृष्टिकोण अब अलग होता है कि अब उसे सांसारिकता से कोई लेना-देना नहीं होता परन्तु एक गृहस्थ को उससे भी बड़ी उत्तरदायित्वौं को समझना और लेकर चलना पड़ता है। उसे स्वयं में सदेह होकर भी विदेह होना पड़ता है। वह आसक्तियों और निरासक्तियों के बीच एक समन्वय और संतुलन बनाए रखकर चलना पड़ता है जो एक अति दुष्कर कार्य है और यही असली तपश्चर्या और साधना है,यही असली योग मार्ग है कि संसार में रहकर भी नहीं रहते हुए अनवरत स्वयं की खोज करते हुए** अहं से सोहं की यात्रा पर चलते रहना है।
मोह है,माया भी है,योग भी है वैराग भी है, स्वार्थ भी है परमार्थ भी है, स्वबोध भी है परबोध भी है और चलते भी रहना है,यही भावातीत योग भी है। भव में रहकर भी भव अर्थात् संसार से निरासक्त रहना है,उसे अतीत कर देना है और इस मार्ग को समझ लेना ही जीवन की सार्थकता है।
हम में से कितने संन्यासी हो सकते हैं, वानप्रस्थी हो सकते हैं,दो चार बमुश्किल से हो सकते हैं परन्तु जिस मार्ग या जीवन शैली की बात हम कर रहे हैं,सबके लिए ग्राह्य और सहज है जिससे जीवित रहते हुए भी मुक्त रहा रहा जा सकता है।
हमारे औपनिषदिक दर्शन और श्रमण दर्शन का भी यही सत्य है,जीवन है,सुख है,सुख है तो दुःख भी अवश्य होगा तो दुखमय होने से बचने का एक ही मार्ग है,जो है उसके भोग में आसक्ति न हो कि यही आसक्ति असल में हमारे दुःखों के मूल में है।
हमें जो मिल रहा है या मिला है,हम उसे स्थायी रूप में मोहवश 
चाहने लगते हैं कि सब ताउम्र मिलते रहे और यही सोंच हमारे जीवन में उथल-पुथल लाने का काम करता है। कामना,वासना और तृष्णा से परे कौन है जो रहकर भी उसमें नहीं है और उसमें रहकर उसे स्थायी समझ लेना ही दुःख,शोक,विषाद आदि के कारण बन जाते हैं और हमारी बुद्धि समझ नहीं पाती कि ये सब हो कैसे रहा है,हो तो युगों युगों से यही रहा है,हम समझकर भी नहीं समझ रहे हैं और इसलिए दुखी और विषादग्रस्त हैं तो मुक्त हो जाइए सब हमारे हाथों में हैं। जो हम कर नहीं सकते, हमारी क्षमताओं के परे है,उनपर सोंचकर क्या होगा और जो कुछ भी हम कर सकते हैं,उनके लिए सोंचना क्या है,कर डालिए।
हम हमारे जीवन के स्वयं निर्माता और विध्वंसक भी हैं। अबतक जो हमनें जिया है,उन सबका आकलन करें, विश्लेषण करें, अधिकांश हमारे सृजित हैं और कुछ आकस्मिकताएं हैं और उन आकस्मिकताओं में भी कहीं न कहीं हमारी भागीदारी होती है। इसलिए चरैवेति चरैवेति,आत्मावलोकन और आत्मपरीक्षण करते रहिए,समय के अनुरूप बदलते रहिए कि बदलाव ही जीवन है, परिवर्तन ही संसार है। जो परिवर्तित होने योग्य है,बदल जाएगा और जो शाश्वत और सनातन है, अपने अस्तित्व में बना रहेगा।
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स्वार्थ भी परमार्थ ही है: सहज बोध। १८ १० २५ 
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अपनी जवाबदेहियों और उत्तरदायित्वों से हम नहीं भाग सकते हैं और इन सबका निर्वहन हमें खुद ही करना पड़ता है। कुटूम्ब, पारिवारिक सदस्य, मित्र आदि बहुत दूर और देर तक सहयोग भर कर सकते हैं पर चलना तो हमें ही पड़ता है तो इसे गंभीरता से समझना होगा अन्यथा 
मन पीड़ित और अवसादग्रसित होगा।
हम सब यही सोंचते रहते हैं कि अमूक समय में अमूक आदमी हमारी मदद करेगा कि हमनें कभी किसी वक्त में उसकी मदद की थी या वह मेरा हमदर्द है,मुझे जानता और समझता है पर कभी-कभी परिस्थितियां बड़ी उलट हो जाती है और कोई कुछ नहीं कर पाने की स्थिति में होता है,मदद कर सकता है पर नहीं कर पा रहा है तो उसकी विवशता और मजबूरियां हो सकती है तब हमें क्या करना चाहिए, उन्हें कोसना या धिक्कारना चाहिए, नहीं, उन्हें समझने की कोशिश करनी चाहिए और स्वयं को झेलने और जूझने योग्य बनाने की लागातार कोशिश करनी चाहिए। आमतौर पर लोगों की सामान्य समझ-बूझ ये कहती है कि अमूक ने वक्त पर हमारी मदद नहीं की तो हम उनके बारे में क्यों सोचें पर यह सोंच सही और औचित्यपूर्ण नहीं हो सकती है कि फिर आदमी और आदमी के बीच का फर्क खत्म हो जाता है और फर्क बरकरार रहना चाहिए।
हम अपनी सहज वृत्ति और प्रवृत्तियों के अनुरूप चलते हैं और‌ हमारी प्रवृत्तियां ही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करती है और एक अच्छे व्यक्ति और व्यक्तित्व के लिए कुछ असाधारण गुण तो अवश्य होने चाहिए। इस संसार में कोई कितना भी सक्षम और सामर्थ्यवान क्यों न हो, सबको कहीं न कहीं, किसी न किसी की,किसी न किसी रूप में सहयोग और‌ सहायता की जरूरत पड़ सकती है और हम सबको ऐसी प्रवृत्ति रखनी चाहिए ताकि हम भी किसी के वक्त बेवक्त काम आ सकें और जो भी सामर्थ्य और संभावनाओं के भीतर हो, करना चाहिए और करने की कोशिश करते रहनी चाहिए।
इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण श्री राम और श्री कृष्ण हैं जो सक्षम और सामर्थ्यवान थे पर उन्हें भी अपने अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अनेक लोगों से मदद लेनी पड़ी थी। यह इस बात का परिचायक है कि यह संसार ऐसे ही पारस्परिक सहयोग और सह अस्तित्व के सिद्धान्त पर चलता है और चलता रहेगा।
इस सन्दर्भ में लेकिन एक बात महत्वपूर्ण है कि हमारी जरूरत जिन्हें है, हमें तत्परता से मददगार बन जाना चाहिए और इस बात की बगैर अपेक्षा किये यह कल हमारी मदद करेगा,हो सकता है कि वह न कर पाए परन्तु कोई अन्य आपके लिए खड़ा हो जाएगा। यह जीवन का अद्भुत सत्य है जो वैज्ञानिक सत्य भी है और आध्यात्मिक सत्य भी है, इसलिए निस्संकोच साकारात्मक भाव से,
भगवत्भाव से करते रहिए और ध्यान रहे कि हमारी यही सोंच और ऊर्जा कल रूपांतरित होकर हमारे लिए किसी अस्तित्व में खड़ी हो जाएगी जिसे आकस्मिक सहयोग को हम दैवी सहायता भी कहते हैं।
देवता भी मानव‌ रूप में आने के लिए तरसते हैं कि सिर्फ मनुष्य में ही श्रेष्ठ करने की क्षमता और संभावनाएं होती हैं कि देवता सबके लिए उपलब्ध नहीं होते हैं और यह सौभाग्य हम मनुष्यों को ही प्राप्त है। इसलिए जब कभी किसी रूप में किसी को आपके सहयोग की जरूरत हो तो उस दैवी सहयोग के नाम पर सहयोग अवश्य करें और ऐसे अवसर को हाथ से न जाने दें।
किसी विवश, लाचार, जरूरतमंद आदि के सहयोग के लिए हमारा चयन किया गया है जो एक दैवी आदेश है जो हमारे लिए एक सौभाग्य है और सौभाग्य को जाने नहीं देना चाहिए।
लियो टाल्सटाय ने एक जगह कहा भी है,
U r ever fortunate that U have been chosen by thy merciful Lord to do something good for someone and it is the best service to thy Lord.
हर स्वार्थ को परमार्थ में बदलकर जीना सीखना ही जीवन का श्रेष्ठ मार्ग है।
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प्रकाश पर्व और दीपोत्सव : २० १० २५ 
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भारत तीज,त्योहार और व्रतों की भूमि है जहां ऋतु आधारित, पौराणिक गाथाओं से अभिप्राणित और लोक जीवन और संस्कृति तथा आध्यात्मिक भावों से परिपूर्ण उत्सवों के आयोजन होते रहते हैं।
उन पर्व त्योहारों में से दीपावली या दीपोत्सव या दीवाली भी एक है जिसके आयोजन के पीछे भी सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक, पौराणिक और आध्यात्मिक कारण और गाथाएं जुड़ी हुई हैं जिनमें निजी तौर पर हमें यह * अंधकार के विरुद्ध प्रकाश की विजय का संदेश लगता है जो समाज के हर वर्ग और समुदाय के लिए सम्यक् और प्रासंगिक है।ऐसे तो इसके कई
अन्य कारण भी हैं जो सबके लिए ज्ञात है।
कार्तिक मास की अमावस्या,स्यामवर्णा 
रात्रि, वायुमंडल में हल्की हल्की सिहरन,
सामर्थ्यानुसार हर घर में रौशनी,रह रह कर फूटते पटाखे और चमकती फूलझड़ियां,
खील बताशे मीठाईयां,सजे धजे दरवाजे और सदैव प्रकाशित रहने और करने का संदेश,एक अद्भुत संयोजन और समन्वय  दिखाई पड़ता है जो सदैव हमें प्रेरित करता रहता है और सीखाता है कि अंधेरा चाहे कितना भी घना क्यों न हो,उसे हम एक छोटे से दीपक से पराजित कर सकते हैं और अंधकार भी वास्तव में हमें जगाने आता है कि उठो,जागो और हमें कोसने के बजाय एक चिराग जलाओ,हमारा
अस्तित्व खत्म हो जाएगा,
It is better to lit a candle than to curse the darkness.
यह छोटी सी उक्ति बहुत कुछ कह जाती है कि हमें हर प्रतिकूल ता में आशा की उम्मीद की एक किरण खोजनी चाहिए जिसके सहारे हम आगे बढ़कर उस परिस्थिति का सामना कर सकें। यह प्रकाश पर्व हमें यही संदेश देता है और कहता है,
ऊॅं असतो मा सद्गमय 
तमसो मा ज्योतिर्गमय 
मृत्योर्मा आमृतम् गमय 
असत् से सत् की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चल, इसका अभिप्राय सिर्फ बाह्य अंधकार नहीं बल्कि हमारे आन्तरिक अंधकार से भी है जो हमारे भीतर अज्ञान,अविद्या,और पंचमाकारों के रूप में बैठा हुआ है।
यही प्रार्थना हम असीम अगोचर परमात्मा से सबके लिए करते हैं और इस दीपोत्सव की यही मंगलकामनाऍं,यही शुभकामनाऍं हम आपके लिए सपरिवार करते हैं कि यह दीपोत्सव आपके जीवन से हर अंधकार और संघर्षों को दूर कर जीवन को जगमग 
बनावे और आप स्वस्थ, प्रसन्न और समृद्ध हों।
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वैश्विक संकट संवेदनहीनता: गिरते मानवीय मोल और‌ मूल्य २३ १० २५ 
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विषय या तो बड़ा सरल और सहज है या बड़ा गंभीर है,दुरूह है। आज समस्त संसार में लोग नानाविध संकटों आपदाओं से जूझ रहे हैं जिन पर राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियां, सम्मेलन, परिचर्चाएं,
वाद संवाद आदि हो रहे हैं। यू एन ओ में बड़े बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं जिनके महत्वपूर्ण विषय, पर्यावरण प्रदूषण और जलवायु संकट,सूखाड़  बाढ़ नियंत्रण, जनसंख्या विस्फोट और नियंत्रण, महिला सुरक्षा एवं सशक्तिकरण, बाल एवं परिवार कल्याण,
विश्व शान्ति एवं युद्ध,
शिक्षा का वैश्वीकरण,
विकासशील एवं पिछड़े देशों के चतुर्दिक विकास,सबको अन्न एवं रोजगार आदि होते हैं। बड़े बड़े विशेषज्ञ और राजनेता,नीति निर्माता, दार्शनिक एवं चिन्तक मिल-बैठकर विमर्श करते हैं परन्तु समस्त मानव‌ जाति के संकट जहां थे वहीं नजर आते हैं। उन बिमारियों के कुछ तात्कालिक ईलाज तो हो जाते हैं परन्तु आमूलचूल बदलाव और निदान के मार्ग नहीं निकलते हैं। हम आमतौर पर परिणाम और घटनाओं की समीक्षा करते हैं और कुछ कारणों पर भी विमर्श करते हैं परन्तु मूल कारण सदैव घने और गहन अन्धकार में छिपे रह जाते हैं।
ऐसा नहीं है कि तथागत सिद्धार्थ के पहले लोगों ने दुःख दर्द और जीवन की त्रासदियों को नहीं देखा था पर तथागत सिद्धार्थ ने बड़े सहज और सरल तरीके से दुःख, कारण, निदान और मार्ग की बातें की
और साधारण जन से लेकर प्रबुद्ध जन ने इस यथार्थ को समझा और आत्मसात करने की कोशिश की और जो समझे मुक्ति मार्ग को समझ गए कि हर घटना और अस्तित्व के पीछे एक कारण नहीं कारण समूह होते हैं जिनकी खोज कर पहचान करने की जरूरत है।
सम्प्रति आज वैश्विक समाज को भी वैश्विक संकटों को समझने और कारण समूहों की खोज करने और पहचान करने की जरूरत है और निजी तौर पर हमारी समझ कहती है कि हम मनुष्यों के समस्त संकटों के पीछे जो कारण है, उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण हमारा संवेदनहीन होता जाना है। हम सब धीरे धीरे संवेदनहीन होते जा रहे है जिसके कारण मानवीय मूल्य और मोल मूल्यहीन होते जा रहे हैं जिसका प्रभाव व्यक्तिगत जीवन से लेकर वैश्विक जीवन पर पड़ रहा है। आज के वैश्विकरण के युग में 
बाजारवाद और उपभोक्तावाद की बढ़ती प्रवृत्तियों ने हमें बाजार का वस्तु बना दिया है जिसका सिर्फ 
मौद्रिक मोल और मूल्य रह गया है। धन
की बढ़ती महत्ता ने हमसे प्रेम,क्षमा,दया, करूणा,सहयोग,सह अस्तित्व आदि के भावों को गौण बना दिया है जिसकी अंतिम परिणति यह हुई कि हम एक छत के नीचे रहते हुए भी 
* कई छोटे छोटे घरों में रहने लगे हैं।घर के भीतर दीवारें खींच गयी हैं वैसे ही जैसे सरहदें देशों को बांट देती हैं और हम सब 
अस्तित्ववादी बनते चले गए और भूल गए
कि अगर छत गिर जाती है तो घर स्वत: स्फूर्त नष्ट हो जाते हैं, इसलिए घर को बचाने के लिए छतों को बचाना जरूरी हो जाता है और वह छत है संवेदना और सह अस्तित्व की भावना जिनके अभाव में मनुष्य जाति संकट में है और हम इसे ही नहीं समझ रहे हैं कि सारे संकटों की जड़ में 
यही दो मूल कारक और अवयव हैं जो सबको बांधकर एकीकृत करके रख सकते हैं।
एक अन्तर्राष्ट्रीय अखबार लिखता है,
There is a very 
intimate and indivisible relation between man and Sensitive awareness and 
Co existence for the survival of the mankind and if we don't realise them,We r going to make hell the whole world. Only compassionate
feelings to one another and the 
realisation of Coexistence will save the human race.
कितनी सच्चाई है इस कथन में पर हम श्रेष्ठता की होड़ में, धनवान और शक्तिवान बनने की प्रतिस्पर्धा में यह भूल गए कि जीवन सिर्फ भौतिक नहीं बल्कि इससे भी इतर है। थाली सोने की हो पर अनाज, दलहन,फल फूल, सब्जी आदि के बगैर हम जीवित कैसे रहेंगे। जीने के लिए भौतिक सुख सुविधाओं के साथ साथ जीवन की सूक्ष्म 
आवश्यकताएं भी जरूरी है जो संवेदना और सह अस्तित्व है।
युद्ध या अशान्ति से एक समाज या देश ही प्रभावित नहीं होता, बल्कि वह कालान्तर में वैश्विक संकट बन जाता है। चीन से निकले कोविड महामारी ने चीन को ही ग्रसित नहीं किया बल्कि वह वैश्विक महामारी बन गया जिसका निदान सबको मिलकर करना पड़ा। बस यही समझना है समझना है कि हमारा अस्तित्व एक दूसरे से बंधा हुआ है और हम एक दूसरे के पूरक हैं और यही संवेदना और सह अस्तित्व का बोध हमें जोड़ने का काम करता‌ है। 
संवेदनहीन व्यक्ति न तो स्वयं जीवित होता है और न किसी के जीवन का कारण बन सकता है। इसलिए एक चिकित्सक का पेशेवर होने से ज्यादा उसका संवेदनशील होना जरूरी है और तभी वह एक सही चिकित्सा धर्म का पालन कर सकता है।
भूख,प्यास,रोग, वस्त्रहीनता,गृहहीनता,
साधनहीनता आदि की समझ सबको नहीं हो सकती है कि इनकी सही वेदना और‌ पीड़ा भोगे हुए यथार्थ की तरह होती है, जो भूखा न रहा है,प्यासा न रहा हो, रोगग्रस्त न रहा हो, साधनहीनता को न झेला हो,वह इनकी पीड़ाओं और यातनाओं कैसे समझ सकता है और अगर समझेगा या समझने की कोशिश करेगा तो उसके लिए एक संवेदनशील और ग्राह्य 
हृदय का होना जरूरी है।
इसी संवेदनशीलता और हृदयग्राह्यता ने सिद्धार्थ को तथागत बुद्ध बना दिया, रत्नाकर को वाल्मीकि बना दिया,अंगुलीमाल को संन्यासी बना दिया, इसलिए हम महामानव अगर नहीं बन सके तो मानव जरूर बन जाएंगे। 
हम जल संकट,अन्न संकट, पर्यावरण और जलवायु के संकट,जातीय साम्प्रदायिक संकट, युद्ध और प्राकृतिक आपदा के संकट और अन्य वैश्विक संकटों को यदि संवेदनशीलता के साथ समझना शुरू कर देंगे कि यह हमारा निजी संकट है तब हम उनके प्रति सचेष्ट और जागरूक हो जाएंगे और वह समस्या सामुदायिक हो जाएगी और हम सब मिलकर उनका सामना कर सकेंगे।
समस्याएं सामने है और निदान भी सामने है और चयन भी हमारे हाथों में है।
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समाज, शब्द और हम २४ १० २५ 
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समस्त दुःखों सुखों के मूल में हम और हमारी*  एषणाएं, वासनाएं और तृष्णाएं हैं जिसके लिए हम  स्वयं जिम्मेदार होते हैं, कोई अन्य कारक या कारण नहीं होते , हां,कुछ आकस्मिकताएं हो सकती हैं तो अपवाद तो हर जगह होते हैं।
परन्तु यह हम मनुष्यों की वृत्ति और प्रवृत्ति है कि सुख को स्वयं की उपलब्धि मानते हैं और आपदा विपदा को दूसरे से सृजित मानते हैं।
जैसा हमने पूर्व में कहा है कि अपवाद स्वरूप कुछ आकस्मिकताओं यथा आपदाओं विपदाओं को छोड़कर सभी कर्मों ( कर्तव्य नहीं)
के प्रति जिम्मेदारी हमारी ही होती है जो हमारे भावों विचारों की परिणति है और इनमें हमारे कर्म अनेक रूपों में अभिव्यक्त होते रहते हैं और इनमें हमारे व्यवहार आचरण के अलावा प्रयोग किए जाने वाले शब्दों की बड़ी अहमियत होती है। 
अक्षर अक्षर ब्रह्म चेतना है, ऊर्जा है, शक्ति है जिनमें सृजन और विनाश दोनों की शक्तियां समाहित होती हैं और इनके सही और गलत प्रयोग पर बहुत कुछ बनता बिगड़ता है और शब्द चूंकि अक्षरों से बनते हैं इसलिए वो महिमा उनमें ही होती है। शब्दों के चयन और प्रयोग पर * समाजशास्त्री मैकाइबर और पेज का कहना है कि शब्द ऐसे तो बेजान होते हैं पर सही और गलत प्रयोग उनमें जान डाल देते हैं,सही शब्दों को सही स्थान नहीं मिलने पर वे अपने अर्थ खो देते हैं और उनकी सामाजिकता औचित्यहीन हो जाती है। हम मनुष्यों की तरह शब्दों के समूह में भी सामाजिकता होती है। हिन्दी के लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार नरेंद्र कोहली जी अपनी प्रसिद्ध रचना* समाज, जिसमें मैं रहता हूॅं में कहते हैं कि, भाषाएं तो सबकी अपनी-अपनी होती ही है परन्तु भाषा को सजीव और सशक्त बनाने के लिए शब्दों का सही चयन भी बड़ा जरूरी होता है जिसमें बड़ी सावधानी बरतने की जरूरत होती है,सही शब्दों का भी यदि गलत जगह प्रयोग हो जाए तो उसके परिणाम विध्वंसक हो जाते हैं, इसलिए सही शब्दों को भी सही जगह पर रखना एक बड़ा हुनर है।
हम रोज़मर्रा की जिन्दगी और जरूरतों में बोलते रहते हैं पर उन सम्बोधनों और‌ लेखन कार्यों में हमें जितना सचेष्ट और सावधान रहना चाहिए, हम नहीं रह पाते हैं जिसके परिणाम अच्छे नहीं होते हैं।
सच को सच की तरह कहने में भी शब्दों की बड़ी अहमियत होती है। कभी कभी ऐसा होता है कि हम सच को मर्यादित, परिष्कृत और परिमार्जित रूप में नहीं रख पाते हैं जो कलह और संघर्षों के कारण बन जाते हैं।
इन प्रकार की शाब्दिक प्रतिक्रियाओं में तंज कसने, कटाक्ष करने,आरोप प्रत्यारोप करने आदि में भी शब्दों की बड़ी भूमिका होती है। हम तंज या कटाक्ष में भी शब्दों की मर्यादा और गरिमा भूल जाते हैं जैसा कि एक छोटे से तंज ने महाभारत करवा दिया। पाण्डवों के नवनिर्मित रंगमहल में ऐसी कारीगरी थी कि फर्श पर जहां पानी था,सुखा नजर आता था और सुखे फर्श पर बहता पानी दिखाई देता था। दुर्योधन इसे तकनीक को नहीं समझ सका और जहां सुखा था,वह धोती उठाले और जहां पानी था, वहां धोती छोड़ दे, नतीजा,उसकी धोती भींग गयी। इसे देखकर पांचाली जोरों से हंस पड़ी और बोल दी कि,
* अंधे का बेटा अंधा ही होता है और यह बात दुर्योधन के सीने में तीर की तरह चुभ गयी और उसने मन ही मन में संकल्प लिया कि इस अपमान का बदला वह जरूर लेगा और कालान्तर में वही हुआ, युधिष्ठिर उसे जुए में हार गया, वनवास हुआ और फिर हक की मांग पर महासंग्राम हो गया। सद्गुरु कबीर साहब ने भी तो कहा ही है,
शब्द संभारे बोलिए 
शब्द के हाथ न पांव 
एक शब्द कर औषधि 
एक शब्द कर घाव।
ठीक ऐसे ही कि हमारी माॅं तो हमारे पिता की पत्नी ही होती है पर हम उन्हें,
ऐ मेरे पिता जी की पत्नी नहीं बोल सकते हैं कि उसके लिए एक 
मर्यादित शब्द माॅं उपलब्ध है।
हम हमारे बोलचाल में जब किसी से कुछ काम लेना होता है तो,
मेहरबानी करके या कृपया या कृपा करके हमारा ये काम कर दें तो वह आग्रह सार्थक होता है और हम अपने काम को सहजता से करवा लेते हैं और इसीलिए यूरोपीय संस्कृति में,
Please and Sorry 
के बड़े महत्त्व होते हैं।
शब्दों के सही प्रयोग हमारे संस्कार और परवरिश की पहचान है, हमारे व्यक्तित्व और गुणधर्म की श्रेष्ठता की पहचान है
और इसलिए हम हमारे दुःखों सुखों में इनकी महत्ता को समझनी चाहिए जो हमें सभ्य और सुसंस्कृत होने की पहचान देते हैं। 
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भारतीय दर्शन चिन्तन और तथागत सिद्धार्थ  : २५ १० २५ 
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तथागत सिद्धार्थ के दर्शन चिन्तन और सिद्धांत व्यवहार का उपयोग जितना जीवन सुधार में नहीं होता है,उससे कई गुना अधिक विकृत राजनीति में होने‌ लगा  है।
उन्होंने जीवन मार्ग को 
बदलने के लिए जिन आदर्शों को एक परिष्कृत और परिमार्जित रूप में*
धम्म अर्थात् मार्ग के रूप में रखा उसे विकृत और विद्रूप करने का काम एक संगठित रूप में किया जाने लगा है।
उन्होंने* चरिय या चत्तारि अरिय सच्चानि
( चार आर्य या श्रेष्ठ सत्य) की अवधारणा दी कि लोग बड़ी सहजता और सरलता से जीवन में भौतिक दुःखों के यथार्थ को समझकर स्वयं उसका निदान कर सकें। उन्होंने बड़ी सहजता से दुःख,उनके कारण,
उनके निदान और‌ निदान मार्ग को बताया पर इसके यथार्थ को लोग अपने अपने तरीके से समझने और समझाने लगे या इसकी जरूरत ही नहीं समझते।
इसी तरह उन्होंने भौतिक जीवन को संयमित, परिष्कृत और परिमार्जित तरीके से जीने के लिए 
* अट्ठंगिकोमग्गो ( आष्टांगिक मार्ग) और * मज्झिमपटिपदा(जीवन का मध्यम मार्ग, अतिवाद से बचना,अति सुख दुःख से बचकर चलना) का दर्शन दिया जो कोरा दर्शन नहीं बल्कि जीवन व्यवहार है जिसे अपनाकर कोई बड़ी सहजता से जीवन यापन कर सकता है। 
पुनः संसार चक्र या कारण और कार्य के सिद्धान्त या कर्म फल के सिद्धान्त या पटिच्चसमुप्पाद् अर्थात् प्रतीत्यसमुत्पाद का दर्शन दिया ( जो मूलतः औपनिषदिक दर्शन है) को भी लोगों ने समझने और इसके यथार्थ को जानने की कोशिश नहीं की और ऐसा न किया जाना ही आज वैश्विक स्तर पर इसे उनकी मौलिकता से भटका दिया है।
औपनिषदिक दर्शन और चिन्तन में भी जीवन के दो मार्गों यथा, प्रवृत्ति मार्ग और निवृत्ति मार्ग की चर्चा की गयी है जिसे तथागत सिद्धार्थ ने अपने प्रथम वेदान्तिक गुरु आलार कलाम से सीखा था कि जीवन में समस्त दुःखों के मूल में एषणा, तृष्णा,
कामना और वासना है जो मनुष्य के मन चित्त को अपनी ओर सदैव आकृष्ट करते रहते हैं और हम मनुष्य इनकी ओर प्रवृत्त होकर अपनी चित्तवृत्तियों को नियंत्रित कर पाने में विफल हो जाते हैं जो हमारे मानसिक, शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक दुःख और क्लेश के कारण बनते हैं। इसे ही बुद्ध ने अपने धम्मदेसना में कहा है कि,
जरा दुक्खं मरन दुक्खं
अपिय मिलन दुक्खं 
पिय बिछोह दुक्खं,
सब्बं दुक्खं 
अर्थात् जीवन में सब दुःख ही दुःख है,जन्म दुःख है,मरण दुःख है,
अप्रिय से मिलन दुःख है,प्रिय का बिछोह या उससे अलगाव दुःख है और इन दुःखों के मर्म और कारणों को समझ लेना ही निदान है। यही चैतन्य बोध‌ हमारे औपनिषदिक और गीता दर्शन में भी बहुत पहले कहा जा चुका है जो दुरूह और 
सहज ग्राह्य नहीं था और इसीलिए सिद्धार्थ गौतम ने इसे सहज बनाते हुए कहा कि अनन्त इच्छाएं ही समस्त दुःखों के मूल में है,सुख की इच्छा है न मिले तो दुःख और मिलकर चला जाए तो दुःख,प्रिय कुछ भी हो सकता है, आहार, वस्तु,वस्त्र,आदमी,घर,
दोस्त आदि जो हमें पसन्द है न मिले तो दुःख और मिलकर छूट जाए तो दुःख इसलिए बुद्ध ने किसी के स्थायित्व को ही दुःखों का मूल माना और कहा,
चित्तवृत्ति निरोधश्च सुखं मूलं अर्थात् चित्तवृत्तियों का निरोध, कामना,वासना,एषणा और तृष्णा के मूल को नियंत्रित करना ही सुखों का मूल है और यही वेदान्त दर्शन में भी बहुत पहले कहा गया है कि चित्तवृत्ति निरोधश्च योग: अर्थात् चित्तवृत्तियों का निरोध ही योग अर्थात् मुक्ति का मार्ग है। कालान्तर में बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन ने इसकी व्याख्या* क्षणिकवाद के रूप में करते हुए समस्त क्रियाशीलताओं और अस्तित्व को क्षणभंगुर बताया और ऐसा इसलिए कहा गया कि आसक्ति से बचने का यही मार्ग है कि न तो दुःख ही स्थायी है और न सुख ही स्थायी है, सबकुछ परिवर्तनशील 
हैं और जब सबकुछ परिवर्तनशील है तो उससे आसक्ति कैसी और मोह कैसा,इसी मोह और माया को शंकर के दर्शन में भी आभासी सत्य या भ्रम कहा गया है। यही भ्रम,मोह, आसक्ति, 
कामना,वासना, तृष्णा आदि हमें दैहिक,दैविक और भौतिक तापों अर्थात् दुःखों की ओर ले जाते हैं। अब यहां एक विरोधाभास उत्पन्न होता है कि दैवी या अलौकिक सत्ता के प्रभाव को तथागत बुद्ध ने नहीं माना है जिसके कारणों की चर्चा हम यहां नहीं करना चाहते हैं कि यह बौद्धिक चेतना उस कालखंड की मांग थी जिसकी पूर्ति करना बुद्ध के लिए जरूरी था पर इस पर उन्होंने स्वयं स्वीकार करते हुए कहा था कि,
हम कोई नया धर्म मत पंथ की स्थापना नहीं कर रहे हैं बल्कि मानव अस्तित्व को श्रेष्ठ कर्मजनित कर्म संस्कारों से युक्त कर दुःखों से निर्वाण पाने के मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं कि व्यक्ति स्वयं अपना आत्मसुधार करके सांसारिक क्लेशों से मुक्त होकर 
निर्वाण या मुक्ति पा सके। आत्मा की सत्ता को अस्वीकार करते हुए उन्होंने कर्म संस्कारों से उत्पन्न गुणधर्मों को पुनर्जन्म का आधार माना है जो 
कर्मफल का ही परिमार्जित रूप है।
अब इस आलेख को उपसंहारित करते हुए हम यह कहना चाहते हैं कि हमें पंचमाकारों अर्थात् काम,क्रोध,मद,मोह और लोभ से बचना चाहिए और इसी को तथागत सिद्धार्थ ने अतिवाद का दर्शन बताया है। हम काम या क्रोध से मुक्त नहीं हो सकते, इच्छा कामना तृष्णा आदि से मुक्त नहीं हो सकते पर अतिवादी होने से तो जरूर बच सकते हैं और यही दुःखों से मुक्त होने का मार्ग है जिसकी विशद् व्याख्या वेदांत दर्शन में और कालान्तर में बौद्ध दर्शन में किया गया है।
तथागत बुद्ध इसी अनुपम भारतीय दर्शन चिन्तन परम्पराओं की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं और लोग उनको लेकर एक विभेदकारी दर्शन के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करते हैं और जो उनकी गहराईयों में जाकर उनके यथार्थ को समझ लेते हैं,वे समझ जाते हैं कि हर कालखंड का एक युगधर्म होता है जिसकी कुछ विशेष मांग होती है और उन्हीं मांगों की पूर्ति के लिए युगपुरुष* एक मार्ग बताने का काम करते हैं परन्तु ध्यान रहे कि सारे मार्गों का एक ही लक्ष्य होता है,
परम सत्य को जानना,उसका आत्मसाक्षात्कार करते हुए उसमें समाहित हो जाने का अनवरत प्रयास करना कि यही शाश्वत सनातन सत्य और उसका मार्ग है जिसे सबको समझने और आत्मसात करने की जरूरत है कि सुख ही दुःख की जननी है और दुःख भी स्थायी नहीं है,इस परिवर्तनशील संसार में जो सत्य है,वो कर्मजनित गुणधर्म है और श्रेष्ठ कर्म ही मुक्ति मार्ग है। श्रेष्ठ कर्म क्या है,जो हमारे विहीत कर्म और‌ कर्तव्य हैं,उनका पालन करना और यही धर्म है।
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इतिहास की ईमानदारी और बेईमानी : २६ ११ २५ 
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इतिहास किसी विषय का गलत व्याख्या कर सकता है परन्तु जब काल उसकी व्याख्या करता है तब सत्य सामने आ ही जाता है। इतिहास का हर सच,सच नहीं होता है,ऐसा इतिहास ही कहता है।
भारत की आजादी का श्रेय किसी एक व्यक्ति या संगठन या संस्था को नहीं दिया जा सकता है कि यह अनन्त बलिदानियों के साथ नाइंसाफी होगी।
भारत की गुलामी का इतिहास बहुत पुराना है पर आमतौर पर इसे 
ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी और ब्रिटिश शासन के साथ जोड़कर देखा जाता है पर इसका सीधा फंडा ये है कि भारतीय सीमाओं के पार से जो भी आक्रांता के रूप में आए और भारत पर शासन किए,अपनी नीतियों को लागू किया और उसे मानने के लिए मजबूर किया,वह वैदेशिक शासन ही कहा जाएगा और तत्कालीन भारत को पराधीन भारत कहा जाएगा।
लेकिन अन्य विदेशी हुकूमत की तुलना में ब्रिटिश शासन को ज्यादा प्रासंगिक माना जाता है कि भारत की आजादी की लड़ाई में 
तत्कालीन सभी समुदायों के लोगों ने उस शासन का विरोध किया था कि ब्रिटिश सत्ता की हुकूमत अब उनपर भी थी जो कभी भारत के ऊपर शासन कर रहे थे परन्तु उन शासकों ने इस धरती के सामंजस्य बिठाकर यहां की सभ्यता और संस्कृति में समावेशित हो गए थे पर ब्रिटिशर्स 
बिल्कुल भिन्न थे।
पलासी युद्ध (1757 )
के बाद भारत के एक बड़े भूभाग पर अंग्रेजी हुकूमत का कब्जा हो चुका था जो धीरे-धीरे सारे भारत को एक शासकीय व्यवस्था के अन्दर लाने का काम कर रहा था और ठीक एक सौ साल अर्थात् 1857 के बाद पुरे भारतवर्ष पर ब्रिटिश हुकूमत काबिज हो गया और अब असली ब्रिटिश हुकूमत की शुरुआत हो गयी। अब गवर्नर जनरल की जगह वायसराय ( ब्रिटिश सम्राट का प्रतिनिधि) भारतीय शासन का सूत्रधार बन गया और ब्रिटिश राज के सीधे नियंत्रण में भारत का शासन चला गया।
आन्दोलन, संघर्ष, क्रांति आदि होते रहे,
आन्दोलन और रक्त क्रांति साथ साथ चलते रहे,लोग जेल जाते रहे,गोली खाकर शहीद होते रहे, काला पानी की सजाएं काटते रहे और फांसी पर चढ़ाए जाते रहे जिसकी अंतिम परिणति भारत की आजादी और विभाजन दोनों हुए।
भारत को विभाजन की एक बड़ी विभिषिका और त्रासदी झेलनी पड़ी जिसके जख्म आज भी दर्द देते हैं। आजादी तो मिल गयी पर आजादी भी ऐसी थी जैसे हार जीत पर हंस रहा हो और विजेता तमाशबीन बना देख रहा हो। 
आजाद भारत एकीकृत भारत नहीं था,खंड खंड में बंटा भारत था जो ब्रिटिशों और सत्ता लोलुपता के प्रतिनिधियों की साज़िश के शिकार का नतीजा था। इतिहास आज भी इस द्वन्द्वात्मक अवस्था में शोधरत है कि विभाजन का सच क्या था और इतिहास आज भी मौन है और थोपा थोपी तथा दोषारोपण,आरोप प्रत्यारोप का शिकार है।
1857 के विद्रोह के पूर्व भी अनेक विद्रोह‌
छोटे बड़े स्तर के हो चुके थे जिनमें राजे रजवाड़े के साथ साथ अनेक जनजातीय विद्रोह भी भारत के अनेक क्षेत्रों में हो चुके थे और उसकी पृष्ठभूमि में भारत फिर उबल रहा था। ठीक इसी समय जब भारत के Secretary for state of India और उसके भारत परिषद् से तत्कालीन भारत की आन्तरिक व्यवस्था के बारे में पुछा गया। तब तक एक रिटायर्ड आइ सी एस पदाधिकारी ए ओ ह्यूम जो नागपुर का तत्कालीन जिलाधिकारी था,भारत परिषद् से जुड़ा हुआ था, उसने
भारत की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के बारे में 
स्टेट सेक्रेटरी को प्रतिवेदित करता है कि,
सम्प्रति भारत की आन्तरिक स्थिति एक 
बोआयलर ( steam boiler) की तरह बन चुकी है और आन्तरिक दवाब इतना बढ़ चुका है कि यह कभी भी फट सकता है,जिसे नियंत्रित करना बहुत 
जरूरी है वरना इस बार का विस्फोट सबकुछ उड़ा देगा और उसने एक * सेफ्टी वाल्व लगाने की बात की। फिर स्टेट सेक्रेटरी की सहमति और ब्रिटिश शासन के निर्देश पर एक संगठन का निर्माण किया जिसका नाम ** अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटि रखा गया जिसके पहले अध्यक्ष व्योमेश चन्द्र बनर्जी को बनाया गया जिसकी पहली बैठक मुम्बई में हुई जिसमें 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया और ए‌ ओ ह्यूम उसका महासचिव था जो अगले बीस वर्षों तक इस पद पर बना रहा।
अब करिश्मा ये है कि ह्यूम की रणनीति सफल रही और तत्कालीन कांग्रेस कमिटी की मांग भारत की आजादी नहीं बल्कि प्रशासनिक सुधार, प्रशासनिक दक्षता में सुधार,संवैधानिक सुधार और भारतीयों की भागीदारी सुनिश्चित करनी थी। ह्यूम ने बड़ी चतुराई से भारतीयों को बेवकूफ बनाया और‌ कांग्रेस कमिटी ब्रिटिश सरकार के लिए सही में* सेफ्टी वाल्व का किरदार निभाने लगी। आम भारतीय इस कुचक्र और कुटनीतक खेल को नहीं समझ पाए।
इसी बीच भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनेक आयाम बने,
भारतीय राजनीति में गांधी जी एवं उनके विचारधारा के अनुगामियों का एक दल बना और उसके विपरीत* बाल गंगाधर तिलक,लाला लाजपत राय और विपीन चन्द्र पाल के नेतृत्व में गरम दल बना और धारा दो भागों यथा गरम दल नरम दल‌ में बंट गयी। नरम दल के औपनिवेशिक आजादी और संवैधानिक सुधार के विपरित गरम दल ने पूर्ण स्वराज्य की मांग की परन्तु तिलक जी की असामयिक मौत ने आन्दोलन की दिशा और दशा बदल दी। इसी के साथ साथ क्रांतिकारियों का एक विशाल समूह भी अपने तरीके से स्वाधीनता की लड़ाई लड़ रहा था और अन्ततोगत्वा भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हो गया परन्तु आजाद भारत को एक भारत में बदलना और तत्कालीन भारत को अखंड बनाकर रखना,उस जंगे आजादी से कम दुष्कर नहीं था।
अब इतिहास की उस ईमानदारी और बेईमानी की बात उठ खड़ी होती है और ऐसी ही परिस्थितियों में एक यूरोपीय इतिहासकार लिखता है,
आजादी तो भारत को मिल गयी परन्तु भारत ऐसे चौराहे पर खड़ा कर दिया गया था जहां कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था कि वह एक स्वतंत्र राष्ट्र राज्य के रूप में कैसे खड़ा रहेगा और चलेगा।
लगभग छः सौ छोटे बड़े राज रजवाड़ों की जमात थी और उन्हें पुरी आजादी थी कि वे भारत या पाकिस्तान किसी के साथ जा सकते हैं या अपने अस्तित्व को स्वतंत्र रख सकते हैं।
एक अजीबोगरीब स्थिति बन गयी थी जो न तो पंडित नेहरू ठीक कर पा रहे थे और न गांधी जी और न अन्य बड़े बड़े राजनेता कर पा रहे थे। अन्तरिम सरकार के पहले गृहमंत्री लौह पुरुष भारत रत्न सरदार वल्लभ भाई पटेल ने पंडित जी को कहा कि इस पर हमें स्वतंत्र रूप से काम करने दें। सबकी सहमति हो गयी। सरदार जी ने सारे आजाद राजाओं की एक सामूहिक बैठक बुलाई और विशाल बंद कमरे में सबको बैठाकर उनकी रजामंदी मांगी और जिस नीति का उन्होंने अनुसरण किया उसे * गाजर और छड़ी की नीति कही जाती है। उन्होंने उनके पद,रुतबा आदि को बनाए रखने की बात की और प्रिवी पर्स ( शाही भत्ता या पेंशन) भी देने का वायदा किया। यह भी कहा कि आपकी प्रजा और आप दोनों भारतीय संघ में सुरक्षित रहेंगे और फिर सबने * लेटर औफ एनेक्सेशन ( विलय पत्र) पर अपने अपने हस्ताक्षर किए पर हैदराबाद, जूनागढ़,जिन्द और कश्मीर रियासतों के साथ* छड़ी की नीति अपनाते हुए उनको भी भारतीय संघ में मिला लिया परन्तु कुछ तकनीकी त्रुटियों और राजनीतिक भूलों के कारण जम्मू कश्मीर की समस्या पूर्ण रूप से उस समय हल नहीं की जा सकी जिसकी चर्चा हम यहां नहीं करना चाहते हैं जो आज भी विवादास्पद है।
अब इतिहास के उस मूल्यांकन को उपसंहारित करने का समय है कि जिस आजादी को हजारों लाखों की बलिदान और रक्तपात तथा आन्दोलन के अन्य स्वरूपों से पाया गया, जिसमें गांधी जी के नेतृत्व में नेहरु जी सहित टंडन जी, कृपलानी जी, लोहिया जी,गोखले जी,लाल,बाल,पाल जी,जे पी, अनेक छोटे बड़े नेता थे तो एक तरफ नेता जी,भगत सिंह जी, आजाद जी, खुदीराम जी,मास्टर दा,लाला हरदयाल जी, रासबिहारी जी,फड़के जी, चाफेकर बन्धु , अशफाक जी, विस्मिल जी आदि थे जिनकी लम्बी फेहरिस्त है और 
उसके श्रेय और सम्मान के लिए इतिहास ने दिल खोलकर लिखा पर जिस एक व्यक्ति लौह पुरुष भारत रत्न सरदार वल्लभभाई पटेल ने अकेले दम,बगैर खून खराबा के विशाल भारत को एक एकीकृत नक्शे पर ला खड़ा किया,उसे मुखपृष्ठ पर न रखकर हाशिए पर रखने का काम किया गया जो इतिहास की सबसे बड़ी बेईमानी कही जा सकती है।
स्मरण रहे कि इतिहास भी इतिहास को कभी माफ नहीं करता है और जब आने वाले कालखंडों में काल इतिहास को लिखेगा तो बहुत लोग हाशिए पर चले जाएंगे और हाशिए वाले नाम मुखपृष्ठ पर आ जाएंगे।
सत्यमेव जयते।
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सामाजिक समरसता एवं समावेशिता, सभ्यता एवं संस्कृति, २७ १० २५ 
प्रकृति एवं पर्यावरण,
विज्ञान तथा अध्यात्म एवं भारतीयता का अद्भुत समन्वय एवं समागम:: सूर्य षष्ठी व्रत या छठ पूजा।

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भारत वैश्विक स्तर पर एक ऐसा देश है जिसका स्वरूप एक विशाल सागर की तरह है जिसमें वैश्विक सभ्यता एवं संस्कृतियां मिलकर एकाकार हो गयी है और इसीलिए कहा भी जाता है कि,
अनेकता में एकता हिन्द की विशेषता।
भारत भूमि पर्व त्योहारों और उत्सवों की भूमि है जहां हर प्रदेश के ऋतु की विशिष्टता के अनुरूप तीज त्योहारों के आयोजन होते हैं जिसकी विविधता उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम में देखी जा सकती है। लेकिन उन सारे पर्व त्योहारों में कार्तिक मास में भारत के हिन्दी पट्टी विशेषकर बिहार, उत्तरप्रदेश, झारखण्ड और दिल्ली में इसका आयोजन एक बड़े उत्सव के रूप में किया जाता है। ऐसे इसका मुख्य केन्द्र बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश रहा है परन्तु आज की तारीख में इसका स्वरूप वैश्विक होता जा रहा है। दक्षिण और उत्तर पूर्व के कुछ हिस्सों को छोड़कर यह सम्पूर्ण रूप से भारतीय हो चुका है।
यहां तक कि बिहार और यू पी के लोग संसार के जिस कोने में जाकर बसे हैं, वहां इसका आयोजन कर रहे हैं।
यह अद्भुत उत्सव है जो एक साथ त्योहार,पर्व और व्रत है जो अन्य किसी भारतीय त्योहारों में देखने को नहीं मिलता है।
जैसा कि आलेख के शीर्षक में ही कहा गया है कि यह प्रकृति, पर्यावरण, सामाजिक समरसता, विज्ञान, अध्यात्म और संस्कृति का उत्सव है जो प्राकृतिक सत्ता के प्रतीक सूर्य की उपासना करने के साथ साथ एक साथ अनेक सन्दर्भों से जुड़ा हुआ है।
हम सबसे पहले इसके सामाजिक समरसता को ही लेते हैं तो इसमें जिस सूप में नैवेद्य ( फल सहित) रखकर 
अर्घ्य दिया जाता है वह सूप * डोम या मुसहर  के द्वारा बनाया जाता है जिसे अति निम्न या अछूत समझा जाता है परन्तु इस पवित्र पर्व का वह मुख्य अंग हो जाता है। कुम्हार के यहां से मिट्टी का दीया कटोरा और पनवारी के यहां से पान सुपारी लाया जाता है। फल आदि की 90-95% दूकानें मुस्लिम समाज की होती है जहां से नारियल सहित सारे फल खरीदे जाते हैं।
नाई व्रती सहित सभी सदस्यों के नाखून काटने ( नरहनी से स्पर्श कराना) का काम करता है जिससे शुद्ध होकर** नहाय‌ खाय की शुरुआत की जाती है। है न अद्भुत कि समाज के हर वर्ग के लोगों की हिस्सेदारी होती है। सारे नदी पोखर के घाट साफ और स्वच्छ कर दिए जाते हैं। गांव शहर की सड़कें धोकर साफ कर दी जाती है मानो प्रकृति और पर्यावरण का श्रृंगार कर दिया जाता है। चारो तरफ पवित्रता का माहौल बन जाता है। यह आनन्द उत्सव के साथ साथ चार दिनों की साधना होती है,लोग सूर्य के प्रति अपनी श्रद्धा, सम्मान और निष्ठा प्रकट करते हुए पारिवारिक आरोग्य एवं सर्व कल्याण की कामना करते हैं। समाज और देश की सुख शांति की कामना करते हैं।
यह विशुद्ध प्राकृतिक पूजा ही सिर्फ नहीं है बल्कि यह हिन्दू जीवन के वैज्ञानिक कर्मकांड, सामुदायिक चेतना बोध,पुराण परम्पराओं और आध्यात्मिक चेतना से भी जुड़ा पर्व और व्रत है जिसकी जड़ें ऋग्वैदिक काल से लेकर रामायण, महाभारत और मध्ययुगीन भारतीय हिन्दू सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन से जुड़ी हुई है।
ऋग्वेद में उषा (प्रातःकालीन सूर्य)और प्रत्यूषा (संध्या कालीन सूर्य) की पूजा और आराधना का प्रावधान रहा है जो आज भी प्रातः अर्घ्य और संध्या अर्घ्य का प्रतीक है।
रामायण में जानकी जी द्वारा भी सूर्य आराधना के प्रसंग मिलते हैं और महाभारत में भी कष्टों से निवारण के लिए द्रौपदी द्वारा सूर्य व्रत के प्रसंग मिलते हैं।
साम्ब पुराण में पुत्र प्राप्ति के लिए राजा प्रियंवद को महर्षि कश्यप द्वारा सूर्य पूजा के लिए निर्देशित किया गया था। ब्रह्मा जी की मानस पुत्री षष्ठी के नाम पर इसे सूर्य षष्ठी या छठी मैया का भी सम्बोधन दिया जाता है जो दूध पूत और आरोग्य का आशीर्वाद देती हैं।
ईरानी सभ्यता और संस्कृति में सौर उपासना और आराधना एक महत्वपूर्ण विषय है जिसमें उनके सौर पुरोहितों को * मागी या मग कहा जाता था और उन्हें भारत में भी सौर पूजा आराधना के लिए आमंत्रित किया गया था। अग्नि मंदिर में अग्नि पूजा उसी सौर ऊर्जा की पूजा का प्रतीक है और आज भी पारसियों के अगियारी होते हैं।।
मध्ययुगीन भारत में भारत के हिन्दू समाज के पांच पंथों में सौर मत या पंथ बड़ा महत्वपूर्ण था जिसके प्रमाण आज भी मोढेर मंदिर ( गुजरात) मार्तण्ड मंदिर ( कश्मीर) और सूर्य मंदिर कोणार्क मंदिर आदि के रूप में मौजूद हैं। इसी कालखंड में शैव, शाक्त और वैष्णव मतों के बढ़ते प्रभाव और इस्लामी आक्रमण के कारण यह पंथ गौण होता चला गया परन्तु यह सूर्य षष्ठी या छठ  व्रत के रूप में पुनर्जीवित होकर स्थापित हो गया। आज इसका स्वरूप धीरे धीरे भारत की सीमाओं से पार चला जा रहा है।
अब जहां तक इसके वैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक, प्राकृतिक, सांसारिक और सांस्कृतिक आदि कारणों की बातें हैं तो ये सारे कारण इस व्रत में एक साथ समाहित हैं।
हिन्दू समाज में यही एक पर्व और व्रत है जो बिना पौरोहित्य नेतृत्व के सम्पन्न किया जाता है।
इसका सामाजिक पक्ष समरसी और समावेशी है जिसमें जाति, वर्ग, ऊंच नीच,अमीर गरीब आदि सारे भेद स्वत: स्फूर्त मिट जाते हैं। एक ही नदी पोखर घाटों पर लोग समेकित रूप में बड़ी श्रद्धा और निष्ठा के साथ भगवान आदित्य को अर्घ्य दिया जाता है।
बरसात खत्म होते ही ऋतु परिवर्तन के कारण होने वाले आधि व्याधियों से यह शरीर की रक्षा करता है। उपवास व्रतियों को रोगमुक्त करता है जिसे आज का आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार करता है कि 48 घंटों का लागातार अनाहार और निर्जल रहना बीमार और मृत कोशिकाओं को पुनर्जीवित कर देता है।
यह हमारी सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है।
हम प्रकृति की शाश्वत और सनातन सत्ता की आराधना उपासना कल भी करते थे,आज भी करते है।
यह व्रत एक साथ आस्था, श्रद्धा, विश्वास, विज्ञान, प्रकृति,अध्यात्म और सामाजिकता 
का प्रतीक है।
हम सूर्य की पूजा उपासना सिर्फ इसलिए नहीं करते हम इन्हें एक देवता मानते हैं बल्कि हमारे सौरमंडल के ये मुखिया और अक्षूण्ण ऊर्जा के स्रोत हैं और हमारी सृष्टि के सृजन,लय और संहार के कारण शक्ति हैं जिसे आज का खगोल भौतिकी भी स्वीकार करता है।
अन्य मत पंथों में सूर्य भले एक आकाशीय पिण्ड भर है परन्तु हिन्दू जीवन दर्शन और चिन्तन में यह देवेश्वर के रूप में पूजित हैं और प्राचीन काल से इनका अस्तित्व वैश्विक रहा है।
सूर्य पूजा का इतिहास चीन, जापान,मिस्र,ईरान,ईराक,माया,इन्का और ग्रीको रोमन सभ्यता और संस्कृतियों में भी पाया जाता रहा है जिनके प्रमाण आज भी अवशेषों और अभिलेखों में उपलब्ध हैं।
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अहंकार और निरहंकार ( Ego and egolessness) २९ १० २५ 
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जीवन का अस्तित्व बहुआयामी होता है जिसे हम मुख्यतः सांसारिक (वैज्ञानिक) और आध्यात्मिक दो नजरियों से देखते हैं या अब तक देखा जाता रहा है जिसमें ये दोनों भाव सन्निहित होते हैं।
सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन में दोनों के अलग-अलग महत्व हैं जिनका अवलोकन किया जा सकता है परन्तु ध्यान रहे कि हम एक साथ समान रूप से दोनों जीवन नहीं जी सकते हैं इसलिए दोनों को समझना और जीवन के व्यवहार में लाने को समझना जरूरी होता है। इसमें भी एक दुविधा है कि आमजन जो कम पढ़े लिखे, अशिक्षित और 
स्वचैतन्य नहीं हैं,इस भेद को सही सही नहीं समझ पाते हैं। सामान्यतया वे आपस की बोलचाल की भाषा में इसे घमन्ड और भला शब्दों से संज्ञायित करते हैं परन्तु जो प्रबुद्ध और स्वचैतन्य हैं,इनके भेद को अपने अपने तरीके से समझते और 
व्याख्यायित करते हैं।
स्व बोध एक तरह से अहंबोध का ही रूप है जो हम सबके पास होता है जो सांसारिक जीवन का एक प्रबल पक्ष है कि अहंकाररहित या निरहंकार होना सहज नहीं है। इसके भी दो आयाम या पक्ष‌ हैं जिसे हम नाकारात्मक और साकारात्मक या रचनात्मक दो रूपों में 
देख और महसूस कर सकते हैं। हर आदमी को चाहे उसका सामाजिक, आर्थिक,
और शैक्षणिक स्तर जो भी हो,इस भाव से कमोबेश ग्रसित रहता है क्योंकि यह अस्तित्व से जुड़ा सवाल बन जाता है और व्यक्ति के स्वबोध के रक्षार्थ इसका होना भी जरूरी समझा जाता है। यह मनुष्य को स्वाभिमानी और प्रतिस्पर्धी बनाने का काम करता है परन्तु इस प्रतिस्पर्धा की भावना जब होड़ में रूपांतरित होने लगती है तब नाकारात्मक और विनाशक हो जाती है। प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए कि हमें हमारे जीवन में श्रेष्ठ बनना है परन्तु वहां*
ईर्ष्या, द्वेष,हिंसा आदि के भाव नहीं होने चाहिए और ऐसा होता है तो मानवीय मोल और मूल्य दोनों नष्ट हो जाते हैं। कविवर गुप्त जी कहते हैं,
सब जाए अभी पर मान रहे
मरने पर गुंजित गान रहे 
परन्तु जब यह भाव अहंकार अर्थात् हम ही हैं के भाव में रूपांतरित होने लगता है तब यह रचनात्मक और सृजनात्मक होने के बजाय विनाशक हो जाता है। वहां जिस प्रतिस्पर्धा से हम आगे बढ़ने के लिए संघर्षरत होते हैं, वहां हम ईर्ष्या,द्वेष,हिंसा आदि भावों के शिकार हो जाते हैं और सांसारिक जीवन भी निरर्थक हो जाता है। जीवन की सार्थकता इसी में है कि सत्ता,पद,पैसा, प्रतिष्ठा आदि के नहीं रहने की अवस्था में भी हमारा सम्मान और हमारी प्रतिष्ठा बनी रहे।
ठीक इसके विपरीत जब हम जीवन के आध्यात्मिक पक्ष का आकलन करते हैं तो 
तो अध्यात्म और‌ अहंकार दोनों विसमांगी अवयव सिद्ध होते हैं कि  स्वबोध और स्वचैतन्य बोध दोनों हमें पतनोन्मुख बनाने का काम करने लगते हैं,इस सन्दर्भ में सद्गुरु कबीर साहब ने कहा भी है कि,
लघुता ते प्रभुता मिले
प्रभुता ते प्रभु दूरी
चिंटी शक्कर लै चली हाथी के सिर धूरी 
अर्थात् भगवत्ता या प्रभुता को पाने के लिए विनम्र, सहज,
ग्राह्य और सरल होना जरूरी है। निरहंकार होना अर्थात् सर्वश्रेष्ठ होने के भाव को त्यागना ही परम सत्य को जानने के मार्ग को प्रशस्त करता है। निरहंकार हृदय ही स्वीकार्यता के गुण को धारण कर सकता है,सहजता और सरलता से ही पानी और हवा अपने मार्ग को खोज लेते हैं जो इस बात के प्रमाण हैं कि सरल और सहज ही वे गुण हैं जो हमें हमारे अहंकार स्वबोध से मुक्त कर सकते हैं जिससे विपरीत और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हम मान सम्मान को नहीं खोते हैं।
शक्ति, सामर्थ्य और धन सदैव एक समान नहीं रह सकते, सबकुछ बदलते रहते हैं इसलिए गुरूर, अहंकार,घमन्ड आदि 
क्षणिकवादी चेतना हैं जिनका अस्तित्व सूर्य और परछाई की तरह होती है, जबतक सूर्य अर्थात् क्षमता और सामर्थ्य है, कोई नजर आता है और अंधकार के आते ही वह अस्तित्वहीन हो जाता है।
इसलिए आत्मसम्मान,
आत्मगौरव,स्वबोध आदि की चेतना हो परन्तु वह अहंकार, सर्वश्रेष्ठता, नाकारात्मक प्रतिस्पर्धा आदि से ग्रसित नहीं हो,इसी में जीवन की सार्थकता है,यही जीवन व्यवहार का यथार्थ है।
Life without the feelings of nothingness and egolessness,
makes a man having qualities of everything, as everything is the consequences of nothiness.
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अच्छा दिखना और अच्छा होना ३० १० २५ 
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अच्छा दिखने के लिए अच्छा करना और बुनियादी तौर पर अच्छा और नेकदिल होना, दोनों अलग-अलग विषय हैं। एक में आन्तरिक गुणधर्म को ढांकने के लिए बाह्याचार अपनाया जाता है और दूसरे में जो अन्दर है वह बाहर होता है जिसे प्रदर्शन करने की कोई जरूरत नहीं होती है।
मनुष्य का यह चरित्रगत गुण दोष है जो स्वाभाविक रूप से 
हमारे अस्तित्व से जुड़ा होता है। हमारे समाज में ही जिसे हम रोज देखते सुनते हैं कि कोई सम्पन्न और समृद्ध व्यक्ति भी सादगीपूर्ण पोशाक, सादा रहन-सहन, परिष्कृत और परिमार्जित आचरण व्यवहार रखते हैं जो उनका बाह्य प्रदर्शन नहीं बल्कि उनका स्वभाव होता है। भारत और विदेशों में भी ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जहां बड़े बड़े लोग इस 
आडम्बर से जीवन भर दूरी बनाकर रखे और एक शानदार और जानदार जीवन जीते रहे हैं।
राजेन्द्र बाबू भारतीय गणतंत्र के दो सत्र राष्ट्रपति के पद पर रहे, परन्तु वही सस्ते खादी के कुर्ते,धोती और बंद गले का कोट पहनते रहे। कलाम साहब भी उन्हीं के परम्पराओं पर चलते रहे, यद्धपि वे कोट पैंट पहनते रहे पर तामझाम से दूर रहे।
शास्त्री जी तो अपवाद रहे कि उनके कुर्ते का कोना फटा रहा पर उन्होंने ध्यान न दी और जब आदरणीय ललिता जी ने ध्यान दिलाया तो उन्होंने जवाब दिया कि करोड़ों भारतीयों को तो यह भी नसीब नहीं है।
कुछ ऐसी बातें विदेशों में सहजता से देखने को मिलती है। ऐसा नहीं था कि विश्व विख्यात साहित्यकार जौर्ज बर्नार्ड शॉ निर्धन थे परन्तु साहित्य साधना में डूबे रहने वाले जौर्ज के लिए सूट कोई मायने मतलब नहीं रखता था। एक बार उनके एक धनाढ्य मित्र ने शाही पार्टी का आयोजन किया और उन्हें आमंत्रित किया।
वे बड़ी सहजता से अपने अध्ययन कक्ष से उठे और चल दिए।
वहां पहुंचने पर उनके मेजबान मित्र ने उन्हें उपर नीचे देखा और मुंह बनाकर कहा कि शाॅ, तुम्हें ऐसे पोशाक में नहीं आना चाहिए था। जौर्ज उल्टे पांव घर आए और एक सूट
पहनकर वापस अपने मित्र के घर पहुंचे तो वह मित्र देखकर बड़ा खुश हुआ और उन्हें उनके टेबल पर सम्मानित अतिथि की तरह बैठाया और वेटर को भोजन सर्व करने को कहा। जब सबकुछ मेज पर आ गया तो उन्होंने एक अजीब व्यवहार किया। केक उठाकर कोट की जेब में भरते हुए बोले,लो कोट,केक खाओ,लो पैंट, पेस्ट्री खाओ,लो टाई,मीठाई खाओ। यह देखकर उनके दोस्त और लोग हक्के-बक्के रह गए।
उनके दोस्त ने कहा,
जौर्ज,यह क्या पागलपन है,तब जौर्ज
ने बड़ी सहजता से कहा,
इसके ठीक पहले खाना खाने जौर्ज आया था तो तुमने लौटा दिया,अब जो आया है, उन्हें खिला रहा हूॅं। वह आदमी समझ गया और बड़ा शर्मिंदा हुआ और अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांगी और खाने का आग्रह किया। अब यहां एक और बात उठकर सामने आती है कि क्या किसी विशेष आयोजन के लिए विशेष पोशाक की जरूरत नहीं होती है,होती है पर यह आदमी से आदमी पर निर्भर करता है। कोई व्यक्ति स्वयं में अपनी पहचान होता है और किसी को वस्त्र आभूषण आदि से पहचान बनानी पड़ती है।हां,यह भी सही है कि सभी मनुष्य खास नहीं होते, उन्हें खास दिखने के लिए खास दिखाने की जरूरत होती है और यही बाह्याचार कहलाता है। हम अच्छे और नेकदिल नहीं होते,दिखाना पड़ता है और यही दिखावट हमारी मौलिकता को नष्ट कर देता है परन्तु यह भी सच है कि आज की सामाजिक व्यवस्था में हम सबको ऐसा करना पड़ता है।
आज की हमारी सामाजिक आधारभूत 
संरचनात्मक व्यवस्था में सबकुछ उल्टा पुल्टा हो रहा है। जो दिखता है वो होता नहीं है और जो होता है वो दिखता नहीं है, यथार्थ इनसे अलग होता है। लिंकन भी इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं,एक ऐसा अमरीकी राष्ट्रपति जिनके पास पहनने लायक सूट तक नहीं था तो उन्होंने अपने एक दोस्त से सूट उधार लेकर पहली बार कोर्ट जाना पड़ा था और फिर वे साधारण सूट ही जीवन भर पहनते रहे।
जीवन का यही यथार्थ भी है कि सहज होना उतना सहज नहीं है जितना कि असहज हो जाना। हम हमारे जीवन में निजी जिन्दगी से लेकर सामाजिक जीवन में भी एक चेहरे पर अनेक चेहरे लेकर चलते और जीते रहते हैं और एक दिन यहां से विदा हो जाते हैं।
हालांकि एक चेहरे को लेकर जीना किसी साधना या तपश्चर्या से कम नहीं होता है जो सबके लिए संभव और व्यवहारिक भी नहीं है पर हमें महत्तम कोशिश करनी चाहिए कि कम से कम चेहरों के साथ जिया जाए कि वक्त की आंधी एक न एक दिन हमारे चेहरों से मुखौटा हटा ही देती है और हम जो पर्दे के पीछे होते हैं, सामने आ जाते हैं।
पर यह हमारी विवशताएं भी होती है कि सबके चेहरों पर चेहरा होता है और हमें एक चेहरा लेकर अगर जीना हो तो बहुत कुछ तजना पड़ता है और जो बहुत कुछ तजने के लिए तैयार हो,वही एक चेहरे के साथ जीने का माद्दा रखता है।
अच्छा या बुरा होना हमारा जन्मजात गुण दोष नहीं होता है। हम हमारे परिवार,समाज,
परिवेश, सान्निध्य आदि से बहुत कुछ पाते हैं और वैसा ही आचरण करना सीखने लगते हैं। राजनीतिकरण और बाजारीकरण के इस 
दौर में हम हमारी अच्छाइयों और सदाशयता का चाहकर भी जी नहीं पाते हैं कि यह कठोर और क्रूर समाज हमें 
झूठ फरेब के साथ जीने के लिए विवश कर देता है और हम फरेब करने लगते हैं। फिर भी इतनी कोशिश तो करनी ही चाहिए कि संसार को तो नहीं पर खुद को जवाब देने में सक्षम हो सकें, जीवन के अंतिम समय में खुद से खुद को शर्मिन्दा न होना पड़े और यही अच्छा और नेकदिल होना है, महत्तम कोशिश करते रहनी है कि हमसे कम से कम बुरा हो,किसी का अहित न हो और न हो तो अच्छा करने की कोशिश तो सदैव होनी ही चाहिए।


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भारत की एक ऐसी महान आत्मा जिनके ३१ १० २५ 
साथ इतिहास ने कभी
इन्साफ नहीं किया।
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यह निर्विवादित सत्य‌
है कि भारत की आजादी की लड़ाई में 
हजारों हजार लोगों ने 
अपने बलिदान दिए,अपना सर्वस्व देश की बलि वेदी पर 
न्योछावर कर दिया परन्तु आजादी के बाद ब्रिटिशों ने जिस अवस्था में भारत को लाकर छोड़ दिया था,उस आजादी को अपने स्वरूप में बनाए रखना उस आजादी की लड़ाई से किसी भी रूप में कमतर नहीं था। आजादी की लड़ाई में तो भारतीय समाज के हर वर्ग के लोगों की भागीदारी थी परन्तु टुकड़े टुकड़े में मिले भारत को एक सूत्र में बांधने का काम सबके वश का नहीं था।
वैश्विक स्तर पर दो बड़े यूरोपीय राष्ट्रों यथा जर्मनी और इटली के एकीकरण में जो भूमिका बिस्मार्क और गैरीबाल्डी की रही थी,वही भूमिका भारत के एकीकरण में 
लौह पुरुष भारत रत्न सरदार वल्लभभाई पटेल की रही है और जो परिस्थितियां उन दोनों यूरोपीय राष्ट्रों की थी,उनसे भी भिन्न भारत की थी और अकेले दम जो काम सरदार जी ने किया वह विश्व इतिहास में अनुपम और अकेला है परन्तु दुःख और पीड़ा इस बात की है कि इसके लिए जो सम्मान और प्रतिष्ठा इनको दी जानी चाहिए थी, आजतक नहीं दी गयी। बच्चे और बड़ों की किताबों में जितनी चर्चा होनी चाहिए थी, नहीं की गयी और यही उनके साथ नाइंसाफी है।
बगैर खून खराबे के लगभग छः सौ देसी राजे रजवाड़े को भारतीय संघ में मिलाने का काम किया। उन्होंने अपनी 
** गाजर और छड़ी की नीति का प्रयोग करते हुए यह महान कार्य किया जिसमें हैदराबाद, जुनागढ़,जीन्द और जम्मू-कश्मीर में इन्हें सैन्य ऑपरेशन करना पड़ा था। हैदराबाद का निजाम पाकिस्तान समर्थक था पर ऑपरेशन पोलो के द्वारा उसका भी ईलाज किया गया और निजाम रातों-रात पाकिस्तान भाग गया।
जींद और जुनागढ़ को भी ऐसे ही मिलाया गया परन्तु जम्मू कश्मीर तत्कालीन राजनीतिक निर्णय और पेचीदगियों का शिकार हो गया था जिसमें हरि सिंह को अन्त में समर्पण करना पड़ा था परन्तु पाकिस्तान के छल के कारण कश्मीर का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान ने हड़प लिया जो आज भी विवादास्पद है। परन्तु शेष जम्मू कश्मीर का विलय भी सरदार जी की ही उपलब्धि रही है।
आज उन्हीं महान विभूति के नाम पर हम राष्ट्रीय एकता दिवस का आयोजन करते हैं और उन्हें मान
सहित श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
अब उनके सही आकलन और मूल्यांकन का समय है कि जो इतिहास ने नहीं किया वह वर्तमान करेगा।
राष्ट्रीय एकीकरण के महानायक के 150वीं
जयन्ती पर हम उनको शत-शत नमन करते हैं।
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नवंबर  : सम्पादकीय : आलेख 
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अरुण कुमार 
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ये भी हकीकत है। 
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अरुण कुमार २। ११। २५ 

भ्रम(Illusion), मृगतृष्णा(Mirage),  यथार्थ(Fact) तथा सत्य (Truth )जीवन की चार बड़ी अनुभूतियां और सत्य है। जीवन में यथार्थ और भ्रम का अन्तर्द्वन्द्व चलता रहता है परन्तु सत्य सबसे परे का विषय है पर जीने के लिए भ्रम का होना भी जरूरी है कि भ्रम सुख देता है,भ्रम के आवरण में लिपटकर हम बहुत कुछ विस्मृत करते हुए संसार में बने रहते हैं।यह एक मानसिक अवस्था है जो हमारी चित्त से जुड़ा होता है।

दुःख, पीड़ा या अवसाद के क्षणों में हम अतीत की सुखद और रोमांचित करने वाली स्मृतियों को जीने की अनुभूति करते हैं जो एक भ्रम की दशा का निर्माण करता है और हम एक निश्चित अवधि के लिए 

उन पीड़ाओं से मुक्त रहते हैं और फिर हम 

स्वाभाविक दशा में आकर पीड़ित हो जाते हैं और अन्तर्द्वन्द्व 

हमारे जीवन में अनवरत चलता रहता है। परन्तु उल्लेखनीय है कि भौतिक अर्थात् सांस्कृतिक दुनिया के लिए यह अनुभूति सुख पैदा करता है कि यह आसक्ति भाव है परन्तु सबके जीवन में एक समय ऐसा भी आता है कि बहुत सी चीजों से अनेक कारणों से विरक्ति या 

अनासक्ति के भाव पैदा होने लगते हैं और यही भ्रम के टूटने की प्रक्रिया है जो धीरे-धीरे उपजती और विकसित होती चली जाती है और इसकी अनुभूति सबको होती रहती है।

ये बात दीगर है कि भ्रम एक न एक दिन टूटता ही टूटता है और भ्रम का टूटना एकबारगी बहुत दर्द देता है पर यथार्थ का बोध भी कराता है। इसलिए भ्रम को समझते हुए स्वीकार करके जीने से जो अंतिम सत्य सामने आने वाला होता है,कम दुखदाई होता है।जब इसे व्यवहारवादी दृष्टिकोण से इतर होकर अध्यात्मिक दर्शन और चिंतन के नज़रिए से देखा जाता है तो शंकर का दर्शन इसे माया (Cosmic illusion) और प्रपंच(False Worldly Affairs) कहता है पर रामानुज इसे दृश्य जगत या  सादृश्य यथार्थ(visible World or Fact in Similarity )कहते हैं। वेदान्त, बौद्ध और जैन दर्शन और चिंतन में भी इनकी अलग-अलग व्याख्याएँ की गयी है पर समेकित रूप में अर्थ लगभग एक ही निकलते हैं कि जो है नहीं पर लगता है और उसका भी एक अस्तित्व है पर सांसारिकता में 

जीवन को जीने के लिए कुछ भ्रमों का पालना भी जरूरी होता है कि जीवन स्वयम् भी एक भ्रम है और यही भ्रम जिस क्षण टूटता है , हमारी मृत्यु हो जाती है। सांसों का आना जाना , रिश्तों का बनना बिगड़ना, सुख दुख की अनुभूति होना, एक ही घटना, वस्तु , व्यक्ति से एक कालखंड में प्रसन्न होना और दूसरे कालखंड में दुखी हो जाना , सब भ्रम ही तो है और इन्हीं भ्रमों से भ्रमित होकर जीना ही तो जीवन है। मेरा दोस्त है, संतान है, पति-पत्नी है, समाज है , रिश्तेदार हैं, सब ये ही दुख सुख के कारण है और सबके पीछे भ्रमावरण ही तो है जो सबको एक दूसरे से बांध कर रखे हुए है और जिस क्षण इसका भ्रम टूटता है सब सम्बन्ध बेमानी और निरर्थक साबित होने लगते हैं और तब बड़ी पीड़ा होती है।एषणा, कामना, तृष्णा और वासना सबके सब ही दुखदायी होते हैं कि चारों के अंत नहीं होते हैं पर क्या हम किसी वस्तु की , व्यक्ति की, क्रियाशीलता की  कामना या वासना(यह शब्द सिर्फ कामेच्छा से नहीं जुड़ा है बल्कि किसी भाव  या इच्छा की तीव्रता को भी वासना कहा जाता है) से कभी किसी क्षण मुक्त हैं क्या, कदापि नहीं और इन दोनों के पीछे भी वही भ्रम काम करता है कि वह वस्तु या व्यक्ति मेरा है और मेरे सुख का सेतु और हेतु है पर जिनसे सुख मिलते हैं, स्मरण रहे, दुख के सृजन के सेतु और हेतु भी वही होते हैं, अन्य नहीं पर बावजूद इसके हम सब भ्रम में ही सुखानुभूति करते हैं और जीवित रहते हैं 

और यही कारण है कि मृत्यु काल में जब एक निमिष में इस यथार्थ का बोध होता है तो आदमी रोने लगता है कि काश, इस यथार्थ का बोध हमें पहले हो गया होता तो इस क्षण इतनी पीड़ा न होती। हम मरते हुए को देखते है , मृत को भी देखते है पर फिर भी जीवन में जीने का भ्रम और उसके सुख के यथार्थ को  नहीं समझ पाते हैं कि इसी भ्रम का नाम  संसार, सम्बन्ध,अनुराग, विराग, प्रेम, घृणा, माया,मोह,जीवन और मृत्यु है जिसकी अनुभूति या तो टूटने से होती है या इसके सच के साक्षात्कार से होती है।

जीवन मे हम सब कुछ खोते रहते हैं, पाते कुछ नहीं हैं और जिसे पाना कहते हैं, वह भ्रम है और भ्रम का टूटना ही खोना कहलाता है। हम पाए कब थे और खोए कब हैं, यह भी तो भ्रम ही है परन्तु भ्रम भी तो बड़ा प्यारा होता है, संसार है न, भ्रम भी है और यथार्थ भी है।

तो आइए , भ्रम ही सही प्रेम मे जीना तो सीखिए,प्रेम को समझना तो सीखिए,

किसी के दुःख, दर्द और पीड़ाओं की अनुभूति करना तो सीखिए, जीवन को जीने की कला तो सीखिए,किसी के दुःख में दुखी और सुख में खुश होना तो सीखिए,लेने की प्रवृत्ति तो सहज है,जो है उसे देना और बांटना तो सीखिए कि जो भी भ्रम है,उसे तो टूटना ही टूटना है पर यथार्थ और सत्य को जानकर आत्मसात करना भी तो सीखिए और यह सीखना और जीना ही तो वास्तविक जीवन है।

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सादर मंगलकामनाएँ

सादर सु प्रभात 

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अनुभूति अभी की ०३ ११ २५ 
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सच चाहे जिस भी विषय से सम्बन्धित हो,वह विषय कोई वस्तु, व्यक्ति, विचार या सिद्धान्त हो सकता है,उसे जानना और तब मानना है वैसा ही दुष्कर कार्य जैसे स्वयं को जानना और स्वयं को मानना जिसकी ओर कोई इसलिए ध्यान नहीं देता है कि सब इसे अर्थहीन और 

निरर्थक विषय समझते हैं,फिर हम किसी सामान को खरीदते वक्त उसकी गुणवत्ता,कीमत आदि की पड़ताल क्यों करते हैं, है न जिज्ञासापूर्ण सवाल कि हम ऐसा क्यों करते हैं।

कपड़े की खरीदारी हो या बच्चों के लिए विद्यालयों का चयन हो या व्याधिग्रस्त होने पर चिकित्सक का चयन हो या यात्रा करने के लिए सुगम और सस्ते मार्ग का चयन हो या घर मकान बनाने के लिए 

जमीन और परिवेश का चयन हो आदि आदि,ऐसी हर क्रियाशीलताओं में हम चयन करने के पूर्व 

अच्छी तरह छानबीन करते हैं और तब हम चयन करते हैं, हम सब ऐसा करते हैं कि यह हम सबकी सहज वृत्ति होती है और यह सब हम सिर्फ वर्तमान को देखकर नहीं करते हैं बल्कि भविष्य के मद्देनजर करते हैं और करना भी चाहिए कि हमारे आज का चयन हमारे भविष्य की बुनियाद होती है।

राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय नीतियों का निर्माण भी इसी आधार पर किया जाता है जिसमें वर्तमान की जरूरतें और भविष्य की आशंकाएं और संभावनाएं जुड़ी होती हैं और इसमें हुयी गलतियां दूरगामी प्रभाव डालती हैं जिससे हमारे निजी, जीवन से लेकर, सामाजिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय,सभी प्रकार की परिस्थितियां प्रभावित होती हैं जिस पर आम जन की गहरी नजर नहीं होती है। हम बड़ी सहजता से अपनी वर्तमान जरूरतों को देखते हैं और भविष्य को अनदेखा करते हैं और पेशेवर बौद्धिक लोग इसी का फायदा उठाकर अपने स्वार्थ को साधने में सफल होते हैं।

इस मनोविज्ञान को समझने के लिए हमें अतीत की ओर झांकने की जरूरत होती है कि अतीत अर्थात् इतिहास एक बेहतरीन शिक्षक, पथ-प्रदर्शक और हमारा सुधारक होता है और जो इतिहास का अवलोकन करते रहते हैं उन्हें अगर घाटा उठाना पड़ता है तब कम घाटा सहना पड़ता है। यह सामाजिक राजनीतिक जीवन में सहजता से द्रष्टव्य होता है।

आमतौर पर हम इस व्यवहारिक सिद्धान्त की अवहेलना करने के कारण वर्तमान में कुछ लाभान्वित तो हो जाते हैं पर भविष्य सदैव घाटे का सौदा होता है। अब इसमें दो तीन बातें और उभर कर सामने आती हैं कि व्यक्तिगत हित,वर्गगतहीत, सामूहिक या बहुसंख्यक हित,किनके आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए जो बड़ा कठिन सवाल है कि हम कैसे निर्णय लें। यह विषय किसी की मानसिकता को भी विचलित और उद्वेलित कर सकता है। एक पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक दार्शनिक कहता है,

It is always a conflict in one's mind, heart and brain to judge and choose a way in life for the betterment of one's life or for the society.

But this decision depends on the circumstantial needs and requirements. If the issues r concerned to mass interest one must choose  the way for the mass needs and pleasures. But if u r in danger,u will have to protect first urself then u can do something for the mass.

यह एक बड़ा और कड़वा सच है। जब हमें किसी विषय का चयन करना हो और वह सामान्य जरूरतों और सुखों से जुड़ा हो तो निज के हित और 

वर्गीय हितों के बजाय 

बहुसंख्यक हितों की अपेक्षा करनी चाहिए और यदि स्वयं का जीवन और भविष्य संकटापन्न हो तो पहले स्वयं की रक्षा करनी चाहिए ताकि फिर अन्य की रक्षा की जा सके। हम ही सबके हित साधक हो सकते हैं तो हमें स्वयं को सुरक्षित रखना होगा ताकि समूह या समुदाय की रक्षा भविष्य में की जा सके।

इसलिए चयन जब भी करें तो अतीत को साक्षी बनाते हुए, वर्तमान के हित को देखने के साथ साथ भविष्य की आशंकाओं और संभावनाओं पर भी नजर रखनी चाहिए कि जो चीजें वर्तमान में सुखकर लगती है वे सदैव भविष्य को संकटापन्न कर देती हैं।

जो रूचे लेकिन न पचे और स्वास्थ्य को हानि पहुंचाए,उनसे बचने की जरूरत होती है और जो रूचे,पचे और स्वस्थ्य को सुरक्षित भी रखे,वही खाना पीना चाहिए,यही जीवन का यथार्थ है।

सादर धन्यवाद 

सादर सु प्रभात।


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समय और हम ०४  ११ २५ 
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हमें समय को समझने की कोशिश करते रहनी चाहिए कि समय तो सबकुछ समझते रहता है, समझना हमें पड़ता है और जो समय को समझ लेते हैं,समय उन्हें दगा नहीं देता है।

समय की सत्ता अद्भुत है जो दृश्यमान जगत में तीन रूपों या अवस्थाओं में दृष्टिगोचर होता है तथा, अतीत या भूत,

वर्तमान और अनागत या भविष्य जिनमें अतीत मृत,भविष्य अनदेखा और वर्तमान सम्मुख होता है। हम मनुष्यों की सहज वृत्ति है कि हम सदैव अतीत के सुख और भविष्य के भय और आशंकाओं से घिरे रहते हैं परन्तु वर्तमान को जी नहीं पाते हैं जो हमें जीना सीखाता है।

समय हमें नानाविध तरीकों से सीखाता रहता है, सफलताएं विफलताएं,सुख दुःख,उतार चढ़ाव,रोग आरोग्य,जीत हार,खोना पाना,प्रेम घृणा आदि के माध्यम से समय हमें सीखाने का काम करता रहता है। समय, वास्तव में एक श्रेष्ठ गुरु, मित्र और मार्गदर्शक होता है जो हमें जीवन के मोल और मूल्यों को बताया करता है। यह समय ही है जो हमें हमारे वास्तविक अस्तित्व का बोध कराता रहता है। हम वहीं और वही रहते हैं पर समय हमें महत्वपूर्ण और महत्वहीन बनाते रहता है। समय जिसे हम काल भी कहते हैं,

किसी वस्तु, विचार या सिद्धान्त और और आदमी को उपयोगी और अनुपयोगी बनाते रहता है।

यह सूरज तो वही रहता है पर गर्मी में इसकी उपयोगिता और उपादेयता गौण हो जाती है पर सर्दी के आते ही वह हमारी जरूरत बन जाता है। काल की यही सत्ता अर्थशास्त्र के उपयोगितावाद के सिद्धान्त को स्थापित करता है कि कोई वस्तु कभी मूल्यहीन नहीं होता बल्कि काल और स्थान तथा मांग उसकी उपयोगिता तय करता है। वस्तु या सिद्धान्त या मनुष्य इसी काल की सत्ता से उपजी मांग के अनुरूप उपयोगी या मूल्यवान होता है और फिर अप्रासंगिक भी हो जाता है। हालांकि यह उपयोगिता या मूल्य सापेक्ष होता है कि जो चीजें क के लिए उपयोगी है वह ख के लिए भी उपयोगी हो,ऐसा नहीं हो सकता पर समय के बदलते आयाम के अनुरूप कीमत और जरूरतें बदल जाती है, कोई निश्चित औषधि एक निश्चित रोग के लिए अनिवार्य है पर एक स्वस्थ आदमी के लिए निरर्थक है। कुनैन की गोली एक मलेरिया ग्रस्त रोगी के लिए जीवन रक्षक औषधि है परन्तु टायफाइड रोगी के लिए निरर्थक है पर इसका अर्थ यह नहीं है कि कुनैन की गोली मूल्यहीन है।यह‌ काल और सामयिक जरूरत की मांग होती है, इसलिए हमें किसी को उपेक्षित भाव से नहीं देखना चाहिए।

समय ही मोल और मूल्यों का निर्माण और निर्धारण करता है। इसकी महत्ता पर जे थाॅमसन कहता है,

समय मनुष्य को मिला एक दिव्य वरदान है, उपहार है और इसका सही इस्तेमाल करना एक कला है। सच है कि जिन्होंने इस कला को समझा,परखा और इस्तेमाल किया, पराजित नहीं हुए और हुए तो फिर उठ खड़े हुए।

सेनेका कहता है, यह सच नहीं है कि हमारे पास समय‌ कम होता है पर हम समय बहुत बर्बाद कर देते हैं और जो समय बर्बाद करते हैं समय उन्हें बर्बाद कर देता है। गंभीरता के साथ सोचिए कि यह कितना बड़ा सच है जिसे सबको एहसास होता रहता है।

महान वैज्ञानिक बेंजामिन फ्रैंकलिन कहता है,

समय ही धन‌ है और इसका सही इस्तेमाल और बचत करना सीखने की जरूरत है।

धन समय का निर्माण नहीं कर सकता है पर समय पर समय का इस्तेमाल धन जरूर पैदा कर सकता है।

सुकरात जिसे ग्रीको रोमन दर्शन का प्रणेता कहा जाता है, कहता है,

समय हमें जीवन को जानने समझने का अवसर देता है,पर हम अनजाने में या जानबूझकर इसे नष्ट करते रहते हैं और समय हमें इसका पुरुस्कार और दण्ड दोनों देते रहता है।

अब इनका हमें आकलन और मूल्यांकन करने की जरूरत है कि हम हमें हमारे परिवेश समाज और राष्ट्र को समयानुकूल समझते रहने की जरूरत होती है। हमारा परिवार,हमारा समाज,हमारा देश और वैश्विक समाज हमसे कुछ मांगते रहता है और हम उसकी पूर्ति भी करते रहते हैं पर समय के अनुरूप उसकी बोध‌ नहीं कर पाते हैं। हम सब छोटी बड़ी सेवाएं देते रहते हैं पर समय की मांग को समझ नहीं पाते हैं और इसी समय को समझकर इसका सही इस्तेमाल करना ही समय की सच्ची पूजा और सच्चा मोल और मूल्य चुकाना है।

समय का यह दर्शन चिन्तन और व्यवहार जीवन के हर क्षेत्र में लागू है,हम चाहे जिस भी पेशे में हों,समय का सही मोल चुकाते रहना चाहिए तभी समय भी हमें उस मोल का मूल्य देते रहता है। कहा भी गया है,

One stitch in time saves nine,

रोग की पहचान, समस्या की परख अगर समय पर हो जाए तो उसका निदान निश्चित ही हो जाता है।

यह व्यवहार हमारे जीवन का उद्धारक सिद्ध होता है। एकबार नेपोलियन को उसके सलाहकारों ने सुबह में हमला करने को कहा परन्तु नेपोलियन ने समय की नजाकत को समझते हुए रात में ही शत्रुओं पर हमला कर दिया कि रात में आमतौर पर लोग आश्वस्त होकर रहते हैं और सुबह में सचेष्ट हो जाते हैं और नेपोलियन जीत गया।

काल की गति बड़ी क्षीप्र होती है, तीव्र होती है,इसकी गति और दिशा समझकर चलने पर ही हम अपने अस्तित्व को सुरक्षित रख सकते हैं और इस कठोर संसार

में जीवित रह सकते हैं।

सादर धन्यवाद 

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समस्याएं, विचार और हम : ७ ११ २५ 

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हम मनुष्य स्वयं को प्रकृति की श्रेष्ठतम रचना कहते हैं और ऐसा कहने के अनेक कारण भी हैं जो हमें अन्य प्राणियों से अलग करते हैं।

इस भिन्नता का कारण सिर्फ शारीरिक ही नहीं वरन् वैचारिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक भी है।

जिज्ञासा ऐसे तो सबके मूल में है जो अन्य जीव जन्तुओं में भी उपलब्ध है परन्तु हम मनुष्यों ने इसी जिज्ञासा का उपयोग करके हमने अपने आप को सर्वश्रेष्ठ बनाने का काम किया है।

लेकिन यह प्रकृति भी अद्भुत है कि जहां इसने हम मनुष्यों को अनेक गुण और क्षमताएं दी है, वहीं अनेक दुर्गुण और कमजोरियां भी दे रखी है जो हमारे गुण क्षमताओं के समानुपातिक चलते दिखाई देते हैं।

प्रेम,करूणा, अहिंसा क्षमा,दया, त्याग, सद्भावना,संवेदना,सहयोग, शान्ति पूर्ण सह अस्तित्व की चेतना आदि के बोध जहां हमारे अस्तित्व से जुड़े

हुए हैं वहीं ईर्ष्या,द्वेष,हिंसा,घात प्रतिघात,अन्याय, अधर्म,असत्य, अनाचार, कदाचार,

भ्रष्टाचार, बलात्कार आदि जैसे दुर्गुण भी हमीं से जुड़े हुए हमारे साथ साथ चलते हैं।

आज वैश्विक स्तर पर जितनी भी समस्याएं,

आधियां व्याधियां आदि नजर आ रही हैं,सबके जिम्मेदार भी हम ही हैं। 

समस्याएं बहुरूपिया की तरह होती हैं जिनके वैश्विक स्तर पर अनेक रूप हैं। वे

नानाविध प्रदूषणों के रूप में हैं जो जलवायु,पर्यावरण,

आहार,ध्वनि, जनसंख्या, वैचारिकी,जलीय आदि प्रदूषणों के रूप में उपलब्ध हैं और इनके निदान के लिए हर वर्ष अरबों रुपए खर्च किए जाते हैं पर परिणाम वही ढाक के तीन पात ही नजर आते हैं और अगर ये समस्याएं कुछ भी नियंत्रित नजर आती हैं तो दूसरी तरफ फिर बढ़ती चली जाती हैं और अगर सच पुछा जाए तो इनकी जननी 

वैचारिक प्रदूषण है। ये

विचार ही है जो सारे प्रदूषणों और व्याधियों की जड़ में है।

हम जो कुछ भी हैं, अपने विचारों के मूर्त रूप ही तो हैं,जो भाव विचार हमारे मनों मस्तिष्क में बनते रहते हैं, हमारे अवचेतन मन अर्थात् चित्त में संग्रहित होते रहते हैं और हमारी सक्रिय चेतना के अंग बनते रहते हैं।

बौद्ध दर्शन की गीता कही जाने वाली विख्यात ग्रंथ धम्मपद के दर्शन का सार भी यही है, तथागत सिद्धार्थ कहते हैं,

मन ही सबकुछ है,हम जैसा सोचते और विचार करते हैं,वैसा ही हमारा संसार बनता है। ऐसे ही विचार हमारे औपनिषदिक दर्शन में भी पाया जाते हैं। विचार अमूर्त चेतना है जो हमारे मूर्त संसार और संस्कारों का निर्माण करते हैं। हमारा संसार हम मनुष्यों के समस्त विचारों का एकीकृत समेकित रूप ही तो है।ये कर्म ही हमारे संसार का सृजन करते हैं।मन की शुद्धि और‌ विचारों की शूचिता और पवित्रता ही मुक्ति मार्ग को प्रशस्त करता है।

प्राचीन ग्रीको रोमन दर्शन के पिता सुकरात और प्लेटो का भी यही चिन्तन है कि हमारे अमूर्त विचारों की मूर्त और भौतिक परिणति यह संसार है,जैसे बीज में वृक्ष के सारे गुणधर्म समाहित रहते हैं वैसे ही हमारे विचार हमारे संसार का सृजन करते हैं।

आधुनिक पाश्चात्य दार्शनिक चिन्तन के प्रणेता रेने डेसकार्टेस कहते हैं,

मैं सोंचता हूॅं इसलिए मैं हूॅं अर्थात् हमारे सोंचने की प्रक्रिया ही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करती है,जैसे

किसी स्थान विशेष पर धीरे धीरे जमती हुयी मिट्टी एक बांध बना देती है,वैसे ही विचारों का सामूच्चय हमारे संसार का निर्माण कर देता है। आधुनिक मनोविज्ञान के पिता कहे जाने वाले विलियम जेम्स कहते हैं,

हमारे विचार जिन्हें हम देख नहीं सकते हमारे व्यवहार और आचरण में दिखाई पड़ते हैं, विचार ही मूल तत्व हैं जो वैश्विक स्तर पर व्यवहार के मानक तय करते हैं।

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर सहजता से कहा जा सकता है कि आज मानव समाज जिन समस्याओं और आपदाओं से घिरा हुआ है,सबके सब वैचारिक प्रदूषण की उपज हैं। हिंसा, अपराध,शोषण दोहन,

हत्या,लूट, बलात्कार,

राजनीतिक भ्रष्टाचार,

अन्याय और असमानता आदि वैचारिक प्रदूषण की परिणति हैं। जिस वैचारिक शूचिता और पवित्रता की बातें हमारे औपनिषदिक दर्शन और बौद्ध चिन्तन में है,अगर उस पर हमारी चेतना का फोकस हो तो वैश्विक स्तर पर ये आपदाएं स्वत:स्फूर्त तिरोहित हो जाएं पर हम वैचारिक प्रदूषण के शिकार हो चुके हैं।

इस त्रस्त मानवता का निदान और कुछ वैचारिक शूचिता और पवित्रता ही है।

जैसा कि ऊपर हमने कहा है कि हम विचार हैं तो विचार ही तो उनका समाधान ढूंढने का काम करेंगे पर हम यहां भी पाखंड और आडम्बर का भाव रखकर काम करते हैं। मन में कुछ व्यवहार में कुछ तो परिणाम भी कुछ अर्थात् अपेक्षित परिणामों की प्राप्ति के लिए हमें भीतर बाहर एक होना पड़ेगा अर्थात् ईमानदार दिखने में नहीं व्यवहार में भी ईमानदार बनना होगा। हमें अपने घर, परिवेश को साफ और स्वच्छ रखना होगा, मोहल्ला साफ हो जाएगा, मोहल्ले साफ रहेंगे तो शहर साफ हो जाएंगे और शहर साफ रहेंगे तो देश साफ और स्वच्छ हो जाएगा, फिर करोड़ों अरबों की बजट बनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी परन्तु हम यह छद्म व्यवस्था बनाए रखना चाहते हैं। जलवायु और पर्यावरण के प्रदूषण की समस्या, जनसंख्या नियंत्रण की समस्या, वैश्विक शांति आदि की समस्या,सबका निदान एक ही है, एकीकृत और ठोस और निश्चित 

विचार और उनका क्रियान्वयन और बगैर औषधि के सफल ईलाज और यह दर्शन नहीं व्यवहार है।

हमारी समस्याएं एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं जिन्हें गंभीरता से समझने की जरूरत है और जिस दिन ये बातें 

हमारे नेतृत्व वर्ग की समझ में आ जाएगी, समस्याएं खत्म हो जाएंगी पर हो नहीं रही है कि लोग अपने अपने निहीतार्थ इसे करना नहीं चाहते हैं और चाहना अर्थात् निष्ठावान होकर मन बना लेना ही, निदान है।

समस्याएं हमसे बनती हैं तो निदान भी हमसे ही होगा और इसके लिए कोई ईश्वर या परमात्मा आसमान से नहीं आएगा।

सादर सु प्रभात 

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सहज वृत्ति,चयन और क्रियान्वयन ८ ११.२५ 

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मन में हिंसा,ईर्ष्या,

द्वेष,धोखा फरेब,घात प्रतिघात रखकर कोई सुखी रहने की कामना कैसे कर सकता है,ये माना कि उपरोक्त सारे

भाव विचार कृत्रिम नहीं सहज और प्राकृतिक है जो हम मनुष्यों की सहज वृत्ति है पर क्या हम अपने मन चित्त में इन्हें स्थान देकर सुखी और 

प्रसन्न रह सकते हैं क्या,हमारी राय में तो कतई नहीं और यह सिर्फ वैचारिक और आध्यात्मिक विषय नहीं है, बल्कि विज्ञान सम्मत भी है।

ध्वनि की प्रतिध्वनि और क्रिया की प्रतिक्रिया तो सबने सुना पढ़ा और अनुभूति भी की होगी पर आज की तारीख में यह भी देखा जाता है कि जो लोग इन विकारों से ग्रसित हैं या इन मनोभावों के साथ जीते हैं तो बाहर से दिखने वाला वो जीवन वैसा नहीं होता है जैसा वो भीतर से जीते हैं कि भीतर बाहर के संघर्ष उनके भीतर चलते रहते हैं।

इस सन्दर्भ में एक शब्द है,अन्तर्द्वन्द्व अर्थात् भीतर में दो भावों के बीच चलने वाला संघर्ष जिससे शायद ही कोई मुक्त रहता है।

इसे आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में Internal clash

between two different streams of thinking या ideological clash कहा जाता है जिसका शिकार निम्न स्तरीय व्यक्ति से लेकर उच्च स्तरीय व्यक्ति भी होते हैं कि हमारा जीवन वैचारिक द्वन्दों से सदैव घिरा होता है कि क्या इसे करें कि न करें,यह खाएं कि न खाएं आदि आदि और 

यह हमारे मन और मस्तिष्क भीतर  एक जैव रासायनिक प्रतिक्रिया को जन्म देता है जिससे हमारा जीवन सरल और सहज नहीं रह जाता है और यह सहज वृत्ति 

भी है।

इससे सम्बन्धित और भी चिन्तन विकसित किए गए हैं जिन्हें intellectual dualism or dialectic selection theory भी कहा जाता है। लिविंग्स्टोन और रेन देकार्त जैसे दार्शनिक भी यही विचार रखते हैं कि हम किसी भी परिस्थिति में किसी वस्तु, विचार या व्यक्ति के बारे में सम्पूर्ण सच या उसके ज्ञान को नहीं प्राप्त कर सकते हैं कि सत्य एक होते हुए भी बहुलतावादी स्वरूप का होता है और इसलिए सबके राय और मत कालक्रम में बदलते रहते हैं।

हर हां में एक ना और हर ना में एक हां सदैव‌ छुपा रहता है जो हमारे मन में एक द्वन्द पैदा करता रहता है। जो है नहीं भी हो सकता है और जो है नहीं भी हो सकता है,इसी को जैन मत में 

*नय या सप्तभंगी तथा औपनिषदिक दर्शन में*नेती नेती का सिद्धान्त कहा गया है जो सदैव अन्तिम सत्य की ओर ले जाता है। 

जब हम ऐसे ही हिंसा कि अहिंसा,सत्य कि असत्य,क्रोध कि क्षमा, दण्ड कि पुरुस्कार,घात प्रतिघात आदि भावों के द्वन्द में फंसे रहते हैं तो उनके सामयिक 

जरूरत और उपयोगिता तथा उपादेयता के आधार पर हम उनका चयन करते हैं और जीवन का व्यवहार भी यही है।

मनुष्य इन कुवृत्तियों पर विजय नहीं पा सकता पर नियंत्रण तो स्थापित कर ही सकता है कि विजय पाने की अवस्था अर्हत की अवस्था होती है जिसकी प्राप्ति सबके लिए सहज हो ही नहीं सकती है तब हम अतिवाद से बचने के लिए, हां और ना के मध्य एक तीसरे समन्वयकारी मार्ग की खोज करते हैं जो अन्तर्द्वन्द्व की ही उपज होती है।

अन्तर्द्वन्द्व की अवस्था हमें हमारे भीतर की छुपी संभावनाओं और क्षमताओं को विकसित होने की संभावनाओं का सृजन करती है और हम सेलेक्टिव होकर 

वांछित का चयन करके उसका क्रियान्वयन भी करते हैं।

प्रकृति और परमात्मा ने इसीलिए हमें दो अद्भुत गुण दिए हैं,यथा, इच्छा स्वातंत्र्य और कर्म स्वातंत्र्य जिनके विवेक सम्मत प्रयोग करते हुए हम विरोधाभासों में से सहज और स्पष्ट का चयन कर सकते हैं और यही श्रेष्ठ मार्ग है।

बौद्ध दर्शन में अतिवाद से बचते हुए 

मध्यम मार्ग को अपनाकर चलना भी यही कहता है।

हिंसा अहिंसा क्रोध क्षमा दण्ड पुरस्कार आदि सहचर वृत्तियां हैं जिनके मध्य उचित 

और संतुलित समन्वय बनाकर चलना ही उनपर नियंत्रण पाने ही श्रेय और प्रेय है।

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इतिहास का सत्य और भ्रम : १२ ११ २५ 

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सत्य तो यही है कि हम सब सत्य को सत्य के रूप में स्वीकार ही नहीं करते हैं बल्कि उसको अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ कर विद्रूप करने की कोशिश करते है परन्तु यह भी सत्य है कि सत्य को चाहे जितना भी तोड़ा मरोड़ा जाए, सत्य तो सत्य ही रहता है।

हमलोगों में से अधिकांश ने ज्यामिति जरूर पढ़ा होगा कि कि किसी सूत्र या सिद्धान्त को साबित करने के बाद हमलोग 

Q E D ( Quad erad demonstrendum) लिखा करते थे जिसका अर्थ* यही साबित करना था,होता है और यह सूत्र आज भी सत्य है कि सत्य को भी सत्य साबित करना पड़ता है जबकि सत्य तो Axiom है, स्वयंसिद्ध 

होता है।

यह मानवीय समाज की बड़ी त्रासदियों में से एक बड़ी त्रासदी है कि सत्य को साबित करने के लिए भी प्रमाणों,साक्ष्यों,तर्कों,

दलीलों और उनके समर्थन में भी साक्ष्यों की जरूरत होती है। 

सत्य का स्वरूप आदि काल से प्रत्यक्ष,परोक्ष,

प्रच्छन्न,आभासी,

सापेक्ष, निरपेक्ष आदि रूपों में आता रहा है।

किसी समय पृथ्वी के आकार, सूर्य और पृथ्वी की गतियां, सौरमंडल की संरचना,

पंच पदार्थ आदि के बारे में भी नाना प्रकार की भ्रान्तियां थी,जो धीरे-धीरे दूर होती चली गयी और उनके सच सामने आते चले गए।

विशेषकर आज की न्यायिक व्यवस्था इस 

भ्रम और यथार्थ के मध्य झूलती दिखाई देती है और सत्य को सामने दिखाई पड़ने पर भी न्यायालयों को सत्य स्वीकार कर निर्णय देने के लिए**

साक्षी प्रमाण ( Eye witness) के साथ साथ अन्य मजबूत और प्रामाणिक साक्ष्यों की जरूरत होती है। कभी कभी नहीं बल्कि आमतौर पर असत्य या फरेब को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि सच भी झूठ के सामने 

नतमस्तक होते दिखाई पड़ता है और कभी कभी न्यायालय को यह भी कहते सुना देखा गया है कि,

हम जानते हैं कि आप निर्दोष हैं पर सारे साक्ष्य आपके विरुद्ध हैं जो आपको अपराधी साबित करते हैं, इसलिए हम चाहकर भी आपको बरी नहीं कर सकते हैं

और न्याय के सत्य का यह सत्य भी एक अद्भुत सत्य है और तब न्यायालय यह कहता है कि आपको स्वयं को निर्दोष साबित करने के लिए एक निश्चित समय दिया जाता है।

इस सत्य और असत्य की लड़ाई के मध्य सत्य कब और कैसे मौन हो जाता है,इसका एक नमूना देखिए,

2008 में दिल्ली के नोएडा में एक हत्या होती है जिसमें आरूषि तलवार नाम की युवती और उसके नौकर हेमराज की हत्या होती है,इसके सन्देह में उसके माता-पिता को गिरफ्तार किया जाता है परन्तु सी बी आइ उनके विरुद्ध पुख्ता सबूत कोर्ट के सामने पेश नहीं कर पायी और सन्देह का लाभ देते हुए कोर्ट ने उनको बाइज्जत बरी कर दिया।अब गौर करने वाली बात तो यह है कि सत्य है कि आरूषि और उसके नौकर हेमराज की हत्या हुई पर हत्या न तो साबित की जा सकी और न वास्तविक हत्यारे पकड़े गए पर उन दोनों की हत्याएं हुई,सत्य है।यह भारत ही नहीं दुनिया के इतिहास की अद्भुत घटनाओं में से एक है कि सत्य को सत्य साबित नहीं किया जा सका।

बस ऐसा ही हमारे जीवन में होता रहता है,हम सत्य को जानते हुए भी नहीं कह सकते कि यही सत्य है और असत्य उस असहाय और निर्बल सत्य पर विद्रूप हंसी हंसता रहता है।

हमारे समाज की आधारभूत संरचनाओं में जितने तत्व हैं,उसका यह नंगा चेहरा है कि सत्य असहाय, लाचार,विवश बनकर खड़ा रहता है और असत्य उस पर विद्रूप हंसी हंसते रहता है।

इसलिए सत्य को अपने अस्तित्व में बने रहने और स्वयं की रक्षा करने के लिए बड़े धैर्य,साहस और सहनशीलता की जरूरत होती है और इतिहास में इसके अनेक उदाहरण मौजूद हैं। भारतीय इतिहास लेखन ने भी ऐसे ही अनेक सत्यों की हत्याएं की है कि इतिहास लेखन का काम विजेता और शक्तिशाली ही करते रहे हैं, इसलिए मैकियाबेली एक जगह कहता भी है कि,

इतिहास लेखन और कुछ नहीं विजेताओं और शक्तिशालियों की गाथाएं हैं पर यह भी ध्यान रखना चाहिए कि काल की रैखिक और वर्तूल दोनों ही होती है, इसलिए इतिहास स्वयं को दूहराता भी रहता है।

इतिहास में कल जिन्हें

महान बताया जाता रहा है, कालान्तर में ऐसा नहीं दिखता है,भले ही ** एरियन और प्लूटार्क ने सिकन्दर को महान और विश्वविजेता बताने का काम किया,वह सिकन्दर तो झेलम की सीमा भी नहीं पार कर सका था और उसकी थकी,हारी और हतोत्साहित सेना जिसे अजेय कहा जाता था,मगध की सेना के पराक्रम से भयाक्रांत होकर वापस लौट गयी। वैसे ही भारत की आजादी की लड़ाई में जिन चेहरों को बड़े वर्णपट पर दिखाया जाता रहा है और किताबों में पढ़ाया जाता रहा है,आज वो यथार्थ नहीं एक भ्रामक विवरण साबित हो रहे हैं। हजारों हजार उन बलिदानियों को हाशिए पर खड़ा कर दिया गया और जो ढोल पीट रहे थे,वे मुखपृष्ठ पर ला दिए गए।

आज हम में से कितने लोग बाघा जतिन,बिनय,बादल, दिनेश, कन्हाई दत्त,

वासुदेव बलवंत फड़के, चाफेकर बन्धु,

मास्टर दा,लाला हरदयाल, मोहन सिंह,

सोहन सिंह,शचिन्द्र सान्याल,लचित बरफूकन,टांट्या भील,

इब्राहीम गार्दी,राजा सूरजमल जाट, ताना जी, संता जी,श्याम जी कृष्ण वर्मा,रोशन सिंह,पीर अली आदि हजारों हैं जिनके अप्रतिम बलिदानों से हम भारतीय वाकिफ हैं और नहीं हैं तो क्यों नहीं है कि इतिहास लेखन सदैव पूर्वाग्रह और दूराग्रहों से ग्रसित रहा है। जो विजेता और शक्तिशाली थे,उनके हाथों में संसाधन थे और इसलिए History was the matter from top to down but now a days it is from down to up.

हां,ऐसा भी नहीं है कि जो भी सच था उसे बिल्कुल से दबा दिया गया, दिखाया गया पर 

छोटे वर्णपट पर दिखाया गया,उनकी *औरा या छाया को कमतर बताया गया।

एक विधवा वृद्धा के तीन तीन बेटे मातृभूमि की बलि वेदी पर न्योछावर हो गए तो उनके लिए महज दस पंक्तियां ही लिखी गयी,जिस मास्टर सूर्यसेन ने पुरी ब्रिटिश सत्ता को ही चटगांव में चुनौती दे दी थी,एक पन्ना भर जगह दिया गया, जिन बिनय,बादल और दिनेश ने तत्कालीन बंगाल सरकार को चुनौती दे दी थी, उनके नाम पर कोलकाता में एक चौराहे का नाम भर दे दिया गया,सत्य के साथ यही बेईमानी की गयी पर सत्य तो सतही नहीं होता है, गहराईयों का विषय है,उसे मोतियों की तरह आज न तो कल खोजकर निकाला ही जाएगा और उसकी चमक दुनिया देखेगी।

इसलिए वह इतिहास जो जिसके साथ बेईमानी करता है,उसको एक दिन पश्चाताप करना पड़ता है और हमें भी इसलिए स्वयं के साथ और दूसरों के साथ भी ईमानदारी बरतनी चाहिए कि समय की गति सीधी और वर्तूल दोनों होती है।

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उधारी चरित्र और हम। १३ ११ २५ 

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हम जन्म से लेकर मरण तक उधार की जिन्दगी जीते रहते हैं।

जन्म एक स्त्री की कोख से, रक्त वीर्य का सम्बन्ध एक पुरुष से(ये अलग बात है कि वे हमारे जैविक माता पिता होते हैं)

जिस परिवार और समाज में हम पलते बढ़ते हैं सबके सब पारिवारिक और सामाजिक तौर पर हमसे जुड़े होते हैं और जो कुछ हम सब सीखते हैं उनमें सबसे बड़ा योगदान इन्हीं का होता है अर्थात् जन्म से शुरू हुई गाथा बस एक यात्रा की तरह चलती रहती है और हमारे पास जो कुछ अधिकांश होते हैं, उधार के होते हैं। पुनः जब हम थोड़ा जागरूक और चैतन्य होते हैं और जिज्ञासा वश कुछ नया जानने की कोशिश करते हैं तो हमारी चित्त में अर्थात् हमारी स्मृतियों में, अवचेतन मन में जो कुछ संग्रहित रहता है,वह नये को भी प्रभावित करता रहता है।

हमारे शरीर की सम्पूर्ण जैव‌ रासायनिक संरचनाएं जिन्हें हम जिनेटिक संरचना कहते हैं उन पर भी मातृ पितृ जनित गुणधर्मों के प्रभाव होते हैं जिनकी अनुभूतियां सबको नहीं होती और उन्हें ही होती है जो इन विषयों पर चिन्तन मनन करते रहते हैं और वे समझ पाते हैं कि अचेतन में हमने परिवार और समाज से क्या पाया और क्या खोया और इस खोए पाए के खेल में बहुत से अन्य प्रेरक तत्व शामिल होते हैं जिन्हें हम * प्रेरक और प्रभावी तत्व कहते हैं और करिश्मा ये है कि सबके सब उधार के होते हैं जिन्हें हम * महाजन येन गतो पन्था के नाम पर मानकर चलते रहते हैं और यह भी उधार के ही होते हैं और उनमें सार्वकालिकता हर जगह नहीं होती है।

चाहे भारतीय दर्शन और चिन्तन के विषय हों या पाश्चात्य के हों,हम उन्हें उद्धृत भर ही करते रहते हैं जिनमें हमारी मौलिकता कम और उधारी ज्यादा होती है।

उधार के विचारों की तरह हमारा जीवन में बहुत कुछ या यों कहा जाए कि कुछ छोड़कर अधिकांश उधार के ही

होते हैं। कपड़े,जूते, आहार विहार, रहन सहन,भवन निर्माण, लेखन,पठन पाठन, भाषण, विचार विमर्श आदि सभी में हम उधार के व्यवहार पर ही चलते रहते हैं और नतीजतन हमारी मौलिकता खत्म हो जाती है और हमारा सम्पूर्ण जीवन उधारी में ही गुजर जाता है।

इस उधारवादी जीवन का दायरा कोई छोटा नहीं बल्कि वैश्विक होता है।

विख्यात पाश्चात्य विचारक इमानुएल कांट इस उधारी के दर्शन पर बोलते हुए कहते हैं कि,

Sapere aude अर्थात् Dare to know and realise 

and dare to utilise ur reasoning अर्थात् जानने का साहस करो और अपने विवेक के प्रयोग करने का साहस करो।

पर हम में से अधिकांश खोजी और जिज्ञासु न होने के कारण परम्परागत तरीके से उन उधार के विचारों को ही लेकर जीने चलने की कोशिश करते हैं और उधार के विचार से कोई कभी मौलिक विचारों को जन्म नहीं दे सकता है।

रेने डेसकार्टेस जिसे आधुनिक दर्शन और संशयवाद के सिद्धान्त का प्रणेता कहा जाता है,कहते हैं कि,

किसी भी विषय पर उपलब्ध ज्ञान को कभी सम्पूर्ण नहीं मानना चाहिए, हमें अपनी सभी पूर्वाग्रहों और विरासत में मिली मान्यताओं को एकबार खारिज कर देना चाहिए और फिर नए सिरे से उसकी खोज शुरू करनी चाहिए ताकि वास्तविक सच उभर कर सामने आ सके,

अर्थात् यह वैचारिक अन्वेषण सिर्फ दार्शनिक सत्य को ही नहीं दर्शाता है बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी प्रामाणिक साबित करता है कि सच को जानने के लिए भी शंका या संदेह करना जरूरी है कि किसी वस्तु,विचार या व्यक्ति को जाने बगैर सीधे स्वीकार कर लेना एक दार्शनिक त्रुटि या मानवीय भूल है।

सुकरात जिन्हें ग्रीको रोमन या पाश्चात्य दर्शन का जनक कहा जाता है,कहते हैं कि,

हम सुनी सुनाई बातों पर सीधे विश्वास कर लेते हैं कि लोग यह नहीं समझते कि इस पर सवाल उठाया जाना चाहिए और सवालों के तर्कसंगत और युक्तिसंगत जवाब मिलने पर ही उसे अपनाया जाना चाहिए।

इस आलेख को पढ़ते वक्त किसी भी प्रबुद्ध पाठक के जेहन में इस सवाल का उठना लाजिमी है कि फिर हमने एक मौलिक विचार देने के बजाय इन विद्वानों को क्यों उद्धृत किया है तो इनको उद्धृत करने का हमारा एक ही मकसद है कि हमारे श्रेष्ठ जनों ने भी उधार के विचारों और दर्शन पर सवाल उठाए हैं कि जब हम बगैर चिन्तन मनन और विश्लेषण के किसी को अपनाने का काम करते हैं तो वे उधार के विचार बनकर रह जाते हैं और हमारे स्वयं की अन्तर्दृष्टि और रचनात्मकता एक छायाप्रति बनकर रह जाती है और हमारी मौलिकता और रचनात्मकता दृष्टिभ्रम का शिकार होकर रह जाती है।

तो क्या हमें किसी सिद्धान्त, विचार, दर्शन,सोच आदि को नहीं अपनाना चाहिए,

नहीं,ऐसा नहीं है। हमें ऐसी परिस्थितियों में उनका विश्लेषण और मूल्यांकन करना चाहिए कि उनमें कितनी सामयिकता,

प्रासंगिकता और युगधर्मिता है और अगर वे इन मापदण्डों पर खरा उतरते हैं तो उन्हें आत्मसात करने में भी गुरेज नहीं करना चाहिए।

इसलिए इस सन्दर्भ में 

विख्यात दार्शनिक एच डी थोरो का कहना है कि,

एक व्यक्ति को जानबूझकर और सचेत होकर जीवन मार्ग को अपनाना चाहिए,उधार के विचारों पर जीवन स्वयं में जीवन न होकर दूसरों की स्क्रिप्ट पर लिखा जीवन बन कर रह जाता है। उधार के विचार, जीवन शैली,

पठन पाठन,लेखन, चित्रण,कला सृजन आदि एक प्रकार से मानसिक या बौद्धिक गुलामी भर है जिसमें 

स्व की गरिमामय बोध के लिए कोई जगह नहीं रह जाती है।

अपने स्वयं के अर्जित 

गुणधर्मों, संस्कारों,

मानसिक शक्तियों एवं ऊर्जाओं, क्षमताओं के प्रयोग के आधार पर ही हम एक मौलिक अन्तर्दृष्टि और अन्तर्चेतना का निर्माण कर सकते हैं।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि हम अपने जीवन में समस्त क्रियाशीलताओं के पीछे तर्कसंगत और युक्तिसंगत कारणों की खोज या व्याख्या नहीं कर सकते हैं कि बहुत सी क्रियाएं अभिसमयों और लोकमान्यताओं और लोक परम्पराओं पर चलती रहती है जो किसी भी सभ्यता और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता हैं जहां हमारी तार्किकता और वैज्ञानिकता की महत्ता गौण हो जाती हैं और वे एक शाश्वत और सनातन विचार बनकर एक कालातीत अस्तित्व बन कर हमारे जीवन का अविच्छिन्न हिस्सा बनकर रह जाते हैं परन्तु यह सब जगह ग्राह्य नहीं होते हैं।

जो कुछ हमारे संसार और जीवन में हैं या होते हैं, जानने के विषय होते हैं पर कुछ सीधे मान लिए जाते हैं जो हमारी* आस्था,

श्रद्धा और विश्वास से जुड़े होते हैं और यह अवधारणा वैश्विक होती है।

१५  ११ २५ 

इस धरती पर स्वास्थ्य सबसे बड़ा धन और आशीर्वाद है। स्वास्थ्य है तो सबकुछ है,हम हैं, परिवार है, समाज है,देश है,जीवन है,दुःख सुख है और संसार है, सिर्फ एक स्वास्थ्य नहीं है तो सब होते हुए भी कुछ न होने का एहसास होता है, इसलिए स्वस्थ हैं तो इसकी रक्षा करें और सबके स्वस्थ रहने की मंगलकामनाऍं करें।


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हम और हमारे भाव:

नियति,स्व और पर का बोध : १७ ११ २५ 

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नियति या प्रारब्ध से आजतक कोई नहीं बचा है,राम,कृष्ण, भीष्म,कर्ण,बुद्ध,जीसस,आदि अनेकानेक हैं और सबको अपने अपने प्रारब्ध को झेलना पड़ा था,इस चक्र को समझना ही संसार को समझना है।

वैसे आधुनिक विज्ञान इसे नहीं स्वीकार करता है पर इस सूक्ष्म 

सत्ता का जब भौतिक प्रत्यक्षीकरण होता है तो वह इसका अवलोकन तो करता है पर वह मौन हो जाता है, कोई टिप्पणी नहीं दे पाता है पर यह इस संसार का प्रकट सत्य है, स्वयं सिद्ध है।

संसार के तीन पक्ष हैं यथा,स्थूल,सूक्ष्म और

कारणिक और यही तीन स्वरूप हमारे शरीर और चेतना के भी होते हैं जो दिखते तो हैं पर सहजता से लोग समझ नहीं पाते हैं।

हमारा जीवन सदैव दो पक्षों यथा,नियतिवाद

( Determinism)

और यदृच्छावाद (Accidentalism)

से नियमित और नियंत्रित होता है जिस

पर हजारों वर्षों से परिचर्चाएं चलती रही हैं और चलती रहेंगी पर उल्लेखनीय है कि यदृच्छावाद भी अन्त में नियतिवाद में ही रूपांतरित हो जाती है।

राम,जिन्हें बारह कलाओं या महापरिमीतताओं से युक्त बताया जाता है,

चौदह वर्षों का वनवास ( ये अलग बात है कि उस वनवास के महती उद्देश्य थे) झेलना पड़ा और अन्त में सरयू में जल समाधि लेकर देहत्याग करना पड़ा था। कृष्ण सोलह कलाओं से युक्त नारायण के पूर्ण अवतार माने जाते हैं, जीवन भर संघर्ष ही करते रहे और अन्त में जरा नामक व्याध के हाथों देहत्याग करने की नियति को को झेलना पड़ा, भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था पर उन्हें भी इसी प्रारब्ध को भोगने के लिए कई दिनों तक शर शैय्या पर भयानक पीड़ाओं को झेलते हुए पड़ा रहना पड़ा था,सिद्धार्थ को  शूकरमार्दव खाकर मर्मान्तक पीड़ा झेलते हुए महापरिनिर्वाण को प्राप्त होना पड़ा, जीसस को सलिब पर

चढ़ाकर, कीलों से ठोक दिया गया और उन्हें भी दुखद और दर्दनाक मृत्यु का सामना करना पड़ा था, ठाकुर रामकृष्ण, महर्षि रमण आदि को भी अपने अपने प्रारब्ध झेलने पड़े था फिर भी हम इस सत्य

को देखकर,जान समझकर भी अनजान बनते हुए अहंकार और मिथ्याभिमान में डूबे रहते हैं और जब इस कड़वे सच का सामना करना पड़ता है तब उस समय निरूत्तर हो जाते हैं।

हमें आलोचक से बेहतर समालोचक और समालोचक से बेहतर आत्मालोचक होने या बनने की जरूरत है ताकि हम सारे आग्रहों, पूर्वाग्रहों और दूराग्रहों से मुक्त होकर तथ्य और सत्य का आकलन, विश्लेषण और मूल्यांकन कर सकें।

एक आत्मालोचक ही सही निर्णय ले सकने में सक्षम हो सकता है कि आत्मालोचक स्वयं से संवाद करता है और जो स्वयं से संवाद स्थापित करता है वही सार्थक वाद संवाद भी कर सकता है।

हम वार्तालाप तो करते हैं पर आत्मालाप नहीं करते हैं,हम परदर्शन तो करते हैं पर आत्मदर्शन नहीं करते हैं, आलोचना समालोचना तो करते हैं पर आत्मालोचना नहीं करते हैं और जिस पल क्षण से हम पर से स्व या आत्म पर आना शुरू कर देंगे,वह क्षण हमें सारे आक्रोश और आग्रहों से मुक्त कर देगा।

हमें उनसे नहीं डरना चाहिए जो पेड़ पौधों,जीव जंतुओं और पेड़ पौधों से प्रेम करते हैं कि वे अपेक्षाकृत ज्यादा सहज,संवेदनशील और न्यायप्रिय होते हैं। जब एक व्यक्ति इन गुणों को धारण करता है और उन भावों को जीता है तो

आत्म प्रतिविम्ब के भावों को जीने लगता है और समावेशी और समरसी हो जाता है।

सत्ता,शक्ति और समय सदैव अनुकूल नहीं रहते हैं इसलिए इतिहास को सदैव सम्मुख रखकर चलना चाहिए ताकि हमें हमारे अस्तित्व और अस्थायीपन का बोध होता रहे और यही बोध हमें सदैव निरहंकारी बनाए रखता है और जो इतिहास का अवलोकन नहीं करते,

कभी नियति या प्रारब्ध को नहीं समझ सकते हैं और प्रारब्ध की पीड़ाओं को झेलना* भीष्म की नियति बनकर रह जाती है।


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हम एक नहीं अनेक उत्तरदायित्वों से ;१८ ११ २५ 

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हम एक नहीं अनेक उत्तरदायित्वों से बंधे रहते हैं और इनके स्वरूप बड़े व्यापक और बहुआयामी होते हैं और हमें सबका निर्वहन करना भी सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक जिम्मेदारी है।

जिस परिवार में हम जन्म लेते हैं, जहां हमारा पालन-पोषण होता है,वह समाज जिसमें हम पल बढ़कर बड़े होते हैं,वे शिक्षक और शैक्षणिक संस्थान जहां से सांसारिक ज्ञान प्राप्त करते हैं,वे मित्र जिनके सान्निध्य में भी हम बहुत कुछ पाते हैं,वह परिवेश और वातावरण जहां हमें मानसिक और शारीरिक पोषण मिलता है,वह मत,पंथ, विश्वास, विचार आदि जो हमें नैतिक और आध्यात्मिक ज्ञान और चिन्तन देते हैं,वे पुस्तकें जिनसे हमारा ज्ञानवर्धन होता हैं,वे लोग जो आड़े बुरे वक्त में हमारे साथ खड़े होते हैं,वे अच्छे बुरे समय और अच्छी बुरी परिस्थितियां,वे पेड़ पौधे और जीव जंतु, वह परम चेतना जिसे हम अनेक नामों से संज्ञायित करते हैं और अन्त में हम स्वयं जिसे हम अच्छी तरह जानते हैं और जो भौतिक और सूक्ष्म रूप में हमारे स्व के साथ जीवित रहता है,सबके प्रति हमारी जिम्मेदारियां एक तरह से बाध्यकारी और करने योग्य होती है।

बाध्यकारी हमने इसलिए कहा कि ऐसा न करने से कोई कानून हमें दंडित नहीं कर सकता परन्तु नैतिक और मानवीय दृष्टिकोण से यह अपरिहार्य और अनिवार्य होते हैं इसलिए बाध्यकारी हैं परन्तु हम में से कितने इन्हें गंभीरता से लेते हैं,यह महत्वपूर्ण है।

जीवन तो परमात्मा और प्रकृति ने सबको दिया है परन्तु सिर्फ मनुष्य ही इनमें स्वचैतन्य और जागरूक होने के कारण इन विषयों पर सोंचता है, विचार करता है, मनन और चिन्तन करते हुए आकलन और विश्लेषण करता है।

हमनें उपर में स्वयं से बंधे जिन जिम्मेदारियों की बातें की हैं,एक तरह सा सबका ऋणभार हमारे उपर,सबके ऊपर होता है और ससमय इन ऋणभारों से हमें मुक्त होने की महत्तम कोशिश करनी चाहिए ताकि संसार चक्र के खत्म होने तक यह जिम्मेदारी बोझ बनकर हमें अंतिम क्षणों में पीड़ित न करे और हमारी समझ में जीवन मुक्ति यही है।

हमें हमारे संसाधनों और उपलब्ध क्षमताओं के आधार पर इनसे उऋण होने की कोशिश करते रहना ही श्रेष्ठ धर्म अर्थात् कर्तव्य है।

एक चीज और बड़ी महत्वपूर्ण है कि सबकी फिक्र करते करते हम स्वयं की फ़िक्र करना भूल जाया करते हैं कि हमें हमारे प्रति भी कुछ जिम्मेदारियां होती हैं कि हमें भी अपना ख्याल इसलिए रखना चाहिए कि हम स्वयं को स्वस्थ और सुरक्षित रखकर ही सबकी सुरक्षा कर सकते हैं, हमें स्वयं को भी मानसिक, शारीरिक स्वास्थ्य, पारिवारिक,सामाजिक, नैतिक दृष्टिकोण से मजबूत रखने की जरूरत होती है। हमारे  मानस और शरीर का स्वस्थ होना या रखना इसलिए भी जरूरी है कि दोनों के सम्यक् समन्वय और संतुलन से ही कुछ किया जा सकता है,हमारा मानस और चित्त सभी * आग्रहों, पूर्वाग्रहों और दूराग्रहों से मुक्त रह सकता है और जिनका मानस इस स्तर पर आ जाता है वह स्वयं के साथ साथ सबके प्रति ईमानदार हो जाता है और जो इस तरह की ईमानदारी को जीता भोगता है,वही सार्थक जीवन जी सकता है या जीने में सफल हो सकता है।

एक स्वस्थ मन चित्त ही स्वस्थ चिन्तन मनन कर सकता है,तब एक सवाल उठता है कि मन चित्त को संतुलित और स्वस्थ कैसे रखा जाए तो अध्यात्म में इसके लिए योग और साधना को श्रेष्ठ मार्ग बताया गया है और इसके अलावा श्रेष्ठ साहित्य, श्रेष्ठ सान्निध्य, श्रेष्ठ संवाद और वार्तालाप, श्रेष्ठ चिन्तन मनन आदि ऐसे मानस के निर्माण में सहायक होते हैं।

हर मनुष्य स्वतंत्र 

मन, चित्त, बुद्धी, अहंकार,विवेक और प्रारब्ध लेकर आता है और ये सब जन्मजात गुणधर्म होते हैं,इनके अलावा अहंकार जनित ईर्ष्या,द्वेष,क्रोध,हिंसा,घात प्रतिघात, छल-कपट,घृणा

अधिकार हनन आदि नाकारात्मक भाव भी लेकर चलते हैं जिनपर पूर्ण रूप से विजय पाना सबके लिए सहज नहीं पर नियंत्रण में रखा जा सकता है और इन्हें नियंत्रित रखने की कोशिश करना भी बड़ी उपलब्धि होती है और इसी प्रक्रिया से हम अपने मन चित्त को संयमित और नियंत्रित रखने में सफल हो सकते हैं और जिनके मन चित्त 

नियंत्रण में रहने लगते हैं,वे ही अपने उत्तरदायित्वों के निर्वहन में सफल होकर उऋण हो सकते हैं।

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विवेक और हम १९ ११ २५ 

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वह जो हर पल क्षण हमारे साथ है, हमारी निगरानी करता रहता है, हमें सचेत,सचेष्ट और सावधान करते रहता है,उस विवेक की अवहेलना हम क्यों करते हैं,यही तो हमारा सच्चा मित्र, सहयोगी,रक्षक, पथ-प्रदर्शक और गुरु है। सब वक्त बेवक्त या किसी परिस्थिति विशेष में हमारा साथ छोड़ देते हैं या छोड़ सकते हैं,बेटा,बेटी,भाई,बहन

हित कुटुम्ब,पति पत्नी 

आदि आदि परन्तु हमारा विवेक कभी भी हमारा साथ नहीं छोड़ता है।

इस विवेक की जिसे

** Discretion,Reasoning, Rational intuition, Conscience आदि कहा जाता है, सभी प्राच्य और पाश्चात्य दर्शन और चिन्तन में बड़ा महत्व है कि यह सिर्फ दार्शनिक या आध्यात्मिक चिन्तन ही नहीं बल्कि शुद्ध व्यवहारिक चेतना है।

यह मानवीय चेतना का वह तल है जो हमें हमारे जन्म के साथ ही मिलता है,यह हम 

मनुष्यों का वह निहितार्थ गुण है जो 

सही गलत के बीच के फर्क को ही नहीं बताता है बल्कि किसी निर्णय के औचित्य और अनौचित्य( justification and legitimacy) का भी निर्णय करता है। यह औपनिषदिक दर्शन के साथ साथ जैन, बौद्ध एवं अन्य मत, पंथों में भी स्वीकार्यता प्राप्त सत्य है।

वेदान्त में यह वह चेतना है जो हमें नित्य और अनित्य के भेद का निर्धारण करता है।

यह ज्ञान का वह सक्षम शक्ति है जो सदैव हमरी बाहरी और भीतरी चेतना को परिष्कृत करते हुए हमें सत्य और न्याय की ओर चलने की प्रेरणा देने के साथ साथ मार्गदर्शन भी करता है।

आदिगुरु शंकर ने इस गुण की विशद् व्याख्या* विवेक चुड़ामणि में इसे मोक्ष‌ और मुक्ति का मार्ग बताया है। पतंजलि के योगसूत्र में इसे समाधि का मार्ग बताया गया है जो हमें 

विचलन और भ्रम से बचाते हुए भौतिक मोह और आकर्षण से बचाते हुए सत्य की खोज के मार्ग का प्रशस्तिकरण करने का काम करता है। यूनानी विचारकों ने इसे ज्ञान की सर्वोच्च 

अवस्था बताया है। इमानुएल कांट इसे मानवीय चेतना का उत्कृष्ट तल बताया है।

स्टोइकों और सुफी दर्शन में भी इसे उच्च स्थान प्राप्त है।सुफीवाद में इसे * रूहानी इल्म और हुनर कहा गया है और इस तरह विवेक ही चेतना शक्ति है जिसे समझकर हम पथच्युत नहीं हो सकते हैं।जैन और बौद्ध दर्शन के * सम्यक् ज्ञान का आधार तो विवेक अर्थात् reasoning  को ही माना गया है। तथागत सिद्धार्थ का समस्त दर्शन और चिन्तन तो इसी पर आधारित है और इसलिए वह अपने धम्मदेसना में सभी शिक्षा, शास्त्र और ज्ञान को विवेक की तराजू पर तौल कर अपनाने की बात करते हुए अपने प्रसिद्ध* कलाम सूत्र में यही बात अपने शिष्यों को समझाते हुए कहते हैं कि किसी गुरु या शास्त्र की बातों को इसलिए नहीं मानना कि यह शास्त्रों में लिखा है या हमारे गुरु ने कहा है बल्कि उसे अपने ज्ञान और विवेक से विश्लेषण करके देखना और वह जब तुम्हारे नीर क्षीर विवेक को स्वीकार्य हो तब अपनाना,विवेक के बारे में यह शाश्वत सत्य है।

आध्यात्मिक विज्ञान के साथ साथ आधुनिक विज्ञान भी इसकी मान्यता देता है। आधुनिक मनोविज्ञान और चिकित्सा विज्ञान हमारे मस्तिष्क के एक भाग जिसे inhibit centre कहा जाता है,के बारे में कहता है कि जब भी हम कोई काम करने के लिए उद्धत होते हैं तो मस्तिष्क का यह सूक्ष्म भाग एक अल्प समय ( तीन से पांच सेकंड)

के लिए हमें संकेत देने के साथ साथ चेतावनी भी देता है कि यह हमारे लिए अनुचित है पर हम क्षणिक सुख भोग के लिए, भौतिक आकर्षण से मोहित होकर वह करते हैं जिसे हमारे विवेक की चेतना शक्ति उसे रोकने की कोशिश करती है और उसकी परिणति एक निश्चित अवधि के बाद या तुरन्त ही पश्चाताप में होती है कि काश! हम ऐसा न किए होते तो इसका परिणाम ऐसा नहीं होता और यह व्यवहार हमारे रोज़मर्रा के जीवन में देखा जा सकता है।

माना कि हम हर पल क्षण विवेक का नहीं सुनते,कभी मन का तो कभी दिल का सुनते और मानते हैं पर ध्यान रहे कि मन और हृदय के फैसले सदैव गलत नहीं तो सही भी नहीं होते परन्तु विवेक सम्मत निर्णय decisions taken by discretion or reasonable reasoning सदैव सही और न्यायसंगत होता है जिसका अवलोकन कोई भी कभी भी कर सकता है।

भारतीय आध्यात्मिक दर्शन और चिन्तन में 

जिस बौद्धिक क्षमता को ** नीर क्षीर न्याय कहा जाता है,वह विवेक ही है और जो इसके निम्न स्तर को प्राप्त कर लेता है उसे * हंस और जो इसके उच्च स्तर को प्राप्त कर लेता है उसे * परम हंस the man with highest power of discretion and reasonable reasons कहा जाता है,वैसे हमारे यहां अनेक तथाकथित बाबा लोग अपने को परमहंस की उपाधि से सम्मानित कर लेते हैं पर उन्हें इसका लेशमात्र भी बोध नहीं होता है। ऐसे तथाकथित बाबा जो बड़े बड़े मंचों से माया मोह,भौतिक सुख भोग आदि से बचने की सलाह देते हैं, वैभवशाली और ऐश्वर्यशाली सुख भोग का जीवन जीते हैं।

इस तरह विवेक की चेतना और उसकी शक्तियों के उपयोग करते रहने का प्रयास हमें सदैव करना चाहिए कि अगर श्रेष्ठ नहीं बन सके तो कम से कम निकृष्ट बनने से तो बच ही सकते हैं।


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पांव जमीं पे रखो आस्मां में घर नहीं होता १९ ११ २५ 

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पांव जमीं पे रखो आस्मां में घर नहीं होता

वजह है सबकी बेवजह कुछ नहीं होता 


देखिए हीरे और शीशे में बड़ा फर्क होता है

हर चमकदार पत्थर यहां हीरा नहीं होता


सफ़र पे चलते हैं सब  मंजिल के लिए 

पर हर सफर यहां सबका पुरा नहीं होता


अनीश वक्त रहमदिल बेरहम भी है यहां 

सफरे जिन्दगी एकसां कभी बसर नहीं होता

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मूर्त,अमूर्त के मध्य सत्य २३ ११ २५ 

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जीवन सदैव अमूर्त से मूर्त और‌ मूर्त से अमूर्त की यात्रा करते हुए अन्तर्द्वन्द्व में रहता है और यह यात्रा मनुष्य के जन्म से शुरू होकर उसकी मृत्यु पर समाप्त हो जाती है। विज्ञान और अध्यात्म का यही अन्तर्द्वन्द्व है, विज्ञान मूर्त का अवलोकन करते हुए 

Evidential and empirical approach,analysis and conclusion 

पर चलते हुए नियमों को सिद्ध करता है और अध्यात्म आत्मानुभूति, बौद्धिक 

चेतना,विवेक और प्रज्ञा के आधार पर सबका आकलन, विश्लेषण और मूल्यांकन करता है जिसका आधार inner conscience,consciousness, reasonable reasoning and intuition होता है और ये सभी अमूर्त हैं,मन,चित्त,बुद्धि, अहंकार,विवेक, प्रारब्ध,करूणा,दया,क्षमा,सहानुभूति,प्रेम,घृणा, संवेदना आदि भी अमूर्त होते हैं परन्तु विज्ञान इनकी मान्यता देता है कि इन्हें mind mapping, IQ, Socio psycho analysis, Bio chemical reactions आदि माध्यमों से अमूर्त के प्रकटीकरण और मूर्ती करण की सिद्धि करता है पर ऐसा नहीं है कि मूर्त सत्य है और अमूर्त असत्य है।

विज्ञान एक संगठित, क्रमबद्ध और अनुशासित व्यवस्था है जो निश्चित प्राकृतिक नियमों से आबद्ध होकर चलता है परन्तु विज्ञान यह भूल जाता है कि उसकी सीमाएं जहां समाप्त होती है अध्यात्म के विज्ञान की सीमाएं शुरू होती हैं और यह असीम और अनन्त है कि यह शाश्वत ब्रहाण्डीय नियमों के अधीन चलता है जिसे ऋत या ब्रह्माण्ड का शाश्वत नियम कहते हैं जिससे विज्ञान की प्रकृति भी संचालित होती है।

 Rit, the law of the universe is the only source of all the laws of the world which 

regulates,directs and controls the 

cycle if the life.

ऋत ही ब्रह्म की चेतना का आधार है,

परमात्मा के अस्तित्व का आधार है, प्रकृति के समस्त नियमों का सृजनकर्ता, नियमितकर्ता,संचालनकर्ता और विनाशकर्ता

है, संसार चक्र इसी के नियम और अनुशासन के अनुरूप चलता है जो विज्ञान की प्रकृति और नियमों का भी आदि स्रोत है,ऋत की सत्ता कालातीत और अविनाशी है जिसके इर्द-गिर्द अमूर्त और मूर्त की रहस्यमई यात्रा चलती रहती है और इस सत्य को समझना ही जीवन के सच को समझना है।

विज्ञान जिस द्रष्टव्य प्रकृति और उसके पदार्थ को सत्य मानता है,ऋत ही उसकी सटिक व्याख्या प्रस्तुत करता है जो अंतिम सत्य का उद्घाटन करता है।यह आध्यात्मिक सत्य ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक प्रमाण भी है।ऋत स्वयं में स्वयं प्रमाणित अस्तित्व Self existing proof माना जाता है जिसका कोई बाह्य आधार नहीं है कि यह स्वयं समस्त अस्तित्वों का आधार है। इसका अस्तित्व सृष्टि या सृजन के पूर्व भी था,है और कल भी रहेगा।यह अनादि और अनन्त व्यवस्था है जो भारतीय आध्यात्मिक दर्शन या चिन्तन में** ब्रह्म या परमेश्वर ही है और समस्त व्यवस्था और नैतिक मापदण्डों का प्रतीक भी है।

ऋत अमूर्त और मूर्त के आदि,मध्य और अन्त का वह आधारभूत संरचना है जिसके भीतर सृष्टि चक्र और संसार चक्र चलता रहता है। सृजन,लय और विनाश की अन्तहीन क्रियाशीलताओं का एकमात्र स्रोत है।

यह अमूर्त होते हुए भी मूर्त साक्ष्य और प्रमाण है जिसे भौतिक विज्ञान ब्रह्माण्ड के प्रत्येक व्यवहार में देखता रहता है और अनुभवों का विश्लेषण भी करता है‌ जिसे विज्ञान* प्रकृति का नियम और अध्यात्म ऋत कहता है जैसे विज्ञान में भौतिक स्थिरांक,यथा, प्रकाश और ध्वनि की गति विभिन्न माध्यमों में निश्चित है, ऊर्जा का संश्लेषण और विखंडन, गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक,

प्लैंक स्थिरांक,जैव रासायनिक प्रतिक्रियाएं,गति के नियम आदि समस्त ब्रह्माण्ड में एक समान और सार्वकालिक रहते हैं, जिनमें जरा भी परिवर्तन सबकुछ उलट-पुलट कर सकता है,ये अटल नियम ही अमूर्त ऋत के नियमों के प्रत्यक्षीकरण या प्रकटीकरण हैं।

विज्ञान स्वयं में कोई विषय नहीं है बल्कि किसी भी विषय का विशिष्ट ज्ञान है और ऋत का विज्ञान सब विज्ञानों का विज्ञान है।

विज्ञान ब्रह्माण्डीय व्यवस्था का एक सुव्यवस्थित, संगठित और अनुशासित व्यवस्था है,

The science of the universal system is not a chaos but a systematic and disciplined organisation,which never differs from it's way defined and if not it causes disaster and natural calamities and it is the spirit of Rit.

हर क्रियाशीलता या घटना एक निश्चित कारण समूहों का परिणाम है,कारण कार्य के इस अटूट श्रृंखला का ही नाम ऋत है जो अमूर्त से मूर्त और मूर्त से अमूर्त की अनन्त यात्रा है।

यह ऋत के होने का शाश्वत स्वभाव है और यह सहज स्वभाव हम मनुष्यों की सहज वृत्ति भी है जो कभी नहीं बदलती है, सभी जीवधारियों के अस्तित्व के लिए, प्राणवायु,भोजन और पानी जरूरी है वैसे ही ऋत जीवन के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है। यह शाश्वत चिरन्तन स्वभाव और प्रकृति का धर्म और विज्ञान तथा विधान है जिसकी अनुपस्थिति में न तो विज्ञान के ब्रह्माण्डीय नियम चल सकते हैं और न नैतिक ब्रह्माण्ड के कर्म सिद्धान्त चल सकते हैं,यही द्रष्टव्य भौतिक और अद्रष्टव्य अभौतिक संसार का सच है। ईशावास्योपनिषद् इसलिए कहता है,हम स्वयं में सभी परिणामों के कारण और हेतु हैं,हम सब में समाहित हैं और सब हम में समाहित है,जिसकी पुष्टि औपरनिषदिक महावाक्य* यत् पिण्डे

तत् ब्रह्माण्डे ,यत् ब्रह्मा ण्डे तत् पिण्डे से होती है और इसकी पुष्टि आध्यात्मिक विज्ञान के साथ साथ आधुनिक भौतिक विज्ञान भी करता है कि जिन पदार्थौं से ब्रह्माण्डीय संरचना हुयी है, उन्हीं की रचना हम भी हैं। समस्त चेतना या ऊर्जा, जड़ चेतन,कारण कार्य आदि के अस्तित्व का आधार यही अमूर्त ऋत है, यही कारण, परिणाम और प्रमाण है, जैसे सूर्य स्वयं प्रभा है, स्वयं से ऊर्जावान है और सबके जीवन का कारण है,वैसे ही ऋत है।

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पैसा ही सबकुछ नहीं है २४ ११ २५ 

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जिनकी जेब में पैसे न हों,पेट खाली हो,तन ढंकने को कपड़े और सर पर कोई छत और जीने के आसरे न हो,उसे दर्शन चिन्तन के पहले,रोटी,कपड़े,

रोजगार और सर पे एक छत की जरूरत होती है।

जब पेट के दरवाजे बन्द होते हैं तभी दिमाग के दरवाजे खुलते हैं अन्यथा एक 

लाचार,भूखे,विवश और जरूरतमंद आदमी को * चांद में भी रोटी नजर आती है।

उसकी विवशता,भूख, बेरोजगारी और अनिश्चितताओं का संकट उसके दिल और दिमाग को संयम,

धैर्य, संघर्षों के बजाय 

अपराध की ओर और अपराध से आगे बढ़ते हुए समाज और तंत्र के प्रति विद्रोह या क्रांति की ओर उन्मुख करते हुए उसे विवश कर देता है और तब यही  समाज और तंत्र उसे*अपराधी या बागी 

घोषित कर देता है।

समाज और राजनीति के अपराधीकरण के मूल में हम कारणों की नहीं परिणामों की चर्चा और समीक्षा करते हैं जिनसे समस्याएं न तो सुलझती हैं और न उनका निदान ही हो पाता है।

अब जहां समाज और राजनीति के अपराधीकरण का सवाल है,इसके पीछे उपरोक्त कारणों के अलावा मनुष्य के भीतर आनन-फानन में, रातों रात धनवान और शक्तिवान बनने की मनोवृत्ति भी काम करती है जो अपराध की ओर उसे ले जाती है। हम हमारे सामाजिक,आर्थिक, राजनीतिक आदि आधारभूत संरचनाओं का जब अवलोकन करते हैं तब ऐसे परिदृश्य भी दिखाई पड़ते हैं जहां ऐसी मनोवृत्ति के लोग उन्हें अपना रोल मॉडल बनाते हैं जो बगैर कठिन मेहनत और प्रयास के धनी और प्रभावशाली बन गये हैं 

और वे लोग उसी मार्ग का चयन कर लेते हैं।

एक ही मोहल्ले,टोले और शहर में एक ईमानदार कर्मचारी अपने से कमतर पद के कर्मी को अवैध तरीके से समृद्ध होते जब देखता है तब वही मनोविज्ञान वहां काम करने लगता है और वह अपनी माली हालत और व्यवहार को देखकर उहापोह की स्थिति में स्वयं को पाता है और अपने परिवार की जरूरतों की पूर्ति करने के लिए न चाहते हुए भी अनैतिक और भ्रष्ट हो जाता है परन्तु ऐसे ही माहौल में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जीवन संघर्षों से जूझते रहते हैं परन्तु अपने मार्ग से च्युत नहीं होते हैं।

हम आज ऐसे ही समाज में जी रहे हैं जहां मार्ग के चयन की आजादी है,किसी पर कोई प्रतिबंध नहीं है परन्तु जीने के मार्ग का चयन भी तो महत्व रखता है कि जीवन का अंतिम लक्ष्य तो चैन,सुकून और स्वयं की बेहतरीन जिन्दगी होती है जो सिर्फ पैसों से नहीं चलती है बल्कि उसके लिए और भी शर्तें होती है।

माना के पैसा बहुत कुछ है, परन्तु पैसा ही सबकुछ नहीं है,पैसा बहुत कुछ दे सकता है, परन्तु चैन, सुकून,

निन्द,सेहत,सुखद अहसास आदि नहीं दे सकता है। हम पैसों से बड़ा बंगला,बड़ी गाड़ी, बड़ा बैंक बैलेंस 

बड़ी शोहरत और बड़ी पहचान बना सकते हैं परन्तु जो हमने ऊपर कहा है,वे बैलेंस नहीं कर सकते हैं।

इसलिए जीने के लिए पैसा जरूरी है पर जीवन के लिए पैसों के लिए और भी बहुत कुछ जरूरी शर्तें हैं जो पैसों से पुरी नहीं की जा सकती है।

Money is very powerful,no doubt,it can do many things but it can't do everything and can't buy everything

और जीवन का यही सच है,पैसा चाहिए पर वांछित ही चाहिए जो बड़े सहज सरल तरीके से सद्गुरु कबीर साहब ने कहा है,

साईं इतना दीजिए जामे कुटुंब समाए 

मैं भी भूखा न रहुं 

साधु ने भूखा जाए।

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अनुभवजनित ज्ञान और बौद्धिक चेतना : दिवस : २६  ११ २५ 

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जब हम मनुष्यों के ज्ञान की बातें होती हैं तो दो बातें उभर कर सामने आती है, अनुभवजनित ज्ञान ( 

Empirical Knowledge) और 

बौद्धिक ज्ञान ( Rational Knowledge) परन्तु यह बात यहीं आकर नहीं ठहरती है कि दोनों के माध्यम से अर्जित ज्ञान में आखिर फर्क क्या होता है और होना भी चाहिए।

Empiricism या अनुभववाद का दावा है कि हम मनुष्यों का मनो मस्तिष्क जन्म के साथ एक कोरे स्लेट या पट्टी ( tabular rosa) होता है जिस पर कोई भी विचार या ज्ञान अंकित नहीं होता

है,हम कालान्तर में जो कुछ भी सीखते या जानते हैं,सब अनुभवजनित या इन्द्रियजनित ज्ञान ही होते हैं।

इस पर जोन लौक कहता है कि सभी विचारों की जननी अनुभव है,

the knowledge is the total result of sensations and reflections है, सारे ज्ञान के पीछे 

संज्ञानात्मक और परावर्तित अनुभव ही होते हैं।

डेविड ह्यूम ने इसे और ऊंचाई पर ले जाते हुए कहता है कि,

हम केवल वही जान सकते हैं जिनका अनुभव हमनें अपनी 

ज्ञानेन्द्रियों से किया है और यही कारण है कि हम घटनाओं की श्रृंखलाओं का अध्ययन पहले करते हैं और कारण आदि बाद में समझ आते हैं।

फ्रांसिस बेकन ने तो 

* प्रयोग, निरीक्षण और‌ निष्कर्ष को ही ज्ञान का अंतिम साधन 

माना है और आज का आधुनिक विज्ञान भी

डेटा आधारित ज्ञान को ही तर्कसंगत और

तथ्यसंगत मानता है,वह समस्त ब्रह्माण्डीय क्रियाशीलताओं का आधार भी कारण कार्य आधारित ज्ञान को ही सही मानता है।

अनुभववाद या empiricism कहता है कि,सत्य वही है जो तर्क और विश्लेषण की कसौटी पर खरा उतरे पर बेकन यहां भूल जाता है कि सत्य सिर्फ वही नहीं जो भौतिक रूप से दृश्यमान है,सत्य इससे भी परे जो मूर्त और अमूर्त की सीमाओं से भी परे है जो ** अभौतिक, अतीन्द्रिय और सूक्ष्म भी होता है जो सिर्फ अनुभवगम्य ही नहीं बौद्धिक चेतनागम्य भी होता है।यह गणीतीय आंकड़ा बिल्कुल सही है कि 2+2=4 और 2-2=0 

होता है पर यह सिर्फ अनुभव ही नहीं बल्कि बौद्धिक चेतना भी है जो इसे अनुभव के साथ मिलकर सच साबित करती है। प्रेम,

घृणा, संवेदना,क्षमा आदि अमूर्त और भौतिक रूप से प्रयोग, निरीक्षण और निष्कर्ष से परे हैं परन्तु हम हमारी बौद्धिक चेतना के द्वारा इसके मूर्त प्रयोग से समझ पाते हैं कि कोई हमसे प्रेम करता है या नहीं करता है,इसकी क्या मात्रा है आदि के बोध अनुभवजनित बौद्धिक चेतनाजनित होती है।

एक और विचारक का कहना है कि,

Knowledge is not only achieved by only 

Our outer organs of sense but it is,too, knowledge by reasoning,wit and intellect, भी है।

इमानुएल कांट ने अनुभव को ज्ञान तो माना परन्तु अनुभव को समझने के लिए मनो मस्तिष्क में एक पूर्व ढांचे की आधारभूत संरचनाओं 

( a priori infrastructure) का होना अनिवार्य शर्त बताया है। ज्ञान सम्पूर्ण रूप से गणीतीय, तर्क और अनुभवजनित संज्ञानात्मक क्षमताओं की उपज या निष्कर्ष नहीं है,इससे भी परे है।

कांट ने इसे ही जन्मजात बौद्धिक चेतना कहा है जो सबके भीतर तो है पर उसकी मात्रा अलग-अलग होती है।हम इसको ऐसे भी समझ सकते हैं कि एक ही कक्षा के अलग-अलग छात्रों के जवाब,एक ही प्रश्न के अलग-अलग क्यों होते हैं,सबके एक ही शिक्षक,एक ही शैली,एक ही अनुभव पर उसकी अभिव्यक्ति 

अलग-अलग क्यों हो जाती है और यही * जन्मजात बौद्धिक चेतना है जो सिर्फ अनुभव नहीं है।

हमारा मन और मस्तिष्क का सम्बन्ध भी कुछ ऐसा ही है जो किसी कम्प्यूटर का सौफ्टवेयर और हार्डवेयर की तरह काम करता है। मन में जो भाव विचार बनते हैं,वे अनुभवजनित हार्डवेयर की तरह होते हैं जिन्हें मस्तिष्क 

एक सौफ्टवेयर की तरह एक ओपरेटिंग सिस्टम तैयार करके 

क्रियान्वयन करता है और यही सम्बन्ध अनुभव और बुद्धि में हैं। अनुभवजनित ज्ञान हमारे मस्तिष्क को डेटा देता है और मस्तिष्क उन डेटा का इस्तेमाल करके एक ठोस आकार देता है।

सामाजिक,आर्थिक,

राजनीतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक,जैव रासायनिक,भौतिक खगोलीय आदि  डेटा तो उस क्षेत्र के हर लोगों के पास उपलब्ध होते हैं पर उनका सही इस्तेमाल वही लोग कर पाते हैं जिनकी बौद्धिक चेतना में ग्राह्यता अपेक्षाकृत अधिक होती है जिसे विभिन्न क्षेत्रों में वैश्विक स्तर पर देखा समझा जा सकता है।

हम कह सकते हैं कि अनुभव हमें ज्ञान की कच्ची सामग्री देता है और जन्मजात बौद्धिक चेतना उसे एक मूर्त रूप देती है।

अन्त में हम जब इमानुएल कांट को देखते हैं तो हमारी बुद्धि सहजता से इसे स्वीकार कर लेती है कि,

Thoughts without content  are empty,intuition without concepts r blind.

हम सिर्फ अनुभव और अनुभूतियों के बौद्धिक चेतना के साथ सम्यक् समन्वय और संतुलन के बगैर 

अंतिम सत्य को नहीं जान सकते हैं।

अनुभव कुछ कहता है, बौद्धिक चेतना कुछ कहती है, इसलिए सही समन्वय 

और संतुलन ही किसी विषय, वस्तु, विचार या व्यक्ति के बारे में सटीक ज्ञान दे सकता है इसलिए कोई निर्णय औचित्यपूर्ण बनाने के लिए अनुभव और बुद्धि दोनों के संतुलित प्रयोग ही एक शर्त है।


कम्फर्ट जोन अर्थात् सुविधाजनक अनुकूल परिस्थितियां हमारी आन्तरिक और बाह्य 

शक्तियों, क्षमताओं और‌ ऊर्जाओं को छीन लेती हैं और हम आसानी से 

प्रतिकूलताओं के शिकार बन जाते हैं कि सुविधाएं और अनुकूलताएं हमें मानसिक और शारीरिक रूप से * दिव्यांग बनाने का काम करती हैं।

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प्रतिकूलताएं : दिवस : २७ ११ २५ 

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प्रतिकूलताएं हमारी बेहतरीन शिक्षक और‌ मार्ग प्रदर्शक होती हैं जो हमारी जिजीविषा,जिज्ञासा और संघर्षों की दबी शक्तियों को जागृत करने का काम करती हैं इसलिए आपदाओं को अवसर में रूपांतरित करने की हुनर विकसित करने के प्रयास करते रहना चाहिए न कि नियती और परिस्थितियों को कोसते रहना चाहिए सकता है हमारा अंतिम प्रयास ही हमारे जीवन की दिशा और दशा दोनों बदल दे।

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इतिहास हमें सबक देने के साथ साथ वर्तमान को जीने का मार्ग भी बताने का काम करते रहता है,बस उसे अवलोकन करने और उससे सीख लेने की जरूरत होती है और जो ऐसा करते रहते हैं,उनके जीवन में भी आपदाएं विपदाएं तो आती हैं,पर टिकती नहीं हैं कि वह अतीत से इसका समाधान ढूंढ़ने 

का काम करता है कि वर्तमान स्वयं में अतीत का ही प्रक्षेपण होता है।

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हम आप या जो कोई भी हों, अपने अपने अनुभवजनित ज्ञान के अलावा अपनी अपनी अतीन्द्रिय बौद्धिक चेतना का सामुच्चय होते हैं,हम अपने अपने अनुभवों से जो भी सीखते हैं, उन्हें फिल्टर करने का काम 

हमारी बौद्धिक क्षमता और चेतनाएं करती हैं और वही हमारा वास्तविक ज्ञान या समझ ( real knowledge and Understanding) 

होता है जो सापेक्ष‌ होते हुए भी निरपेक्ष स्वरूप को प्राप्त कर लेता है कि वे अनुभव 

अब मस्तिष्क की संज्ञानात्मक चैतन्य बौद्धिक क्षमताओं की 

तर्क और तथ्य से छनकर निकलते हैं।

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यह सही है कि जो हमारा सत्य है वो आपका सत्य‌ नहीं हो सकता है परन्तु जो सत्य अनुभव (इन्द्रियजनित) और 

बौद्धिक चेतना के सम्यक् समन्वय‌ और विश्लेषण से छनकर निकलता है,वह‌ लोकस्वीकृत सत्य बन जाता है।

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सामाजिक समरसता और हम दिवस २८ ११ २५ 

( Social Harmony and We People)

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समाज और समाज से जुड़े विषय और मुद्दे सदैव चर्चा और परिचर्चा के विषय रहे हैं कि हम इस समाज के मूल में हैं और समाज की समस्त गतिविधियों के केंद्र में हम मनुष्य ही हैं।

आज जब हम समाज या उससे जुड़े विषयों या मुद्दों की बात करते हैं तो पहले उस विषय या मुद्दे को जानना जरूरी हो जाता है कि वह है क्या और उसका अर्थ क्या होता है। आज के वैश्विक समाज में जिस विषय पर सबसे ज्यादा चर्चा करने या होने की जरूरत है,वह विषय सामाजिक समरसता 

( Social Harmony) है, इसलिए इसके अर्थ के साथ साथ इसकी उपयोगिता और उपादेयता को जानना जरूरी हो जाता है। आज यह सार्वभौमिक 

विषय बन गया है कि हमारा समाज संज्ञा शून्य और संवेदनहीन होता जा रहा है।

इसकी शाब्दिक संरचना दो शब्दों से मिलकर बनी है जो समाज और समरसता है। सामाजिक शब्द का अभिप्राय समाज  से जुड़े उन हर 

अवस्था और क्रियाशीलताओं से हैं जिसका सीधा सम्बन्ध हम मनुष्यों से है और समरसता का अभिप्राय उस समाज 

से है जहां, समस्त मानवीय व्यवहार और आचरण समभाव और 

समन्वयकारी होते हैं अर्थात् जीवन रस समभाव से परिपूर्ण हो। समाज की आधारभूत संरचनाओं में समाज के सभी जातियों,वर्गों,मत पंथों, सम्प्रदायों, विचारों, विश्वासों आदि के बीच पारस्परिक प्रेम,सहयोग, सद्भावना, समझदारी,

एकता,समन्वय एवं सामंजस्य की स्थितियों का बने रहना ही सामाजिक समरसता की अवस्था है जिसमें हम एक दूसरे की सभ्यता, संस्कृति,रीति रिवाजों,

साम्प्रदायिक मान्यताओं आदि का सहमना भाव से सम्मान करते हैं। ऐसी अवस्था में हम सहज और सरल भाव से एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था को बनाने और उसमें जीने की बातें करते हैं जहां मानवीय मोल और मूल्यों का सम्मान किया जाए और जिससे हमारा समाज 

समरसी और समावेशी बन सके और जीवन संतुलित और मर्यादित बने और रह सके। यही वजह है कि हिन्दू सामाजिक जीवन के औपनिषदिक दर्शन में कहा गया है कि,

सर्वे भवन्तु सुखिन 

सर्वे सन्तु निरामया 

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु 

मा कश्चिचत् दुःखभाग्भवेत्

अर्थात् सभी सुखी और निर्भय होकर रहें,

हम सबके कल्याण की कामना करें और कोई दुःखी न हो, निस्संदेह सामाजिक समरसता का यही मूल मंत्र है।

समतामूलक समाज की रचना के लिए हम सबकी बराबर की भागीदारी और हिस्सेदारी अनिवार्य है। यह सिर्फ आदर्श ही नहीं बल्कि शुद्ध व्यवहार और आचरण 

से बनने और चलने वाली व्यवस्था है। सामाजिक समरसता एक स्वस्थ और प्रगतिशील समाज की बुनियादी सोपान है,नींव है, जहां अनेकता और विविधता को एक समेकित और समन्वयवादी रूप में देखा जाता है जहां विखंडनकारी और विभाजनकारी विचारों के लिए कोई जगह नहीं होती है।

विशेषकर भारत जैसे

विशाल,बहुभाषी,बहुसंस्कृति,मत पंथ, विचार एवं विश्वासों,

रीति रिवाजों वाले देश में सामाजिक समरसता देश की एकता,अखंडता, राष्ट्रीयता, सम्प्रभूता,

अक्षूण्णता आदि के लिए तो अनिवार्य ही नहीं अपरिहार्य तत्व है। इसके बगैर देश में 

शान्ति, सुव्यवस्था,

सुरक्षा,विकास आदि को मजबूत नहीं रखा जा सकता है। यद्यपि सामाजिक समरसता की जरूरत तो वैश्विक समुदाय और समाज को है परन्तु भारत में इसकी जरूरत अपरिहार्य मानी जा सकती है।

सामाजिक समरसता मूलतः समानता और न्याय, मानवीय गरिमा के सम्मान,समावेशन और स्वीकृति, सहिष्णुता और बहुसंस्कृतिवाद, जिम्मेदारी और सहानुभूति के सिद्धान्तों पर टिकी होती है कि इन विशिष्टताओं की उपस्थिति के बगैर एक समरसी समाज की व्यवहारिक आधारभूत संरचना के बनावट और अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती है।

समरसता के भाव के बीजारोपण की प्राथमिक धरती तो हमारा परिवार है जिसे

हम सामाजिक जीवन की प्राथमिक पाठशाला कहते हैं जहां* माता पिता और पारिवारिक सदस्यों से

हम जीवन का पहला 

पाठ सीखते हैं और 

इसलिए हमें हमारे बच्चों को बचपन से श्रेष्ठ, परिष्कृत और परिमार्जित विचारों को देने की जरूरत होती है। दूसरी बड़ी भूमिका शैक्षणिक संस्थानों और समाज तथा परिवेश की होती है जहां हम पलते बढ़ते हैं। हमारे मन की जमीन पर विचार रूपी जो बीज बोए जाएंगे,वही कालान्तर में उस वृक्ष के रूप में परिणत होंगे।

सामाजिक समरसता के भाव के निर्माण में मौलिक और बुनियादी शिक्षा की बड़ी सक्रिय भूमिका होती है। अच्छी शिक्षा ही एक चैतन्य और जागरूक 

नागरिक का निर्माण कर सकती है और जागरूक और चैतन्य नागरिक ही एक श्रेष्ठ समाज और राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं। अच्छी शिक्षा ही हमें। श्रेष्ठ मानवीय गुणों से युक्त करने का काम कर सकती है और यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि आजतक हमारे देश में ऐसी रचनात्मक और साकारात्मक शिक्षा व्यवस्था के मूल को स्थापित करने की दिशा में सफल प्रयास नहीं किए गए हैं,हम डिग्रियां तो बांट रहे हैं, नौकरियां भी दे रहे हैं परन्तु** श्रेष्ठ और समर्पित, चैतन्य और जागरूक नागरिकों के निर्माण नहीं कर पा रहे हैं इसीलिए ऋग्वेद में एक मानव बनने की बात कहते हुए कहा गया है कि,

मनुर्भव 

अर्थात् मनुष्य बनें कि मनुष्य योनि में जन्म लेने मात्र से हम मनुष्य नहीं बन सकते हैं कि एक श्रेष्ठ मनुष्य के लिए कुछ निश्चित और निर्धारित मापदण्ड होते हैं जिनके बगैर हम मनुष्य होकर भी मनुष्य नहीं हो सकते हैं।

अरस्तू और प्लेटो ने भी समरसी और समावेशी समाज के लिए न्याय, बराबरी और बन्धुत्व की बातें की है। कन्फ्यूशियस और ताओ ने भी सबके लिए न्याय और समता की बातें की है।

फ्रांसिसी क्रांति की जो सबसे बड़ी देन मानी जाती है वह * स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व है जो एक समरसी समाज की बुनियादी सोपान है।

यूरोपीय विद्वानों में इमानुएल कांट,दुर्खिम जैसे विद्वानों ने भी समरसी समाज के निर्माण की शर्तों में इन्हीं गुणों की अनिवार्यता पर बल दिया है।हौब्स,लाॅक,रूसो जैसे 

सामाजिक राजनीतिक चिन्तकों ने भी न्याय, बराबरी और स्वतंत्रता को एक स्वस्थ समाज के लिए अनिवार्य बताया है और कहा है कि जब हम एक दूसरे के अधिकारों की रक्षा करेंगे तभी हम एक समरसी समाज की रचना करने में सफल हो सकते हैं और इसलिए हमारे अथर्ववेद में हजारों साल पहले कहा गया है कि,

सर्विआशा मम् मित्र भवन्तु,

अर्थात् सभी दिशाएं हमारी मित्र हों और यह ऋचा सार्वभौमिक 

भाईचारे और एकता का ही संदेश देता है।

परन्तु यहां यह भी उल्लेखनीय है कि अच्छे कार्य के मार्ग में बाधाएं भी होती हैं जो सामाजिक समरसता के मार्ग में भी है।

आर्थिक असमानताएं एवं विसंगतियां, अवसरों की असमानता, जातिवाद, वर्गवाद,

भाषावाद, क्षेत्रवाद, संकीर्ण और स्वार्थपरक राजनीति,मत पंथ आदि के श्रेष्ठता के संघर्ष, मौलिक रचनात्मक और बुनियादी शिक्षा का अभाव आदि इसके मार्ग के बड़े बाधे हैं।

परन्तु हमें इन्हीं विषमताओं और विडम्बनाओं के बीच ही एक मध्यम मार्ग 

की खोज करते हुए एक सुखी, संतुलित और स्वस्थ समरसी और समावेशी समाज की रचना भी करनी है।

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दुःख सुख कहकर नहीं आते हैं, दिवस : ३० ११ २५ 
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दुःख सुख कहकर नहीं आते हैं, दोनों अनामंत्रित होते हैं पर दोनों में बड़ा फर्क होता है, सुख को स्वीकार करने में हम सहज और ग्राह्यपूर्ण हो जाते हैं परन्तु दुःख हमें सहजता से असहज कर देता है और हमें स्वीकार नहीं होता परन्तु न स्वीकार्य होते हुए भी स्वीकार करना पड़ता है और उसे झेलना पड़ता है तो क्यों न हो उस दुःख को भी सहजता से झेलने और जीने की कोशिश की जाए।

इस कोशिश का सच यह भी है कि झेलने और सहने के अलावा कोई विकल्प हमारे पास नहीं रह जाता है और जिसका कुछ विकल्प नहीं होता है,उसे सहजता से लेने पर उसकी पीड़ा और वेदना कम हो जाती है।

यह जीवन का सहज मनोविज्ञान है कि जिस विषय पर हमारा फोकस होता है,वह सक्रिय हो जाता है और हमारे शरीर के भीतर वैसी ही जैव रासायनिक प्रतिक्रियाओं का असर शुरू हो जाता है जो एक आध्यात्मिक सच के साथ साथ वैज्ञानिक सच भी है।

जब हम प्रेमपूर्ण और सहज भाव में रहते हैं तो हमें हमारा जीवन बड़ा सुखद और अनुभूतिपूर्ण लगता है। सबकुछ सुखमय प्रतीत होता है और ठीक इसके विपरीत मन को अवसादित और कुंठित रखने पर अच्छी चीजें भी सुखकर नहीं लगती है।

हमारा जीवन हमारे भाव और विचारों पर निर्भर करता है इसलिए दुःख या पीड़ा को भी जीवन का एक हिस्सा मान लेने पर उसकी स्वीकार्यता ग्राह्य हो जाती है।

मान लिया जाए कि कोई दिन हमें भूखे रहना पड़े और कोई विकल्प न हो तो उसे सहर्ष झेलने पर भूख हमें कम पीड़ित करता है और भूख के बारे में ही लागातार सोचते रहने पर भूख की पीड़ा और बढ़ जाती है।

हमारा जीवन विकल्पों पर भी चलता है और जो चीजें निर्विकल्प होती हैं उसे ही विकल्प मान लेने पर जीवन अपेक्षाकृत सहज हो जाता है।

हम अपेक्षा और‌ उम्मीदों पर भी जीते हैं पर ध्यान रहे कि अपेक्षाएं और उम्मीदें जितनी कम होती हैं वे उतनी ही सुखकर होती हैं कि अपेक्षा या उम्मीदों से ज्यादा मिल जाने पर खुशियां दुगुनी हो जाती है और अपेक्षाओं के कम होने पर दुःख की अनुभूति कम होती है।

जीवन के जो भी मार्ग हैं उनके चयन की आजादी तो हमारे हाथों में हैं,किसे चयन करें या न करें हमारे विवेक पर निर्भर करता है और हमारे चयन के लिए हम ही जिम्मेदार होते हैं।

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दिसंबर  : सम्पादकीय : आलेख 
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अरुण कुमार 

विचार : दिवस : १ ; १२ : २५  

हारते वो नहीं जो हार जाते हैं 
जो हार मान लेते हैं हकीकत में वो हार जाते हैं।
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सितारों के आगे आस्मां और भी है
बस उड़ान भरने का हौसला रखना 
आस्मां और भी है।
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मैदान में जंग तभी जीते जाते हैं जब वो मैदान के पहले दिलो-दिमाग में जीत लिए जाते हैं।
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जिन्दगी किसी भी लम्हा बदल सकती है,बस उसे बदल देने की जिद और हौसला होना चाहिए।
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हमसे बेहतर हमको कौन जान सकता है,
बस खुद की ताकत और काबिलियत को
पहचान करने की कोशिश करो, रास्ते तो 
निकल ही आएंगे।
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जीवन का सच दिवस : २ : १२ : २५  
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हम सदैव‌ पूर्ण या सफल जीवन की बातें करते हैं पर कभी हम में से किसी ने यह समझने की कोशिश की है एक पूर्ण या सफल जीवन क्या होता है, इस जीवन के 
मापदण्ड या शर्तें क्या होती हैं जिनकी पूर्ति करने के बाद कोई यह दावा कर सके कि हमनें सफल जीवन जिया है या हमारा जीवन पूर्ण रहा है। जीवन के सम्बन्ध में यह बड़ा ही गुढ़ और गंभीर सवाल है जिसका सटिक और निरपेक्ष उत्तर देना अगर असंभव नहीं तो सहज और सरल भी नहीं है।
जैसा कि हम सब जानते हैं कि हम मनुष्यों का जीवन बहुआयामी होता है परन्तु मूलतः द्वीआयामी ही होता है,एक भौतिक जीवन और दूसरा सूक्ष्म या आध्यात्मिक जीवन जिनमें बहुसंख्यक वर्ग 
इसी भौतिक जीवन को जो सांसारिक जीवन है,को ही जीवन समझता और मानता है।
जो द्रष्टव्य है,जो भौतिक रूप में उपलब्ध और जांचा-परखा है,सबके लिए सच नजर आता है परन्तु एक पक्ष यह भी है कि जो नजर नहीं आता,वह भी सच ही होता है जो भौतिक जगत का आधार होता है। 
भूख,प्यास,प्रेम,मोह,
आकर्षण,घृणा,ईर्ष्या,
द्वेष,सहानुभूति,दया,करूणा,क्षमा,हिंसा, अहिंसा आदि के अस्तित्व सूक्ष्म होते हैं परन्तु इनके प्रकटीकरण से इनके भौतिक रूप हमें दृष्टिगोचर होते हैं और तभी हम प्रेम और घृणा,क्रोध और क्षमा,
हिंसा और अहिंसा आदि के भेद और भाव को समझ पाते हैं।
ऐसा ही हमारे जीवन का सच है जो हमें अलग-अलग रंगों में दिखाई पड़ता है और हम उसे उसी अनुरूप परिभाषित करने की कोशिश करते हैं और यह परिभाषा भी हर व्यक्ति की योग्यता, क्षमता,बौद्धिक चेतना,अनुभव,ज्ञान आदि पर निर्भर करता है।अकादमिक डिग्री एक बड़ा मानक होता है कि एक सातवां कक्षा उत्तीर्ण और एक स्नातकोत्तर डिग्री धारक की सोंच में फर्क होना स्वाभाविक है,यह बात अलग है कि सातवीं पास व्यक्ति की सहज चेतना और समझ उस स्नातकोत्तर डिग्री धारक से अधिक हो सकती है और जीवन को देखने,जानने, समझने और परिभाषित करने का नजरिया यहां बदल सकता है।
भौतिक दृष्टिकोण से समृद्ध एक निरक्षर या अल्प साक्षर व्यक्ति की तुलना में एक आर्थिक दृष्टिकोण से कमतर और कमजोर व्यक्ति की सोंच इस जीवन के प्रति निस्संदेह अलग-अलग हो जाएगी कि एक शिक्षित व्यक्ति जीवन को भौतिक और सूक्ष्म दोनों तरीके से देखेगा परन्तु अशिक्षित या अल्प शिक्षित अलग तरीके से देखेगा और इसका पक्ष सिर्फ भौतिक ही होगा। वह जीवन की सफलता,असफलता, पूर्णता अपूर्णता आदि को अपनी भौतिक उपलब्धियों के आधार पर ही आकलन करेगा। इस तरह जीवन को अपूर्ण और पूर्ण मानने और परिभाषित करने का जो फर्क है,वह भौतिक और सूक्ष्म दोनों आयामों से जुड़ा होता है।
परन्तु ध्यान रहे कि किसी भी विषय या अवस्था की पूर्णता कभी भी एक आयामी नहीं हो सकती है चाहे आपकी समझ, ज्ञान 
और योग्यता का स्तर जो भी हो परन्तु भेद तो मन का बना ही रहता है।
यहीं पर हमारे जीवन में संतुलन समन्वय और सामंजन की जरूरत होती है।एक बड़े धनी उद्योगपति या कारोबारी को अपनी व्यवस्था को सही तरीके से चलाने के लिए बौद्धिक,
योग्य,सक्षम,कुशल, ईमानदार,कर्मठ और
प्रबन्धकीय क्षमतायुक्त 
व्यक्तियों के समूह की जरूरत होती है,उसकी योजनाओं को व्यवहारिक रूप देने के लिए एक सक्षम कार्यकारी समूह की जरूरत होती है और ऐसी अवस्था में ही हम समझ पाते हैं कि भौतिक और सूक्ष्म क्षमताओं में संतुलन और समन्वय ही जीवन को सफल और पूर्ण बनाने का काम करता है और ऐसी अवस्था एक साथ एक व्यक्ति में नहीं मिल सकती है।
ऐसा ही फर्क भौतिकता या  सांसारिकता और आध्यात्मिकता में होता है जिसके सम्यक् संतुलन और समन्वय से जीवन को पूर्ण और सफल बनाने की कोशिश की जा सकती है।
हम सिर्फ सुख,वैभव,
यश, प्रतिष्ठा,पद,कद,
धन आदि को पा कर और जी कर ही सफल या पूर्ण जीवन की अनुभूति नहीं कर सकते हैं कि तमाम उपलब्धियों के बावजूद भी जीवन रुपी कमरे का कोई कोना खाली रह ही जाता है।
जीवन अनुकूलताओं
और प्रतिकूलताओं का सुन्दर सम्मिश्रण है,किसी का प्रारम्भिक या पूर्वार्द्ध काल दुखमय और संघर्षपूर्ण होता है तो किसी का उत्तरार्द्ध काल संघर्षपूर्ण हो जाता है तो किसी का उत्तरार्द्ध काल सुखमय हो जाता है और अपवाद स्वरूप किसी के दोनों काल अनुकूलताओं में गुजर 
जाते हैं। ऐसा ही कुछ जीवन होता है।
भौतिकता से उबा हुआ जीवन आन्तरिक या अन्तस के सुख की खोज करने लगता है और हम देखते हैं कि ढेर सारे धनाढ्य विदेशी उसी सुख की खोज में भारत की ओर भागे चले आते हैं कि भारत को आध्यात्मिक अनुभूतियों की धरती माना जाता है। ऐसे लोगों से हिमालय की घाटियों में बसे क्षेत्र,बनारस, हरिद्वार, प्रयागराज,
ऋषिकेश जैसे नगर भरे पड़े हैं जो सब भौतिक सुख भोग की निस्सारता को समझकर,सब त्याग कर यहां चले आते हैं।
भोग जब अपने अति पर पहुंच जाता है या पहुंचने लगता है तब 
विरक्ति या वैराग्य का बोध होने लगता है और यह क्षण ही हमें हमारी दिशा और दृष्टि को बदल देता है।
भौतिकवादी दृष्टिकोण 
जीवन की सफलता और पूर्णता को भौतिक उपलब्धियों के नजरिए से देखता है और आध्यात्मिक दृष्टिकोण जीवन की सार्थकता के दृष्टिकोण से देखता है कि हम अगर इस संसार में हैं,हमारा अस्तित्व है तो क्यों है
और होने का कारण क्या है, परन्तु सच दोनों के मध्य में या इनसे भी इतर हो सकता है। भौतिकवादी दृष्टिकोण हमारे किशोरवय से शुरू होकर प्रौढ़ावस्था तक चलता है और इसके बाद दूसरे पक्ष का बीजारोपण शुरू होता है, जीवन हमसे सवाल करना शुरू कर देता है कि अबतक क्या खोया क्या पाया और यहीं से द्वन्द्वात्मक बोध शुरू हो जाती है।
जीवन को देखने समझने का नजरिया हमारे दृष्टिकोण के उपर भी निर्भर करता है जिसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है। एक मनोविज्ञान की कक्षा में एक शिक्षक पानी से भरा एक गिलास मेज पर रखकर छात्रों से पुछा कि इसमें कितना पानी है। कुछ बच्चों ने कहा कि गिलास आधा खाली है और कुछ ने कहा कि आधा भरा है। जिन्होंने आधा खाली कहा उनका दृष्टिकोण नाकारात्मक माना गया और इसके विपरीत जिन्होंने आधा भरा कहा, उन्हें साकारात्मक माना गया।
जीवन में कभी भी कुछ पूर्ण नहीं हो सकता है, कुछ न कुछ खालीपन रह ही जाता है,इसी रहस्य को समझना ही जीवन के सच को समझना है और यही संसार का भी सच है जो हमें सबकुछ के प्रति जिज्ञासु बनाकर रखता है।

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हम,हमारी पहचान और इसका संकट
५ १२ २५ 
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सबको अपने अस्तित्व और शक्ति की पहचान 
स्वयं करनी पड़ती है कि
ऐसे लोग लगभग नहीं के बराबर होते हैं जो
किसी की वास्तविक 
शक्तियों, योग्यताओं और क्षमताओं को बता
सकें कि वह वास्तव में क्या है कि यह कालखंड 
नाकारात्मक प्रतिस्पर्धा 
का है जहां एक ही क्षेत्र 
में अनेक प्रतिस्पर्धी होते
हैं और प्रतिस्पर्धा सदैव 
एक नाकारात्मक होड़ 
होती है।
एक सिंह शावक एक भेड़ माता को मिल गया और वह उन्हीं भेड़ों के साथ पलने बढ़ने लगा
और उसकी हिंसक तथा नायक प्रवृत्ति भेड़ जैसी
हो गयी। वह भेड़ों की तरह पीता खाता और वैसे ही रहता। उसकी भेड़ माता भी नहीं चाहती कि वह उन्हें छोड़कर जाए कि उसके रहने से उसका झुन्ड सुरक्षित महसूस करता था। एक दिन वह शेर शावक जो अब वयस्क शेर बन गया था, झुन्ड से बिछड़कर जंगल में कहीं 
भटक गया। उसे देखकर अन्य जानवर इधर उधर भागने लगे। वह भौंचक था कि हो क्या रहा है।
इसी बीच उसे प्यास लगी और वह पास के बड़े जलाशय में पानी पीने के लिए झुका और पानी में अपनी भारी भरकम आकृति देखी और इसी बीच उसे सामने पहाड़ की ऊंची चोटी पर अपने जैसी आकृति वाला जानवर
दिखाई पड़ा और वह थोड़ा ठिठक गया। तब
तक उस पहाड़ वाले शेर ने दहाड़ लगाई जिसे सुनकर इसके भीतर एक आन्तरिक स्पन्दन हुआ,उसके गर्दन की नसें खिंच गई और उसने भी सर उठाकर चिल्लाने की कोशिश की तो फंसी फंसी सी गुरगुराहट निकली। उसने फिर कोशिश की, फिर कोशिश की और उसके गले से एक तेज दहाड़ निकली। सारा जंगल कांप गया और वह समझ गया कि वह भेड़ नहीं जंगल का राजा शेर है।
शाम ढले वह फिर अपने भेड़ झुन्ड में आ गया पर अब उसकी चाल में एक दर्प और गुरूर था जिसे देखकर भेड़ें सहम गयीं।
फिर वह पोषक मां के पास आया और बड़े प्रेम और ममता से देखा और दहाड़ मारते हुए निकल गया।
आज उसे उसकी वास्तविकता से भेंट हो गयी थी, उसने स्वयं को पहचान लिया था कि उसकी पहचान संगति में खो गयी थी,वह शेर से भेड़ बन गया था परन्तु अपनी छाया को जलाशय में देखकर और उस पर्वतीय शेर की दहाड़ सुनकर वह समझ गया कि वह क्या है।
ऐसा ही हमारे जीवन में भी होता है कि हमें हमारे असली स्वरूप का ज्ञान भान नहीं होता है। किसी संगति का लम्बी 
अवधि का सान्निध्य हमारे व्यक्तित्व को प्रभावित करता है और हमारे भीतर की आन्तरिक शक्तियां और क्षमताएं कुंठित हो जाती हैं और हम मानसिक रूप से कमजोर हो जाते हैं।
यही भेड़ वृत्ति और सिंह वृत्ति के विकसित होने के कारण और कारक हैं।
हम यदि व्यवसायियों के सान्निध्य में रहेंगे तो वाणिज्यिक वृत्ति और प्रवृत्ति विकसित होगी, योद्धा के संग, योद्धा वृत्ति प्रवृत्ति विकसित होगी, आपराधिक संगति, आपराधिक वृत्ति 
प्रवृत्ति को विकसित करेगी, आध्यात्मिक संगति,वैसी ही वृत्ति प्रवृत्ति को विकसित करेगी।
भटकाव और विचलन हमें हमारी पहचान से अलग कर देता है, हमारी आन्तरिक चेतना और हमारे संस्कार आवृत्त है जाते हैं जैसे राख अग्नि को ढक लेती है और फिर जैसे ही राख हवा के तेज झोंके से उड़ जाती है तो अग्नि फिर से प्रबल हो जाती है।
ऐसे ही हमारी शारीरिक और मानसिक शक्तियां
और क्षमताएं परिस्थितिजन्य कारणों
और कारकों से ढक जाती हैं और हम सिंह से भेड़ बन जाते हैं,अपनी वास्तविक पहचान भूल जाते हैं।
इसलिए समय समय पर हमें आत्मावलोकन और 
आत्मनिरीक्षण करते रहना चाहिए और जीवन को श्रेष्ठ बनाने का यही मार्ग है।

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विकास की अपार संभावनाएं ८ १२ २५ 
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हर मनुष्य के भीतर अपने व्यक्तित्व के विकास की अपार संभावनाएं होती है बस जरूरत होती है कि उसकी पहचान कर उसे 
विकसित करने की और समय इसके लिए समय जरूर देता है।

हम भी भगवत्ता को प्राप्त कर भगवान बन सकते हैं कि भगवान बनने की भी संभावनाएं 
सभी मनुष्यों में समान रूप से उपलब्ध होती हैं।अब कोई यह प्रश्न पृच्छा कर सकता है कि आदमी भगवान कैसे बन सकता है कि भगवान तो भगवान होता है।
पर ऐसा नहीं है,हम सर्वोच्च मानवीय मोल‌और मूल्यों को विकसित करके, सामान्य मानवीय एषणाओं,कामनाओं,
इच्छाओं,मोह और वासनाओं पर नियंत्रण प्राप्त कर और अंत में उन पर विजय पाकर भगवान बन सकते हैं।
यहां यह भी ध्यान रखना है कि ईश्वर‌ और भगवान 
में बड़ा फर्क होता है, ईश्वर बना नहीं जाता है,वह तो होता है,वह स्वयं अस्तित्व, Self
Existing Being होता है।
जहां भगवान बनने का सवाल है तो मानव से महामानव बनने की अवस्था ही भगवान बनना है या रूपांतरित हो जाना है जैसे सिद्धार्थ,वर्द्धमान,नानक
देव आदि मानव से महामानव बन गए। भगवान शब्द का विश्लेषण करने पर देखा जाता है कि यह दो शब्दों यथा,भग और वान के मिलने से बना है। भग शब्द की उत्पत्ति भज् धातु से होती है जिसका अर्थ बांटना या हिस्सा करना होता है अर्थात् परम सत्ता का महती अंश प्राप्त कर लेना होता है और पुनः समन्वित हो जाना है अर्थात् अद्वैत से द्वैत और फिर द्वैत से अद्वैत हो जाना है। एक अर्थ भग का भंग करना भी होता है और वान का सामान्य अर्थ* वाला या धारण करने वाला के साथ साथ बाण या बंधन भी होता है तो जिसने बाणों अर्थात् मानवीय चारित्रिक दोषों 
यथा,मद(अहंकार),मोह
(आसक्ति,आकर्षण,राग
आदि),लोभ(लालच,
किसी वस्तु को पाने की अति लालसा),काम(दैहिक भोग, इच्छा, कामना आदि) और क्रोध पर विजय पाकर अरिहंत बन गया,अर्हत्व की अवस्था को पा लिया, भगवान बन गया और ऐसा ही अनेक महापुरुषों या विभूतियों ने किया है।
भारतीय आध्यात्मिक दर्शन और चिन्तन में भगवान उस सत्ता या अस्तित्व को कहा गया है जो * षड् ऐश्वर्य Six Fold Great Virtues
अर्थात् ऐश्वर्य,वीर्य,यश,
श्री,ज्ञान (प्रज्ञा) और वैराग्य छः महान बल या 
पारमीतताओं का धारण करने वाला हो,ये षडगुणात्मक सत्ता ही भगवान है पर ईश्वरीय सत्ता से इतर है।
सामान्य सांसारिक जीवन में भी श्रेष्ठ मानवीय गुणों यथा,दया,
करूणा,क्षमा,त्याग,प्रेम,
अक्रोध,अकाम,अहिंसक वृत्ति,समवेदना, शान्ति आदि से भी जो युक्त है, भगवान है। किसी के बड़े बुरे वक्त में, संकट काल में,रोग व्याधि आदि से मुक्त करने में जो सहायक सिद्ध होता है,हम उसे भगवान की संज्ञा देते हैं।
The God is the Personification of
thy Supreme Power in the form of Human Being Which is omnipresent in different forms on the earth.
कल्याणकारी ईश्वरीय
सत्ता जब मानव रूप में 
रूपांतरित होती है,वही रूपांतरण भगवान है।
हम भी अपने श्रेष्ठ दैवी गुणों से किसी का कल्याण करके किसी के लिए भगवान बन सकते हैं इसलिए सदैव श्रेष्ठ करते रहने का प्रयास करते रहना चाहिए कि क्या पता वह परम सत्ता 
कब किसे किसके लिए * भगवान बनने हेतु चयन कर लें।

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समदृष्टि और समभाव: : दिवस ९ १२ २५ 
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Equanity and impartiality or a balanced state of mind,heart and brain
सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन में इन दो शब्दों के बड़े दार्शनिक और व्यवहारिक पक्ष होते हैं जो सिर्फ दर्शन या सिद्धान्त ही नहीं जीवन के व्यवहार भी हैं जिनसे 
हमारा रोज का साक्षात्कार होता है।ये दो 
ऐसे भाव हैं जो हमें हमारे अस्तित्व के औचित्य और अनौचित्य का बोध कराते हुए सर्वश्रेष्ठ होने की आत्ममुग्धता की स्थिति से मुक्त करवाते हुए हमें 
हमारे भीतर** समदृष्टि 
और समभाव की भावनाओं का सृजन करते हुए हमें,स्वतंत्र,
सहज,उन्मुक्त,निरपेक्ष,
स्वाभिमानी और वैचारिक रूप से परिपक्व बनाने का काम करते हैं और शायद इसीलिए हमारे वैदिक साहित्य और औपनिशदिक दर्शनों में हजारों साल पहले इस पर गहन चिन्तन किया जा चुका है।
इस सन्दर्भ में यजुर्वेद 
(36:18) कहता है कि,
मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षान्ताम्,
अर्थात् सभी प्राणी मुझे मित्र दृष्टि से देखें और मैं सभी प्राणियों को मित्र दृष्टि से देखूं।
अब इस श्लोक का गंभीरता से अवलोकन करने की जरूरत है और गहराई से समझने की जरूरत है और तभी हम जीवन के अर्थ और यथार्थ को समझ सकते हैं।
समभाव और समदृष्टि को वैश्विक स्तर पर सभी
मत, पंथों आदि में बड़े आदर और सम्मान के साथ स्थान दिया गया है, विशेषकर बौद्ध दर्शन के
* सात बोध्यांग कारकों 
में से एक माना गया है जहां समभाव को * उपेक्षा भाव या equanimity कहा गया है कि अपेक्षा भाव से राग द्वेष आदि की उत्पत्ति होती है।
कश्मीर शैव मत में भी इसे श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है।
यह दर्शन कहता है कि,
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड हमारी स्वयं की चेतना ( आत्मन) का ही प्रतिविम्ब है जिसे दूसरे शब्दों में ऐसा कहा जा सकता है कि हम मनुष्य
सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय चेतना का ही विस्तार और प्रक्षेपण हैं,उस अमूर्त सत्ता का मूर्त रूप हैं और इसलिए जैसा कि पंचभूत्वा सत्ता समभाव और समदृष्टि रखती है, हमें भी उस गुणधर्म का पालन करने
की चेष्टा करनी चाहिए।
परम वास्तविकता क्या है,जो सर्वहितकारी और
सर्वकल्याणकारी भाव
और चेतना से युक्त है,उस सत्ता और सत्य को जानना ही परम सत्य ultimate truth
को जानना है जिसे समस्त प्राणियों में सिर्फ मनुष्य ही जान समझ सकता है और इस दिशा में जो अपनी सोंच भर ही विकसित कर लेता है,उसके भीतर समभाव
और समदृष्टि की भावना और चेतना विकसित होने लगती है। 
हम हमारे जीवन में जो कुछ भी बनते बिगड़ते हैं 
वह हमारी दृष्टि और हमारा दृष्टिकोण ही है।
समभाव और समदृष्टि हमारे भीतर स्वात्म प्रतिबिम्ब अर्थात् स्वयं को पर में और पर को स्वयं में देखने की दृष्टि और चेतना को विकसित करने का काम करती है जो निजी जीवन से लेकर पारिवारिक, पारिवारिक से सामाजिक, सामाजिक से लेकर राष्ट्रीय और राष्ट्रीय से लेकर वैश्विक जीवन को 
समदृष्टि से समझने का अवसर सृजित करती है। हम हमारे पारिवारिक जीवन में ही
सुख, शान्ति, सहयोग और सद्भावना के लिए 
हमें इन दोनों भावों को अपनाने की जरूरत होती है। अगर परिवार में कभी मत मतान्तर, विवाद या तनाव की स्थिति बन जाती है तो
यही दो भाव स्थिति को शान्त और संतुलित करने में सफल होते हैं।
यही यजुर्वेद में अंकित श्लोक का मूल भाव है।
हमें किसी निर्णय या न्याय करने वक्त निरपेक्ष भाव से,सभी आग्रहों, पूर्वाग्रहों और दूराग्रहों से मुक्त होना पड़ता है तभी
हम सच कह पाने में सक्षम हो सकते हैं। हमें 
स्मरण होना चाहिए कि इसी यथार्थ को मुंशी जी ने पंच परमेश्वर में कहा है कि,
पंच के आसन पर बैठकर कोई किसी का न तो दोस्त होता है और न दुश्मन,पंच की आवाज खुदा की आवाज होती है, उसमें परमेश्वर का वास होता है और यही दृष्टिकोण तो
समभाव और समदृष्टि का भी होता है।
पारिवारिक सामाजिक राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर समरसता और सहमना की चेतना इन्हीं से सृजित होती है और 
हम शान्ति पूर्ण सह अस्तित्व को स्वीकार करके एक वैश्विक मानव समाज की कल्पना भी करते हैं और उसे बनाए रखने का प्रयोग और‌ प्रयास भी करते हैं। इनसे मानसिक तनाव और संघर्षों से मुक्ति मिलती है, हमारे भीतर
करूणा, क्षमा,त्याग,
दया, सहानुभूति, परस्पर सहयोग और सद्भावना, समरसी और समावेशी बनने की चेतना का सृजन और विकास होता है जो आज के समय की वैश्विक मांग है।
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विश्व मानवाधिकार दिवस १०   १२ २५ 
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मानवाधिकार केवल वैश्विक कानूनी अवधारणाएं नहीं है बल्कि हमारे दैनिक जीवन की मूलभूत जरूरतें और पहलू भी है
कि समस्त मानव समुदाय को बगैर किसी
भेदभाव के समान भाव से स्वतंत्र रूप से जीने का अधिकार है।
इसी मूलभूत अवधारणा को लेकर 10 दिसम्बर 1948 को यू एन ओ की
महासभा के द्वारा मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के तहत मानवाधिकार दिवस के रूप में घोषित किया गया परन्तु इसकी घोषणा विधिवत 10 दिसम्बर 1950 को की गयी।
यद्यपि वैश्विक समुदाय आज भी इसके लक्ष्यों को पाने में सफल नहीं हुआ है फिर भी हम बेहतर करने की कोशिश में हैं।
हर वर्ष इस दिवस के लिए एक थीम तय किया जाता है,इस वर्ष का थीम,* मानवाधिकार: हमारी रोजमर्रा की आवश्यकताएं हैं अर्थात सबकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति में सबको मिलकर काम करने की जरूरत है।=====
समस्त मानव समुदाय को वैश्विक मानवाधिकार दिवस की हार्दिक बधाईयां एवं 
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आभार या कृतज्ञता का भाव हमारे जीवन में क्यों ११  १२ २५ 
जरूरी है।
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मेरा जीवन और हमारा जीवन कहने मात्र से ही एक बड़ा फर्क पैदा हो जाता है और जीवन को देखने समझने का नजरिया ही बदल जाता है।
मैं शब्द जीवन को संकुचित करके एक छोटे वर्णपट पर लाकर खड़ा कर देता है जिससे जीवित* सिकुड़ा और सिमटा हुआ लगने लगता है पर जैसे ही कोई हमारे जीवन की बातें करता है तो जीवन का स्वरूप विराट और बड़े वर्णपट पर चला जाता है और जीवन मैं से हम में रूपांतरित हो जाता है और यहीं से आभार और कृतज्ञता के भावों का सृजन शुरू हो जाता है। जीवन के सारे परिदृश्य बदलने लगते हैं और जीवन के मोल और मूल्य बदल जाते हैं।
हमारा जीवन कहने मात्र से हम समस्त ब्रह्माण्ड और जागतिक जीवन से
जुड़ जाते हैं, ब्रह्माण्ड के समस्त जड़ चेतन, स्थावर जंगम के सम्बन्ध 
हमसे जुड़ने लगते हैं और इस जुड़ाव से जीवन के सृजन विकास और संरक्षण के प्रति हमारे मन हृदय और मस्तिष्क में आभार एवं 
कृतज्ञता के भाव जागृत होकर विकसित होने लगते हैं जिससे हम सबकी उपयोगिता और उपादेयता समझने लगते हैं।
अब हम यह समझने की कोशिश करें कि कि कोई एक बहुत धनवान है,उसे कुछ नेक काम करना है तो वह किसके लिए करेगा,इसके लिए 
निर्धन,बीमार, लाचार,
जरूरतमंदों की जरूरत होगी जिनकी वह मदद कर सके और ऐसा करके उसे सुखानुभूति होगी, आत्मसंतुष्टि होगी,
अब यह सोचें कि अगर ऐसे लोग उपलब्ध न हों
तो वह क्या करेगा तो उसे उनके प्रति आभार प्रकट करना होगा, उनके प्रति कृतज्ञ होना होगा कि उनके रहने से वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर सकने में सफल हो सका। 
हम हमारे जीवन में नाना विषयक क्षमता गुण सम्पन्न लोगों को देखते हैं जिनकी भागीदारी और हिस्सेदारी इस समाज में होती है जिन्हें हम समझते हैं कि वे अपना काम धंधा करते हैं पर जरा सबके कार्यकलापों का आकलन और विश्लेषण करने की कोशिश करें तो आप पाएंगे कि हम सब एक दूसरे के कामकाज से जुड़े हुए हैं,
एक डाॅक्टर हमारी चिकित्सा करता है और इसके एवज में अपनी फीस लेता है पर हमें 
हमारी व्याधियों से मुक्त करता है,फीस उसने अपनी मेहनत और समय का लिया और इस एवज में उसने हमें आरोग्य दिया,इस आरोग्य के लिए हमें उसके प्रति आभार प्रकट करना चाहिए, कृतज्ञ होना चाहिए। एक जवान सीमा पर देश की सुरक्षा में लगा रहता है,उसे इसके लिए वेतन मिलता है पर वह अपनी जान की कीमत पर हमें हमारी सुरक्षा की गारंटी भी देता है कि हम सीमाओं पर जाग रहे हैं पर आप चैन से सोएं।
हमें उसके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए।
सम्पूर्ण वातावरण और परिवेश में हमारे इर्द-गिर्द पेड़ पौधे,जीव
जन्तु,नदी तालाब,झील
झरने,वन पर्वत,फल फूल,हवा पानी, समाज और उसमें रहने वाले लोग मौजूद हैं जिनसे हमारा जीवन हर पल बंधा हुआ है, हमारी आश्रिता उनपर टिकी हुई है, हम इन्हीं के बीच जन्म लेकर,पलते बढ़ते हैं या यों कहें कि जीते मरते हैं तो स्वाभाविक है
कि हमें इनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए।
कृतज्ञता के भाव हमें 
समस्त ब्रह्माण्डीय क्रियाशीलताओं के साथ जोड़ने का काम करते हैं। कृतज्ञता के भाव हमें 
साकारात्मक भाव से जीने और आगे बढ़ने के मार्ग प्रशस्त करते रहते हैं। कोई अच्छा और नेकदिल इंसान है पर उसकी कीमत तुलनात्मक होती है कि उनकी तुलना में कम अच्छे या बुरे लोगों का होना भी जरूरी है। एक दार्शनिक कहता है,
It is the attitude and feeling of gratitude which makes a difference between good and bad. A man who is always grateful to everyone is a blessed one.
किसान, मजदूर, कामगार,कारीगर, गीतकार, संगीतकार, चित्रकार, व्यवसायी,फल सब्जी विक्रेता, स्वर्णकार, चिकित्सक,वकील, चिकित्सक,शिक्षक,
साहित्यकार, पत्रकार 
आदि सभी के योगदान से हमारा संसार चलता है,हमारा जीवन चलता है। समाज नाकारात्मक लोगों से भी भरा हुआ है जहां चोर, उचक्के, हत्यारे,अन्य अपराधी भी भरे पड़े हैं और ये भी इसी समाज के हिस्से हैं पर हम इनके प्रति उपकृत होने या कृतज्ञता के भाव नहीं रखते हैं पर जरा सोचिए कि ये पुलिस, कचहरी, न्यायालय,वकील आदि का होना क्योंकर होता यदि अपराध और अपराधी नहीं होते पर सामान्य रूप से हम नहीं कह सकते कि इनका होना जरूरी है। जीवन भी बहुआयामी और बहु
दृष्टिकोण वाला है,यह वर्ग भी एक वर्ग विशेष के लिए जरूरी होता है पर इसे सामाजिक और नैतिक तथा आध्यात्मिक 
स्वीकार्यता प्राप्त नहीं होती है।
आभार, उपकार और 
कृतज्ञता के भाव हमें 
हमारी दृष्टि और दृष्टिकोण को साकारात्मक और रचनात्मक बनाने का काम करते हैं जिससे हमारे जीवन में प्रतिस्पर्धा तो होती है पर वह प्रतिस्पर्धा साकारात्मक और रचनात्मक होती है जो हमें सदैव आगे बढ़ने के लिए उत्प्रेरित करती है।
हमारे भीतर से ईर्ष्या,द्वेष,हिंसा,क्रोध,
प्रतिशोध आदि के नाकारात्मक भाव कम होने लगते हैं और हम धीरे-धीरे सहज होने लगते हैं।
जीवन जितना सहज होगा,जीना उतना ही सरल होगा। जीवन को जटिल और सहज बनाने का काम कोई अलौकिक शक्ति नहीं करती है बल्कि हम ही कर सकते हैं।
जो हमारे पास उपलब्ध हैं, हमें उनके प्रति आभार प्रकट करना चाहिए, कृतज्ञता के भाव रखने चाहिए कि इस संसार में लाखों करोड़ों ऐसे हैं जिनके पास ये सब नहीं है। आधियां व्याधियां सब
जगह है, उनसे मुक्ति इस जीवन में नहीं है और उनके प्रति भी हमें कृतज्ञ होना चाहिए कि ये होते हैं तो हमारे जीवन में बहुत कुछ बदल जाते हैं,ये हमें एक पुराना जीवन लेकर एक नया जीवन देते हैं, हमें जीवन में संघर्षशील और जुझारू बनाने का काम करते हैं और इसलिए सदैव कृतज्ञता का भाव इस लौकिक और अलौकिक जगत के प्रति बनाए रखिये,निन्दक का होना भी उतना ही जरूरी है जितना कि प्रशंसक का होना और दोनों के प्रति आभार प्रकट करते रहें, कृतज्ञता निवेदित करते रहें कि जीवन का सच यही है।
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मद और कालचक्र १२ १२ २५ 
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कनक कनकते सौ गुनी
मादकता अधिकाय 
वा खाए बौराए जग
या पाए बौराए।
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कविवर बिहारी लाल का यह पद बहुत कुछ कह जाता है कि नशा तो बहुत हैं,पद,बल, नशीले पदार्थ,सत्ता आदि के अपने अपने नशे होते हैं पर धन का नशा ही कुछ और होता है।
कवि यहां कनक शब्द के दो अर्थ और दो प्रयोग बताए हैं जो आज
भी कितना प्रासंगिक और यथार्थ है।
कनक का एक अर्थ धतुरा होता है और एक अर्थ सोना भी होता है।
धतुरा एक मादक फल होता है जिसके कुछ बीज मात्र खा लेने से तीव्र नशा हो जाता है,आदमी बौरा जाता है अर्थात् विक्षिप्त जैसा हो जाता है। ठीक वैसा ही नशा कनक अर्थात् सोना अर्थात् धन का होता है और धन का मद
या नशा किसी भी नशे से ज्यादा प्रभावकारी होता है। इसलिए कवि कहते हैं कि एक को खाने से नशा होता है और एक को मात्र प्राप्त कर लेने से ही नशा हो जाता है। 
धन आदमी को मदान्ध कर देता है,अब धन की मात्रा विचारणीय है,जिनके पास जीवन के लिए आवश्यक धन होता है,वे मदान्ध नहीं हो सकते हैं परन्तु धन का अतिशय होना अहंकार को जन्म देता है 
और अहंकार श्रेष्ठ और‌
तुच्छ,उत्कृष्ट और निकृष्ट में भेद करने की बुद्धि खो देता है,विवेक भी धन के नशे से आच्छादित हो जाता है,
जैसे मोतियाबिंद का जाला मनुष्यों की दृष्टि धुंधली कर देता है।‌उस पर भी अगर धन के साथ सत्ता की शक्ति भी शामिल हो जाए तो वह आदमी तो अंधा ही हो जाता है,वह देखकर भी नहीं देखता और सुनकर भी नहीं सुनता और समझकर भी नहीं समझता,बस धन और सत्ता की समेकित शक्ति 
के वश में होकर उसे जो भी अच्छा लगता है,वही सही लगता है।
पर ध्यान रहे कि नशा चाहे जिस भी प्रकार का हो,एक निश्चित अवधि के बाद उतरता ही है। हमें इसे काल की गति के रूप में देखने की जरूरत होती है कि काल की गति ** रैखिक और वर्तूल दोनों होती है और यह आध्यात्मिक सच होने के साथ साथ 
भौतिक या वैज्ञानिक सच भी है।
समय रैखिक गति से तीर की भांति सीधे आगे की ओर बढ़ते चला जाता है और जिस अवस्था से हम गुजर जाते हैं,उस अवस्था की फिर पुनरावृति नहीं हो सकती है या तो उससे बेहतर होगा या बदतर होगा पर वह नहीं होगा जो था जैसे बचपन से युवा होना,युवा से प्रौढ़ होना और प्रौढ़ से वृद्ध होना,यह जीवन की रैखिक गति है परन्तु एक व्यक्ति का जन्मदिन 
साल भर में एक बार लौटकर आना एक वर्तूल गति है।
ऋतु परिवर्तन,दिन रात का बनना, जन्म मरण का चक्र आदि काल की वर्तूल गति है और ये दोनों गतियां एक दूसरे की विरोधाभासी न होकर सहचरी है कि जागतिक क्रियाशीलताएं
एक साथ रैखिक और वर्तूल दोनों होती हैं। इसलिए कहा भी जाता है कि इतिहास स्वयं को दुहराते रहता है।
बस इसीलिए हम सबको इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि आज तुम्हारा है तो कल हमारा भी होगा।
धन,पद,बल,प्रभाव, सत्ता आदि की शक्ति वर्तुल गति से चलती है
और सदैव कभी इधर तो कभी उधर होती रहती है और इसे समझना ही मद,अहंकार तथा समदृष्टि और समभाव को समझना है और इसे समझना ही जागतिक सच को समझना है।


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जीवन का सच यह भी है आलेख :१३  . १२. २५.
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जीवन जो गुजर गया वो भी हमारा ही था,जो गुजर रहा है वो भी हमारा ही है और जो गुजरने वाला है वो भी हमारा ही होगा और मूलतः इन सबकी
जिम्मेदारी हमारी ही है।भले ही हम अपने मन को समझाने और बोझ
को हल्का करने के लिए 
तर्क और दलील देकर कुछ जिम्मेदारियां लोगों पर डाल दें पर जो हकीकत है,वो हकीकत है।
हम सब बड़ी चालाकी और चतुराई से इससे 
बचने की कोशिश करते हैं पर आत्मावलोकन और आत्मनिरीक्षण से सबकुछ आइने की तरह साफ हो जाता है और आईना वही दिखाता है जो वह देखता है इसलिए जब कभी आईने में देखो तो जो चेहरा नजर आए उससे 
उन सारे सवालों को पूछो जो तुम औरों से पूछना चाहते हो,जवाब मिल जाएगा।
हम सदैव भागने और बचने की कोशिश करते रहते हैं पर उनसे नहीं बच सकते हैं जो हमारा रचा बुना है,भले ही वह जानबूझकर न किया गया हो, उद्देश्य भी गलत न हो परन्तु किया धरा तो हमारा ही है।हां,
इसमें थोड़ी सी राहत मिलती है कि चले थे तो रक्षा करने पर रक्षा में हत्या हो गयी, इसमें आदमी शायद क्षमा न करे परन्तु ईश्वर क्षमा कर देगा कि वह तो काम नहीं,उसके पीछे की मंशा देखता है। इसलिए कहा भी जाता है कि जो कुछ भी करो मन साफ करके करो,किसी गलत मंशा से न करो,आज अगर उससे दुःख या लांछना मिल रहा है तो कल वहीं से प्रशंसा और सम्मान भी मिलेगा।
The dignity of real justice lies not in the action done but the intentions behind the action.
यह जागतिक और दैवी
न्याय दोनों के सिद्धान्त हैं।
क्षमा और पश्चाताप में बड़ी शक्ति होती है। भूल होना स्वाभाविक है पर उसकी स्वीकारोक्ति एक बड़ा गुण है और जो सच्चे मन और हृदय से
क्षमा मांग लेता है, प्रायश्चित और पश्चाताप कर लेता है, उससे उसका मन,हृदय और मस्तिष्क तो सहज हो ही जाता है, ईश्वर भी उसे क्षमा कर देते हैं।
जब हमारा मन,हृदय और मस्तिष्क एकरस 
हो जाता है, समदृष्टि और समभाव रखने लगता है तो उसकी समस्त ऊर्जा एवं चेतना ब्रह्माण्डीय चेतना और ऊर्जा से जुड़ने लगती है,
उसका स्थूल, सूक्ष्म और कारणिक शरीर प्रकाश शरीर या ऊर्जा में रूपांतरित होने लगता है, उसके भीतर अनयास ही दिव्य और‌
अलौकिक शक्तियां जागृत होने लगती हैं और वह स्वयं जागृत चेतना बनने लगता है।
हमारा सम्पूर्ण शरीर एक जटिल यंत्र है जिसमें एक साथ जैव रासायनिक और‌ विद्यूत 
चुम्बकीय प्रेरणाएं और‌ प्रतिक्रियाएं काम करती रहती हैं जिसकी अनुभूति सबको नहीं होती है क्योंकि सब जीवित तो होते हैं परन्तु 
सबकी चेतना जीवित नहीं होती है,या तो अचैतन्य होती है या निष्क्रिय होती है जैसे हमारे शरीर के दो अंग‌ यथा हृदय और मस्तिष्क 
सदैव कार्यशील रहते हैं पर सबको इसकी अनुभूति नहीं होती है वैसे ही हम और हमारी चेतना ब्रह्माण्डीय चेतना से जुड़ी रहती है और हम उसकी नजरों में रहते हैं। कभी कभी हम देखते हैं कि घोर निराशा
और अवसाद के क्षणों में कोई संदेश या कोई भाव 
हमारे मन में कहीं से मिल जाता है जो हमें 
स्वत: स्फूर्त ऊर्जावान बनाने का काम करता है,हम पुनर्जीवित हो उठते हैं और हमारी सोयी जिज्ञासा और जिजीविषा जाग उठती है और यहीं से जैव रासायनिक प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है,हमारा खोया हुआ विश्वास वापस आने लगता है और जैसे चमत्कार सा हो जाता है और यही क्षण आत्मशक्ति और 
ब्रह्माण्डीय शक्तियों के मिलन का क्षण होता है जिसे विज्ञान अपने नजरिए से देखता है और अध्यात्म अपने नजरिए से देखता है।
आस्था,श्रद्धा, विश्वास और भरोसा को मापने का कोई प्रयोगशाला नहीं होता है कि इनकी सत्ता सूक्ष्म और कारणिक होती है परन्तु इनके परिणाम भौतिक रूप से द्रष्टव्य होते हैं।
प्लासेबो का वैज्ञानिक सिद्धान्त इसी पर काम करता है कि एक मरीज को किसी मर्ज की असली दवा दी जाती है और किसी को दिखावे की दवा दी जाती है और दोनों में समान असर होता है और दोनों ठीक भी हो जाते हैं,दर असल यह मानसिक और स्वीकार्य चेतना का प्रभाव होता है,पर सब जगह यह समान रूप से लागू नहीं होता है पर यह सच है और यह विश्वास और भरोसे का प्रभाव है जो बहुत कुछ बदल देता है। यह हमारी 
आस्था,हमारी श्रद्धा, हमारे विश्वास और भरोसे का चमत्कार है कि जो काम दवा नहीं कर पाती वे दुआएं कर जाती हैं,वे हमारे इष्ट के प्रति हमारे विश्वास कर जाते हैं पर इसके लिए बड़े धैर्य,साहस और  सहनशीलता की जरूरत होती है जिसे बनाए रखना पड़ता है और निस्संदेह चमत्कार होता है।
काल की गति बड़ी अद्भुत होती है, इसको समझने के लिए अतीत में झांकते रहना पड़ता है,अतीत हमें प्रतिकूलताओं में लड़ने जूझने की शक्ति देता है और जुझारूपन 
हमें जीवित रहने की ताकत देता है। अतीत, वर्तमान के साथ परछाइयों की तरह चलते रहता है,हमारा बेहतरीन गुरु और‌ मित्र होता है जिसे सीख लेकर वर्तमान की बुनियाद पर भविष्य के भव्य महल के निर्माण की आधारशिला रखी जाती है।
काल क्षीप्र गति से चलायमान है,इसको समझकर,इसके साथ चलते रहने की कोशिश करते रहनी है और जो समय के साथ चलते हैं समय उनके साथ चलता है और वे असफलताओं 
में भी सफलता के मार्ग खोज ही लेते हैं, अमंगल में भी मंगल की खोज कर लेते हैं और वही अमंगल उनके लिए मंगल का कारण बन जाता हैं,
कहते भी हैं कि, मंगलमय विभु अमंगल में भी हमारे लिए मंगलमय कामनाएं छुपा कर रखे रहता है,बस अवलोकन करने की जरूरत होती है।

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सृजन और पीड़ाएं आलेख :१५ . १२. २५.
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सृजन या रचना सदैव‌  आन्तरिक पीड़ाओं से 
गुजरने की प्रक्रिया है जो
जितनी गहन पीड़ाओं से
होकर गुजरेगा, सृजन उतना ही महत्वपूर्ण और
कीमती होगा।एक स्त्री जब गहन शारीरिक और मानसिक पीड़ाओं और यंत्रणाओं से होकर गुजरती है तो एक माॅं बन जाती है, संसार को एक नया जीव देती है जो राम,कृष्ण,महावीर,
बुद्ध जैसी महान विभूतियों में रूपांतरित हो जाते हैं। राम का वनवास झेलना उन्हें 
* मर्यादा पुरुषोत्तम बना देता है, कृष्ण का जन्म से लेकर महाप्रयाण तक 
संघर्षरत रहना और उसी के मध्य प्रेम, कर्म, ज्ञान और भक्ति का संदेश देते रहना उन्होंने योगेश्वर और कर्मयोगी बना देता है, महावीर और सिद्धार्थ का सत्यान्वेषण और तपश्चर्या, जीवन के नवीन मार्ग की खोज उन्हें मानव से महामानव अर्थात् जीण महावीर और तथागत सिद्धार्थ बना देता है।
झेलना पड़ता है,कड़े संघर्ष करना पड़ता है,
कुछ पाने के लिए बहुत कुछ खोना पड़ता है और तब कहीं जाकर कुछ की प्राप्ति होती है।
माना कि सूर्य कोई हमारी तरह जीवित और
चैतन्य प्राणी नहीं है पर सूर्य हमें जीवन देने के लिए तपता रहता है जिसे हम एक उपमा के रूप में इस्तेमाल करते हैं
कि बगैर तपे हुए हम न तो कुछ पा सकते हैं और न संसार को कुछ दे ही सकते हैं इसलिए सृजन पीड़ा खोजती है,
महादेवी की गहन पीड़ाओं की अभिव्यक्ति उनकी रचनाओं में ऐसी ही दिखाई पड़ती है,
*तुझको पीड़ाओं में ढुढ़ा
तुझमें ढुंढूगी पीड़ा 
मैं नीर भरी दुःख की बदली
उमड़ी कल थी मिट आज चली
पीड़ाएं जब सघन और गहन होती हैं तो उसकी
अभिव्यक्ति अनेक रूपों में होती है,वह एक यात्रा बन जाती है जैसे पहाड़ी चट्टानों से गिरते टकराते और अन्त में जमीन को चूमने के लिए पहाड़ी नदी एक सुन्दर जलप्रपात का रूप ले लेती है।
अपने अपने कर्म-क्षेत्र के शीर्ष पर पहुंचने का सपना किसके मनो मस्तिष्क में नहीं होता है
परन्तु सपनों को सच करने के लिए अपादमस्तक तपना पड़ता है, जीवन साधना है, श्रेष्ठता पाना यज्ञ है जिसमें सुखों की,भोगों की आहूति देनी पड़ती है, एक अनगढ़ पत्थर हजारों बार छेनी हथौड़ी के प्रहारों को सहता है तब एक खुबसूरत शिल्प का आकार लेता है, एक 
प्रतिमा बनता है जिसे देखकर हम आह्लादित होते हैं, भावविभोर हो जाते हैं पर यह भूल जाते हैं कि इस सुन्दर रचना के पीछे कितनी चोटें लगी हैं और कितना श्रम लगा है।
We always see the top of the magnificent historical buildings and structures but we never try to see the cost of sufferings,diligence and dedication
behind them.
हम बड़े को बड़ा तो देखते हैं परन्तु उसकी पृष्ठभूमि के संघर्षों और
सही यातनाओं की अनुभूति नहीं करते हैं।
कोणार्क के सूर्य मन्दिर के सौंदर्य को तो देखते हैं पर उसके पीछे उन मजदूरों और कारीगरों की यातनाओं को नहीं देखते हैं,जब राजा अपने महामात्य से पुछता है,
देखिए कितना सौन्दर्य और कितनी खुशियां चारों ओर है, महामात्य कहता है,
महाराज,झूरमुट की ओट में चहकने वाले पक्षियों के स्वर में सदा जयकार ही नहीं होता,दुःखों का हाहाकार भी मुस्कुराता रहता है और यही सच भी है।
जीवन का सच और यथार्थ सबके लिए अलग-अलग होता है।
सबके लिए जीवन आनन्द और खुशियां नहीं होती,सबकी सुनहरी सुबह सबके लिए मुस्कान लेकर नहीं आती, कुछ के लिए भूख आवास की यातना, रोजी-रोटी की समस्या, कर्ज मर्ज की फिक्र भी लेकर आती है
पर जीवन तो हमारे दृष्टिकोण और भोग की स्थिति पर निर्भर करता है।
हम सब एक जैसे होकर भी कभी एक जैसे नहीं हो सकते हैं, फूलवारी में सभी फूल ही होते हैं पर सब फूल गुलाब नहीं होते हैं और इसी भिन्नता
को समझना ही जीवन को समझना है।
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कारण, परिणाम और समाधान। आलेख : १७  . १२. २५.
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जो * अवस्थाएँ घटनाएँ या क्रियाशीलताएँ और परिदृश्य हमारे सामने दिखायी पड़ते हैं, ये परिणाम हैं और हम सब परिणामों में ही उलझे रहते हैं। उन्हीं पर संवाद और परिचर्चा करते रहते हैं परन्तु जिन पर गहन चर्चा परिचर्चा और संवाद होने चाहिए, हम उन्हें ही दरकिनार कर देते हैं, नतीजतन
घटनाक्रम और परिदृश्य तो बदलते रहते
हैं पर उनके कारण अपने * अस्तित्व या
वजूद में किसी न किसी रूप में बने रहते हैं और जरूरत हैं उन्हीं कारणों के विश्लेषण और परख की जो हम नहीं करते या उनकी उपेक्षा करते हैं।
हमारी जिन्दगी के कई तल या स्तर हैतेहैं,  जो निजी, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर के होते हैं। हम निजी जिन्दगी को ही ले लें और उनका आकलन करें तो पाएँगे कि हम अधिकांश निजी समस्याओं का खुद ही
सृजन करते रहते हैं और कुछ * आकस्मिक भी होते हैं। जिन छोटी बड़ी समस्याओं को हम देखते हैं, अब उनका विभिन्न नजरिए से अवलोकन विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि इनका निदान समाधान हम ही कर सकते हैं पर हमारी सोंच इस बात पर आ खड़ी होती है कि ऐसा क्यों होता है या हो रहा है। जड़ो की ओर जाना होगा, गहराइयों में जाना होगा और जितनी गहराइयों में जाएंगे, उनका यथार्थ समझ में आता चला जाएगा।
जिस दिन हम इस यथार्थ को समझ लेंगे, सारी समस्याएं तिरोहित हो जाएगी। जीवन है तो * त्रिविध ताप ( दैहिक दैविक और भौतिक) तो आएँगेही आएँगे। उन्हें झेलने के साथ साथ, उनपर गहरी नजर भी रखनी है और हर 
क्रियाशीलता में * उत्प्रेरक कारणों की खोज करते रहनी है, जैसे ही कारण समझ में आया नहीं कि उनका ईलाज हो गया, निदान हो गया। औपनिषदिक * 
कार्य कारण के सिद्धान्त, कर्म फलाफल  के सिद्धांत  ( प्रतीत्यसमुत्पाद) और तथागत बुद्ध के दर्शन का * पटिच्चसमुप्पाद  का यथार्थ भी यही है।
अगर कोई घटना घट रही है तो उसका परिणाम या तो अच्छा होगा या बुरा होगा और यह अच्छा या बुरा होना उन्हीं बीजसूत्रों पर निर्भर करेगा जो कारण में समाहित होगा। सहज ही ग्राह्य है कि
जो बीज (कारण) का गुणधर्म और संस्कार होगा, वही समानुपातिक परिणाम होगा।
आज हर आदमी, समाज, राष्ट्र, तंत्र और व्यवस्था इनसे ग्रसित है। हम रोज संवाद कर रहे हैं, छोटे बड़े वर्णपट पर 
बातें हो रही हैं, पर बाते तो उपरी तल पर हो रही है और निदान सबसे निचले तल पर है। दर्द भूख की है, प्यास की है,
संवादहीनता और संवेदनहीनता की है, गिरते मानव मोल और मूल्यों की है और ईलाज हम कुछ और कर रहे हैं तो भला रोग का निदान कैसे होगा, गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
अभी भी बहुत कुछ सीखना, जानना और समझना बाकी है। जीवन अनन्त है, हर गत पीढ़ी आगत के लिए कुछ विरासत छोडकर जाती है, हम क्या छोडकर जा रहे हैं या जाएँगे, जरा सोंचिए और यही सोंच हम सबको अलग-अलग ऋणभारों से मुक्त करने का काम करेगी।
समस्त जीव जगत में सभी प्राणी अपने अपने विहीत कर्म और कर्तव्यों का निर्वहन करते नजर आएंगे पर हम मनुष्य जो इस जगत की श्रेष्ठतम रचना हैं,इस बोध से वंचित रहते हैं और हम वो सब नहीं कर पाते जो वास्तव में हमें करना चाहिए।
आप आस्तिक हों या नास्तिक, एकेश्वरवादी हों या बहुदेववादी या अज्ञेयवादी,इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम तो बुनियादी तौर पर आदमी ही होते हैं और तमाम शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक चेतनाओं में विभिन्नताओं के बावजूद भी हम यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर हम मानवीय मोल और मूल्यों से रहित हैं तो मनुष्य कहलाने के अधिकारी नहीं हैं और सारे संकटों के पीछे जो अन्तर्निहीत कारण हैं वो हमारा स्वयं को मनुष्य नहीं समझना है या अहंकार बोध से ग्रसित होना है।
हम मनुष्यों को सदैव‌ श्रेष्ठ बनने की कोशिश करनी चाहिए पर मिथ्या अहंबोध‌ और आत्ममुग्धता का शिकार होने से बचना चाहिए ताकि हम और हमारी दृष्टि समरसी और समावेशी बन सके।

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समस्याएं, विपत्तियां और हम आलेख : १८  . १२. २५.
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समस्याएं हमारे जीवन के महत्वपूर्ण अंग हैं और हम जबतक जीवित हैं, समस्याएं हमारे जीवन से अविच्छिन्न रूप से जुड़ी रहती हैं जो हमारे लिए एक अच्छे और सच्चे 
मार्गदर्शक और हितैषी का काम करती हैं।
Problems r natural 
phenomenal characteristics and co partners of our lives, they cause hurdles and hindrances,no doubt but they r our real guides and friends which 
r proved eye openers in life. They reveal our hidden potentialities and 
capabilities and make us perfect.
यकीनन यह बिल्कुल सच है कि जीवन है तो समस्याएं आएंगी ही पर हमें इन्हें अपना शत्रु नहीं मित्र समझकर स्वीकार करना चाहिए कि ये जब आती हैं तो हमें सोए से जगाने का काम करती है, हमारी जिज्ञासा और जिजीविषा को सबल बनाने का काम करती हैं। विपत्तियां और संकट 
न हों तो हमारे व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास हो ही नहीं सकता है। विपत्तियां और संकट उत्प्रेरक का काम करते हैं और हमारी सोंच को बदलकर एक नयी ऊर्जा का संचार करते हैं।यह
विपत्तियां ही हैं जो राम को मर्यादा पुरुषोत्तम, कृष्ण को युगद्रष्टा और‌
योगेश्वर बनाने का काम करती हैं और पाण्डवों को दुर्दम्य साहसी बनाने का काम करती हैं और तभी तो दिनकर जी बोल उठते हैं 
जो लाक्षागृह में जलते हैं 
सूरमा वही निकलते हैं 
वे फिर कहते हैं,
सच है विपत्ति जब आती है
कायर को ही दहलाती है
सूरमा नहीं विचलित होते 
क्षण एक नहीं धीरज खोते 
विघ्नों को गले लगाते हैं 
कांटों में राह बनाते हैं 
और यही हमारे जीवन का सच भी है कि जो डर गया समझो मर गया।
स्वामी विवेकानन्द जी ने भी अपने एक प्रवचन में कहा था,
संघर्ष जितना कठिन होगा,जीत उतनी ही शानदार होगी। संकट ही वह समय है जब हमारी आत्मशक्ति जागृत होती है।
शिवमंगल सिंह सुमन कहते हैं,
गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहुं दर‌ दर खड़ा 
जब मेरे सामने है रास्ता इतना पड़ा 
जबतक न मंजिल पा सकूं 
तबतक न मुझे विराम है
चलना हमारा काम है।
संकटों से, विपत्तियों से घबराकर हमें रूकना नहीं चाहिए,जो रूक गया,जो थम गया बस वहीं रह गया।
धैर्य और साहस से हमारे शरीर के भीतर एक जैव रासायनिक प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है जिससे 
अन्त:स्रावी ग्रंथियां जागृत होकर हमें ऊर्जावान बनाने का काम करना शुरू कर देती हैं और हमारा आत्मविश्वास मजबूत होना शुरू हो जाता है।
हमारे जीवन की दशा और दिशा बदलने लगती है और हम संघर्षों के लिए फिर से तैयार हो जाते हैं।
इसके आध्यात्मिक पक्ष पर बोलते हुए गोस्वामी जी कहते हैं,
तुलसी भरोसे राम के
निर्भय होके सोए
अनहोनी होनी नहीं 
होनी है सो होए
यहां राम का अभिप्राय अपने अपने इष्ट से है कि उनपर भरोसा और विश्वास करके हमें हर 
मुश्किल और मुसीबतों का सामना करते हुए निर्भय होकर रहना चाहिए कि हर अनहोनी से वही रक्षा करते हैं।
विपत्तियां वास्तव में हमारे लिए परेशानी लेकर आती दिखती है और ऐसा सबको लगता भी है परन्तु जब हम डर के सम्मुख तनकर खड़े हो जाते हैं तो डर हमें रास्ता दे देता है। इस पर अल्बर्ट आइंस्टीन भी कहते हैं,
विपत्ति और आपदाओं के बीच में ही अवसर छिपे होते हैं जिन्हें पहचान करने की जरूरत होती है।
बस आपत्तियों और विपत्तियों को,समस्याओं
की जड़ को समझने की कोशिश करनी है और यह समझ में आते ही उनके निदान समझ में आ जाते हैं।
तो आइए,हम अपनी अपनी समस्याओं को समझने की कोशिश करें, निदान तो शिव जी करेंगे ही।
अंधकार जब गहन होता है तो कहता है बस अब 
सुनहरी सुबह होने ही वाली है।

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सफ़र है जिन्दगी का बड़ा मुश्किल : आलेख : १९. १२. २५. 
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बहुत बोझ लेकर आते हैं यहां हम
बोझ को हल्का करना ही पड़ेगा 
सफ़र है जिन्दगी का बड़ा मुश्किल 
बड़ा संभल संभल कर चलना ही पड़ेगा 
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इस सच को समझना ही जिन्दगी के सच को समझना है जैसे किसी सफर में हम कम से कम और जरूरी सामान लेकर ही चलना चाहते हैं कि सफर में अधिक बोझ उठाने की जहमत न उठानी पड़े,ठीक वैसी ही हमारी जिन्दगी का सफर है जिसमें जन्म के साथ हम बहुत सारी जिम्मेदारियां और कर्ज लेकर आते हैं, जिन्हें यहां से विदा होने के पहले निर्वाह करके तमाम ऋणभारों से मुक्त होना होता है अन्यथा वह सीने पर एक बोझ की तरह रह जाता है जिससे प्रयाणकाल में बड़ी पीड़ा होती है।
इस सन्दर्भ में मुंशी जी कहते हैं कि मरने के समय कुछ न कर पाने का दुःख बड़ी पीड़ादायक होती है। कुछ न कर पाने का दुःख जब आदमी सह नहीं पाता तो वे दुःख आंखों से आंसू बनकर बहने लगते हैं पर इस दुःख को कोई समझ नहीं पाता  है कि वे दुःख उसके नितान्त निजी दुःख होते हैं।
हम सब जिन्दगी के इस भागदौड़ और जद्दोजहद में इस हकीकत को कभी समझने की कोशिश नहीं करते और जब ये बात समझ में आती है तब वक्त हमारे हाथों से निकल चुका होता है और हम बस आह भरकर रह जाते हैं कि काश,ये बात पहले समझ में आ गयी होती पर ये समझ हमारी समझ में आती भी कैसे। बचपन अबोध,
किशोरवय अल्हड़,जवानी उमंग तरंग जोश और उन्माद, प्रौढ़ावस्था पारिवारिक जिम्मेदारियां और ठीक पीछे वृद्धावस्था और लाचारी तब सिवाय पश्चाताप के साथ कुछ नहीं होता। इसके पहले की हम उम्र और लाचारी से हारने लगे हों,सचेत और सचेष्ट होने की कोशिश करनी चाहिए कि सारे ऋणभारों और जिम्मेदारियों से अगर हम मुक्त न हो सकें तो बहुतों से तो मुक्ति जरूर पा सकते हैं।
Less burden better journey का उसूल हमारे दर्शन और व्यवहार दोनों का सच है और इस सच को वक्त पर समझ लेना उससे भी बड़ा सच है और इसे जीवन में उतार लेना सबसे बड़ा सच है।
Life is a myth if u don't realise it,life is a truth if u realise it,so we must try to realise it to leave the world finally with a free and fair soul.
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बात आज की २२ १२ २५ 
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सिंहों के लेहड़े नहीं 
हंसों की नहीं पांत 
लालों की नहीं बोरियां
साधु न चले जमात।
बड़ा अद्भुत दोहा है,
बड़ा अद्भुत मर्म है जिसे कविवर कबीर दास जी ने कहा है।
जो श्रेष्ठ हैं,उत्तम हैं, उत्कृष्ट हैं,उनकी भीड़ नहीं होती और ना वे भीड़ के हिस्से ही होते हैं।
कवि यही बताना चाह रहे हैं कि सिंह जो वनराज है,उसकी जमात  या भीड़ नहीं होती है,वह जंगल में अकेले विचरण करता है और वह किसी का अनुगामी भी नहीं होता है। वैसे ही जो सच्चे साधु और संन्यासी होते हैं वे भी एकांतवासी होते हैं जिन्हें जमात या भीड़ की जरूरत नहीं होती है। ठीक वैसे ही लाल एक दुर्लभ रत्न है जो ढेर में नहीं मिलते हैं जैसे श्रेष्ठ और महान लोगों की संख्या चयनित होती है,वैसे ही पक्षियों में हंस श्रेष्ठ माने जाते हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वे नीर-क्षीर विवेक सम्पन्न जीव होते हैं और इनकी उड़ान कबूतरों के झूंड की तरह नहीं होती है।
इस तरह यह पद 
उन व्यक्तियों के व्यक्तित्व और गुणधर्म का परिचायक है जो किसी भीड़ का हिस्सा नहीं होते हैं कि भीड़ मनुष्य की पहचान छीन लेती है।
भीड़ का हिस्सा बनने से बेहतर है कि स्वयं की पहचान कर अपने व्यक्तित्व का विकास करें कि लोग आपके अनुगामी हों और आपको उदाहरण बनाते हुए जीवन मार्ग को तय करें।
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मंशा,समस्या,निदान एवं लक्ष्य ( Intention, Problem,Solution and goal) एवं श्री कृष्ण।
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दिनांक २३ १२ २५ 

वास्तव में वसुदेव कृष्ण की सारी छलनीति,कूटनीति, रणनीति,लक्ष्य और धर्म और न्याय युद्ध के सारे आधार यही चार शब्द हैं।
अब हमें हमारे तर्क, बुद्धि और विवेक से इसे समझने की कोशिश करने की जरूरत है कि
कृष्ण आज भी इतने प्रासंगिक क्यों हैं। हम सबको वे हर जगह सबसे छल कपट ही करते नजर आते हैं और लोग इसलिए उन्होंने* छलिया भी कहते हैं और छल कपट करने के बावजूद वे सार्वकालिक 
वन्दनीय और पूजनीय हैं जबकि जो आदमी छल‌ कपट करते हैं लोग उन्हें 
घृणा की नजरों से देखते भी हैं और कोई उनपर भरोसा भी नहीं करता है
और यही फर्क वसुदेव कृष्ण तथा आम आदमी के छल में है।
कृष्ण का छल* सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय है,लोक कल्याणार्थ और
धर्म,सत्य और न्याय की स्थापना के लिए है। कृष्ण इस सिद्धान्त के हिमायती हैं कि * शठे
शाठ्यम् समाचरेत अर्थात् जो दुष्ट हैं उनके साथ भद्रता का व्यवहार करके उनका उपचार नहीं किया जा सकता है बल्कि दुष्ट और अधर्मी के साथ छलनीति अपनाने की ही जरूरत होती है। 
यहां इसीलिए किसी भी
 कृत्य में उसकी मंशा,साधन और समाधान या निदान के आधार पर ही लक्ष्य का निर्धारण किया जाता है।
हम साधारण मनुष्य जब छलनीति या कूटनीति का अनुसरण करते हैं तो उसका उद्देश्य निज के स्वार्थों की पूर्ति होती है जिसमें धर्म,सत्य‌ और न्याय हमारे स्वार्थ की पूर्ति ही होती है। परन्तु कृष्ण उस कालखंड की सच्चाई से अवगत हैं कि 
दुर्योधन,दु:शासन और‌ 
शकुनी के चक्रव्यूह को तोड़ना इतना सहज नहीं था।
वे अपनी बाल लीलाओं में भी छल करते हुए दिखाई देते हैं। माता यशोदा के साथ भी बालक्रीड़ा करते हुए छल करते हैं, मिट्टी खाने का दिखावा करते हैं और मैया के कहने पर मुंह खोलकर मिट्टी के बजाय सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का ही दर्शन करवा देते हैं। छल से गोपियों के घर में घुसकर दही, माखन आदि खाते हैं और सबको खिलाते हैं और यहां भी उनकी वही नीति दृष्टिगोचर होती है जो आज भी यह बताती है कि जिनके पास अतिशय‌ धन धान्य हो तो उनका वितरण किया जाना चाहिए कि सबको सबका भोग भाग्य परमात्मा ने दिया है परन्तु सामाजिक नैतिक 
व्यवस्था का यह दोष है कि कुछ पोषित हैं तो कुछ वंचित हैं।
स्नान करती हुई गोपियों के वस्त्र छल से चुरा लेते 
हैं परन्तु इसके पीछे भी उनका महती उद्देश्य रहता है। उनके मन में गोपियों को उत्पीड़ित करने का वासनात्मक भाव नहीं था बल्कि उन्हें 
तत्कालीन सामाजिक और नैतिक मर्यादा का पालन करना सीखाना था,उस कालखंड में ही नहीं बल्कि आज भी खुले में स्त्रियों का नग्न स्नान को अत्यन्त वर्जित माना जाता है जो उनके श्री का हरण कर लेता है। स्त्रियों के नग्न स्नान से उनके घर परिवार श्री विहीन हो जाता है। यद्धपि कृष्ण उस समय मात्र सात आठ साल के किशोर ही थे परन्तु वे परम चैतन्य थे।
कृष्ण का छल और मंशा 
* Fact and Truth की पहेली है जिसे सहजता से नहीं समझा जा सकता है। मनुष्य का छल पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय ताने-बाने को तोड़ने का काम करता है ( जैसा कि पानीपत की तीसरी लड़ाई,प्लासी की लड़ाई,
झांसी की लड़ाई और अन्य ऐसी अनेक लड़ाईयों में हुई हैं) परन्तु कृष्ण का छल उपचारात्मक है जो समस्त आधियों व्याधियों के निदान का काम करता है, अधर्म,असत्य और अन्याय के नाश करने का काम करता है। कुछ लोगों की यह मान्यता है कि साध्य की पवित्रता साधन की पवित्रता पर निर्भर करता है परन्तु कृष्ण की अवधारणा इससे बहुत परे और इतर है,उनकी सोंच है कि लक्ष्य यदि महान और पवित्र हो तो साधन की नीति,कूटनीति और रणनीति सबकुछ बदली जा सकती है। उनके लक्ष्य की यही पवित्रता है कि वे महाभारत युद्ध के बाद गांधारी के शाप को स्वयं अपने उपर लेकर अपने वंश‌ विनाश को आमंत्रित कर लेते हैं और यही कृष्ण की विराटता और महानता है। उनकी मंशा goodness of the mass or Common goodness है न कि वैयक्तिक है। वे स्वयं युद्ध में सक्रिय रूप से भाग लेते नहीं दिखाई देते हैं परन्तु लाक्षणिक युद्ध नीति में कूटनीति का अनुसरण करते हुए 
द्रोण, जयद्रथ, भीष्म, जरासंध, कर्ण आदि को मरवा भी देते हैं और जो ऐसी क्षमताएं रखता है, वही तो कृष्ण हो सकता है।उनकी छलनीति या कूटनीति क्षूद्र या नीच प्रकृति की नहीं बल्कि उत्कृष्ट र श्रेष्ठ है। वे हर उन मार्गों को अपनाने में नहीं हिचकते और तब 
कुरूक्षेत्र में अर्जुन को कहते हैं,
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत 
अभ्यूत्थानम् -------
संभवामि युगे युगे,
यहां कृष्ण के इस उद्घोष का सीधा सा अर्थ है कि हर कालखंड में मैं आता रहुंगा और अनीति, अधर्म,असत्य और अन्याय का नाश करता रहुंगा।
ध्यान रहे कि समस्या यदि जटिल,विकट और असाधारण हो तो उसका उपचार भी असाधारण ही होना चाहिए। कौरव पक्ष‌के महारथियों को पराजित करना इतना सहज नहीं था अगर कृष्ण ने छलनीति नहीं अपनायी हुयी होती। इसलिए यह सार्वभौमिक और सार्वकालिक सत्य है कि
जैसी व्याधि होगी उसका उपचार वैसा ही करना होगा अन्यथा वह असाध्य हो जाएगा। बुखार अगर मलेरिया हो और ईलाज टायफाइड बुखार का होगा तो मरीज की मौत सुनिश्चित है।
बड़े विनाश को रोकने के लिए छोटे छोटे छल कपट करना अनिवार्य हो जाता है और कृष्ण ने यही किया और हमें ऐसा ही संदेश भी दिया जिसका अनुसरण करना युगधर्म है।यह नीति आध्यात्मिक न्याय व्यवस्था में Choice of Evils कहा जाता है अर्थात हमें अगर बुरा ही चयन करना हो तो न्यूनतम बुरे का चयन करेंगे ताकि बड़े का उपचार किया जा सके और इन्हीं अतुलनीय गुणों के कारण कृष्ण को 
* सार्वकालिक और सार्वभौमिक युगपुरुष भी कहा जाता है जो समय और परिस्थितियां देखकर निर्णय लेते हैं और समस्याओं के आमूल निदान का समाधान ढूंढने का काम करते हैं।

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अलविदा ऐ २०२५ , १ १ २५ 
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तेरा शुक्रगुजार हूॅं,कुछ लम्हें तू ने होंठों को गुनगुनाने और आंखों को मुस्कुराने को दिए, अपनों के संग जीने गाने को दिए।
अब तू तो  कयामत तक लौटकर नहीं आने वाला तो हम तुम्हें तुम्हारी खताओं के लिए माफ कर देते हैं और तू हमारी खताओं के लिए माफ कर दे।
इसी तरह इस साल किसी अनजाने पल में हमसे हमारे अपनों के साथ जो गुस्ताखियां या गलतियां हुई हों,हम दिल से माफी चाहते हैं और यकीनन आप हमें माफ कर देंगे और हम भी जहां कहीं आहत महसूस किए हैं,हम दिल से उनको माफ करते हैं और क्षमा याचना तथा क्षमा दान, संसार की श्रेष्ठ वृत्तियों में एक है और शायद इसीलिए जैन मत में* खम्मन परब (क्षमा पर्व) की अवधारणा को विकसित किया गया था कि स्थावर जंगम,सबसे हम इसका आदान-प्रदान करते रहें और अपराध बोध की त्रासदी से मुक्त रहें।
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वक्त है वक्त का क्या 
गुजर ही जाएगा
ये ठहरा कब
रूका कब
बस गुजर ही जाएगा।
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आप तमाम दिल अजीज दोस्तों की बेहतरीन जिन्दगी के लिए दिल से दुआएं करता हूॅं जो रंजोगम आपने 2025 में झेला हो,आपकी झोली में उससे दोगुनी खुशियां शिव सारस्वत कृपा से आपको 2026 में मिले कि आप सारे रंजोगम को भूलकर 
अपनी बेहतरीन जिन्दगी को बिन्दास जिएं।
2026 की खुबसूरत सुबह आपकी जिन्दगी में एक खुबसूरत आगाज़ लेकर आए, जिन्दगी मुस्कुराए और आपको खुश देखकर हम भी मुस्कुराएं।
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बस हम सब एक दूसरे की सेहत और खुशियों के लिए अपने अपने इष्ट से दुआ प्रार्थना करते रहें।
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सर्वे भवन्तु सुखिन 
सर्वे सन्तु निरामया 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु 
मा कश्चिचत् दुःखभाग्भवेत्।

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दर्पण और मन : २ : १. २६.
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दर्पण दो तरह के होते हैं,एक सांसार (शीशे का दर्पण/लोग) और एक अन्तःकरण(मन/चेतना) और दोनों का एक ही काम है,विम्ब का प्रतिबिम्ब दिखाना पर दोनों के प्रतिविम्ब में बड़ा फर्क होता है। दर्पण को जो बाहर से 
दिखाया जाता है,वही देखता और बोलता है पर अन्तःकरण(मन) जो भीतर से सच होता है,वही दिखाता और बोलता है और हमें दोनों दर्पणों का सदैव इस्तेमाल करते रहना चाहिए। 
ध्यान रहे कि शीशे के दर्पण में अगर न भी देख पाएं तो कोई फर्क नहीं पड़ता है परन्तु मन रूपी दर्पण में स्वयं का अवलोकन न करने पर बड़ा फर्क पड़ जाता है कि हम स्वयं के अवलोकन से चूक जाते हैं और हम आत्मसुधार और आत्मचिंतन से चूक जाते हैं जो सदैव हमारा मार्गदर्शन कराते रहता है इसलिए अन्तःकरण से रोज सोने के पहले 
पुछा कीजिए कि आज हमनें क्या अच्छा और क्या बुरा किया,जैसे आईना चेहरा दिखाने का काम करता है वैसे ही हमारी आन्तरिक चेतना हमें हमारे कृत्यों का आकलन करके सही गलत को दिखा देगी।
Mirror is a temporary reflection and reaction of the person but the inner consciousness and awareness shows the reality of our thoughts and actions.
ध्यान रहे हम अपनी बाह्य नेत्रों से हम स्वयं को नहीं देख सकते परन्तु हमारे भीतर का स्व हमारा अवलोकन और आकलन करता रहता है।
आत्मसाक्षी और आत्मावलोकन से बड़ा कोई दर्पण नहीं होता है।

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संवाद और निदान। ३  १. २६.
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उपरोक्त दोनों शब्द व्यक्तिगत जीवन से लेकर वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य और ग्राह्य होते है। विवाद , सहमना संवाद से 
ही खत्म किए जा सकते है।
दोस्त भाई पड़ोसी व्यवसायी हिस्सेदार
मालिक प्रेमी पत्नी पति संतान आदि किसी कारणवश नाराज हो गए, भ्रमित हो गए तो निदान क्या है?
निदान है कि हम या आप सब एक दूसरे को जानते हैं, पहचानते हैं। एक दूसरे के चारित्रिक  गुण दोष और विशिष्ट आदतों को जानते हैं फिर विवाद या भ्रम अथवा संशय की स्थिति क्यो, मिल बैठिए, मुस्कुराईए, थोड़ा सा संवेदनशील होकर
बातों को छेड़िए फिर करिश्मा देखिए।
 सम्बन्ध कोई नया तो होता नहीं कि परखने में समय लगेगा, बात शुरू हुयी नही कि जज्बात ओ एहसास जग गए
और दिल के साथ-साथ आँखे भी विगलित हो गयी और भावनाओं का ज्वार भड़क गया। भ्रम संशय और विवाद की अवस्था स्वतःस्फूर्त विलोपित हो गयी। 
यह अनुभूत सत्य है कि संवादहीनता और संवेदनहीनता ही सारे दुखों और संघर्षों को जन्म देती है।
संवेदनशील होकर संवाद करें , दोनो पक्ष सहमना बनें, निदान और निराकरण सहज हैं और जिद की अवस्था तो * महाभारत का सृजन करती ही है।।

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बदलाव या रूपांतरण : ४. १. २६. 
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बदलाव या रूपांतरण एक लम्बी  अवधि की चलने वाली प्रक्रिया हो सकती है पर वह रूपांतरण तो एक निमिष या एक क्षण में  हो जाता है।
यह महज एक घटना नहीं जो किसी कालखंड में घटती है बल्कि यह चेतना का,बोध का रूपांतरण है।
सांसारिक जीवन में क्षण क्षण सबकुछ बदल रहे हैं और इस बदलाव को हम देखते भी रहते हैं पर अवलोकन बहुत कम ही कर पाते हैं और जो अवलोकन करने की वृत्ति विकसित कर लेते हैं, उनमें बदलाव या रूपांतरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
बदलाव या परिवर्तन या रूपांतरण प्रकृति का सबसे बड़ा सच है जिसे प्रकृति बड़ी सहजता से स्वीकार करते हुए अनवरत क्रियाशील रहती है, समस्त ब्रह्माण्डीय क्रियाशीलताएं इसी सिद्धान्त पर चलती रहती हैं,कुछ भी स्थिर और स्थायी नहीं है परन्तु उस बदलाव में जो मौलिकता है,जो गुणधर्म है,कभी नहीं बदलते हैं और इसी सत्य को समझना और बोध विकसित करना ही जीवन के मोल और मूल्य हैं।
दिन रात बदलते रहते हैं परन्तु सूर्य अपनी ऊष्मा और चन्द्रमा अपनी शीतलता नहीं बदलते हैं, हमें भी हमारे गुणधर्मों को नहीं बदलना चाहिए जो करूणा,क्षमा, शान्ति,प्रेम, सद्भावना,
शान्ति पूर्ण सह अस्तित्व और सहानुभूति है।
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जीवन की जटिलता, किंकर्तव्यविमूढ़ता और मौन ;६. १. २६. 
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जीवन जटिलता, सहजता,संयोग, दुर्योग, वियोग, उत्थान,पतन,जय पराजय, दुःख सुख आदि का सुन्दर सम्मिश्रण और समन्वय है,यही रीत है,ऋतु है,ऋत भी है।
पर सबके जीवन में कुछ कालखंड ऐसे भी अचानक से उत्पन्न हो जाते हैं या होने लगते हैं जब एक व्यक्ति स्वयं को ऐसी शारीरिक और मानसिक अवस्था में पाता है जहां कुछ न सोंच पाने की स्थिति बनती है और न कुछ
कर पाने की स्थिति बन पाती है उस क्षण
वह स्वयं में जीने लगता है पर जीवन की जो अवस्था सामने होती है उसे किंकर्तव्यविमूढ़ता की अवस्था कहते हैं। ऐसी अवस्था में वह‌ अपने भीतर बाहर सिर्फ स्वयं को पाता है। जीवन उसके समझ से परे लगने लगता है और वह किसी को न तो कुछ कह पाता है और न स्वयं को समझा ही पाता है और ऐसी विकट और जटिल परिस्थिति ही उसे उसके स्व से बोध‌ कराती है।
ऐसे क्षण में उसे मौन होकर अपने भीतर जाने की कोशिश करनी चाहिए ताकि अपने अन्तर्मन की सोयी चेतना को जागृत कर सके। उस व्यक्ति का मौन ही उसे 
पुनर्स्थापित कर सकता है।
मौन हमें हमारे भीतर झांकने के लिए उत्प्रेरित करता है,हम ही हैं जो हमारी समस्याओं, विपदाओं,
संकटों आदि का समाधान ढुंढ सकते हैं।
सांसारिक जटिलताएं और क्रियाशीलताएं हमारी चेतना को प्रभावित करती रहती हैं जिससे विचलन होता रहता है और इसी विचलन से बचने के लिए, विचारों और भावनाओं को शमित करने के लिए मौन रहना जरूरी हो जाता है। ध्यान रहे कि मौन‌ का अर्थ वाक् रूद्ध होना नहीं है, बातचीत बन्द करना नहीं है बल्कि मौन‌ तो स्थिर मन चित्त की भाषा है, मानसिक प्रवाह को रोककर आत्मा से संवाद है।भीतर से स्थिर होकर स्वयं में अवस्थित हो जाना मौन है। स्वयं से स्वयं का साक्षात्कार मौन है। चेतना का परम चेतना से मिलने का मार्ग मौन है, इसलिए 
प्रार्थना के स्वर मौन होते हैं।
इसमें एक अच्छे और सच्चे मित्र की भूमिका भी भी बड़ी कारगर होती है कि वह मौन‌ और मुखर की भाषा और भाव को समझता है। वह भी हमें हमारी किंकर्तव्यविमूढ़ता की अवस्था से निकालने का मार्ग निकाल सकने में सहायक होता है।
मौन हमारे जीवन के सभी पक्षों से जुड़ा है।
वैज्ञानिक रूप से मौन‌ की अवस्था काॅर्टिसोल 
( तनाव हार्मोन) को नियंत्रित करता है और 
अमिग्डाला ( मस्तिष्क का वह हिस्सा जो भय और तनाव से हमें नियंत्रित करता है,मुक्त करता है) को सक्रिय करता है। हमें मानसिक रूप से सशक्त करने का काम करता है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी मौन‌ परम चेतना या ईश्वर‌ की भाषा है। समस्त इन्द्रियों ( मन सहित)
के शान्त होने पर ही हम उस सूक्ष्म ध्वनि या उस अस्तित्व की अनुभूति कर सकते हैं जो हमारे बाहर भीतर व्याप्त है।मौन ही उस परम चेतना या परमात्मा का प्रथम‌ उपदेश है और उस किंकर्तव्यविमूढ़ता की अवस्था का सर्वोत्तम उपचार और औषधि है।
मौन‌ केवल शब्दों के प्रवाह को रोकना भर नहीं है बल्कि भीतर की आन्तरिक ऊर्जा और‌ शक्ति को जागृत करने का हेतु है। यह‌ वह प्रेरक शक्ति है जो हमारे आत्मविश्वास को बल देने का काम करती है। 
मौन हमारी समस्त बाहरी भीतरी शक्तियों के समेकन करने का काम करता है। हम आन्तरिक रूप से चैतन्य होकर समस्याओं और संकटों के समाधान के मार्ग ढुंढने का काम करते हैं। मन की वृत्तियां शमित हो जाती हैं और मन,     हृदय और मस्तिष्क का सम्यक् समन्वय और संतुलन होने लगता है जिससे सही निर्णय लेने में हम सक्षम हो पाते हैं।
पर ध्यान रहे कि मौन आन्तरिक तो सही है पर बाहरी संसार में हर जगह मौन‌ उचित नहीं होता है। कुरू सभा में भीष्म और‌ विदूर के मौन ने महाभारत के सृजन में सक्रिय भूमिका निभाने का काम किया था।
मौन, स्थान,काल और पात्र पर भी निर्भर करता है जिसका सदैव आकलन हमें करते रहना चाहिए ताकि इस महान गुण का दुरूपयोग न हो कि मौन मुक्ति और बंधन तथा संग्राम है।
मौन की भाषा समझने के लिए ही मौन होना एक मार्ग है और इस मार्ग को समझना जीवन मार्ग को समझना है कि जो वाणी नहीं कह पाती,मौन कह जाता है।
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तथागत सिद्धार्थ की कथा यात्रा  :७  . १. २६. 
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तथागत सिद्धार्थ अर्थात् गौतम बुद्ध ने अर्हत्व की प्राप्ति के बाद अपने शिष्यों के साथ यायावर बनकर देश के विभिन्न भागों में घुमते रहे, धम्मदेसना करते रहे।
एकबार अपने प्रिय शिष्य आनन्द एवं अन्य शिष्यों के साथ रात्रि विश्राम हेतु एक गांव में ठहर गए। गांव वालों की अतिथि सत्कार के संस्कार से वंचित थे। यह जानने के बाद भी कि ये गौतम बुद्ध हैं, लोगों ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया। न तो भोजनादि की व्यवस्था की और ना ही विश्राम की व्यवस्था की। फिर भी बुद्ध जीवन व्यवहार को परिष्कृत और परिमार्जित करने की बातें करते रहे। पर किसी ने ध्यान न दी। रात किसी तरह कटी,सुबह वे चलने को तैयार हुए और कुछ दूर चलने के बाद उन्होंने कहा,
यह गांव ऐसे ही खुशहाल बना रहे और लोग यहीं बने रहें।
किसी शिष्य ने कोई टिप्पणी नहीं की पर आनन्द तो बड़ा जिज्ञासु था। उसके मन में यह बात समा नहीं रही थी कि इतने दुर्व्यवहार के बाद भी बुद्ध ने उन्हें फलने फूलने का आशीर्वाद क्यों दिया।
चलते चलते फिर एक गांव में विश्राम करने की योजना बनी। गांव वालों ने जैसे ही जाना कि भगवान बुद्ध आए हुए हैं तो समस्त ग्रामवासी वहां जुट गए। उन्होंने खुले हृदय से उनका शिष्यों सहित आदर सम्मान किया। उत्तम भोजन एवं शयन की व्यवस्था की। सोने से पूर्व भगवान ने धम्मदेसना की और फिर सब सो गए।
सुबह फिर यात्रा शुरू हुई। गांव वालों ने श्रद्धा सहित भोजन आदि दान देकर सम्मान विदा किया। जब भगवान बुद्ध गांव
की सीमा से बाहर आए तो उनके मुंह से उद्गार निकले,
यह गांव बिखर जाए और यहां के लोग यत्र तत्र सर्वत्र फैल जाएं।
अब तो आनन्द की जिज्ञासा अपने चरम पर पहुंच गयी। एक विशाल वटवृक्ष के नीचे जब विश्राम के लिए भगवान बैठे तो आनन्द ने उनकी ओर देखा। भगवान के होंठों पर हल्की सी मुस्कुराहट आयी पर वे चुप रहे।
आनन्द अपनी जिज्ञासा को नहीं दबा पा रहा था। उसने भगवान से पुछा,
हे भगवन,
जिस गांव ने हमें तिरस्कृत किया आपने उसे वहीं बने रहने और फलने फूलने का आशीर्वाद दिया और जिस गांव ने हमारा आथर सत्कार किया उसे बिखर कर सब जगह फैल जाने का आशीर्वाद दिया,ऐसा क्यों?
भगवान ने कहा, आनन्द,
तुम्हारी जिज्ञासा सही है। बुराइयों जितनी सिमटी रहे,एक जगह पर रहे और उसका विस्तार व हो, उतना ही श्रेयस्कर है। उस गांव के लोग जहां जाएंगे,बुराई ही फैलाने का काम करेंगे। इसलिए हमने उन्हें वहीं बने रहने की कामना की और जिस गांव के लोगों ने हमारा आदर सत्कार किया,उनके बिखर कर फैल जाने की कामना की ताकि वे लोग जहां जाएं, अच्छे 
संस्कार और संस्कृति का विस्तार करें और लोगों में सदाचार, अच्छे आचरण और व्यवहार का प्रसार हो।
यह सुनकर आनन्द की जिज्ञासा शान्त हो गयी।
कथा छोटी सी है परन्तु इसके अर्थ और भाव बड़े व्यापक और प्रासंगिक हैं।
हमें भी अच्छे लोगों के आचरण, व्यवहार, गुणधर्म, योग्यता, क्षमता आदि गुणों की चर्चा करते रहनी चाहिए ताकि अच्छी बातें एक मुंह से सौ कानों तक पहुंच कर हजारों मुंह से फैलती रहे और लोग उन्हें सुनकर उत्प्रेरित हों और अच्छी बातों का प्रसार हो परन्तु सम्प्रति इस भाव की प्रबलता घट रही है,हम आलोचना प्रत्यालोचना में अपनी ऊर्जा अपेक्षाकृत ज्यादा खर्च करने में लगे रहते हैं जिससे सामाजिक ऋणात्मकता फैलती रहती है।
जरूरत है कि समाज और परिवेश में रचनात्मक विचारों का प्रचार प्रसार हो ताकि आने वाली पीढ़ियों को लाभान्वित किया जा सके और यही जीवन की सार्थकता भी है।
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औपनिषदिक दर्शन चिन्तन, गीता और धम्मपद। ८ . १. २६. 
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हिन्दू जीवन के आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन में जो स्थान औपनिशदिक दर्शन और गीता का है वही स्थान धम्मपद का बौद्ध दर्शन और चिन्तन में है जो जीवन की गहराईयों में ले जाकर सत्य के आन्तरिक  और व्यवहारिक पक्षों को बड़ी सहजता और सरलता के साथ हमारे समक्ष रखने के काम करते हैं।
धम्मपद के जिस गाथा को हम यहां रखने जा रहे हैं,वह बौद्ध दर्शन एवं चिन्तन के सबसे शक्तिशाली और महत्वपूर्ण सिद्धान्तों में से एक है जो मनुष्यों को परावलम्बन(others dependency) से मुक्त कर स्वावलंबन 
(Self dependency) की ओर ले जाने की प्रेरणा देकर उस दिशा की ओर चलने को उन्मुख करता है जो इस प्रकार है,
अत्त ही अत्तनो 
नाथो को ही नाथो
परै सिया(160वीं गाथा)
अर्थात् व्यक्ति स्वयं ही अपना नाथ(स्वामी) है,दूसरा कोई उसका नाथ (स्वामी) नहीं हो सकता है।यदि कोई स्वयं को अनुशासित कर लेता है या उस दिशा की ओर अग्रसर हो जाता है, स्वयं पर नियंत्रण करने की कोशिश करने की ओर उन्मुख हो जाता है या नियंत्रित कर लेता है तो वह दुर्लभ नाथ (आत्मशरणगता)
को प्राप्त कर लेता है।
इसी गाथा के रहस्य का प्रकटीकरण महापरिनिर्वाण सूत्र में होता है जब भगवान अपने प्रिय शिष्य आनन्द को कहते हैं,
अप्प दीपो भव अर्थात् अपना प्रकाश स्वयं बनों, कोई नहीं तुम स्वयं से आत्म चैतन्य बनकर आत्मप्रकाश बनो और सभी बंधनों से मुक्त हो जाओ।यह कार्य अत्यन्त कठिन तो जरूर है पर असंभव नहीं है।
यहां तथागत सिद्धार्थ के नाथ या स्वामी का अभिप्राय कोई अलौकिक सत्ता/परमात्मा या रक्षक नहीं है बल्कि स्वयं को स्वयं का उत्तरदायी बनाने से है। उनका कहना है कि हमें हमारे कृत कर्मों के फल को स्वयं ही भोगना पड़ता है इसलिए स्वयं के उद्धार या मुक्ति के मार्ग को स्वयं ढुंढना है और वह मुक्ति मार्ग कहीं बाहर नहीं बल्कि हमारे ही भीतर है।बुद्ध इसलिए स्वयं को मोक्षदाता या मुक्तिदाता नहीं मार्गदर्शक कहते हैं। सद्गुरु कबीर ने भी इसी तथ्य और सत्य को अपनी साखियों में उजागर किया है,
ज्यों तिल माहीं तेल है
त्यों चकमक में आगी 
तेरा साईं तुझमें है
जाग सकै तो जागी।
वह परम चेतना वैसे ही हमारे भीतर समाई हुई है,बस हमें जागने अर्थात् चैतन्य होने की जरूरत है।
यद्यपि बौद्ध दर्शन अनात्मवादी और अनीश्वरवादी दर्शन है फिर भी गाथा का भाव औपनिषदिक दर्शन और गीता के आत्मोद्धार के भाव से जुड़ा और गहराईयों से प्रभावित है।
इस सन्दर्भ में मनुष्यों को प्रेय और श्रेय ( निज स्वार्थ सुख और सर्वकल्याण के मार्ग) के चयन करने की विवेक शक्ति दी गयी है और चयन मनुष्यों के हाथों में हैं कि वह बंधन का चयन करे या मुक्ति का चयन करे। प्रेय जागतिक सुखों का मार्ग है र श्रेय कल्याण और मुक्ति का मार्ग है।सत्योपनिषद या ब्रह्मोपनिषद या अमृतोपनिषद कहता है कि मन ही मनुष्य के बंधन या मोक्ष‌ का कारण है। मन विषयासक्त है तो बंधन है, विरक्त है तो मोक्ष है। श्वेताश्वतर उपनिषद कहता है अज्ञानता ही बंधन है और ज्ञान ही आत्मोद्धार और मोक्ष‌ के कारण हैं।आत्मवादी और ईश्वरवादी दर्शन में परम चेतना/ परमात्मा/ परम सत्य को जानने का मार्ग आत्मबोध या आत्मचेतना ही है जो हमें हमारे स्व का साक्षात्कार करवाने का काम करता है। मुण्डकोपनिषद और ईशोपनिषद में भी इन्हीं भावों की विशद व्याख्या की गयी है।
गीता के छठे अध्याय के पांचवें श्लोक में कहा गया है कि,
उद्धरेदात्मनात्मानं 
नात्मानमवसादयेत्
रिपुरात्मन:,
अर्थात् मनुष्य को चाहिए कि वह अपना उद्धार स्वयं करे, आत्मोत्कर्ष और आत्मोद्धार का उत्तरदायी वह‌ स्वयं बने क्योंकि आत्मा ( आत्म चेतना या बौद्धिक चेतना)ही श्रेष्ठ मित्र और परम शत्रु भी है।
जैन दर्शन में भी इसी आत्मचेतना को मार्गदर्शक स्वीकार किया गया है कि आत्मचेतना ही कैवल्य प्राप्ति के मार्ग को प्रशस्त करती है। वैश्विक मत, पंथ एवं विचारों तथा विश्वासों में यहूदी दर्शन और चिन्तन में*तशूवा अर्थात् भीतर‌ की ओर लौटने की बात कही गयी है जहां* नित्जोत
( ईश्वरीय अंश की उपस्थिति) की उपस्थिति की बात कही गई है और उस परम चेतना से जुड़ना ही टिक्कून ओलाम(
आन्तरिक शुद्धि का मार्ग) है।
ईसाइयत में लूका 17:21 में कहा गया है कि ईश्वर का मार्ग तुम्हारे भीतर ही है और उसका साक्षात्कार करने वाले भी तुम ही हो और जो है सब भीतर है और जो बाहर वह भीतर‌ का ही प्रकटीकरण है। इस्लाम शरीयत के अनुसार बाहरी विधि विधानों पर बल देता है परन्तु सूफीवादी दर्शन रूहानी इल्मात की खोज की बातें करता है। सूफी संत और विचारक रूमी और अल गजाली कहते हैं कि इन्सान का दिल बेहतरीन आईना है जिसमें झांकने से उसका नफ्स (अहंकार/गुरूर) फ़ना हो जाता है और खुदा जात से वह रुबरु हो जाता है और इसलिए पीर मंसूर हल्लाज चिल्ला उठता है,
अनल हक अनल हक
( हिन्दी अनुवाद, मैं ही हक अर्थात् खुदा हूॅं जो अहम् ब्रह्मास्मि औपनिषदिक दर्शन का भाव है)।
इस प्रकार वैश्विक आध्यात्मिक दर्शन और चिन्तन इस विषय पर एक मत है कि मनुष्य ही सर्व उन्नति और सर्व अवनति के लिए उत्तरदाई या जिम्मेदार है।
औपनिषदिक दर्शन की उद्घोषणा* अहं ब्रह्मास्मि इस अवधारणा का परिचायक है कि मनुष्य असीम शक्तियों का स्वामी है और उस परम चेतना का ही अंश है जो तथागत सिद्धार्थ के अत्तनो नाथो के व्यवहारिक रूप का पर्याय है। आज के भौतिकवादी उपभोक्तावादी आधारभूत संरचनाओं में हम सुख शान्ति की तलाश विभिन्न व्यसनों या मनोरंजन के साधनों या सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर तलाश करते हैं परन्तु उन सबसे वांछित इच्छाओं और‌अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं हो पाती है जिससे विचलन और अवसाद (Deviation and depression)
का जन्म होता है और हम भटकते ही चले जाते हैं।
सुख, शान्ति और स्थिरता और कहीं नहीं हमारे ही भीतर है परन्तु उनकी खोज हम बाहरी संसार में करते हैं और ये मिलते भी हैं तो ये अल्पकालिक ही होते हैं। हम सुख चैन और अवसाद से बचने के लिए शराब पीते हैं,शराब का प्रभाव जबतक हमारे मनो मस्तिष्क में बना रहता है तबतक हमारी दुनिया अलग होती है और नशा उतरते ही हम वास्तविक दुनिया में आ जाते हैं जहां वही तनाव, समस्या और अवसाद बने रहते हैं।
मानसिक सुख या शान्ति का केंद्र हमारे ही भीतर है बस उनकी खोज करनी है,उनको समझना और आत्मसात करना है,यही स्वयं का नाथ या स्वामी बनना है।
दुःख और समस्या के कारणों को समझकर उनके समाधान के मार्ग ढुंढने हैं जिससे हम परावलम्बन से मुक्त होकर स्वावलंबन की ओर उन्मुख हो सकते हैं।
कोई अनात्मवादी हो या अनीश्वरवादी,आत्मवादी हो या ईश्वरवादी या अज्ञेयवादी हो,सबके लिए यही मार्ग है कि प्रकृति या परमात्मा ने सबको समान रूप से विचार स्वातंत्र्य, इच्छा स्वातंत्र्य और‌ कर्म स्वातंत्र्य प्रदान कर रखे हैं और चयन का अधिकार विवेकाधीन है।
मत,पंथ, विचार, विश्वास आदि को हम सहजता से धर्म समझ लेते हैं पर धर्म बड़े विराट वर्णपट का विषय है और एक ही है जिसे समझने के लिए अनेक मार्ग विकसित किए गए परन्तु उसी धर्म का आन्तरिक भाव और‌ विस्तार अध्यात्म है जिसे समझने की जरूरत संसार को है।
शान्ति,क्षमा, करूणा,
प्रेम,त्याग,सद्भावना‌,
सह अस्तित्व और सहानुभूति किसी अदृश्य संसार के विषय नहीं हैं,सब हमारे ही भीतर हैं परन्तु आमतौर पर लोग इनके विपरीत धर्मा आचरण और व्यवहार को ज्यादा प्रश्रय देने का काम करते हैं जो निराशा,
अशान्ति,तनाव, संघर्ष 
आदि के कारण बनते हैं जिससे स्वावलंबन का गुण घटता है और परावलम्बन का भाव बढ़ता है।
इसीलिए हमें अत्तनो नाथ बनने की बात को गंभीरता से समझने की जरूरत है।
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सम्पादकीय : आलेख  : पद्य संग्रह 
-------
अरुण कुमार 

*
इतिहास साक्षी है  ० ५. ० १. २६  
*
शक्ति आरती अरुण 
*

द्रौपदी :  चीर हरण : लघु फिल्म : कृष्ण रक्षण 
*
और इतिहास साक्षी है
जब जब ऐसा हुआ है
महाभारत हुआ है
महासमर का तांडव हुआ है,
और फिर ,
बलि दे दी जाती है 
किसी एकलव्य की,
किसी कर्ण की,
और पांचाली का चिर हरण होता
रहता है,
मौन रह जाती है सारी कुरू सभा।
सनद रहे,
मौन ने सदैव अन्याय और अत्याचार,
शोषण और दोहन को जन्म दिया है।
मौन,
न्याय और सत्य का
हक और अधिकार का
मूक हत्यारा है।
न्याय,
नैसर्गिक है, धर्म है , प्रकृति है 
सत्य है और अंत में ईश्वर है।
इसे अबाध निःशंक निर्भय स्वतंत्र 
और निष्पक्ष रहने दो,
इतिहास साक्षी है ,
जब जब इसने अपने धर्म के मर्म 
को खोया है, विस्मृत किया है
विध्वंस हुए हैं, 
मानवता रोयी है।
इसलिए बस इसलिए 
न्याय को जीवित रखना है
कि
फिर इतिहास की दुःखद परिणति न हो,
महासमर न हो।
*
पृष्ठ सज्जा : संपादन 
शक्ति शालिनी मंजिता सीमा  

*
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भाविकाएँ : अनुभाग 
२ / ३  : न्याय 
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न्याय,
मुक्त है
स्वतन्त्र है
स्वच्छन्द है
अबंध है।
कोई बन्धन नहीं होता
कोई नियंत्रण नहीं होता इस पर,
मानवीय रिश्तों का
सम्बन्धों का
आशाओं का, अपेक्षाओं का।
न्याय,
कभी बंधता नहीं 
स्थान, काल , पात्र के बंधनों से,
यह खेल नहीं होता सत्ता और शक्ति का,
छद्म व्यापार करते,
व्यवस्था का चीर हरण  करते
सामर्थ्यवानों का
तंत्र के संचालकों का।
पर विडम्बना है
न्याय की नियति का,
न्याय के प्रारब्ध का,
बंध जाता है कभी किसी कालखंड में 
कभी पुत्र प्रेम में,
कभी शिष्य मोह मे,
तो कभी राज मोह में 
तो कभी मित्र धर्म के मोह में ।
*
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गुजरते साल से : १ १ २५ 
=========
गुजरते हुए साल‌ से
क्या शिकवा 
क्या शिकायतें 
जो आया है उसे
जाना है
कुछ लम्हें बस इन्तजार के
और इसे भी गुजर 
ही जाना है
इन्तजार की घड़ियां 
भी बड़ी अजीब 
होती हैं 
कोई चला जाए तो
आने का इन्तजार 
रहता है और
गुजरते साल के जाने
का इन्तजार रहता है
कि
एक साल आंसुओं 
और मुस्कुराहटों के
बीच वैसे ही गुजर गया
जैसे हम धीरे-धीरे 
वक्त के साथ गुजरते 
चले जाते हैं 
और
यहां फिर वही इन्तजार के शायद
कल सब नहीं तो
बहुत कुछ जरूर 
बदल जाएगा
नम आंखें फिर से
मुस्कुराने लगेंगी 
होंठ गुनगुनाने लगेंगे 
और इसी तरह
बस इसी तरह 
जिन्दगी अपने तरीके से
गुजरती चली जाएगी 
और हर गुजरते साल 
के साथ 
एक नये साल के आने का इन्तजार रहेगा
हां,
वैसे ही 
जैसे किसी अच्छी खबर 
जैसे किसी अपनों के 
आने का इन्तजार रहता है।
=======
Poem २७। ०८ २५ 
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All r in quest of love

All r in quest of love
everyone is asking love
everyone is preaching the message of
love
but the love
it's theme and
essence is 
beyond the 
narration and
description in
the words
it is a deep feeling of innocent heart and soul 
always fresh like blooming flowers and
flowing rivers
smiling face of children 
innocent eyes of
mothers
loving affections of father
and blowing airs
a very subtle feeling of pure
heart and 
conscience
indiscriminating
the barriers of 
caste creed and
religion
free from all the
evils of life
and that is why
it is the embodiment of
the purity and 
righteousness
of thy merciful Lord
who is in itself 
Love and Passion.
*
युद्ध और संघर्षों दिवस : २३ ०९ २५ 

युद्ध और संघर्षों की गाथा
अनन्त है
युद्ध ही गाथा लिखते हैं 
इतिहास रचते हैं 
विनाश के गर्भ में न्याय 
धर्म अधिकार और शान्ति
की रचना करते हैं
जब जब अनर्थ अन्याय अधर्म अनाचार अपने चरम पर पहुँचता है तो
युद्ध का शंखनाद होता है
हाँ
पर ध्यान रहे कि युद्ध हो पर परमार्थिक हो
न्यायार्थ हो धर्मार्थ हो
सत्य के रक्षार्थ हो
जानकी के रक्षार्थ हो
पांचाली के पत के रक्षार्थ हो
पाण्डवों के अधिकारार्थ हो 
दीन हीन वंचित पीड़ितों के
सम्मानार्थ हो
 राष्ट्र धर्म के रक्षार्थ हो
सभ्यता संस्कृति के मान सम्मान के लिए हो
यह भी सत्य है कि जब जब युद्ध हुए हैं 
धन जन संपदा का विनाश हुआ है
मानवता कराही है
बच्चे अनाथ हुए हैं 
लोग आश्रयहीन हुए हैं
धरती प्रदूषित हुयी है
और आकाश कम्पयमान
हुआ है
जतन करो कि युद्ध न हो
पारस्परिक संवाद हो
सह अस्तित्व की बात हो
परन्तु स्मरण रहे कि 
जब सारे मार्ग समाधान के 
बन्द हो जाएँ तो
 युद्ध ही अंतिम विकल्प है।


गमों को रोज दावत देता हूॅं 
दिवस : ५ १० २५ 

गमों को रोज दावत देता हूॅं 
घर के दरवाजे खुले रखता हूॅं 

रंजोगम की भीड़ है सीने में
किसी से पर कुछ न कहता हूॅं 

अंधेरों में बसर करता रहा हूॅं 
रौशनी हो जला दिया रखता हूॅं 

दुनिया का हिस्सा हूॅं पर जूदा हूॅं 
न मानो सबकी खबर रखता हूॅं 

बेचैनियां हमारे हिस्से में रहे
अनीश सबके लिए दुआ करता हूॅं ।

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पांव जमीं पे रखो आस्मां में घर नहीं होता 
१९ ११ २५ 
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पांव जमीं पे रखो आस्मां में घर नहीं होता
वजह है सबकी बेवजह कुछ नहीं होता 
देखिए हीरे और शीशे में बड़ा फर्क होता है
हर चमकदार पत्थर यहां हीरा नहीं होता
सफ़र पे चलते हैं सब  मंजिल के लिए 
पर हर सफर यहां सबका पुरा नहीं होता
अनीश वक्त रहमदिल बेरहम भी है यहां 
सफरे जिन्दगी एकसां कभी बसर नहीं होता

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कुछ भी लिखो : ६.१२.२५  
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कुछ भी लिखो
कथा,कहानी,कविता,
संस्मरण,रिपोर्ताज, उपन्यास, जीवनवृत्त आदि
पर लिखते रहो
लिखना मत बन्द‌
करो कि
लेखन
रचनाधर्मिता 
और समय को
समय की मांग को
लोगों की पीड़ाओं 
को
उनके संघर्षों और 
जिजीविषा को
शोषण दोहन‌ दमन 
की कहानियों को
जीवित रखता है
लेखन
एक अनब्याही बेटी 
की पीड़ाओं को
उस बेटी के मजबूर 
पिता की वेदनाओं 
और त्रासदियों को
समय और समाज के 
सामने 
जीवित रखता है
जीवित रखता है 
रोजगार के लिए 
जद्दोजहद करते एक
बेरोजगार की पीड़ाओं को
उस बेरोजगार के 
पिता की बेबसी और
किंकर्तव्यविमूढ़ होने 
की मानसिकता को
गिरते मानवीय मोल‌
और मूल्यों को
मानवीय त्रासदियों को
मानवता पर हावी होते
दानवता को
पीड़ित मानवता के 
आर्तनाद को
युद्ध से उपजी पीड़ाओं 
और यंत्रणाओं को
घोर आर्थिक विषमताओं और विसंगतियों को
इसलिए 
लेखन कार्य चलते 
रहना चाहिए कि
कोई तो इन पीड़ाओं 
संघर्षों और वेदनाओं
को पढ़ेगा 
समझेगा गुनेगा बुनेगा 
कि
आदमी आखिर इन
हालातों में भी
कैसे जिन्दा रहता है
और लड़ना जूझना 
नहीं छोड़ता है कि
कल सबकुछ नहीं 
कुछ न कुछ तो
जरूर बदल जाएगा
और जीवन 
कुछ तो सहज और 
सरल हो जाएगा
बस इसलिए लिखते 
रहो
लिखते रहो।।

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