Radhika : Krishna : Rukmini : Darshan : 9.Dainik.SV3
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कृण्वन्तो विश्वमार्यम.
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Radhika Krishna Rukmini.
Darshan.9.Dainik.
Dainik.Volume : 2. Series : 3.
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आवरण पृष्ठ. दैनिक.
राधिकाकृष्णरुक्मिणी दर्शन : ९.
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आवरण पृष्ठ. पत्रिका .
राधिकाकृष्णरुक्मिणी दर्शन : ९.
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पत्रिका / दैनिक अनुभाग..
तिथि : २६ .३.२०२६.
विक्रम संवत : २०८३. शक संवत :१९४८.
विक्रम संवत : २०८३. शक संवत :१९४८.
दिन :गुरुवार.
महाशक्ति.दिवस.मूलांक : ८ .
चैत : शुक्ल पक्ष : नवरात्रि : अष्टमी .
*
हिन्दू नववर्ष की
अनंत शिव शक्ति हार्दिक शुभकामनाएं
*
महाशक्ति मीडिया प्रस्तुति.
राधिकाकृष्णरुक्मिणी
सदा सहायते.
*
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लेखकीय प्रधान
सम्पादकीय त्रिशक्ति : पृष्ठ : ०.
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*
शक्ति.शालिनी मधुप रेनू.
नैनीताल.डेस्क.
*
दिग्दर्शिका सम्पादकीय त्रिशक्ति
शक्ति.डॉ.रजनी तनु अनु
द्वारिका डेस्क.
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संशोधक त्रिशक्ति : पृष्ठ : ०.
वाराणसी डेस्क.
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राधिकाकृष्ण : प्रेम प्रकृति : दर्शन : आज : पृष्ठ : ० / १.
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राधिका डेस्क.
राधाकृष्ण मंदिर.मुक्तेश्वर.नैनीताल.
संपादन
शक्ति.डॉ.अनु मधुप प्रिया.
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| शक्ति.सोनाली.आर्य.डॉ.दीनानाथ वर्मा.फिजिशियन.ह्रदय एवं शुगर रोग विशेषज्ञ.समर्थित |
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राधिकाकृष्ण : प्रेम प्रकृति : दर्शन : आज : पृष्ठ : ० / १.
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राधिका डेस्क.
राधाकृष्ण मंदिर.मुक्तेश्वर.नैनीताल.
संपादन
शक्ति.डॉ.अनु मधुप प्रिया.
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कृष्ण : दृश्यम : जो तुम्हारे साथ हुआ गलत था लेकिन उसे अनुभव प्राप्त करने का माध्यम समझे
*
*
विश्वास : मन और कर्म का अन्योन्याश्रय समबन्ध है
सर्वप्रथम अन्तर्मन में जन्मी आस्था से ही मन विचलित और कर्म प्रेरित होता है
*
सखी रे मैं का से कहूं
*
सन्दर्भ : विचार : माया.
शक्ति : मंजु : हिमाचल : छाया.
*
जब जब तू मेरे सामने आए
*
जीवन अनमोल है समय बहुमूल्य व्यर्थ के विवाद , और झगड़ें
में क्षण न गवाएं उनके लिए सम्बन्ध निभाएं
जो आपके लिए समय शब्द और संस्कार निभाते हो
*
लोग अपने मतलब की बात शीघ्र समझ जाते हैं, माधव
मगर दूसरों की बातों का मतलब कभी नहीं समझते.है, ऐसा क्यों माधव
*
सखी रे मैं का से कहूं
सन्दर्भ : विचार : माया.
शक्ति : रितु : छाया
*
मुझे दोष न देना जग वालों
*
श्रेष्ठ व्यक्ति निर्मल पानी जैसा तरल होता है, वह
उच्चतम स्थान से निम्तम स्थान की और बह तो जाता है
लेकिन उनमें विनम्रता पारदर्शिता, घुलनशीलता सहिष्णुता के उच्च भाव सदैव वर्तमान होते हैं
*
जीने की राह : एक बंजारा गाए
*
जब कोई अपनी दिली ख्वाहिशें जिन्दा होती है, तो समझदारी से तय किये गए सफ़र में
रास्तें खुद-ब-खुद मंजिल की ओर मुख़ातिब हो जातीं हैं।
*
प्रेम , प्रकृति, पहाड़
प्रेम , प्रकृति, पहाड़ ( स्वच्छता ) पवन और पुरुषोत्तम की अभिलाषा रखें
जीवन में परम आंनद स्वतः प्राप्त हो जाएगा
*
जीवन को जानना है तो....जागना होगा..समझना होगा
सब को प्रसन्न करने की चेष्टा व्यर्थ ही है...
अपने हिस्सें में जीवन के कर्म है और हमें बस वही करते रहना है
*
शक्ति @ शालिनी मधुप रेनू
गम नहीं यदि कोई मुझे कोई गैर न समझ सके, मैं फुरसत
की चीज़ हूँ और उन्हें बड़ी जल्दबाजी है..
लेकिन अपने न समझे जाने पीड़ा तो थोड़ी होगी...
मैंने तुम्हारे लिए असीम सहिष्णुता जमा रखी है
.....देखो न
*
अगर पीड़ा न होती तो खुशी की कीमत न होती
अगर मिल जाता सब कुछ चाहने से,
तो हमें दुनिया में ऊपर वाले की जरूरत न होती
*
एकला चलो रे
*
सन्दर्भ : विचार : माया.
शक्ति : डॉ.अनु : छाया
*
जब जब तू मेरे सामने आए
*
मनुष्य का सम्मान उन शब्दों प्यारी बातों में नहीं,
जो उसकी उपस्थिति में कही जाएं
बल्कि उन शब्दों में है,जो उसकी अनुपस्थिति में
बोले जाते हैं
*
सौ खामियाँ मुझ में सही मगर एक जिद अच्छी भी है,माधव
जिन्हें भी हमने अपना माना है उन्हें आज तक पराया नहीं किया..
*
सौ खामियाँ मुझ में सही मगर एक जिद भी है,माधव
जिन्हें भी हमने अपना माना है उन्हें आज तक पराया नहीं किया..
*
एकला चलो रे
*
जिनकी कर गुजरने की अलग चाहत होती है
वो भीड़ में नहीं उनके पीछे भीड़ अनुगमन करती है
भीड़ के साथ चलना तो आसान है,
लेकिन अकेले चलना साहस का काम है.
*
तुम हार के जीत अपना
प्रीत अमर कर दो
*
प्रेम कोई कब्जा नहीं है, जो हर कोई किसी को काबिज कर लें
ये तो वो मन की उदात्त भावनाएँ जो स्वतंत्र है
और तुम्हारे लिए प्यार और अच्छाई वश ही अंकुरित होती हैं
शक्ति @ डॉ.अनु मधुप प्रिया
*
दो कदम तुम भी चलो दो कदम हम भी चलें
देखो सम्यक साथ कभी न छूटे
*
शक्ति : सोनी : छाया
*
*
अगर किसी की बात बुरी लगे तो दो तरह से सोचें ।
यदि व्यक्ति महत्वपूर्ण है तो बात भूल जायें ,
और अगर बात महत्वपूर्ण है तो व्यक्ति को भूल जायें …
सम्यक जन बड़ी सोच विचार कर व्यक्ति के गुण, दोष ,साथ विश्वास के आधार पर
सुनिश्चित करते हैं कि बातें भूली जाए या उस व्यक्ति को
*
शोध विचार : शक्ति @ शालिनी रेनू मधुप
*
बस अगले मोड़ पर मिलेगी जिंदगी
दो कदम तुम भी चलो दो कदम हम भी चले
*
*
असंयम : शब्द : महाभारत
सार्वजनिक रूप से अपनों के लिए कहे मर्म स्पर्शी
शब्दों के तीक्ष्ण बाणों से ही तो तुम डरते रहें माधव
जिसमें तुम्हें अपनों के मध्य होने वाले महाभारत की संभावनाएं
नज़र आती रही
--------- रुक्मिणीकृष्ण : प्रकृति प्रेम : दृश्यम : आज : पृष्ठ : ० / १. ---------- राधाकृष्ण मंदिर.मुक्तेश्वर. नैनीताल डेस्क संपादन शक्ति.शालिनी मधुप प्रिया. |
*
शक्ति विशेष : विचार
आ बता दें कि तुझे कैसे जिया जाता हैं
*
कल आज और कल
इस जटिल संसार में जीने के लिए
कल की अच्छी बीती हुई बातें, मेरे अपने
आज कुछ सकारात्मक, रचनात्मक ,बेहतर करने के निमित
देखने के लिए कल के सपने मुझे सदैव से प्रेरित करती रहती है
*
शोध विचार शक्ति @ प्रिया मधुप रेनू
*
*
भोले भाव मिले रघुराई
*
सरल रहिए ताकि सब भले आपसे हिल मिल सके
पानी जैसा तरल रहिए ताकि सब सार में घुल मिल सके
किस का जीवन सरल है माधव..?
जीवन तो कठिनाईओं और संघर्ष से परिपूर्ण ही होता है
यह तो हमारे ऊपर ही है कि हम कितना ,धैर्य के साथ कर्म
करते हुए अपने जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करते हैं
शक्ति @ शालिनी मधुप रेनू
*
बुद्धि शक्ति-रूपेण संस्थिता
*
सन्दर्भ : विचार : माया. शक्ति : रितु : छाया
*
स्वयं ही असीमित शक्तियों की श्रोत हैं
स्वयं के भीतर ही अनंत शक्तियाँ जो सत्यम शिवम सुंदरम हैं
की तलाश ताउम्र जारी रखें
जिससे समस्त जगत के नव निर्माण के साथ साथ प्राणियों में स्व आवलंबन और कल्याण का भाव
उत्पन्न हो
शक्ति @ शालिनी मधुप रेनू
*
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राधिकाकृष्ण : जीवन दर्शन : दृश्यम : शब्द चित्र : पृष्ठ : १ / १.
--------
प्यार : व्यवहार : संस्कार
*
राधिकाकृष्ण.
वरसाने.वृन्दावन.डेस्क.
*
संपादन
*
शक्ति * प्रिया मधुप.डॉ.सुनीता
*
तुम्हारे लिए.
*
आ बता दे कि तुझे कैसे जिया जाता है
*
जयपुर : वृन्दावन मंदिर : राधा कृष्ण : छाया रेनू
*
जागो उठ कर देखो
जीवन जोत उजागर है
*
समय का पता ही नहीं चलता अपनों के साथ
लेकिन अपनों का पता समय और परिस्थिति के साथ
जरूर पता चल जाता है
*
सन्दर्भ विचार : साभार : माया
मेरा नाम जोकर : फोटो : राजकपूर : छाया
*
स्वर्ग यही नर्क यही
जीना यहाँ मरना यहाँ
*
व्यवहार व्यक्ति के जीवन का ऐसा दर्पण है जिसमें अहंकार और संस्कार दोनों दिख जाते हैं।
अगरआपकी नीयत सही है तो नियति आपके साथ कभी गलत नहीं करेगी
*
अप्रिय ,कुपित, असंतुलित और शापित होकर यहाँ
जीवन जीते रहें तो उनके लिए नर्क यही है
सहिष्णु,शब्दशील, संतुलित व्यवहारिक, कर्मशील, प्रिय,
बन कर रहें तो उनके लिए स्वर्ग यही है
*
विचार शक्ति @ प्रिया मधुप रेनू
*
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राधिकाकृष्ण : प्रेम प्रकृति : जीवन दर्शन : शब्द चित्र : पृष्ठ : १ / १.
--------
*
प्यार : व्यवहार : संस्कार
*
राधिकाकृष्ण.
वरसाने.वृन्दावन.डेस्क.
*
संपादन
*
शक्ति * प्रिया मधुप.डॉ.सुनीता
*
तुम्हारे लिए.
*
आ बता दे कि तुझे कैसे जिया जाता है
*
जयपुर : वृन्दावन मंदिर : राधा कृष्ण : छाया रेनू
*
जागो उठ कर देखो
जीवन जोत उजागर है
*
समय का पता ही नहीं चलता अपनों के साथ
लेकिन अपनों का पता समय और परिस्थिति के साथ
जरूर पता चल जाता है
*
भय : मन और मस्तिष्क
*
भय की स्थिति का दुष्प्रभाव मन और मस्तिष्क पर लम्बे अंतराल तक होता है,प्रिय
प्रतिपक्षी अपने वर्ताव में निरंतर सुधार से ही
भय के दुष्प्रभाव को कम कर सकता
*
प्रेम मानव मन में तुम्हारी ही नेक नियति से उत्पन्न
तुम्हारे लिए एक स्वतः समर्पण भाव है
कोई व्यापार नहीं जो हर किसी से कर लिया जाए
*
यदि किसी भूल के कारण कल का दिन दुःख में बीता हो
तो उसे आज स्मृत कर आज और कल को
दुःख पूर्ण करने का औचित्य , प्रिय
*
सुख दुःख में समभाव,धैर्य से ही जिया जाता है
खुश रहने के दो ही तरीके हैं, हो सके
तो जीने के हालात ही बदल दीजिए या फिर
ख़ुद को अपने सोचने का तरीका ही बदल दीजिए*
शक्ति. @ शालिनी मधुप रेनू
सन्दर्भ : विचार : माया : छाया : माधव
*
रसखान
*
प्रेम हरी को रूप है, त्यौं हरि प्रेम स्वरूप।
एक होइ द्वै यो लसै, ज्यौं सूरज अरु धूप॥
*
भावार्थ
*
संत रसखान द्वारा रचित इस दोहे का अर्थ है कि प्रेम और ईश्वर ( हरि ) एक- दूसरे से अभिन्न हैं।
प्रेम ही ईश्वर का रूप है और ईश्वर स्वयं प्रेम-स्वरूप हैं।
वे सूर्य और धूप की तरह हैं—दिखने में दो अलग-अलग लगते हैं लेकिन वास्तव में एक ही हैं
क्योंकि धूप के बिना सूरज और सूरज के बिना धूप नहीं हो सकती
*
प्रस्तुति शक्ति
डॉ. राखी फरहीन बीना जोशी
*
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राधिकाकृष्ण : ड्योढ़ी : दर्शन : आज : पृष्ठ : १ / १.
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प्यार : व्यवहार : संस्कार
*
राधिकाकृष्ण.
वरसाने.वृन्दावन.डेस्क.
. प्रादुर्भाव वर्ष :१९७६.
संस्थापना वर्ष : १९९८.महीना : जुलाई. दिवस : ४.
*
संपादन
*
शक्ति * प्रिया मधुप.डॉ.सुनीता
*
हे री मैं तो प्रेम दिवानी,मेरा दरद न जाने कोय
*
श्याम तेरी बंशी पुकारे राधा नाम
*
तुम्हारे लिए.
*
तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है राधा का भी श्याम वो तो मीरा का भी श्याम
*
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राधिकाकृष्ण : जीवन दर्शन : दृश्यम : शब्द चित्र : पृष्ठ : १ / १.
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प्यार : व्यवहार : संस्कार
*
राधिकाकृष्ण.
वरसाने.वृन्दावन.डेस्क.
*
संपादन
*
शक्ति * प्रिया मधुप.डॉ.सुनीता
*
तुम्हारे लिए.
*
आज रंग बरस रहा : बरसाने की छोरी
साभार : दृश्यम : वृन्दावन बांके बिहारी की होरी
*
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रूक्मिणीकृष्ण : जीवन दर्शन : पृष्ठ : १ / २.
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रूक्मिणीकृष्ण : जीवन दर्शन : पृष्ठ : १ / २.
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प्यार : व्यवहार : संस्कार
*
रुक्मिणी डेस्क.
विदर्भ डेस्क.महाराष्ट्र.
प्रादुर्भाव वर्ष : १९७८.
संस्थापना वर्ष : १९८७.महीना : अगस्त : दिवस : ६.
*
संपादन
शक्ति प्रिया डॉ.सुनीता मधुप.
रुक्मिणी डेस्क.
विदर्भ डेस्क.महाराष्ट्र.
प्रादुर्भाव वर्ष : १९७८.
संस्थापना वर्ष : १९८७.महीना : अगस्त : दिवस : ६.
*
संपादन
शक्ति प्रिया डॉ.सुनीता मधुप.
*
ख़ामोशी और नाराजगी
*
*
सन्दर्भ विचार : माया
शक्ति : रितु : छाया
*
नाराजगी जीवन में रिश्तें का एक अहम हिस्सा है
लेकिन एक तरफ़ा अख़्तियार की गई ख़ामोशी रिश्ते का अंत
इसलिए पहल होती रहनी चाहिए
*
प्रेम : प्रकृति : पहाड़ : पुरुषोत्तम : पुनर्जन्म
*
जिंदगी एक नयी जंग है
*
शिव अनायास ही हमें तब याद आ जाते है जब बात कष्ट सहने की होती है
उन्होंने समुद्र मंथन के दौरान निकले अत्यंत विषैले ' हलाहल ' या ' कालकूट ' विष का पान किया था और नील कंठ कहलाए थे
*
दुर्योधन : हरि को बंदी बनाने का प्रयास
*
सन्दर्भ विचार : माया
हस्तिनापुर : दुर्योधन : छाया
*
दुर्योधन वह भी दे ना सका,
आशीष समाज की ले न सका,
आशीष समाज की ले न सका,
उलटे,हरि को बाँधने चला,
जो था असाध्य, साधने चला।
जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।
*
राष्ट्र कवि
रामधारी सिंह दिनकर
बिहार
*
शक्ति @ शालिनी मधुप रेनू
*
ये न सोचो इसमें अपनी हार है कि जीत है
इसे अपना लो जो भी जीवन की रीत है
*
सन्दर्भ : विचार : माया. शक्ति : रितु : छाया
*
जब आपको यह अनुभूति होने लगे कि
आप स्वयं ही अपने जीवन में आसन्न दुखों के कारण हैं
तो किंचित यह समझदार होने का पहला लक्षण है
अधर्म : ज्ञानी : मौन
*
कभी कभी अन्याय और अधर्म केवल बुरे लोगों के कारण ही नहीं होता बल्कि
न्याय और धर्म जानने वाले की मौन और चुप्पी भी अन्याय और
अधर्म को बढ़ावा देती है,माधव
कुरु सभा में आप तो द्रौपदी के चीर हरण के स्वयं साक्षी रहें
*
शक्ति शालिनी मधुप रेनू
*
---------
रूक्मिणीकृष्ण : प्रकृति प्रेम : जीवन दर्शन : दृश्यम : पृष्ठ : १ / २.
----------
रूक्मिणीकृष्ण : प्रकृति प्रेम : जीवन दर्शन : दृश्यम : पृष्ठ : १ / २.
----------
*
रुक्मिणी डेस्क.
विदर्भ डेस्क.महाराष्ट्र.
रुक्मिणी डेस्क.
विदर्भ डेस्क.महाराष्ट्र.
*
संपादन
शक्ति प्रिया डॉ.सुनीता मधुप.
संपादन
शक्ति प्रिया डॉ.सुनीता मधुप.
एक स्वरुप है आधा आधा
*
*
जो बड़ेन को लघु कहे.
सन्दर्भ विचार माया : गिरधर मुरली धर : छाया
रहीम.
जो बड़ेन को लघु कहे, नहिं रहीम घटि जाहिं
गिरिधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहिं
*
प्रथम मीडिया शक्ति प्रस्तुति.
*
-------
मीरा : दर्शन : ड्योढ़ी : पृष्ठ १ / ३ .
---------
*
मीरा डेस्क.
मेवाड़ डेस्क.जयपुर.
प्रादुर्भाव वर्ष : १९८२.
संस्थापना वर्ष : १९८९. महीना : सितम्बर. दिवस : ९.
*
*
मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों न कोय
*
मेवाड़ डेस्क.जयपुर.
संपादन.
शक्ति. जया अनीता गरिमा
*
भंवरें भी करते हैं गुंजन
*
शीलं परम भूषणम
*
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय।।
*
शीलं परम भूषणम
धैर्य व सहिष्णुता ही पुरुषार्थ का अहम लक्षण है
जो विकट परिस्थितियों में समस्याओं से हमें लड़ना सिखाता है
*
*
| सन्दर्भ : विचार : माया.शक्ति रितु : छाया * फूल और कांटें संगत का असर मगर कोई तो मुझे बता दे फूलों के संग रहने वाले काँटों को कहाँ महकना आया है |
शक्ति @ मीना भारती दया जोशी
सम्पादिका केदार दर्शन. नैनीताल.
*
शहद और डंक
*
क्या मधुमक्खी की तरह बनना हमारे जीवन का
विकल्प हो सकता है समयानुसार हम अपने
शहद और डंक का प्रयोग यथा मनुष्य कर सके
*
जिंदगी का सफ़र
ये है कैसा सफ़र
शक्ति : दीप्ती बोरा : नैनीताल छाया :
*
जो हो रहा है ठीक है
जो होगा वो ठीक ही होगा
*
जिंदगी कभी आसान नहीं होती
इसे आसान बनाना पड़ता है
कभी अंदाज से कभी कुछ नजरअंदाज से
*
ईश्वर के हर फैसले पर खुश रहें
सुनते है ईश्वर वो नहीं देता जो आपको
अच्छा लगता है बल्कि ईश्वर वो देता है जो आपके लिए अच्छा होता है
*
शक्ति शालिनी प्रिया मधुप
*
*
श्री हरि : राम : कृष्ण.
*
----------
सम्पादकीय शक्ति. समूह. त्रिशक्ति. विचार धारा : पृष्ठ :२/ १.
-----------
संपादन
शक्ति. प्रिया मधुप शालिनी.
*
होली विशेष : देव शक्ति समूह : सन्देश
हम
*
धर्मो रक्षितः रक्षतः
*
सन्दर्भ : विचार : अलंकरण : माया :
शिव : शक्ति : छाया
*
किंचित तुम्हारे स्वयं का एकांतिक क्षण और उसमें किए गए
चिंतन मनन ही तुम्हें मनुष्य बना सकता है,
अन्यथा भीङ तुम्हें भेड़ ही बना देगी, पार्थ
*
शोध विचार @ शक्ति. नैना मधुप भारती
नैना देवी डेस्क.नैनीताल.
*
-------
सम्पादकीय :त्रिशक्ति : गोरी साँवरे सलोनी :गद्य संग्रह : आलेख : पृष्ठ : २ / ३.
--------
नैनीताल डेस्क
संपादन
शक्ति.डॉ.रजनी मधुप शालिनी.
*
*
शक्ति. आलेख
शक्ति. आरती अरुण.
सह : शक्ति प्रिया मधुप
*
अहिंसा परमो धर्म : महावीर जयंती विशेष.
मानवीय गुणों में क्षमा की बड़ी महिमा और महत्ता है। अगर कोई शक्तिशाली और सामर्थ्यवान है परन्तु क्षमाशील नहीं है तो सब व्यर्थ है।
अहिंसा : शक्तिशालियों का धर्म और आभूषण है : अहिंसा भी शक्तिशालियों का धर्म और आभूषण है, हिंसा की प्रकृति और प्रवृत्ति तो आदिम सामाजिक व्यवस्था में चली आ रही है लेकिन अहिंसक होना सहज नहीं है,जो सहजता से, समग्रता के साथ अहिंसक वृत्ति को अपनाकर आत्मसात कर लेते हैं,वे ही क्षमावान और अहिंसक हो सकते हैं। क्षमा और अहिंसा सहचर वृत्ति और प्रवृत्ति है।
क्षमा और अहिंसा की जरूरत : एक संतुलित और शान्त जीवन के लिए : आज की वैश्विक व्यवस्था में इसी क्षमा और अहिंसा की जरूरत है। परिवार और समाज में भी इसकी ग्राह्यता से अलग हटकर एक संतुलित और शान्त जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। इसलिए जीण महावीर ने अपने दर्शन और चिन्तन में क्षमा और अहिंसा को एक व्रत के रूप में अपनाकर चलने का आग्रह किया है, जो जैन मत में खम्मन परब और अहिंसा के अणुव्रत के रूप में जाना जाता है।
अब इस अहिंसा के सन्दर्भ में जब यह कहा जाता है कि, अहिंसा परमो धर्म तो एक सवाल खड़ा होता है कि इस अहिंसा के सिद्धान्त या आदर्शों की रक्षा कैसे की जाए। यहां इतिहास के अवलोकन की जरूरत हो जाती है कि जैन मत और बौद्ध मत दोनों छठी सदी ई पू की अवधारणा हैं जब हिंसा और रक्तपात अपने चरम पर था।
सामाजिक,आर्थिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक क्रांति : जैन धर्म की स्थापना : बलि, यज्ञादि कर्मकाण्डों की वजह से गोधन या गोवंश की भयानक क्षति हो रही थी, समस्त सामाजिक आर्थिक और आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक आधारभूत संरचनाएं विकृत और विद्रूप होती जा रही थी जिससे ध्वस्त होती सामाजिक आर्थिक व्यवस्था को स्थिरता प्रदान करने,समाज को समरसी समावेशी बनाने, हिंसा को रोकने तथा एक नवीन सामाजिक आर्थिक तथा आध्यात्मिक व्यवस्था को स्थापित करने के लिए दोनों मतों ने इस मार्ग को अपनाने का काम किया और इसीलिए इन दोनों को कभी कभी नवीन सामाजिक,आर्थिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक क्रांति भी कहा जाता है।
इससे स्पष्ट होता है कि संसार के समस्त दर्शन चिन्तन और सिद्धान्त अपने अपने युगधर्म को प्रतिबिम्बित करते हैं और इसमें जो सार्वकालिकता होती है,उसे अपनाया जाता है,तब इस अहिंसा के स्वरूप कोआधुनिक सन्दर्भों में भी देखने की जरूरत है कि जो व्यक्ति,समाज या राष्ट्र अगर शक्तिशाली, सामर्थ्यवान और सामरिक दृष्टिकोण से सक्षम नहीं है तो वह न तो क्षमावान हो सकता है ना ही उसके अहिंसा की कोई कीमत हो सकती है।
अहिंसा परमो धर्म : हिंसा धर्मो तथैव च : इसलिए हिन्दू जीवन दर्शन में इसे इस रूप में कहा गया कि,अहिंसा परमो धर्म हिंसा धर्मो तथैव च अर्थात् अहिंसा परम धर्म है पर उसी अहिंसा धर्म के रक्षार्थ अगर शस्त्र उठाना पड़े ,रक्त बहाना पड़े तो वह भी धर्म ही है।
आज की वैश्विक व्यवस्था इसी शक्ति संतुलन और समन्वय के सिद्धान्त पर चल रही है। इसलिए क्षमा,त्याग और अहिंसा वीरोचित धर्म है तभी तो दिनकर जी ने भी कहा है, क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो उसको क्या जो दंतहीन विषहीन विनीत सरल हो।
आज भगवान जीण महावीर की जयन्ती है। समस्त देशवासियों को महावीर जयन्ती की हार्दिक बधाईयां एवं मंगलकामनाऍं जय जीणेन्द्र.
*
स्तंभ संपादन : शक्ति डॉ.रजनी रीता रंजीता रेनू
सज्जा : शक्ति मंजिता सीमा स्वाति अनुभूति।
शक्ति रेनू मधुप शालिनी
शक्ति समूह आलेख : तू लाली है सवेरे वाली
*
पृष्ठ : २ / ३ / ०
शक्ति आलेख : रामनवमी विशेष
राम आज की आवश्यकता क्यों हैं ? आदर्श जीवन की सीख :
डॉ.सुनीता रजनी मधुप.
आज के समय में राम की प्रासंगिकता और उनकी आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जीवन सत्य, त्याग, सेवा और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
राम आज की आवश्यकता क्यों हैं ? आदर्श जीवन की सीख : भगवान राम का जीवन हमें विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य रखने और धर्म कर्तव्य के मार्ग पर अडिग रहने की शिक्षा देता है।
नैतिकता और संस्कार: वर्तमान समय में जब पारिवारिक और सामाजिक मूल्य कमजोर हो रहे हैं, राम का जीवन भाई, पुत्र, पति, राजा के रूप में हमें नैतिक मूल्यों की याद दिलाता है।
सामाजिक समरसता: राम ने समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने का 'समन्वय मॉडल' प्रस्तुत किया, जो आज के समय में सामाजिक एकता के लिए आवश्यक है। रावणों के विरुद्ध संघर्ष: वर्तमान में व्याप्त बुराइयों, भ्रष्टाचार, और अनैतिकता आधुनिक रावणों के खिलाफ राम की विचारधारा और आदर्शों की आवश्यकता है।
संकट प्रबंधन : राम ' मानवता के पर्याय ' माना गया है, जो संकट के समय कुशल नेतृत्व और धैर्य की शिक्षा देते हैं। संस्कारों का बीजारोपण के लिए नई पीढ़ी को संस्कारित करने के लिए रामायण और रामलीला से परिचित कराना अत्यंत आवश्यक है।
श्री रामनवमी एक पर्व या त्योहार नहीं है बल्कि जीवन में मर्यादा, अनुशासन और कर्तव्य की महत्ता, उपयोगिता और उपादेयता को जानने का उत्सव है। यह उस भारतीय सभ्यता संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था का उत्सव है जिसकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कल थी और कल भी रहेगी। इस मर्यादा और अनुशासन की जरूरत आज परिवार से लेकर वैश्विक स्तर पर है
और यही श्री रामनवमी की महत्ता है।
रामराज्य : अभी तक का सुशासन : सन्देश श्री हरि के अवतार भगवान श्रीराम मर्यादा, सत्य, धर्म और आदर्श जीवन के प्रतीक हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य, साहस और सत्य का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। राम केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक विचार हैं - जो हमें संघर्ष में स्थिर रहना, अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना और सदैव धर्म के मार्ग पर चलना सिखाते हैं। इस पावन अवसर पर प्रभु श्रीराम आप सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करें। आप सभी को राम नवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
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स्तंभ संपादन : शक्ति. रीता रंजीता माधवी.
स्तंभ सज्जा : शक्ति. सीमा स्वाति अनुभूति.
शक्ति समूह आलेख : तू लाली है सवेरे वाली
पृष्ठ : २ / ३ / ०
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खुद को आइने में नहीं अनुभवों में तराशिये : संवेदनशील बनिए
सकारात्मक हो सम्यक जनों और अपने सही लक्ष्य के लिए
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पद, पैसा, प्रतिष्ठा और चमक -क्या यही जीवन की अंतिम उपलब्धि है : आज सुबह ' हैप्पी मॉर्निंग ' भेजा गया यह वाक्य मन के भीतर देर तक गूंजता रहा दुनिया को और अधिक सफल लोगों की नहीं, बल्कि ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो यह प्रश्न करने का साहस रखें कि हमारी संस्कृति जिसे ‘ सफलता ’ कहती है, वह वास्तव में क्या है। हम जिस सफलता की दौड़ में भाग रहे हैं, क्या वह सचमुच मानव जीवन की पूर्णता है ?
पद, पैसा, प्रतिष्ठा और चमक-क्या यही जीवन की अंतिम उपलब्धि है ? या फिर संवेदनशील मन, सत्यनिष्ठ चरित्र और करुणामय हृदय भी सफलता के शिखर हैं ? समाज ने हमें सिखाया कि ऊँचाई ही सफलता है, पर शायद आज आवश्यकता गहराई की है विचारों की गहराई, संवेदनाओं की गहराई, मनुष्यता की गहराई।
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| :सन्दर्भ फोटो : शक्ति रितु : जीवन का उद्देश्य |
संवेदनशील मनुष्य गढ़ना : सत्यनिष्ठ चरित्र : शिक्षा का उद्देश्य भी यही है-सोचने वाले, प्रश्न करने वाले, संवेदनशील मनुष्य गढ़ना। यदि हमारी सफलता मनुष्य को मनुष्यता से दूर कर दे,तो वह उपलब्धि नहीं, विडंबना है। सफलता शिखर पर खड़े होने का नाम नहीं,सफलता मनुष्य बने रहने का संकल्प है। यह संदेश केवल एक उद्धरण नहीं, यह हमारी सोच की सीमाओं को तोड़ने का आह्वान है।
शायद अब समय है कि हम सफलता की नई परिभाषा गढ़ें-जहाँ चरित्र, करुणा और चेतना भी उतने ही मूल्यवान हों जितनी उपलब्धियाँ।
मेरी कलम से कुछ पंक्तियाँ स्वतः उतर आईं-सफल वही नहीं जो भीड़ में आगे निकला,सफल वह भी है जो भीड़ से अलग सोच सका। शिक्षा का उद्देश्य भी यही है-सोचने वाले, प्रश्न करने वाले, संवेदनशील मनुष्य गढ़ना। यदि हमारी सफलता मनुष्य को मनुष्यता से दूर कर दे,तो वह उपलब्धि नहीं, विडंबना है।
यह संदेश केवल एक उद्धरण नहीं,यह हमारी सोच की सीमाओं को तोड़ने का आह्वान है।शायद अब समय है कि हम सफलता की नई परिभाषा गढ़ें-जहाँ चरित्र, करुणा और चेतना भी उतने ही मूल्यवान हों जितनी उपलब्धियाँ।
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आइने में नहीं अनुभवों में तराशिये
सफल वही नहीं जो भीड़ में आगे निकला,सफल वह भी है जो भीड़ से अलग सोच सका।'
सकारात्मक हो सम्यक जनों और अपने सही लक्ष्य के लिए
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भावनात्मक रूप से परिपक़्व व्यक्ति वही होता है जो बाहरी धारणाओं से प्रभावित हुए बिना अपनी सच्चाई को स्वीकार कर सके और अपनी आंतरिक शांति बनाए रख सके।
सफलता शिखर पर खड़े होने का नाम नहीं,सफलता मनुष्य बने रहने का संकल्प है। यह संदेश केवल एक उद्धरण नहीं,यह हमारी सोच की सीमाओं को तोड़ने का आह्वान है।शायद अब समय है कि हम सफलता की नई परिभाषा गढ़ें-जहाँ चरित्र, करुणा और चेतना भी उतने ही मूल्यवान हों जितनी उपलब्धियाँ। खुद को आइने में नहीं अनुभवों में तराशिये जिंदगी में कई मोड़ पीछे आयेंगे जो आपको और काबिल बना जायेंगे
मेरी कलम से कुछ पंक्तियाँ स्वतः उतर आईं-सफल वही नहीं जो भीड़ में आगे निकला,सफल वह भी है जो भीड़ से अलग सोच सका।'सच्ची सफलता वह है जहाँ मनुष्य अपनी चेतना से प्रश्न करता है,जहाँ वह परंपराओं को आँख मूँदकर नहीं, विवेक से स्वीकार करता है,जहाँ वह समाज को केवल अपनाता नहीं, बल्कि बेहतर बनाने का साहस भी रखता है। शिक्षा का उद्देश्य भी यही है-सोचने वाले, प्रश्न करने वाले, संवेदनशील मनुष्य गढ़ना।यदि हमारी सफलता मनुष्य को मनुष्यता से दूर कर दे,तो वह उपलब्धि नहीं, विडंबना है।
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शक्ति. रेनू : फोटो : सम्पादकीय |
धरती पर भूख इसलिए नहीं है कि खेतों में अन्न कम उगता है…भूख इसलिए है क्योंकि दिलों में दया कम उगती है। जिस दिन इंसान रोटी से पहले इंसानियत उगाने लगेगा, उस दिन दुनिया में कोई भूखा नहीं सोएगा।
सफलता की परिभाषा पर एक प्रश्न आज सुबह ' हैप्पी मॉर्निंग ' भेजा गया यह वाक्य मन के भीतर देर तक गूंजता रहा- दुनिया को और अधिक सफल लोगों की नहीं, बल्कि ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो यह प्रश्न करने का साहस रखें कि हमारी संस्कृति जिसे ‘ सफलता ’ कहती है, वह वास्तव में क्या है।हम जिस सफलता की दौड़ में भाग रहे हैं, क्या वह सचमुच मानव जीवन की पूर्णता है? पद, पैसा, प्रतिष्ठा और चमक-क्या यही जीवन की अंतिम उपलब्धि है?या फिर संवेदनशील मन, सत्यनिष्ठ चरित्र और करुणामय हृदय भी सफलता के शिखर हैं? समाज ने हमें सिखाया कि ऊँचाई ही सफलता है,पर शायद आज आवश्यकता गहराई की है-विचारों की गहराई, संवेदनाओं की गहराई, मनुष्यता की गहराई।
'सफलता शिखर पर खड़े होने का नाम नहीं,सफलता मनुष्य बने रहने का संकल्प है।'यह संदेश केवल एक उद्धरण नहीं,यह हमारी सोच की सीमाओं को तोड़ने का आह्वान है।शायद अब समय है कि हम सफलता की नई परिभाषा गढ़ें-जहाँ चरित्र, करुणा और चेतना भी उतने ही मूल्यवान हों जितनी उपलब्धियाँ।
सकारात्मक हो सम्यक जनों और अपने सही लक्ष्य के लिए
कभी - कभी लगता है कि यह दुनिया सचमुच एक ऐसी महफ़िल है जहाँ लोग अपने -अपने चेहरे नहीं,
बल्कि मुखौटे पहनकर आते हैं। कोई मुस्कान का मुखौटा लगाए है, कोई सफलता का, कोई संस्कार का…और भीतर की सच्चाई अक्सर कहीं छिपी रह जाती है।
ऐसे समय में जो व्यक्ति अपने असली स्वरूप,अपने सच्चे विचार और अपने साफ़ दिल के साथ जीता है, वह कभी-कभी इस दुनिया में अजनबी सा लगने लगता है। पर सच तो यही है- नकाब पहनकर चमकने से कहीं अधिक साहस चाहिए अपने असली चेहरे के साथ जीने के लिए। आज का चिंतन यही कहता है - दिखावे की भीड़ में भी अपने सच को बचाए रखना ही सबसे बड़ी ईमानदारी है।
जिंदगी की खूबसूरती आपके इसे देखने के फैसले पर निर्भर करती है। जितना आपका नजरिया जिंदगी के प्रति सकारात्मक होगा उतनी ही जिंदगी के प्रति खूबसूरती बढ़ती जाएगी।
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संपादन : शक्ति डॉ रजनी प्रीति रंजीता क्षमा
पृष्ठ सज्जा : शक्ति मंजिता स्वाति सीमा अनुभूति
शक्ति समूह आलेख : २ /३ /१
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महिला दिवस : आलेख विशेष
मन की बात
अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो ..!
संपूर्ण सृष्टि रचती हूँ मैं :
भीख नहीं भागीदारी :
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शक्ति.समूह आलेख
शक्ति.शालिनी मधुप रेनू
शक्ति.आरती अरुण अनुभूति
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| फोटो : शक्ति शालिनी दिव्य सृजन की आशा |
तमाम संगठन अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के एक दिन पूर्व से लेकर आज तक कुछ विशेष महिलाओं को शॉल, प्रशस्ति पत्र व मोमेंटो देकर बख़ूबी सम्मानित कर रहे हैं। इसमें सम्मिलित सभी महिलाएं भी आत्मसंतुष्ट हो गईं..!
इन सब के बीच किसी को ध्यान भी न रहा होगा कि प्रतिदिन कितनी ही महिलाएं घरेलू हिंसा, बलात्कार व हत्या की शिकार हो रही हैं, क्या इस पर भी किसी ने विचार किया..?
जब भी ऐसी कोई भयावह घटना घटती है, हम महिलाएं कैंडिल मार्च करके अपना काम ख़त्म कर लेती हैं, जबकि पीड़िता का परिवार वर्षों तक कानूनी लड़ाइयां लड़ते-लड़ते हतोत्साहित हो जाता है..! न सरकार इस पर सख़्त है..और ना ही कोई संगठन..! न्याय मिलने में इतना विलम्ब हो जाता है कि पीड़िता की आत्मा भी स्त्री रूप में जन्म लेने पर स्वयं को कोसती होगी..!
बहरहाल ! बहुत दुःखी मन से एक रचना प्रेषित कर रही हूँ। समाज में स्त्रियों की ऐसी दुर्दशा देख बस एक ही बात मन में आती है..' अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो ..! '
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| फोटो : शक्ति रेनू सृष्टि रचती हूँ मैं |
भीख नहीं भागीदारी : नारी को पूज्य नहीं समादरित सम्मानित और समकक्ष समतुल्य बनाने की जरूरत है पूज्य बनाने पर वह देवी बन जातीहै और पुरूष उसकी पहुंच से दूर हो जाते हैं उसे महज देह नहीं महज भोग विलास की सामग्री नहीं जिन्दगी का अविच्छिन्न हिस्सा बनाए रखना है पुरूष और स्त्री की अवधारणा शिव ने इसीलिए अर्द्धनारीश्वर के रूप में की है किन पुरुष ज्यादा न स्त्री कम सृजन संरक्षण और विकास में बराबर की भागीदारी यही स्त्री पुरुष के मध्य रिश्ते का सच है बदलना होगा इस सूत्र वाक्य को यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते तत् रमन्ते देवता और इसके आदर्शों को बदलकर एक नवीन सूत्र गढ़ना होगा कि नारी जहां समादरित समतुल्य होगी बराबर की भागीदार होगी वहीं सुख शांति और समृद्धि होगी
जब स्त्री पुरुष दोनों कन्धे से कन्धा मिलाकर जागतिक व्यूह को भेदेंगे संघर्षों से जूझेंगे तभीअर्द्धनारिश्वर की संकल्पना सार्थक होगी नारी स्वत:स्फूर्त अपने स्थान को पा लेगी और सम्यक् स्थान पाना ही उसकी
और पुरुष की सार्थकता है।
११५ वें अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक बधाईयां एवं मंगलकामनाऍं। भीख नहीं भागीदारी
जीवन में बराबर की हिस्सेदारी। नारी शक्ति को सादर नमन।
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स्तंभ संपादन : शक्ति रीता माधवी क्षमा
स्तंभ सज्जा : शक्ति सीमा स्वाति अनुभूति
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सम्पादकीय. शक्ति आलेख :२ / ३ /२ :
अपने ही रंग में रंग ले मुझको याद रहेगी होली रे
होली : रंगों का उत्सव ही नहीं हमारे जीने की बजह भी है.
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शक्ति. रेनू मधुप शालिनी
साझे उल्लास का भी नाम है होली : त्योहार केवल तिथियों का क्रम नहीं होते, वे समाज की सामूहिक चेतना की धड़कन होते हैं। विशेषकर होली जैसा पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि जीवन केवल व्यक्तिगत व्यस्तताओं का नाम नहीं, बल्कि साझे उल्लास का भी नाम है। जब तक त्योहार जीवित रहते हैं, समाज में संवेदना जीवित रहती है; और जब संवेदना क्षीण होने लगती है, तो सबसे पहले त्योहारों की चमक फीकी पड़ती है।
कभी त्योहार जीवन की सहज लय का हिस्सा हुआ करते थे। उनका आगमन किसी विशेष घोषणा का मोहताज नहीं था। मौसम बदलते थे और मन भी बदल जाता था। घरों में तैयारियाँ कई दिनों पहले आरंभ हो जाती थीं। सफाई केवल दीवारों की नहीं, मन की भी होती थी। रिश्तों पर जमी धूल झाड़ी जाती थी और मनुष्यों के बीच के छोटे-छोटे अंतराल पाटे जाते थे। त्योहार मिलन का अवसर होते थे ऐसा मिलन जिसमें औपचारिकता नहीं, आत्मीयता होती थी।
औपचारिकता नहीं, आत्मीयता होती है होली में : होली का रंगे केवल अबीर- गुलाल नहीं है, वह मनुष्यता का रंग है। यह पर्व भेद मिटाने की प्रेरणा देता है। रंगों का स्पर्श हमें यह अनुभव कराता है कि मनुष्य की पहचान उसके बाहरी रूप से नहीं, भीतर की ऊष्मा से होती है। परंतु जय यही रंग केवल औपचारिकता बन जाएँ और मिलन तस्वीरों व संदेशों तक सीमित रह जाए, तब हमें ठहरकर सोचना चाहिए-क्या हम उत्सव मना रहे हैं या केवल उसका प्रदर्शन कर रहे हैं ?
समय बदला है और परिवर्तन स्वाभाविक है। आधुनिक जीवन में सुविधाएँ दी है, संभावनाएं दी है, पर जीवन की गति इतनी तीव्र कर दी है कि ठहराव के क्षण दुर्लभ होते रहें हैं। जिनमें त्योहार अपना अर्थ पाते हैं। कई बार त्योहार केवल अवकाश का दिन बनकर रह जाते हैं। लोग काम से विराम तो लेते हैं, पर उस विराम में उत्सव का भाव नहीं होता। आंतरिक उल्लास की जगह औपचारिकता का स्थान बढ़ता दिखाई देता है।
त्योहारों के मूल्य भी बदल रहे हैं। शुभकामनाएँ अब दरवाजों पर दस्तक देकर नहीं आतीं ; वे मोबाइल स्क्रीन पर चमकती पंक्तियों में सिमट जाती हैं। मिलने-जुलने का समय निकालना कठिन होता जा रहा है, और धीरे-धीरे यह कठिनता आदत बनती जा रही है। जो त्योहार कभी लोगों को निकट लाते थे, वे अव कई बार दूरियों के बीच ही गुजर जाते हैं।
त्योहारों के मूल्य भी बदल रहे हैं। जो पर्व कभी सादगी और आत्मीयता के प्रतीक थे, वे धीरे-धीरे प्रदर्शन और प्रतिस्पधां के अवसर में परिवर्तित होते दिखते हैं। पहले त्योहारों की पहचान साथ बैठने, हँसने बोलने और साइझा करने से होती थी, अब उनका केंद्र कई बार वस्तुओं और व्यवस्थाओं में सिमट जाता है। अब त्योहार बाजार के हाथों में चले जाते हैं तो ये समाज को जोड़ने के बजाय तुलना और प्रदर्शन का माध्यम
बनने लगते हैं। बाहरी सजावट के बीच मानवीय ऊष्मा दब जाती है।
बनने लगते हैं। बाहरी सजावट के बीच मानवीय ऊष्मा दब जाती है।
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| फोटो : शक्ति मीना |
यह कहना उचित नहीं कि परंपराएँ ज्यों की त्यों बनी रहें। समाज स्थिर नहीं होता, त्योहार भी समय के साथ बदलते हैं। पर यदि परिवर्तन के बीच उनकी मानवीयता ही नष्ट हो जाए, तो केवल रूप बचता है, सार नहीं। तब त्योहार रस्म बन जाते हैं, उत्सव नहीं। वास्तव में त्योहारों का महत्व केवल सांस्कृतिक नहीं, मानवीय है। वे हमे स्मरण कराते हैं कि जीवन केवल व्यक्तिगत संघर्ष का नाम नहीं; उसमें साझा सुख-दुख भी हैं। त्योहार पीढ़ियों के बीच संवाद का सेतु होते हैं। वे स्मृतियों को भविष्य से जोड़ते हैं और मनुष्य को मनुष्य के निकट लाते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम त्योहारों को नए संदभों में समझें। आधुनिकता को नकारना समाधान नहीं, पर संवेदना को बचाए रखना आवश्यक है। यदि इस होली पर हम कवल रंग न लगाकर संबंधा पर जमी धूल को भी झाड़ दें, यदि औपचारिक संदेशों की जगह किसी के द्वार पर जाकर मुस्कान बाँट दें, तो शायद त्योहार अपनी खोई हुई आत्मा पुनः पा सकेंगे।
क्योंकि त्योहारों की असली रोशनी दीयो या रंगों में नहीं, मनुष्य के भीतर जलती है और वही रोशनी समाज को जीवित रखती है।
*
आगे जारी
*
स्तंभ संपादन : शक्ति नीलम प्रीति क्षमा
सज्जा : मंजिता सीमा अनुभूति
नामांकन के लिए सीटें कुछ उपलब्ध हैं : संपर्क करें
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सम्पादकीय :त्रिशक्ति : गोरी साँवरे सलोनी :पद्य संग्रह : आलेख : पृष्ठ : २ / ३.
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ढाई आखर प्रेम का : प्रेम के सात रंग
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संपादन
शक्ति. रेनू डॉ.आर के. सीमा
*
गोरी साँवरे सलोनी : पद्य संग्रह :अनुभाग
*
शक्तिअनुभाग.
*
शक्ति. रेनू शब्दमुखर.
जयपुर.
कवयित्री, लेखिका
शक्ति प्रधान सम्पादिका एम एस मीडिया
*
क्षणिकाएं
*
मैंने तेरे लिए ही
सात रंग के सपने चुने
*
*
संदर्भित : छाया : शक्ति. रेनू
*
चेहरे पर रंग है,
पर मन भी रंगीन रहे,
होली तभी सच्ची है,
जब रिश्ते कटु न रहें.
द्वेष की धूल झाड़ो,
प्रेम का अबीर उड़ाओ,
हर दिल में
विश्वास का इंद्रधनुष सजाओ.
भाविकाएँ
*
खो देंगे सब कुछ
पर तुम्हें ना दे पाएंगे.
*
तुम्हारी हर चीज
अनमोल रतन सी संभाली है दिल में
जैसे कोई विरासत ,
कोई खजाना बेशुमार.
तुमने पुकारा,फटाक से निकाल दी हमने
न रुके पाँव
न ठिठका दिल का संसार.
यूं ही ख्याल आया
एक पल आंखें नम हुई
तुम तो हमारे पास हो पूरे
हर सांस में बसे हो.
पर अगर कभी मांगोगे तुम्हें ही हमसे
दे ना पाएंगे हम, बस रो देंगे चुपके से.
क्योंकि तुम हो तो सब कुछ है
तुम बिन खाली यह जहां.
हर धड़कन तुम्हारी,
हर खुशी तुम्हारी पहचान.
तुम्हारा होना ही जीवन का सबसे प्यारा जहां
खो देंगे सब कुछ पर तुम्हें ना दे पाएंगे.
*
*
पृष्ठ सज्जा : संपादन :
शक्ति शालिनी मधुप अनुभूति
*
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शक्ति.अनुभाग
शालिनी रॉय
नैनीताल डेस्क
कवयित्री, लेखिका
शक्ति. प्रधान सम्पादिका. एम एस मीडिया
*
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भाविकाएँ
*
भाविकाएँ
*
आन मिलो कान्हा, वृंदावन.
आह्लादित-मन हुआ सतरंगी,
बाट निहार रहा अब मोहन।
कोरी चुनरिया मचल रही अब,
दौड़ चली राधा बन जोगन।।
फागुन मास उल्लास लिए प्रिय,
अंतस प्रेमिल भीग गया तन।
चंदन सा मन महक गया अब,
प्रेम-पुष्प खिला मन-आँगन।।
भीग रही चुनरी यह मोहन,
लाज लगे पिय देख रहे हैं।
मन की बात छुपे नही कान्हा,
अँखियन से ही निरेख रहे हैं।।
*
अनुभाग
प्रीत बयार बहे मन आंगन
भंग के रंग में सुधि बिसराई,
नाच रहे धरती अरु अंबर।
प्रेम सुधा रस घोल रहा नभ,
मन प्रसन्न यह दृश्य है सुन्दर।।
मन मलंग सतरंगी हुआ अब,
प्रीत बयार बहे मन आंगन।
चूनर ओढ़त, घूंघट खोलत,
देख रही शरमा कर 'साजन'।।
जोगन के नखरे जब देखत,
अति मनभावन रूप सुहावन।
भाग्य खुले इन नैनन के अब,
आज मिले यह दर्शन पावन।।
*
सन्दर्भ : माया : राधिका : छाया
सन्दर्भ : माया : राधिका : छाया
*
भाविका : अनुभाग :
सतरंगी ये हुआ मन-आंगन
*
फागुन-मास अति मनमोहक,
है खुशहाल धरा मनभावन।
रंग, गुलाल, अबीर उड़ावत,
सतरंगी ये हुआ मन-आंगन।।पत्नी-धर्म निभाए राधिका,
प्रेम-धर्म बस राधा-मोहन।
प्रेम रंग में लाल हुआ तन,
आन मिलो कान्हा, वृंदावन।।
देर हुई मोरे रुसे कन्हैया,
कैसे मनाऊँ, बता मेरे मोहन,
कोरी चुनरिया मचल रही अब,
दौड़ चली राधा बन जोगन।।
*
शक्ति.अनुभाग
शालिनी रॉय नैनीताल डेस्क
भाविका :
फागुन शोर मचाए..२
*
ताप और शीत का मिश्रण
प्रकृति-प्रेम का ये अनुबंधन
जाकर कोई पिय से कह दे - २
चटक रंग ले आये...!
फागुन शोर मचाए..२
भर-भर लाओ रंग-पिचकारी
सतरंगी कर दो मेरी साड़ी
बहुरंगी है मोरा बलमुआ - २
जाके कोई ले आये...!
फागुन शोर मचाए.. २
कब आओगे मोरे सांवरिया
रंग दो आकर कोरी चुनरिया
राधा-कृष्ण विरह में व्याकुल,
तन्हाई तड़पाये...!
फागुन शोर मचाए..२
*
कब आओगे मोरे सांवरिया
रंग दो आकर कोरी चुनरिया
राधा-कृष्ण विरह में व्याकुल,
तन्हाई तड़पाये...!
फागुन शोर मचाए..२
शीतली बयरिया सिहर मैं जाऊं
बोलो कन्हैया किधर मैं जाऊं
उधव तुम माधव से कहना -२
रुत ये सही न जाए...!
फागुन शोर मचाए..२
केसरिया हो जाए ये आँगन,
धड़कन गाए प्रेम का गुंजन.
तुम बिन सूनी सारी होली-२
कोयल कूक सुनाए...!
फागुन शोर मचाए... २
तेरे रंग में रंग गई मोहन
विरह में तेरे बन गई जोगन
आ जाओ फिर से वृन्दावन-२
संग-संग रास रचाएं...!
फागुन शोर मचाए... २
शक्ति.अनुभाग
डॉ.रजनी परमार.
द्वारिका डेस्क.
*
भाविकाएँ
*
*
जब कभी मन में
घनीभूत पीड़ा ने घर किया,
मैंने कर दिया स्वयं को
प्रकृति के हवाले,
हवाओं में उड़ा डाली
सारी अपेक्षाएं ,
नदियों में धो डाले
अपने आंसू,
सौंप दी सूरज को
अपनी सारी तपिश
और कर दिया स्वयं को
उस अदृश्य सत्ता के हवाले,
जो स्वामी है
संपूर्ण चर-अचर अस्तित्व का !
*
दूरियाँ नजदीकियां बन गयी.
स्वयं : शक्ति रजनी : छाया
*
हर बात जुबां से कह दी जाए,
ये जरूरी तो नहीं,
उम्र गुजरी है अभी आधी,
ये गुजरी पूरी तो नहीं
एहसासों से रंग देंगे वो,
मेरे सुने मन के मधुवन को
वो दूर बैठे हैं तो क्या,
दिलों की दूरी तो नहीं.
*
पृष्ठ सज्जा : संपादन :
शक्ति स्वाति मधुप शालिनी
*
शक्ति. अनुभाग
शक्ति.सीमा डॉ.आर.के.
*
होली गीत.
*
कान्हा छोड़ वृन्दावन में
कहा भागे जाए
*
डॉ. आर. के. दुबे
कवि लेखक गीतकार
*
पृष्ठ सज्जा : संपादन : शक्ति शालिनी मधुप अनुभूति
*
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राधिकाकृष्णरुक्मिणी : आज का गीत : जीवन संगीत :भजन : पृष्ठ : ३.
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⭐
संपादन
शक्ति.डॉ.अनु रजनी तनु.
*
हमारी पसंद
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प्यार : व्यवहार : संस्कार
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फ़िल्म : श्याम तेरे कितने नाम.१९७७.
सितारे : सचिन. सारिका.
गाना : जब जब तू मेरे सामने आए
मन का संयम टूटा जाए
*
गीत : रविंद्र जैन. संगीत : रविंद्र जैन. गायक : जसपाल सिंह.
गाना सुनने व देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक को बताए
*
*
हे गिरि नंदनी, विश्व विनोदनी,भगवती शैल सुते
*
फिल्म : मदर इण्डिया.१९५७.
गाना : होली आई रे कन्हाई रंग छलके
सुना दें ज़रा बांसुरी
सितारे : सुनील दत्त. नरगिस. राज कुमार.
गीत : शकील बदायूनी.संगीत : नौशाद.गायिका : लता.शमशाद बेगम.
गाना सुनने व देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक को दवाएं
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राधिकाकृष्णरुक्मिणी : शक्ति : कला दीर्घा : पृष्ठ : ५ .
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इंद्रप्रस्थ डेस्क
संपादन
शक्ति. मंजिता रंजिता अनुभूति
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राधिकाकृष्णरुक्मिणी : शक्ति : फोटो दीर्घा : पृष्ठ :७.
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राधिकाकृष्णरुक्मिणी : समसामयिकी.समाचार : दृश्यम : दिन विशेष : पृष्ठ : ८.
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संपादन
शक्ति.डॉ.रजनी अनु रितु
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Contents.
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Times Media Powered
Shakti.Pooja. Arya.Dr.Rajeev Ranjan. Child Specialist.Biharsharif. Supporting
*
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Shakti Editorial. Prose : English Page : 4
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Editor Shakti.
Anuradha Priya Madhvee Seema
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Phool Dei a Traditional Basant Festival in Uttarakhand.
Shakti Priya Madhup Bharti.
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| Phool Dei : Basant : collage : Nainital. Shakti. Deepti Latika Lakshika |
We Latika Lakshika and Deepti witness the Phool Dei is a vibrant, traditional spring harvest festival celebrated in the Garhwal and Kumaon regions of Uttarakhand on the first day of the Hindu month of Chaitra (March-April).
A festival is a special celebration or recurring event, often a public holiday, centered around a community's culture, religion, or shared interest, featuring music, food, traditions, and activities to foster unity, preserve heritage, and bring people together for joy and commemoration.
It symbolizes the arrival of spring, prosperity, and a deep connection to nature, where children Phulyari decorate doorsteps with fresh flowers, rice, and jaggery.
If we celebrate the key aspects of the festival include :
Cultural Significance : it represents Uttarakhand's heritage, with children placing flowers on doorsteps to wish for a prosperous year.
Rituals : Young girls and boys collect flowers (such as Fyoli, Buransh, and mustard) and visit houses, singing traditional songs and putting flowers on the thresholds (Dehri).
Dei Offering : A ceremonial pudding made from jaggery, flour, and curd—known as Dei is offered to visitors.
Blessings : In return for the flowers, households give children gifts, money, or sweets, and blessings.
The festival brings a sense of community, with, in some regions, the festivities lasting for an entire month.
If we celebrate the key aspects of the festival include :
Cultural Significance : it represents Uttarakhand's heritage, with children placing flowers on doorsteps to wish for a prosperous year.
Rituals : Young girls and boys collect flowers (such as Fyoli, Buransh, and mustard) and visit houses, singing traditional songs and putting flowers on the thresholds (Dehri).
Dei Offering : A ceremonial pudding made from jaggery, flour, and curd—known as Dei is offered to visitors.
Blessings : In return for the flowers, households give children gifts, money, or sweets, and blessings.
The festival brings a sense of community, with, in some regions, the festivities lasting for an entire month.
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Nainital Desk.
Passage Editor : Shakti Shalini Latika Lakshika.
Decorative : Shakti Beena Kanchan Deepti Bora.
Remembering the Kapda Phad Holi
A unique Tradition of Bihari Holi.
Ashok Karn.
Ex.Press Photographer Hindustan Times Patna Ranchi.
Co : Shakti Dr. Sunita Priya Madhup.
Kapda Phad Holi : Remembering the Kapda Phad Holi A unique Tradition of Bihari Holi. Ashok Karn. Ex.Press Photographer Hindustan Times Patna Ranchi. Co : Shakti Dr. Sunita Priya Madhup. Kapda Phad Holi Just I go in our high time when we were at age 20 to 30. We were full of energy. completely roamed at the day of holi.We always got together meeting one to one. We used to visit our friends houses just I remembered .We used to sing a chorus. These are specially Key Aspects of Kapda Phad Holi in Bihar : Action is known to each Bihari. Participants, often in groups, tear each other's clothes (usually shirts /kurtas) while celebrating. While playing such an indecent holi such an atmosphere is created. It is characterized by loud music, dholak beats, and intense, rustic fun, where traditional,.
Cultural Significance : This tradition is deeply rooted in local culture, especially among youth, making the celebration more intimate and energetic, often blending with mud or sludge bathing. Locatedly it is quite popularized in Patna, Jehanabad, and rural Bihar.Timing: Celebrated during the main day of Holi (Rangwali Holi). It is a, intense, and, unapologetic, expression of, joy, and camaraderie.
Holika Dahan : A Journey Down Memory Lane Holika Dahan always takes me on a nostalgic trip back to my childhood. I vividly remember the excitement of running around with my siblings and friends, searching for discarded wooden items—broken chairs, old benches, and anything wooden that caught our eyes. Our mischievous mission was simple: gather… Celebrating the Colors of Life : The Vibrance of Holi As the month of Phagun comes to an end, India bursts into a celebration of colors, love, and spring—Holi, one of the most joyous and significant Hindu festivals. Holi symbolizes rebirth and
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| Celebrating the Colors of Life : Photo Ashok Karn. |
rejuvenation, commemorating the eternal love of Lord Krishna and Radha. People dressed… Shirtless Holi – Shirtless Holi – A Contemporary Expression of Celebration As the month of Phagun draws to a close, India comes alive with the vibrant festival of Holi—an occasion that celebrates color, love, and the arrival of spring. Rooted in the divine bond of Lord Krishna and Radha, Holi symbolizes renewal, joy, and the timeless spirit… Kapada Phad Holi (cloth-tearing Holi) is a raw, high-energy, and traditional form of celebration in Bihar, particularly popular in rural areas
and places like Jehanabad and Forbesganj. It involves singing folk songs (Jogira), dancing, and tearing clothes off friends in a playful, chaotic, and enthusiastic celebration of the festival.
Column Editor Shakti Dr R.K Sinha.Bhagwanti Seema Ranjita.
Decorative : Shakti : Dr Bhwana Smita Sangeeta Madhvee
a decorative of Holika Dahan.
Negativity and illuminate your life with
Happiness and Prosperity.
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Shakti.Anjushree.Aasis.Anita.
Powered by Pratham Media.
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Editor.
Shakti.Shalini Ranjita Seema.
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Holi : Togetherness Collage
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Day Personal : You Said it : Page : 9.
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Editor.
Nainital Desk.
Shakti. Lakshika Latika Beena Joshi.
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7.3.26
Day : Special.
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Our united warm wishes form
Dev Shakti Media Family
to You
Pram . Prakriti. Pahad : Purushottam
Shakti Shiv ke liye
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an amature photographer and a reel maker
Marriage Anniversary
Happy Returns of the Day.
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Shakti Team
Shakti. Bharti. Lakshika Latika Joshi.
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Coolex Refrigeration : AC: Fridge : Washing Machine : Chhajju Road Bagicha. *Biharsharif Supporting. -------- You Said it : Short Reel 9/ 3 ---------- Editor * Shakti Priya Deepti Manju Darjeeling Desk Nadiyan Ka Pani Dariya Se Mil ke Sagar Ki Ore Chale Short Video News : Clip : Sangla : Chitkul : Kinnaur Nature whispering you |










































































































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