Samchar : Alekh
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शक्ति.समाचार संपादक.
शक्ति.शालिनी.डॉ.रजनी. रेनू.
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प्रस्तोता.प्रस्तुति.
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आज के समाचार विशेष में आपका स्वागत है। शक्ति प्रणाम !
महाशक्ति मीडिया की अगली मनभावन प्रस्तुति...भारतीय सभ्यता संस्कृति की तेरी मेरी कहानी ।
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मिलते हैं शक्ति की अगली प्रस्तुति में ....तबतक के लिए साथ और सहयोग बनाए रखें।
धन्यवाद ! आपका दिन मंगलमय हो.
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आलेख : नंदा सुनंदा महोत्सव
देवी नंदा सुंनदा। उत्तराखंड की अधिष्ठात्री देवी। भाद्र मास। शुक्ल पक्ष पंचमी का दिन। इन्हीं दिनों शक्ति पार्वती स्वरूपा नंदा सुनंदा महोत्सव की शुरुआत उत्तराखंड में होती है। और अनंत चतुर्दशी के पवित्र दिवस को भव्य शोभा यात्रा व विसर्जन के साथ इस उत्सव का समापन भी होता है।
पार्वती स्वरूपा शक्ति नंदा सुनंदा अपने मायके से डोले में विदा होकर अपने स्वामी भोले शंकर के घर कैलाश के लिए विदा हो जाती हैं।
उत्तराखंड के लोक विश्वास और संस्कृति में मां नंदा और सुनंदा को बहनों या सहचरी साथ रहने वाली के रूप में पूजा जाता है, जो संपूर्ण पर्वतीय क्षेत्र की कुलदेवी और लोकमाता मानी जाती हैं।
पौराणिक कथा और पृष्ठभूमि नंदा देवी : धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नंदा देवी को राजा हिमालय : हेमंत और मेनावती की पुत्री हैं। उन्हें तथा भगवान शिव की अर्धांगिनी : पार्वती का रूप माना जाता है।
सुनंदा देवी : सुनंदा को नंदा देवी की बहन या प्रिय सहचरी कहा जाता है, जो मुख्य चोटी के पूर्वी शिखर के पास निवास करती हैं। मुख्य नंदा देवी पर्वत के ठीक पूर्व में स्थित निचली चोटी को सुनंदा नंदा देवी ईस्ट भी कहा जाता है।
मायके और ससुराल की कथा : ऐसी मान्यता है कि विवाह के बाद नंदा शिवजी के साथ कैलाश चली जाती हैं, लेकिन हर साल या विशेष अवसरों पर वे अपनी बहन सुनंदा के साथ अपने मायके उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र आती हैं। तब इसी उपलक्ष्य पर नंदा देवी महोत्सव के निमित विशेष मेले व उत्सव का आयोजन समस्त उत्तराखंड में अपने विशेष अंदाज में होता है।
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वृत्त चित्र समाचार आलेख : १ : तीज़
वृत्त चित्र समाचार आलेख : २ : तीज़
शक्ति. डॉ.सुनीता मधुप अनुभूति.
शिव ही शक्ति है। शिव ही भक्ति है। अंत भी शिव आदि भी शिव। सत्य ही शिव है शिव ही सुन्दर है। हम सत्यम शिवम सुंदरम की खोज में हम काशी जा पहुंचे थे। शिव की नगरी। सुनते हैं काशी में शिव विराजते हैं। काशी की मणिकर्णिका घाट पर घूमते हुए शक्ति पार्वती की कई कहानियां भी सुनी। पार्वती ने शिव को पाने के लिए घोर तपस्या की थी। यह हम भी जानते हैं उन्होंने तीज व्रत भी किया। निर्जला रही थी। भला क्यों ?
कई ऐसा तो नहीं कि शिव अत्यंत सरल, सीधे साधे, भोले भाले, कल्याणकारी रहे इसलिए पार्वती को भा गए। कहते हैं प्रेम हो तो सिर्फ शिव पार्वती के जैसा। मिले तो कई जन्मों के लिए नहीं तो बैरागी हो गए। प्रस्तुत है महाशक्ति मीडिया की संस्कृति और परंपराओं की एक छोटी सी
मनभावन प्रस्तुति : काशी, शिव : तीज और पार्वती।
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वृत्त चित्र समाचार आलेख :२ :गणपति.
वृत्त चित्र समाचार : आलेख :२ : गणपति
शक्ति. डॉ.सुनीता मधुप अनुभूति.
भारतवर्ष विविधताओं का देश है। भाषा भाषी , लोग प्रांत अनेक है फिर भी हम सभी के मध्य एकता स्थापित है। भाद्र मास शुक्ल पक्ष तृतीया का शुभ दिन जब शक्तियां शिव की आकांक्षा में निर्जला तीज व्रत करती है। तब उनकी एक मात्र अभिलाषा होती है कि कई जन्मों तक उनके स्वामी भोले शिव शंकर जैसे ही मिले और वो एक पत्नी निष्ठ हो। शायद शिव की महिमा ही ऐसी है।
ठीक इसके एक दिन बाद ही भाद्र शुक्ल पक्ष गणेश चतुर्थी का दिन आता है। इस दिन ही विघ्नहर्ता, वक्रतुंड, महाकाय, गणेश जी का शुभ आगमन होता है।
गणपति उत्सव की चर्चा होते ही हमें महाराष्ट्र की याद स्वतः आ जाती है क्या धूम होती हैं यहां ? बजते हुए ढ़ोल तासे ,गणपति बप्पा मोरिया के लिए थिरकते हुए लोग। यही दिखता है कि देश प्रांत भाषा भासी लोग तो सारे अनेक हैं फिर भी हम एक है।
ज्ञात हो ब्रिटिश कालीन भारत में १९०४ - १९०५ के बंग भंग आंदोलन के विरुद्ध महाराष्ट्र केसरी बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल और लाला ने महाराष्ट्र, बंगाल, पंजाब में ही नहीं गणेश उत्सव की परंपरा समस्त भारत में शुरू करने की प्रेरणा समस्त भारतीय को दी थी। जो आज समस्त भारत में पूर्ण रूप से साकार होती दिख रही है। बल्कि यूँ कहें आज यह गणेश उत्सव की परंपरा विश्व व्यापी हो गई है।
सनातनी परंपरा के अनुसार हम अपने प्रत्येक शुभ कार्य करने के पहले बार-बार दोहराते हैं, श्री गणेशाय नमः। गणेश जी सभी के लिए कष्टहर्ता बने यह हमारी हार्दिक आकांक्षा है। सब के कार्य मंगल मय हो। हम गणपति बप्पा मोरया की ह्रदय से वंदना करते हैं।
महाराष्ट्र में सार्वजानिक गणेशोत्सव आम तौर पर १० दिनों तक़ चलता है और ग्यारहवें दिन अनंत चतुर्दशी के दिन मूर्ति विसर्जन के साथ समाप्त होता है। अगले वर्ष तू जल्दी आ इस कामना के साथ हम प्रतीक्षा रत होते हैं।
आपके समक्ष है : महाशक्ति मीडिया की भक्ति की शक्ति प्रस्तुति
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पूजे गए ब्रह्मांड के पहले इंजीनियर और वास्तुकार : भगवान विश्वकर्मा.
विश्वकर्मा : विश्व के निर्माण कर्ता। विश्व के सम्यक कर्म क्या होने चाहिए ? बुद्धि विवेक कौशल, का अर्जन। तत्पश्चात समस्त जगत के लिए शिव सृजन। जिससे समृद्धि आए।
वर्ष में एक निश्चित तिथि १७ सितंबर को भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है जो सृजन कौशल व समृद्धि के पर्याय माने जाते हैं।
जिज्ञासा युक्त मन के भीतर प्रश्न यह है कि भगवान विश्वकर्मा की पूजा की तिथि १७ सितंबर ही क्यों ?
सही जवाब है अधिकांश हिंदू त्योहार चंद्रमा की स्थिति पर आधारित होते हैं, लेकिन विश्वकर्मा पूजा सौर कैलेंडर पंचांग की कन्या संक्रांति पर आधारित है। इस दिन सूर्य सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार हर साल १७ सितंबर के आसपास होता है।
पौराणिक कथाओं की माने तो भगवान विश्वकर्मा इस ब्रह्मांड के पहले इंजीनियर और वास्तुकार समझ जा सकते हैं जिन्होंने सतयुग से लेकर द्वापर युग तक देवताओं के लिए कई दिव्य महल राजधानियां अस्त्र शस्त्रों का निर्माण किया था। उन्होंने रावण की लंका,कृष्ण की द्वारिका नगरी और पांडवों की माया सभा जैसे दिव्य,अभूतपूर्व नगरों व महलों का निर्माण किया था।
यह वैसे निर्माण हैं जिसे वास्तु कला के लिए अभी भी याद किया जाता है। दर्शनीय व प्रशंसनीय हैं । यह त्यौहार मुख्य रूप से औद्योगिक क्षेत्र, दुकानों और कार्य स्थलों पर मनाया जाता है जिसमें इंजीनियर शिल्पकार, कारीगर, मैकेनिक, वेल्डर और श्रमिक इस दिन अपने भविष्य सुरक्षित कामकाजी परिस्थितियों और व्यापार को लेकर के भगवान से प्रार्थना करते हैं।
मातृ शक्ति : आलेख : ४ : मधुप
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी माता और मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी श्रेष्ठ और महान है। सही है। मातृ शक्ति कहें या जननी सदैव पूजनीय व स्मृत रहेगी। एक संघर्ष की गाथा जीव की संरचना, संतति की कहानी है । कैसे भूली जा सकती हैं मातृ शक्ति ?
किसी भी मातृ शक्ति की अवतरण तिथि कोई भी हो सकती हो लेकिन प्रत्येक की कहानी एक जैसी ही हैं।
जीवन एक संघर्ष की कहानी के साथ ही शुरू होती है। २८अक्टूबर १९४०, मातृ शक्ति के अवतरण की तिथि। इसलिए मेरी व मेरी मातृ शक्ति की जन्म भूमि पटना साहिब रही है । गुरु साहिब गोविन्द जी का जन्म स्थान।
साल १९४२ भारत छोड़ो आंदोलन की बातें भी होती थी। राष्ट्र वाद ,संघर्ष और कर्म की गाथाएं बचपन में ही घर कर गयी । बी ऐन आर के बाद पटना विश्वविद्यालय से बी ऐड, हिंदी स्नातकोत्तर से उच्चतम शिक्षा पूर्ण हुई। फिर आरंभ होती है जीवन के अग्निपथ में, व्यवधानों के मध्य निंरतर कर्म संघर्ष की अंतहीन गाथा।
उस कहानी को हमें जानने,समझने की,आवश्यकता है जिसने निरंतर सहन करते हुए ,परिस्थितियों से हमेशा लड़ना सीखा। सफ़लता सुख समृद्धि के लिए सदैव प्रयत्न शील रही।
अपनी संतति , परिवार ,समाज व लोक हित के लिए सकारात्मक प्रगति का कारण बनी। यहीं प्रकृति रही है हमारी मातृ शक्ति की। समय शब्द और संस्कार की प्रथम व अंतिम पाठशाला रहीं है हमारे लिए। इस दृश्य संसार के लिए वो प्रत्यक्ष भले ही न हो लेकिन सदैव हमारे लिए रचनात्मक, व प्रेरणादायी रहीं हैं।
मेरे जीवन में त्रिशक्ति शब्द भाव की रचियता और उस व्यवहार को अपने जीवन में उतारना भी माँ ने ही सिखलाया। यद्यपि नाशवान शरीर के विश्रामित होने से जीवन यात्रा १५ दिसंबर २०२३ को विश्रामित तो हो गयी लेकिन सद भाव और सतकर्म की कहानी हिंदी में अभी भी पीढ़ी दर लिखी जाती ही रहेगी।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि की तरह वह आत्मा अजर अमर है,अमरणशील है। बतौर समय शब्द ,संस्कार और मेरी रचनात्मक क्रियाशीलता के रूप में वो शक्ति अभी भी वर्तमान थी हैं और रहेगी।
न जाने क्यों उगते ढ़लते हुए चाँद ने मुझे सदैव अपनी ओर खींचा है।तुम आये तो आया मुझे याद गली में चाँद निकला। आश्विन कृष्ण पक्ष करवा चौथ का मनभावन चाँद तो हर दिलकश हसीं जोड़े के लिए प्रेमपूर्ण प्रतीक्षारत भावनाओं की सुन्दर प्रेम कहानी ही है। जिसे हर कोई चाहना देखना, पसंद करता है।
यकीं कीजिए जब आप एक दूसरे की खुशियों के लिए कोई व्रत रखते है। साथ जीने मरने की कस्में खाते हैं ,कोई शपथ लेते है ,एक दिवस की दिनचर्या तय कर लेते है कि जबतक चाँद न दिख जाए, शीतल चांदनी बिखर न जाए, तबतक अन्न जल ग्रहण नहीं करुँगी। सच में वो एक सुकून की भीगी रात होती है।
दिल जो न कह सका त्याग, प्रेम, समर्पण मधुरिमा की भावना क्या कहीं किसी क्षण ,किसी दिन किसी व्यक्ति विशेष के लिए बंध सकती है। कदापि नहीं। चंद्र का साथ हो, सम्यक हो ।
सम्यक जनों के लिए अपने व्यवहार चांदनी जैसी शीतलता अपने भीतर भी रखिए। प्रकृति की सुंदरता का मान रखें। अँधेरे से निकलते चाँद को देखिए, भाव समझिए भी। अँधेरे में फैलती रौशनी से तमसो माँ ज्योतिर्गमय के अर्थ को अपने भीतर भी सार्थक कीजिए। स्वयं भी शीतल हो दूसरे को भी शीतल करें।
परंपरा निभ गयी लेकिन भाव और सन्देश को नहीं समझ सके तो क्या फायदा। एक दिन की रौशनी की चाहत फिर आगे अंधेरे कर्म और व्यवहार का विस्तार। तो ज़रा थोड़ा ठहर जाइए ज़रा सोचिए न।
हमारी कई शक्ति सम्पादिकाओं ने करवा चौथ का व्रत रखा। चाँद का दीदार भी किया। जल ग्रहण करने के बाद अपने व्रत भी तोड़ें। हिमाचल ,दिल्ली ,पंजाब, उत्तरप्रदेश, झारखण्ड, बिहार , राज्यों के अलावा जयपुर, दार्जलिंग, देहरादून,किन्नौर ,नैनीताल व रांची आदि प्रमुख शहरों में चाँद की एक पूरी झलक शक्तियों ने देखी। कस्में खाई , रस्में निभाई, धुन गुनगुनाया कस्में वादें प्यार वफ़ा सब राज यही है,जीवन का क्या ?
साथ बना रहे इसकी कोशिश कीजिए। मन का विश्वास न टूटे, अंधकार भी दूर हो इसके लिए सार्थक प्रयास भी करें। मिलता हूँ अगले ब्लॉग में ,तबतक के लिए अजी शुक्रिया
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