Radhika : Krishna : Rukmini : Darshan : Dainik.10.V2.S3.
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Shakti Project.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम.
In association with.
A & M Media.
Pratham Media.
Times Media.
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Radhika Krishna Rukmini.
Darshan.10.Dainik.
Dainik.Volume : 2. Series : 4.
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Holi Special.
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राधिकाकृष्णरुक्मिणी दर्शन : १०.
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| आवरण पृष्ठ. दैनिक. |
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राधिकाकृष्णरुक्मिणी दर्शन : १०.
पत्रिका / दैनिक अनुभाग..
तिथि : २०.०४.२०२६.
विक्रम संवत : २०८३.शक संवत :१९४८.
विक्रम संवत : २०८३.शक संवत :१९४८.
दिन : सोमवार.
शक्ति.दिवस.मूलांक : २.
बैशाख : शुक्लपक्ष : द्वितीय / तृतीया.
अक्षय तृतीया
*
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सम्पादकीय त्रिशक्ति : पृष्ठ : ०.
लेखकीय प्रधान
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*
शक्ति.शालिनी मधुप रेनू.
नैनीताल.डेस्क.
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| शक्ति.सोनाली.आर्य.डॉ.दीनानाथ वर्मा.फिजिशियन.ह्रदय एवं शुगर रोग विशेषज्ञ.समर्थित |
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राधिकाकृष्ण : प्रेम प्रकृति : दर्शन : आज : पृष्ठ : ० / १.
----------
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राधिका डेस्क.
राधाकृष्ण मंदिर.मुक्तेश्वर.नैनीताल.
संपादन.
शक्ति.डॉ.अनु मधुप प्रिया.
*
सखी रे मैं का से कहूं
*
जब जब तू मेरे सामने आए
*
*
सन्दर्भ : विचार : माया.
शक्ति : राधिका : कृष्ण : छाया.
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राधिकाकृष्ण : प्रेम प्रकृति : दृश्यम : पृष्ठ : ० / १.
प्रेम धुन
राधिका कृष्ण : रहें न रहें हम महका करेंगे *
साथ : कृष्ण : अपने
*
*
विचार सन्दर्भ : फोटो : माया
राधिका : कृष्ण : छाया
*
हम तोड़ के निकलेंगे जंजीर समाजों की
*
सकारात्मक ऊर्जा में स्वयं को लगाए
रूढ़ियों को तोड़ने वालों के उदाहरण पर्याप्त संख्या में नहीं हैं
इसलिए लोग रूढ़ियों को मानते आए हैं
*
शोध विचार शक्ति
@ शालिनी प्रिया मधुप
*
तुम्हें देखती हूँ तो लगता है ऐसे
*
*
सन्दर्भ : विचार : माया.
शक्ति : रितु : इंदप्रस्थ : छाया.
*
गंगा में डूबा कि यमुना में डूबा
डूब गया रे मेरा मन
*
*
पाप इन्द्रियां नहीं करती प्रथमतः विकार तो मन के भीतर विचार में उत्पन्न होते हैं, माधव !
और गंगा में डूबकी लगा कर हम अपने तन के मैल को ही धो पाए मन का नहीं,
*
विचार शक्ति @ रितु मधुप अनुभूति
*
तो शब्द नहीं उनके लिए संजीवनी है ,प्रिय
*
*
राधिका : अनंत विश्वास, त्याग, कथित शब्द, शाश्वत शिव विचार और तुम्हारे दिव्य साथ
की शक्ति के अतिरिक्त हमारे पास क्या शेष है माधव , बोलो न ?
शोध विचार शक्ति
@ प्रिया मधुप अनुभूति
©️®️M.S.Media.
*
जब जब तू मेरे सामने आए
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राधिका : प्रेम तो सकारात्मक, स्वाभाविक, स्फूर्त, शिव अनंत मन की भावना है, कान्हा
भला अनुग्रह, विनय, अधिकार से कैसे प्राप्त किया जा सकता है ?
*
शोध विचार
शक्ति @ प्रिया मधुप अनुभूति
©️®️M.S.Media.
*
साथ, सहायता देने, असीम प्रेम ,सहिष्णुता रखने वाले हो ,न माधव ?
*
*
शोध विचार
शक्ति @ प्रिया मधुप अनुभूति ©️®️M.S.Media.
*
कर्म ही पूजा है तप है.
*
क्या श्रेष्यकर है प्रिय ?
दिन दुनियां समाज जन से अलग
पर्वतों में स्वयं ज्ञान तप के लिए धूनी रमाना
या
स्वजन, परिजन, परिवार, समाज देश हित और उन्नयन जैसे
कार्य में निरंतर प्रयासरत रहते हुए तपना ?
विचार कीजिए
*
शोध विचार
शक्ति @ प्रिया मधुप अनुभूति ©️®️M.S.Media.
*
साधवो न हि सर्वत्र
शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे।
साधवो न हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने॥
*
न प्रत्येक पर्वत पर मणि-माणिक्य ही प्राप्त होते हैं न प्रत्येक हाथी के मस्तक से मुक्ता-मणि प्राप्त होती है। संसार में मनुष्यों की कमी न होने पर भी साधु पुरुष नहीं मिलते । इसी प्रकार सभी वनों में चन्दन के वृक्ष उपलब्ध नही होते।
*
जब जब तू मेरे सामने आए
*
यह शाश्वत प्रेम ही है जीवनपर्यन्त राधा जीवन भर कृष्ण के लिए रही
राम के साथ सीता वन वन भटकी
....वर्तमान में किंचित कृष्ण के प्रेम में भटकना, राधा बनना प्रिय लगे ,
हैं, लेकिन राम के साथ सीता की तरह वन में रहना,कष्ट सहना
शायद ही किसी को पसंद हो
*
--------- रुक्मिणीकृष्ण : प्रकृति प्रेम : दृश्यम : आज : पृष्ठ : ० / १. ---------- राधाकृष्ण मंदिर.मुक्तेश्वर. नैनीताल डेस्क संपादन शक्ति.रेनू मधुप प्रिया. |
*
शक्ति विशेष : विचार
*
आ बता दें कि तुझे कैसे जिया जाता हैं
*
विचार सन्दर्भ : फोटो : माया
राधा कृष्ण मंदिर : मुक्तेश्वर : छाया
*
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रुक्मिणीकृष्ण : प्रकृति प्रेम : शब्द चित्र : आज : पृष्ठ : ० / १.
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राधाकृष्ण मंदिर.मुक्तेश्वर.
नैनीताल डेस्क
शक्ति.रेनू मधुप प्रिया.
*
*
क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी फ़ितरत छिपी रहे
नकली चेहरा सामने आए असली सूरत छिपी रहे.
*
*
विचार सन्दर्भ : फोटो : माया
शक्ति रितु सिंह : इंद्रप्रस्थ : छाया
*
ये आसमाँ,ये बादल,ये रास्तें,ये हवा
इस प्रकृति में हर एक चीज वैसी ही है जैसी दिखती है
सिवाय मानव के वह होता कुछ और है
कहता कुछ और है,करता कुछ और,प्रिय !
*
विचार शोध शक्ति @ डॉ.अनु मधुप आस्था
*
साथ : जोड़ : घटाव
*
*
सन्दर्भ : विचार : माया.
शक्ति : शबनम : इंद्रप्रस्थ : छाया.
*
....हिसाब कर लो कितना, कैसे और कब तक साथ निभाना है ?
*
विचार शक्ति @ रेनू मधुप शबनम
*
कुछ रीत जगत की ऐसी है
सन्दर्भ : विचार : माया.
शक्ति : नैना : जयपुर : छाया
*
शक्ति : नैना : जयपुर : छाया
*
अधिकतर गलत लोग गलत करके भी शर्मिंदा नहीं होते हैं
जबकि सही लोग केवल आरोपों से से ही टूट जाते हैं
*
तन भी सुन्दर मन भी सुन्दर
तुम सुंदरता की प्रतिमा हो
*
*
लोग कहते हैं सुंदर से ज्यादा
सही शख्स का होना जरूरी है..
हम कहते है तन मन धन से आप सत्यम शिवम सुंदरम हो जाए
तो क्या बुरा
*
विचार शक्ति @ डॉ. सुनीता मधुप अनुभूति
©️®️M.S.Media.
*काहे बनाए तुमने माटी के पुतले
दुनियां बनाने वाले काहे को दुनियाँ बनाई
आप उन ग़लत छवियों के लिए जिम्मेदार नहीं हैं
जो समाज ने दूसरों के दिमाग़ में आप के लिए बनाई है
*
सोना सज्जन साध्वी
*
*
सन्दर्भ : विचार : माया. कृष्ण शक्ति : रितु : छाया.
अक्षय तृतीया अनंत संदेश
*
विचार में अनंत शिवशक्ति हो मन में बुद्धि विवेक कौशल : सरस्वती ,
अपने मन मर्यादा ,में राम : कृष्ण निर्दिष्ट सम्यक कर्म पथ
पर बढ़ते हुए हमने ' विद्या ', ' लक्ष्मी ' की ' शक्ति ' प्राप्त हो
*
विचार शक्ति @ डॉ. सुनीता सीमा अनुभूति
*
भाग्य न बांटें कोई
*
कहते हैं कि अपने मन की व्यथा
अन्य को बताने से कभी न्यून नहीं होती है
प्रत्युत जग हंसाई ही होती है ,अतः सोच समझ कर ही
अन्य के समक्ष अपनी पीड़ा सार्वजनिक करिए
*
शोध विचार शक्ति
@ प्रिया मधुप रेनू
*
विचार सन्दर्भ : फोटो : माया
साभार : शक्ति : रेखा : देहरादून : छाया
*
प्रेम है अनंत है
*
प्रेम अनंत है इसका कोई ओर छोर नहीं
प्रारंभ तो है लेकिन इसका कोई अंत नहीं
*
शोध विचार शक्ति
@ प्रिया मधुप रेनू
*
प्रेम : प्रकृति : पहाड़ : पुरुषोत्तम : पुनर्जन्म
*
शोध विचार शक्ति
@ प्रिया मधुप रेनू
*

कृष्ण शक्ति : रितु : छाया.
*
साधवो न हि सर्वत्र
*
शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे।
साधवो न हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने॥
भावार्थ
साधवो न हि सर्वत्र
न प्रत्येक पर्वत पर मणि-माणिक्य ही प्राप्त होते हैं न प्रत्येक हाथी के मस्तक से मुक्ता-मणि प्राप्त होती है। संसार में मनुष्यों की कमी न होने पर भी साधु पुरुष नहीं मिलते । इसी प्रकार सभी वनों में चन्दन के वृक्ष उपलब्ध नही होते।
*
ए जिंदगी गले लगाना
*
नाराजगी,आंसू ,गुस्सा ,मुस्कान से ही बिगड़ती ,बनती
संवरती है जिंदगी
*
जिस पथ पर चला
*
मार्ग दिखाने वाले अगर सही हो, ईश्वरीय हो
तो उसके पीछे सन्मार्ग में चलने कोई भी बुराई नहीं है ….
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राधिकाकृष्ण : प्रेम प्रकृति : ड्योढ़ी : दर्शन : आज : पृष्ठ : १ / १.
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प्यार : व्यवहार : संस्कार
*
राधिकाकृष्ण.
वरसाने.वृन्दावन.डेस्क.
. प्रादुर्भाव वर्ष :१९७६.
संस्थापना वर्ष : १९९८.महीना : जुलाई. दिवस :४.
*
संपादन
*
शक्ति * प्रिया मधुप.डॉ.सुनीता
*
हे री मैं तो प्रेम दिवानी,मेरा दरद न जाने कोय
*
श्याम तेरी बंशी पुकारे राधा नाम
राधा का भी श्याम वो तो मीरा का भी श्याम.
*
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राधिकाकृष्ण : जीवन दर्शन : दृश्यम : शब्द चित्र : वृन्दावन.डेस्क : पृष्ठ : १ / १.
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वरसाने.वृन्दावन.डेस्क.
*
संपादन
शक्ति शालिनी मधुप रितु
*
विचार सन्दर्भ : फोटो : माया
इस्कॉन मंदिर : मीरा रोड : मुंबई : राधिका कृष्ण : छाया
*
*
*
दूसरों की जय से पहले
ख़ुद को जय करें
*
अच्छी भूमिका,अच्छे लक्ष्य,अच्छे विचार वाले
मानव : देव : शक्तियों को सदैव स्मृत किया जाएगा
मन से भी, शब्दों से भी और जीवन में भी
*
शोध विचार शक्ति @ सीमा.डॉ.आर के.भावना
*
*
जब छल ही कर्म हो जाए
*
*
विचार सन्दर्भ : फोटो : माया
अनंत : श्री हरि राम कृष्ण : छाया
*
अथ श्री महाभारत कथा
*
स्वार्थ की परमार्थ की
*
चिंता किस बात की पार्थ ! यह तो स्वयं के अर्थ का सार्थक शब्द है
कि तुम्हें जीवन के महाभारत में मात्र कृष्ण का ही साथ चाहिए
तो तुम्हारे भ्राता दुर्योधन को नारायण की चतुरंगिणी सेना
*
शोध विचार शक्ति @ शालिनी मधुप आस्था
*
मनुष्य के ६ विकार
हरि : मनुष्य के ६ विकार काम : इच्छा वासना, क्रोध : गुस्सा, लोभ : लालच,
मद : अहंकार, मोह : आसक्ति और मत्सर : ईर्ष्या
ये ६ विकार यदि तुम्हारे व्यक्तित्व्य में शून्य हो जाए
तो तुम इंद्रजीत हो गए ...प्रयास करते रहें
*
शोध विचार
शक्ति शालिनी @ प्रिया सीमा
*
माधव : सीधा सा है पार्थ कर्मों का फल ..
छल का फल छल आज नहीं तो कल....
*
कद और क़ाबिलियत
*
अपने आस पास प्रभाव शाली व्यक्तियों से घिरे रहने
मात्र से स्वयं को योग्य,गुणवान व कद में ऊँचा समझना एक मिथ्या भ्रम पालने के सामान है पार्थ !
अपना व्यक्तित्व और कद स्वयं की अर्जित क़ाबिलियत से बढ़ता है
ध्यान रहें
*
वर्धमान : महावीर : हिंसा : वर्तमान
*
सिर्फ मारकाट ही हिंसा नहीं
प्रत्युत जिन के सिद्धांतों के अनुसार किसी भी जीव के लिए
अमर्यादित शब्दों का सम्भाषण भी हिंसा का ही पर्याय है
*
*
विचार सन्दर्भ : फोटो : माया
महावीर : जिन : छाया
*
विशेष : ध्यान सोना सज्जन साधु जनों
अपवाद : दुर्जन को छोड़ कर
*
शोध विचार शक्ति @ प्रिया मधुप सीमा
*
*
मैं चुप रहूंगी
*
हो गयी बैरी से दूर,समझ बूझ कर उसने माधव सोना सज्जन साधु जन को अपनाया
*
विचार शक्ति @ शालिनी मधुप रितु
*
धरम करम
*
विचार सन्दर्भ : फोटो : माया
साभार : शक्ति : रेखा : देहरादून : छाया
*
इहलोक में जीवन के अंत बाद परलोक सुख दिलवाने का दावा तो सभी धर्मो के पास है
काश जिंदा रहते हुए ही थोड़े से कतरे सुख के लिए हम उनके लिए
कुछ कर जाते
*
विचार कीजिये धरम क्यों करना है
इसलिए कि अपना पाप करम धोना है
या स्वयं का और उन्नयन करना है
*दर्पण को देखा
दूसरों के प्रभुत्व और उसके व्यक्तित्व में रुचि
रखने के बजाय ,किसी भी बुद्धिमान व्यक्ति की तरह अपनी पहली रुचि
स्वयं के जानने व उन्नयन में रखिए .... श्रेष्यकर होगा
विचार शक्ति @ शालिनी मधुप रितु
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रूक्मिणीकृष्ण : प्रकृति प्रेम : जीवन दर्शन : शब्द चित्र : पृष्ठ : १ / २.
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रूक्मिणीकृष्ण : प्रकृति प्रेम : जीवन दर्शन : शब्द चित्र : पृष्ठ : १ / २.
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प्यार : व्यवहार : संस्कार.
*
रुक्मिणी डेस्क.
विदर्भ डेस्क.महाराष्ट्र.
प्रादुर्भाव वर्ष : १९७८.
संस्थापना वर्ष : १९८७.महीना : अगस्त : दिवस : ६.
*
संपादन
शक्ति. प्रिया डॉ.सुनीता मधुप.
रुक्मिणी डेस्क.
विदर्भ डेस्क.महाराष्ट्र.
प्रादुर्भाव वर्ष : १९७८.
संस्थापना वर्ष : १९८७.महीना : अगस्त : दिवस : ६.
*
संपादन
शक्ति. प्रिया डॉ.सुनीता मधुप.
*
विचार सन्दर्भ : फोटो : माया
इस्कॉन : मंदिर खारगर : छाया
*
*
जीवन की धारा ... सदैव हमसब की इच्छाओं
के विपरीत ही चलती है ...न ,माधव ?
*
*
विचार शक्ति दृश्यम @ प्रिया मधुप अनुभूति
*
कहीं ऐसा न हो शिशुपाल कि समय आने पर
कहीं ऐसा न हो शिशुपाल कि समय आने पर
अपने अपराधों की गिनती ही भूल जाओ
*विचार शक्ति @ प्रिया मधुप अनुभूति.
*विचार सन्दर्भ : फोटो : माया
शक्ति : माधव : छाया.
*
प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम्
*
जो घटित हुआ वो सामने था,और जो शब्द कहे गए वो कर्ण मर्म भेदी सिद्ध हुए
और जिसकी पुनरावृति भी सार्वजानिक होती रही
फिर स्वयं के साक्षी होने के बाद किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता कैसी ? प्रिय !
*
विचार शक्ति @ प्रिया मधुपअनुभूति
*
समझ : वचन : परिणाम
*
वचन दिया सोचा नहीं होगा क्या परिणाम
सोच समझ कर कीजिए जीवन में हर काम
साभार : महाभारत
*
हौसला और हालात
*
हालात तो हर किसी का मन के अनुकूल नहीं होता
दिन भी उनके ही बदलते हैं जो अपने भीतर
कुछ कर गुजरने का हौसला रखते हैं
*
सन्दर्भ : विचार : माया
शक्ति : सोनी : इंद्रप्रस्थ : छाया
सब दिन होने न चाहिए एक सामान
*
कोई दिन विशेष नहीं सत कर्म,शब्द और व्यवहार विशेष होना चाहिए
प्रिय जिससे स्वयं, जड़ चेतन समस्त जगत का उन्नयन दर्शित हो
*
शोध विचार शक्ति
@ डॉ.सुनीता मधुप प्रिया
@ डॉ.सुनीता मधुप प्रिया
©️®️M.S.Media.
*
तुलसी दास
*
विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति।।
*
क्षणे रुष्टा: क्षणे तुष्टा:
*
क्षणे रुष्टा: क्षणे तुष्टा: रुष्टा तुष्टा क्षणे-क्षणे।
अव्यवस्थित चित्तानाम् प्रसादोऽपि भयंकर
*
भावार्थ
जो लोग क्षण भर में नाराज और क्षण भर में खुश हो जाते हैं अव्यवस्थित चित्त वाले ,
उनकी प्रसन्नता या कृपा भी भयंकर नुकसानदेह होती है
*
निदान
अपने स्वजनों से होने वाले सार्वजानिक वाद प्रतिवाद से हटकर तत्क्षण स्थान,
व्यक्ति विशेष के लिए
आत्म अनुभूति के लिए अतिरिक्त समय दें
यदि अन्य है तो सर्वदा दूरी बना लें
*
रामस्य तेजः सीताया सौम्यता
उभयं परम सौन्दर्यम
*
प्रेम : प्रकृति : पहाड़ : पुरुषोत्तम : पुनर्जन्म
*
ख़ामोशी और नाराजगी
*
*
सन्दर्भ विचार : माया
शक्ति : रितु : छाया
*
जीवन की बगिया महकेगी
*
प्रेम प्रकृति का एक अनमोल उपहार है
जिसमें ,समर्पण, क्षमा व प्रीत का भाव सुगंध से
जीवन की बगिया महकती है
*
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मीरा कृष्ण : जीवन दर्शन : मेवाड़ डेस्क. : पृष्ठ १ / ३ .
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*
मीरा डेस्क.
मेवाड़ डेस्क.जयपुर.
प्रादुर्भाव वर्ष : १९८२.
संस्थापना वर्ष : १९८९. महीना : सितम्बर. दिवस : ९.
*
*
मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों न कोय
*
मेवाड़ डेस्क.जयपुर.
संपादन.
शक्ति.जया अनीता गरिमा.
*
विचार सन्दर्भ : फोटो : माया
*
इस्कॉन : पटना : राधिका कृष्ण : छाया
*
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मीरा कृष्ण : दृश्यम : मेवाड़ डेस्क
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शक्ति. तनु जया अनीता
*
*
तुम मम प्रिय भरत ही सम भाई
*
विचार सन्दर्भ : फोटो : माया
*
छाया : सियाराम भरत लक्ष्मण : हनु
*
तुम मम प्रिय भरत ही सम भाई कह राघव हनु संग भरत का मान बढ़ाया
वन वन घूमे लक्ष्मण राम सिया संग धन दौलत सुख वैभव ठुकराया
*
विचार छाया हनु छाया :
राज सिंहासन भरत को कैकेयी ने राम को वनवास दिया
भ्रमवश भरत के तीर ने संजीवनी बूटी लिए हनु को मूर्छित किया
*
©️®️ डॉ.राखी मधुप सीमा
*
समय साथ और सच
*
आँखें देखे मौन मुख सहा कहा नहीं जाए
लेख विधाता का लिखा कौन किसे समझाए
*
साभार : महाभारत
*
मीत न मिला रे मन का
*
सन्दर्भ : विचार : माया.
*
*
किसी सच ,समय में जो सदैव साथ,सुरक्षा और प्रीत निभाए
जगत को जीतने वाला वही तो मन का मीत होता है,माधव
*
विचार शक्ति @ सोनी मधुप आस्था
*
समय : सच : साध्वी
*
अपने जीवन की उलझन को
कैसे मैं सुलझाऊँ
*
आजकल लोग समझते कम समझाते ज्यादा है
इसलिए तो हमारे जीवन में,विवाद,उलझनें और बाधा है
*
अलङ्कियेत शीलेन केवलेन हि मानवः
मुक्ताभिर् न माणिक्यैः न वस्त्रैर न परिच्छदैः,
अलङ्कियेत शीलेन केवलेन हि मानवः ।।
*
भावार्थ
*
मोती, माणिक, सुंदर वस्त्रों अथवा इत्र से मनुष्य की शोभा केवल अल्पकालिक होती है, कोई भी व्यक्ति अपने मधुर स्वभाव, उत्तम बुद्धि एवं शालीन गुणों से ही दीर्घकालिक विभूषित होता है।
*
साथ, शोध, और सच.
व्यक्ति, समाज, हवा, भ्रान्ति पंच और परमेश्वर
स्वयं, साथ, सुकर्म ,सोच , शोध, सच,और संकल्प
*
अनुभूति विचार शक्ति
@ डॉ.अनीता प्रशांत मधुप.
बड़ौदा.गुजरात
देर आए मगर सही आए
*
व्यक्ति और समाज के एकतरफ़े फैसले पर मत जाओ
अधिकतर आबादी भेड़ चाल और अफवाहों के धुंध की गिरफ़्त में जीती है
इसमें सच का अनुसंधान स्वयं तुम्हारे अंतर मन ज्ञान की
दीर्घ गामी जटिल प्रक्रिया है जिससे तुम्हें ही गुजरना है
*
अनुभूति विचार शोध शक्ति @ डॉ.राखी मधुप.
*
करमवा बैरी हो गई हमार
*
हर दुख पाप के ही कारण हो आवश्यक नहीं
कुछ दुख इंसान की हद से ज़्यादा अच्छाई की वज़ह होती है
विचार शक्ति @ जया अनीता गरिमा
*
नीयत से नियति.
सन्दर्भ विचार : साभार : माया
मेरा नाम जोकर : फोटो : राजकपूर : छाया
*
स्वर्ग यही नर्क यही
जीना यहाँ मरना यहाँ
*
अप्रिय ,कुपित, असंतुलित और शापित होकर यहाँ
जीवन जीते रहें तो उनके लिए नर्क यही है
सहिष्णु,शब्दशील, संतुलित व्यवहारिक, कर्मशील, प्रिय,
बन कर रहें तो उनके लिए स्वर्ग यही है
*
विचार शक्ति @ प्रिया जया अनीता
*
*
त्रिशक्ति. सम्पादकीय विचार धारा
*
बस तीन बातें
सम्पादकीय पृष्ठ : २.
त्रिशक्ति विचार धारा
*
समय : साथ और सच
*
कृष्ण : कर्म किये जा फल की चिंता मत कर इंसान
बुद्ध : मैं तो ठहर गया ...तुम कब रुकोगे, उंगली माल !
ईशा : हे ! ईश्वर इन्हें क्षमा कर देना ये स्वयं नहीं जानते कि ये क्या कर रहें हैं ?
*
२०. ०४. २०२६.
शक्ति.दिवस.मूलांक : २.
बैशाख : शुक्लपक्ष : तृतीया.
*
@ त्रिशक्ति
*
| शक्ति. मनीषा.निदेशिका. शिशु उद्द्यान आर्य रवि रंजन समाज सेवी समर्थित |
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सम्पादकीय : त्रिशक्ति : गोरी साँवरे सलोनी : गद्य संग्रह :आलेख : पृष्ठ : २ / २.
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नैनीताल डेस्क
संपादन
शक्ति.डॉ.रजनी मधुप शालिनी
*
स्मृति विशेष : शक्ति आलेख
शक्ति. शालिनी मधुप आस्था
*
राष्ट्रकवि : पुण्यतिथि : श्रद्धांजलि : २४.४.२६.
रामधारी सिंह दिनकर. राष्ट्रकवि.
*
*
जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है।
हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप विस्तार किया।
डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान कुपित होकर बोले-
'जंजीर बढ़ाकर साध मुझे, हां, हां दुर्योधन! बांध मुझे
अहंकार में डूबे व्यक्ति की बुद्धि नष्ट हो जाती है। कल स्मृति विशेष : शक्ति आलेख में शक्ति सम्पादिका शालिनी ने दिनकर को याद किया। महाभारत प्रसंग में कुरु राजसभा में जब अहंकारी दुर्योधन ने न केवल कृष्ण के शांति प्रस्ताव को ठुकराया वल्कि
कृष्ण को बंदी बनाने का असफल प्रयास भी किया। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित महाकाव्य ' रश्मिरथी ' के तृतीय सर्ग से यह पंक्तियाँ ली गई हैं। रचित महाकाव्य ' रश्मिरथी ' के तृतीय सर्ग ' कृष्ण की चेतावनी ' से हैं।
यह कविता तब की है जब कृष्ण दुर्योधन को समझाने जाते हैं, लेकिन दुर्योधन उन्हें बंदी बनाने का प्रयास करता है। दूत बनकर आए कृष्ण पांडवों की ओर से शांतिदूत बनकर कौरवों की सभा में गए थे। दुर्योधन का अहंकार देखिए कि दुर्योधन ने संधि के बजाय कृष्ण को बंदी बनाने का दुस्साहस किया।
इस पर भगवान कृष्ण ने अपना विराट और रौद्र रूप दिखाया, अनुसार "कृष्ण की चेतावनी" के रूप में जाना जाता है। तब माधव ने समस्त कुरु राज सभा में अपना विराट रूप दिखलाया यह पंक्तियाँ हिंदी साहित्य की सबसे प्रसिद्ध और ओजस्वी पंक्तियों में से एक हैं, जो यह दर्शाती हैं कि अहंकार में डूबे व्यक्ति की बुद्धि नष्ट हो जाती है।
रे, रोक युधिष्ठिर को न यहाँ, जाने दे उनको स्वर्ग धीर,
पर, फिरा हमें गाण्डीव-गदा, लौटा दे अर्जुन-भीम वीर।
वैराग्य का विरोध : कवि काव्यांश के माध्यम से यह कह रहा है कि युधिष्ठिर को अब वैराग्य लेने या स्वर्ग जाने से रोकना नहीं चाहिए। वे धर्म और धैर्य के प्रतिमूर्ति हैं, इसलिए उन्हें उनकी आत्मिक शांति स्वर्ग की ओर जाने देना चाहिए।
अर्जुन -भीम की वापसी : इसके साथ ही, कवि अर्जुन और भीम जैसे वीर योद्धाओं को फिर से युद्ध के लिए प्रेरित करने की बात करता है। वे चाहते हैं कि युद्ध में गिरे गांडीव अर्जुन का धनुष और गदा भीम का अस्त्र को वे फिर से उठा लें और युद्ध की विभीषिका को समाप्त कर शांति की स्थापना करें।
ऐतिहासिक तात्कालिक संदर्भ : जब दिनकर जी ने यह लिखा, तब वे युधिष्ठिर के ' पलायनवाद ' समस्या से भागना के बजाय अर्जुन के ' कर्मठता ' और वीरता के मार्ग को चुनना चाहते थे।
मुख्य संदेश: यह पंक्तियाँ कायरता या वैराग्य के बजाय, संकट के समय में कर्म और वीरता के मार्ग को अपनाने का आह्वान करती हैं।
जब तक मनुज-मनुज का यह,सुख-भाग नहीं सम होगा,
शमित न होगा कोलाहल, संघर्ष नहीं कम होगा।
अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस : हिंदी साहित्य के आकाश में अपनी लेखनी से अंगारे भरने वाले, 'राष्ट्रकवि' रामधारी सिंह 'दिनकर' जी की पुण्यतिथि पर ' शालिनी साहित्य सृजन संस्था ' उन्हें सादर नमन और विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करती है..कुछेक और कालजयी पंक्तियों को स्मृत करती है।
दिनकर जी केवल एक कवि नहीं, बल्कि भारतीय चेतना के स्वर थे। उनकी कविताओं में जहाँ एक ओर ' रश्मिरथी ' जैसा ओज और पुरुषार्थ है, वहीं दूसरी ओर ' उर्वशी ' जैसी कोमलता और अध्यात्म भी..! उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से सदैव समाज को जगाने और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस दिया..!
क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो,
उसका क्या जो दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो।
शौर्य और क्षमा शीलता : आज के दौर में भी दिनकर जी के शब्द हमें यह सीख देते हैं कि शांति और शक्ति का संतुलन ही मानवता का सच्चा पथ है। उनकी स्मृतियाँ हमारी लेखनी और विचारों में सदैव जीवित रहेंगी। हम सभी की तरफ़ से भावभीनी श्रद्धांजलि..
*
स्तंभ संपादन : सज्जा : शक्ति. सीमा रंजीता अनुभूति
अति सूक्षम लघु कथा : साधु और शैतान
डॉ.मधुप
*
एक बस्ती। कुछेक लोग। वहाँ व्यापारी, कृषक, पड़ोस में एक साधु और शैतान भी रहते थे।
गर्मियाँ के दिन थे। तापमान बढ़ रहा था । भिन्न भिन्न प्रकार के लोग। अलग अलग विचारधाराएं।
परिन्दें प्यासे न रह जाए यह सोच कर साधु ने घर की चहारदीवारी पर वर्तन में शीतल जल भर कर
रख दिया जिससे परिंदे की प्यास बुझ सके।
शैतान यह सब कुछ देख रहा था। उसके दिमाग में एक अलग योजना चल रही थी।
अचानक कुछेक पल के बाद एक गोली की मध्यम आवाज़ आई। शायद किसी ने एयर गन छोड़ा था।
साधु शीघ्र ही बाहर निकला। धरा पर एक कबूतर घायल पड़ा गिरा था।
हाथ में एयर गन लिए शैतान ने साधु की तरफ़ देखते हुए कहा , ' मेरा क्या सटीक निशाना लगा है ..है ना ...?
संपादन सज्जा : शक्ति.रेनू प्रिया अनुभुति
कहाँ सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग :
शक्ति.आलेख
आखिर सुदामा ने चोरी छिपे वो चने क्यों खाए ?
ये न रुक्मिणी जाने न सत्यभामा
यह तो केवल माधव ही जाने
*
*
शक्ति.शालिनी संदीप.
शालिनी साहित्य सृजन जय श्री कृष्णसह : शक्ति मंजिता मधुप
कथा एक मित्र की.. सुदामा के साथ बातें करते हुए कब कृष्ण उनके पाँव दबाने लगे यह सुदामा को पता ही नही चला। सुदामा सो चुके थे किंतु कृष्ण अपनी ही सोंच में मग्न उनके पाँव दबाते हुए बचपन की बातें करते चले जा रहे थे, कि तभी रुक्मिणी ने उनके कंधे पर हाथ रखा..!
कृष्ण ने चौंक कर पहले उन्हे देखा और फिर सुदामा को, फिर उनका आशय समझ कर वहाँ से उठ कर अपने कक्ष में चले आये।
कृष्ण की ऐसी मग्न अवस्था देखकर रुक्मिणी ने पूछा, " स्वामी ! आज आपका व्यवहार बहुत ही विचित्र प्रतीत हो रहा है. ! ....आप, जो इस संसार के बड़े से बड़े सम्राट के द्वारका आने पर उनसे तनिक भी प्रभावित नही होते हैं, वे अपने मित्र के आगमन की सूचना पर इतने भावविह्वल हो गए कि भोजन छोड़कर नंगे पाँव उन्हे लेने के लिए भागते चले गए..!
' .......आप, जिनको कोई भी दुख, कष्ट या चुनौती कभी रुला नही पाई, यहाँ तक कि जो गोकुल छोड़ते समय मैया यशोदा के अश्रु देखकर भी नही रोये, वे अपने मित्र के जीर्ण-शीर्ण, घावों से भरे पाँवों को देखकर इतने भावुक हो गए कि अपने अश्रुओं से ही उनके पाँवों को धो दिया..!
' ........कूटनीति, राजनीति और ज्ञान के शिखर पुरुष आप, अपने मित्र को देखकर इतने भावुक हो गए कि बिना कुछ भी विचार किये उन्हे समस्त त्रिलोक की संपदा एवं समृद्धि देने जा रहे थे..!
कृष्ण ने अपनी उसी आमोदित अवस्था में कहा, ' वह मेरे बालपन का मित्र है रुक्मिणी।"
रुक्मिणी : ' ..परंतु उन्होंने तो बचपन में आपसे छुपाकर वो चने भी खाये थे जो गुरुमाता ने उन्हे आपसे बाँटकर खाने को कहे थे..अब ऐसे मित्र के लिए इतनी भावुकता क्यों..?"
सत्यभामा ने भी अपनी जिज्ञासा रखी..!
आखिर सुदामा ने चोरी छिपे वो चने क्यों खाए ? कृष्ण मुस्कुराये, " सुदामा ने तो वह कार्य किया है सत्यभामा कि समस्त सृष्टि को उसका आभार मानना चाहिए..! वो चने उसने इसलिए नही खाये थे कि उसे भूख लगी थी, बल्कि इसलिए खाये थे क्योंकि वो नही चाहता था कि उसका मित्र कृष्ण दरिद्रता देखे..!
'......उसे ज्ञात था कि वे चने आश्रम में चोर छोड़कर गए थे, और उसे यह भी ज्ञात था कि उन चोरों ने वे चने एक ब्राह्मणी के गृह से चुराए थे। उसे यह भी ज्ञात था कि उस ब्राह्मणी ने यह श्राप दिया था कि जो भी उन चनों को खायेगा, वह जीवन पर्यंत दरिद्र ही रहेगा..!
'......सुदामा ने वे चने इसलिए मुझसे छुपा कर खाये ताकि मैं सुखी रहूँ। वो मुझे ईश्वर का कोई अंश समझता था, तो उसने वे चने इसलिए खाये क्योंकि उसे लगा कि यदि ईश्वर ही दरिद्र हो जायेगा तो संपूर्ण सृष्टि ही दरिद्र हो जायेगी..! सुदामा ने संपूर्ण सृष्टि के कल्याण के लिए स्वय का दरिद्र होना स्वीकार किया..!'......इतना बड़ा त्याग ! ' , रुक्मिणी के मुख से स्वतः ही निकला।
' .......मेरा मित्र ब्राह्मण है रुक्मिणी, और ब्राह्मण ज्ञानी और त्यागी ही होते हैं..! उनमें जनकल्याण की भावना कूट कूट कर भरी होती है..! इक्का दुक्का अपवादों को यदि छोड़ दिया जाए तो ब्राह्मण ऐसे ही होते हैं..! अब तुम ही बताओ ऐसे मित्र के लिए हृदय में प्रेम नही तो फिर क्या उत्पन्न होगा प्रिये ?
ये न रुक्मिणी जाने न सत्यभामा ' ........गोकुल छोड़ते हुए मैं इसलिए नही रोया क्योंकि यदि मैं रोता..तो मेरी मैया तो प्राण ही त्याग देती..! परंतु मेरे मित्र के ऐसे पाँव देखकर, उनके जीर्ण-शीर्ण हालत व ऐसे घावों को देखकर मेरा हृदय भर आया रुक्मिणी.. उसके पाँवों में ऐसे घाव और जीवन में उसकी ऐसी दशा मात्र इसलिए हुई क्योंकि वह अपने इस मित्र का भला चाहता था..!
'......पता है रुक्मिणी, परिवार को छोड़कर किसी और ने कभी इस कृष्ण का इतना भला नही चाहा..! लोग तो मुझसे उनका भला करने की अपेक्षा रखते हैं, ....किन्तु सुदामा जैसे मित्र ही होते हैं जो अपने मित्र के सुख के लिए स्वेच्छा से दरिद्रता एवं कष्ट का आवरण ओढ़ लेते हैं..!
यह केवल माधव ही जाने : ऐसे मित्र दुर्लभ होते हैं और न जाने किन पुण्यों के फलस्वरूप मिलते हैं। अब ऐसे मित्र को यदि त्रिलोक की समस्त संपदा भी दे दी जाए तो भी कम ही होगा।"
कृष्ण अपने भावुकता से भर्राये हुए स्वर में बोले..! इधर कक्ष में समस्त रानियों के नेत्र सजल थे और उधर कक्ष के बाहर खड़े सुदामा के नेत्रों से गंगा यमुना बह रही थीं..
*
स्तंभ संपादन : सज्जा : चित्र नेट से साभार
शक्ति. डॉ. रजनी प्रीति अनुभूति
*
शक्ति.आलेख : कहानी ३.
*
पुरानी घड़ी.
*
शक्ति. रेनू शब्दमुखर
जयपुर
लेखिका.कवयित्री.प्रधान सम्पादिका.
बरामदे की दीवार पर टंगी वो पुरानी घड़ी न जाने कब से चलना भूल चुकी थी, पर उसकी टिक-टिक अब भी किसी के कानों में गूंजती थी।
अदिति ने वर्षों बाद अपने पैतृक घर का दरवाजा खोला तो भीतर एक अजीब सी खामोशी थी। मकान अब वीरान सा हो चला था, जैसे हर दीवार पर किसी की चुप्पी चिपकी हो। फर्श पर धूल की परते, टेबल पर रखी चाय की पड़ी-पड़ी दागदार प्याली और उस कोने में रखी वही पुरानी कुर्सी... सब जस का तस था, जैसे बस अभी-अभी कोई वहां से उठा हो।
उसने अपनी आंखें बंद की, और सबकुछ फिर से जीवंत हो उठा-पिता की ठहाकेदार हंसी, मां की चाय की आवाज, और वो घड़ी, जो हर आधे घंटे में टनटनाती थी। घड़ी के हर टन-टन में पिता की पुकार होती-'अदिति, पढ़ाई का वक्त हो गया ! "
पिता एक सरकारी क्लर्क थे। सीमित वेतन में अनंत इच्छाएं पालने वाले उन जैसे लोग आज किताबों में मिलते हैं। पर अदिति के लिए वे हमेशा एक आदर्श थे। सर्दी की कंपकंपाती रातों में जब यो रजाई में सिकुड़ कर सोती. पित्र उसके सिरहाने बैठकर दीपक की मद्धम रोशनी में अखबार के पुराने पन्नों पर गणित के सवाल हल कराते। एक बार अदिति ने थककर कह दिय, पापा, आप इतना क्यों करते हैं मेरे लिए?"
पिता ने बस मुस्कुराकर कहा था, ' ....क्योंकि तू मेरी घड़ी की सुई है, बेटा। ....तू रुकी, तो सब रुक जाएगा। '
उसके जीवन में पिता की भूमिका किसी रीढ़ से कम न थी। मां तो कभी-कभी डांट भी देतीं, पर पापा. उन्होंने तो कभी ऊंची आवाज में कुछ कहा ही नहीं। बस आंखों से समझा देते थे कि क्या सही है, क्या नहीं। और सबसे बड़ी बात उन्होंने अदिति को बेटी नहीं, बेटे की तरह पाला, कभी कोई फर्क नहीं किया। आज जब यो खुद एक सफल पत्रकार है. विदेशों में सेमिनार लेती है, टीवी पर बहस करती है, तो कहीं अंदर से एक आवाज हमेशा कहती है- 'तेरा हर शब्द मेरी घड़ी की सुई है।
पर इस बार फादर्स डे पर वो कुछ टूट गई। पापा अब नहीं रहे। बस उनकी निश्खनी है-वो पुरानी पंड़ी, जो अब चलती नहीं, पर अदिति को हर बार समय का मतलब समझा देती है।
उसने उस पड़ी को दीवार से उतारा। बड़ो एहतियात से उसे अपनी गोद में रखा, जैसे पिता की थक चुकी हथेलियां हों। घड़ी के पीछे एक पुराना पर्चा चिपका मिला, जिस पर कांपते हाथों से लिखा था- 'अगर कभी वक्त के थपेड़े तुझे थका दें, तो ये घड़ी देख लेना में यहीं हूं, हर सुई में तेरा साथ देने के लिए।
अदिति उस दिन फूट-फूटकर रोई। पहली बार उसे लगा, किसी ने उसे इस तरह टूटकर चाहा था।
अब वो पड़ी उसके नए अपार्टमेंट की दीवार पर है। अदिति ने उसे मरम्मत करवा कर फिर से चालू करवा दिया है। हर बार जब वो टनटनाती है, अदिति मुस्कुरा देते हैं।
कभी-कभी रिश्ते शब्दों से नहीं, टिक-टिक से
*
जागो इण्डिया जागो में प्रकाशित
*
स्तंभ संपादन : शक्ति. डॉ.रजनी प्रीति रीता
सज्जा : शक्ति.मंजिता सीमा अनुभूति
-----------
सम्पादकीय :त्रिशक्ति : गोरी साँवरे सलोनी :पद्य संग्रह : आलेख : पृष्ठ : २ / ३.
-----------
*
ढाई आखर प्रेम का : प्रेम के सात रंग
*
संपादन
शक्ति. रेनू डॉ.आर के. सीमा
*
गोरी साँवरे सलोनी : पद्य संग्रह :अनुभाग
*
शक्तिअनुभाग.
*
गोरी साँवरे सलोनी : पद्य संग्रह : अनुभाग
*
शक्तिअनुभाग.
*
शक्ति. शालिनी
कवयित्री, लेखिका
प्रधान सम्पादिका.एम एस मीडिया
*
पायो जी मैंने प्रेम रतन धन पायो
*
अनुभाग
स्थिरप्रज्ञ.
यह मुश्किल जरूर था पर नामुमकिन नहीं था,
तुम्हें छोड़ने का तय कोई दिन नहीं था।
आख़िर फैसला दिमाग़ ने ले ही लिया,
जबकि दिल का रहना तुम बिन पलछिन नहीं था।
वह मोह का धागा जो मेरी रूह ने बुना था,
पर नियति ने मेरी, संघर्ष का पथ चुना था।
मौन की ओट में सिसकती रही मेरी चाहतें,
पर विवेक ने सच को सलीके से सुना था।
अश्रु आँखों की दहलीज पर आकर रुके हैं,
आज जज्बात भी ज़मीर के आगे झुके हैं।
ख्वाहिशों के समंदर में उठती थी लहरें,
पर उसूलों के पर्वत कहाँ कभी रुके हैं..?
तुम यादों के झरोखे में महकती रहोगी,
सपनों की गलियों में बहकती रहोगी।
पर यथार्थ की धूप ने झुलसा दी छाँव,
तुम दूर क्षितिज पर अब चमकती रहोगी।।
एक दर्द सा है, जो बन गया अब गहना,
सिखा दिया वक्त ने भी हमें खामोश रहना।
तुमसे बिछड़ना..खुद से बिछड़ना ही सही,
पर अनिवार्य था इस अग्नि-पथ पर आगे बढ़ना।
वह जो मोह की डोर थी, अब तनिक ढीली है,
दर्द की स्याही भी, अब पड़ गई नीली है।
न कोई शिकवा बचा, न कोई मलाल रहा,
*
भाविकाएँ : संदर्भित : माया शक्ति : अनुभूति : छाया
*
अनुभाग
जिंदगी कैसी ये पहेली है
*
जिंदगी अब स्वयं में ही एक उत्तर और पहेली है।
न किसी के आने की अब वैसी खुशी होगी,
न किसी के जाने से आँखों में नमी होगी।
हृदय के उस शून्य को मैंने पा लिया है,
जहाँ न तुम्हारी अधिकता और न कमी होगी।
अब न राग खींचता है, न द्वेष डराता है,
अकेलापन ही अब मुझे रास आता है।
पत्थर की मूरत बन अडिग खड़े हैं हम,
जहाँ संसार का कोलाहल भी थम जाता है।
तुम पराए हुए तो क्या, मैं ' स्वयं ' के करीब हूँ,
अब न मैं राजा हूँ, ना ही मैं बदनसीब हूँ।
जो मिला उसे प्रसाद कहा, जो गया उसे अलविदा,
अपनी ही चेतना में अब मैं बेख़ौफ़ हबीब हूँ।
यही वह बिंदु है, जहाँ द्वंद्व का अंत है,
पतझड़ भी अब मेरे भीतर का वसंत है।
बिछड़ कर भी जो न टूटे, वही असल है,
स्थितप्रज्ञ वही, जिसका मन ही भगवंत है।
स्थितप्रज्ञ वही, जिसका मन ही भगवंत है।
*
शक्ति. रेनू शब्दमुखर.
जयपुर.
कवयित्री, लेखिका
शक्ति प्रधान सम्पादिका एम एस मीडिया
*
ढाई आखर प्रेम का
*
*
संदर्भित : छाया : शक्ति.रेनू
*
भाविकाएँ
*
शेफालिका के फूल सी
तुममें खिलती रहूंगी.
*
प्रेम का अंकुरण
सुनो !
मेरे बंजर मन पर
तुमने कुछ बीज प्रेम के
अनजाने ही रोप दिए थे,
और संवेदना जल से
उसे सिक्त करते रहे,
आज मैंने देखा
उस सूखे बंजर मन में
अब प्रेम का अंकुरण हो,
छोटे-छोटे नव पल्लव
विकसित होने लगे है.
*
*
और उन पर प्यार की कलियाँ
पुष्पित हो महकने भी लगी है,
सुनो बस इतना करना
इस अंकुरित पल्लव को
स्नेहसिक्त कर महके हुए पुष्पों में,
नव ऊर्जा और नव ऊष्मा
की धूप लगा के
विश्वास की खाद से
सृजित आभा की सुखानुभूति से,
प्रेम संसार को आलोकित कर
अंकुरण के अस्तित्व को गति देना
और मैं कविता बनकर
तुम्हारे अंतस को
प्रेम से प्लावित कर
सरस शेफालिका के फूल सी
तुममें खिलती रहूंगी.
*
संपादन : सज्जा :
शक्ति. डॉ रजनी शालिनी अनुभूति
| * * * शक्ति अनुभाग शक्ति सीमा * * ग़ज़ल डॉ.आर के दुबे * * शक्ति अनुभाग : सीमा * गोरी साँवरे सलोनी :पद्य संग्रह : * ग़ज़ल * बन के बरपी कहर यूं लहर बोलियां शबनम : इंद्रप्रस्थ : छाया * बेखबर बेबहर बेसबर बोलियां बात ने बात की बेअसर बोलियां. रंगी थी बोलियां घाव के रंग में दिल के आंगन में बरसी पहर गोलियां. जलती जो आग थी चुप्पी -चादर तले बन के बरपी कहर यूं लहर बोलियां. नजरों के नज्र थे सब इशारें मगर दी उड़ा यूं हवा में कहर बोलियां. भीगते हम रहे यादों के आब में मेरी किस्मत ने की बेअसर गोलियां. * डॉ.आर के दुबे. लेखक कवि गीतकार. * शब्दार्थ : नज्र : भेंट. आब : चमक दमक * बंद आँखों में तब रंगीन ख़्वाब सजायेंगे * डॉ.श्याम किशोर मॉडर्न एक्सरे : अल्ट्रा साउंड : सी टी स्कैन : बिहारशरीफ समर्थित |
----------
राधिकाकृष्णरुक्मिणी : शक्ति : फोटो दीर्घा : पृष्ठ :७.
-----------
संपादन.
शक्ति.डॉ.रजनी रितु बीना जोशी
नैनीताल डेस्क.
*
डॉ.श्याम किशोर मॉडर्न एक्सरे : अल्ट्रा साउंड : सी टी स्कैन : बिहारशरीफ समर्थित |
----------
राधिकाकृष्णरुक्मिणी : शक्ति : फोटो दीर्घा : पृष्ठ :७.
-----------
संपादन.
शक्ति.डॉ.रजनी रितु बीना जोशी
नैनीताल डेस्क
*
-----------
राधिकाकृष्णरुक्मिणी : समसामयिकी.समाचार : दृश्यम : दिन विशेष : पृष्ठ : ८.
----------
समसामयिकी.समाचार : दृश्यम : पृष्ठ :
*
संपादन
शक्ति. शालिनी डॉ.रजनी माधवी
*
-----------
समसामयिकी.समाचार : दृश्यम : पृष्ठ : ८.
---------
दृश्यम : पौंड्रिक : मैं ही वासुदेव हूँ
*
कार्टून कोना : मधुप :
आज कल : राज ' नीति
*
कल ' सम्मान ' आज ' सम्मन ' ?
*
क्या कह रहें है..? ... कल ' सम्मान ' दिया था
आज इडी का ' सम्मन ' भिजवायेंगे
*
*
डॉ०बी०आर०अंबेडकर जयंती विशेष
महिलाओं की प्रगति ही समाज की प्रगति है.
शालिनी साहित्य सृजन.
डॉ०बी०आर०अंबेडकर, ' मैं किसी समाज की प्रगति का माप उस समाज की महिलाओं द्वारा की गई प्रगति से करता हूँ। ' आज डॉ०बी०आर०अंबेडकर जयंती है
आज हम जिस स्वतंत्र और सशक्त भारत की कल्पना करते हैं, उसकी नींव में बाबासाहेब के क्रांतिकारी विचार हैं। उन्होंने केवल संविधान ही नहीं लिखा, बल्कि करोड़ों महिलाओं को ' गुलामी की बेड़ियों ' से आजादी दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया।
बाबासाहेब ने महिलाओं को संपत्ति में अधिकार, तलाक का हक और पितृसत्तात्मक बंधनों से मुक्ति दिलाने के लिए अपनी कैबिनेट सीट तक दांव पर लगा दी थी। उन्होंने सुनिश्चित किया कि काम के लिए पुरुषों और महिलाओं को बराबर वेतन मिले।
आज कामकाजी महिलाओं को जो मातृत्व अवकाश मिलता है, उसकी शुरुआत बाबासाहेब की ही देन है। लिंग की परवाह किए बिना हर महिला को शिक्षा और वोट देने का समान अधिकार दिलाकर उन्होंने लोकतंत्र को समावेशी बनाया। बाबासाहेब के लिए ' स्त्री अधिकार ' कोई उपकार नहीं, बल्कि मानवाधिकार थे।
आइए, उनके विचारों को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपने आचरण और समाज की सोच में उतारें..नारी शक्ति को नमन.
महावीर : जयंती : विशेष : लघु वृत्त चित्र : पावापुरी
धारावाहिक : ३
जैन धर्म के प्रतिपादित सिद्धांत
निर्माण : संपादन : आवाज़ : डॉ. मधुप. *
----------
राधिकाकृष्णरुक्मिणी : दृश्यम : पृष्ठ : ८ / २
-----------
हिमाचल डेस्क.
संपादन.
*
सांग्स : लोकेशन : किन्नौर : लौहल स्पीति
*
राधिका कृष्ण भक्ति : इस्कॉन : मुम्बई : दृश्यम
*
दृश्यम : भक्ति : प्रस्तुति : शक्ति प्रिया मधुप सेजल *
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*
दिन विशेष : अक्षय तृतीया : धारावाहिक
धारावाहिक : दृश्यम : १ : लघु वृत्त चित्र.
*
लेखन : आवाज संपादन : निर्माण : डॉ.सुनीता मधुप
*
अक्षय तृतीया : बद्री विशाल के खुले कपाट
धारावाहिक : दृश्यम : लघु वृत्त चित्र : २
*
प्रस्तुति :शक्ति डॉ राखी सीमा रंजिता अनु
लेखन : आवाज संपादन : निर्माण : डॉ. मधुपदिन विशेष : हनुमान जयंती : पृष्ठ :
----------
संपादन.
तुलसी दास
*
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई
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गीता ज्ञान : मुझे भी कुछ कहना है : आभार : पृष्ठ :९.
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शक्ति
संपादन
शक्ति. डॉ.सुनीता आर के जया सोलंकी
मेवाड़ डेस्क
⭐
अक्षय तृतीया की अनंत शिव शक्ति शुभकामनाओं के साथ
*
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मुझे भी कुछ कहना है : पृष्ठ :९.
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संपादन
शक्ति. डॉ.अनु मधुप रेनू.
*
धरम : करम : जीवन
नीति : नीयत और कृष्ण
मुरलीधर बांसुरी बजाते हुए
*
मुझे भी कुछ कहना है :
*
साभार : राजकपूर : मेरा नाम जोकर
साथ : समय : सच : जीवन का फ़लसफ़ा
शॉर्ट रील जाने कहाँ गए वो दिन कहते थे तेरी राह में
शक्ति. प्रिया मधुप अनुभूति प्रस्तुति
*
रामायण : बनाम : महाभारत :
रामायण : भातृ, पितृ, मातृ प्रेम, सहयोग त्याग । रामत्व और रावणत्व के मध्य संघर्ष की सुखद कहानी बनी
महाभारत : अपने भाई के छल प्रपंच,स्वार्थ, स्वजनों के धोखा के निमित्त अपने लिए अपनों के द्वारा, अपनों के विरुद्ध ही लड़े गये युद्ध की दुःखद गाथा है यह
*
शोध विचार गोविन्द शक्ति @ प्रिया डॉ.मधुप.
*
आज के : स्वार्थ ,छल प्रपंच, विश्वासघात, झूठ सच, षड्यंत्र, बहुरूपिये संसार से बचने
के लिए प्रभु नटवर,गिरधर, छलिया, रणछोड़,मुरली धर, माधव ही मेरे लिए एकमात्र विकल्प है
*
@ डॉ मधुप
*
संसार है एक नदियाँ सुख दुःख दो किनारे है
न जाने कहाँ जाए हम बहते धारे है
*
*
है कौन वो दुनियाँ में न पाप किया जिसने बिन उलझे काँटों से है फूल चुने कि सने
*
साभार
फिल्म रफ़्तार : १९७५
अभिनीत : मौसमी चटर्जी. मदन पुरी.
गीतकार : अभिलाष.संगीतकार सोनिक ओमी. गायक : मुकेश.
*
तराने : फ़िल्म : मेरे अपने : अभिनीत : विनोद खन्ना
*
कोई होता जिसको अपना हम अपना कह लेते यारों.
पास नहीं तो दूर ही होता लेकिन कोई मेरा अपना
कवि : गीतकार : गुलज़ार.
*
शख्सियतें : विनोद खन्ना :
अभिनेता : सांसद : मंत्री :
दृश्यम :धारावाहिक : १
*
नैनो में दर्पण दर्पण में कोई
देखूं जिसे सुबह शाम
*
*
फिल्म अभिनेता : विनोद खन्ना : धारावाहिक : लेखन : संपादन : आवाज़ : निर्माण : डॉ मधुप
*
*
फिल्म अभिनेता : विनोद खन्ना : धारावाहिक : २.
*
प्रिय प्राणेश्वरी : हृदयेश्वरी : प्रेम का हम श्री गणेश करें
लेखन : संपादन : आवाज़ : निर्माण : डॉ. मधुप
*
फिल्म अभिनेता : विनोद खन्ना : धारावाहिक : ३
*
मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाये
*
लेखन : संपादन : आवाज़ : निर्माण : डॉ. मधुप
*
फिल्म अभिनेता : विनोद खन्ना : धारावाहिक : ४.
*
कांच की चूड़ियां भी मैंने खनकाई
अपनी जुल्फें भी मैंने तो बिखराई
*
लेखन : संपादन : आवाज़ : निर्माण : डॉ. मधुप
*
फिल्म अभिनेता : विनोद खन्ना : धारावाहिक :५ .
अंतिम क़िस्त
कोई होता जिसको अपना हम अपना कह लेते यारों.
पास नहीं तो दूर ही होता लेकिन कोई मेरा अपना.
*
लेखन : संपादन : आवाज़ : निर्माण : डॉ. मधुप
*
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आभार : ढाई आखर प्रेम का : पृष्ठ :९ /३
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संपादन
शक्ति. मीना स्मिता शबनम
मुक्तेश्वर डेस्क नैनीताल
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आभार ढाई आखर प्रेम का : पृष्ठ :९ / ३
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संपादन
शक्ति.मीना स्मिता शबनम
मुक्तेश्वर डेस्क.नैनीताल
शॉर्ट रील : तेरे मेरे होठों पे मीठे मीठे गीत
*
निर्माण अभिनय : शक्ति स्मिता : दृश्यम सम्पादिका सांग्स : लोकेशन : किन्नौर : लौहल स्पीति
MS Media Powered
English Section
Times Media Powered
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Times Media Powered
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Shakti Editorial. Prose : English Page : 3
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Editor.
Shakti.Priya Isha Seema.
Darjeeling Desk.
Lord Krishna bestowed the Akshaya Patra to Draupadi.
Akshaya Tritiya : never-ending. Beliefs
write Up : Dr.Sunita Madhup Priya.
*
Akshaya Tritiya : Never Ending Beliefs : Akshaya Tritiya, celebrated on the third bright day of Vaisakha , is a highly auspicious Hindu and Jain festival marking eternal prosperity.
It is celebrated by purchasing gold to bring lasting wealth, performing Lakshmi-Vishnu puja, donating to the needy, and starting new ventures.
The day symbolizes 'never-diminishing ' good fortune.
Significantly Known as Akha Teej, it is believed that any good deed, charity, or investment made on this day multiplies, as ' Akshaya ' means never-ending.
Rituals & Puja : Devotees wake up early, bathe in holy rivers, and worship Lord Vishnu and Goddess Lakshmi to seek blessings.
Homes are cleaned, and special, satvik meals like Puran Poli and Aamras are prepared and offered to the deities.
Tradition to buy gold : Gold and Investments :
It is a widespread tradition to buy gold, silver, or jewelry, believed to bring prosperity. It is also considered a prime day for starting new businesses or buying property.
Charity (Daana) : People donate food, clothes, and water to the underprivileged, as charitable acts done on this day are considered highly beneficial.
Regional Variations : Odisha :
Farmers start sowing seeds in their fields and worship Goddess Lakshmi.
Maharashtra : Women celebrate by exchanging turmeric and vermillion haldi-kumkum, praying for the longevity of their husbands.
Jain Tradition : The day commemorates Tirthankara Rishabhanatha ending his 400-day fast by consuming sugarcane juice, known as Varshitapa.
Lord Krishna bestowed the Akshaya Patra a bowl that never runs out of food upon Draupadi. It is believed that on this day,
Sage Vyasa started writing the Mahabharata.
Sudama visited Lord Krishna, receiving unexpected wealth.
*
Drishyam : Akshaya Patra : Visuals
*
*
Column Editing : Shakti Dr. Anuradha Isha.Ankita
Decorative : Shakti. Manjita Shivani Seema
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Visuals News : News : Editorial Page : 7
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Shakti Priya.Seema Ranjita.
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Devotees floating deeps in Saryu Ayodhya : collage Dr.Rakhi Sunita Madhup |
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News : Editorial : English : Page : 8.
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News : Day Special.
Editor.
Shakti Ankita Seema Ranjita .
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22.04.26.
Black Day : Pahalgam Attack.
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Jammu and Kashmir.
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19.4.26.
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Akshay Tritiya.
Briefing : Shakti Shalini Tanu* Suhas
Dwarika Desk.
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photo : Shakti Laxami. Goddess of
Wealth and Goodness,
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is a divine reminder that prosperity is not only in gold
and riches but in love we give, the kindness we share ,and the good deeds we do,
May this day inspire you to start a new with devotion in your heart and purpose in your soul
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15.04.26.
World Art Day. Brief News
Shakti Anubhuti Manjita Shivani
Shimla Desk.
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a sketch of Viceroy House : Shimla. Shakti Anubhuti.*
Shimla / CR / Anubhuti .Archana. Our Shakti Art Editorial team observing World Art Day is celebrated annually on April 15th to promote global creativity, cultural diversity, and awareness of artistic freedom, honoring the birth anniversary of Leonardo da Vinci. Recognized by UNESCO in 2019, the 2026 celebrations emphasize art's power to strengthen cultural connections and foster social innovation
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8.4.26.
Bankim Chandra Chatterjee,
the renowned Indian novelist, poet,
and composer of ' Vande Mataram ', National Song.
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being Remembered on
26 June 1838 - April 8, 1894,
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Vande Matram ( 1875.Written.)
Published in Novel: 1882 (Anandamath).
First Sung: 1896 (Calcutta Session of INC).
Adopted as National Song: January 24, 1950.
The song, written in Sanskrit and Bengali script, served as a powerful anthem during India's freedom struggle.
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Courtesy Visual News : Republic. Arnav Goswami
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Edited Mode.
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National Song Vande Matram Getting Primacy.
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The Goddess Laxami : Durga : Saraswati brought back
Sung in the Six Stanza : Original Form of the Song
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Day Special.
Editor
Shakti Dr.Anita Seema Ankita
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03.04.26.
Good Friday.
02.04.26.
Hanuman Jayanti.
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Our Unitedly Wishes for you all
for Hanuman Jayanti
from ' Hum ' Dev Shakti Family
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Shakti Art Gallery : Radhika : Krishna : Rukmini : English : Page 8.
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Editor.
Shakti.Anubhuti Manjita Shivani.
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You Said it : Page : 9.
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Editor.
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Kinnaur : Sangla : Updates
Shakti. Dr.Bhwana Manju Archana.
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Narkanda : 2700.Meter.About.Shimla.
Manali : 2050. Meter.About.Kullu.
Mandi : 2495. Meter.About.Mandi
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Reckong Peo : 2290. Meter.About. Kinnaur.
Kalpa : 2758.Meter.About. Kinnaur.
Kinnara Kailash : 6050.Meter.Kinnaur.
Sangla : 2621. Meter.About. Kinnaur.
Chitkul : 3450.Meter.About. Kinnaur.
Highest Krishna Temple : 3895.Meter.Kinnaur.
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a Courtesy short reel : Spiti.
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Lahaul Spiti. : Updates
Kunzum Pass : About 4550 Meter.Lahaul Spiti.
Chandra Tal : 4300.Meter.Lahaul Spiti.
Tabo : 3280.Meter.About.Lahaul Spiti.
Kaja : 3650.Meter.About. Lahaul Spiti.
Kelong : 3440.Meter.About. Lahaul Spiti.
Chimchim : Highest Bridge : 4150.Meter.About.Lahaul Spiti.
Kibber : 4270.Meter.About.Lahaul Spiti.
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World's Highest Post Office Hikkim : 4440.Meter.About.Lahaul Spiti.
Kaumik Village : 4587.Meter.About.Lahaul Spiti.
Key Monastery : 4166..Meter.About.Lahaul Spiti.
Dhankar Monastery : 3894.Meter.About.Lahaul Spiti.
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Seen Somewhere : Cartoon Corner
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Cartoonist : Dr.Madhup.
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Day Special.
I st of April.2026.
I st of April.2026.
April Fool.
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Getting confused ... is she lovingly blinking me ..
or ...making me April Fool only.
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